मुजरा का अर्थ एवं परिभाषा

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मुजरा मनोरंजन का माध्यम व कलाकार की विपरीत परिस्थितियों में अजीविका का साधन रहा, मुजरा क्या है इसे विभिन्न अर्थो में समझा जा सकता है। “मुजरेको मुजरऊ” भी कहा जाता है।

मुजरा शब्द का अर्थ है:- “राजा या किसी बडे़ व्यक्ति (आदमी) के सामने झुककर किया जाने वाला अभिवादन, नमस्कार, प्रणाम” “सामान्यतया किया जाने वाला अभिवादन,नमस्कार।”

“वेश्या द्वारा बिना नाचे, बैठकर गाया जाने वाला गाना। दामाद को गाया जाने वाला एक लोक गीत। किसी राजा या बादशाह के दरबार में नौकरी हेतु उपस्थित होने की क्रिया या भाव।” इसके अतिरिक्त मुजरे के विशय में अलग-अलग रूप से इसे परिभाषित किया गया है मुजरे का अन्य शब्दों में अर्थ- “जारी किया हुआ, बहाया हुआ, छोटे व्यक्तियों का बडे़ व्यक्तियों (आदमियो) को प्रणाम, मिन्हा, वज़ा।”मुजरे के पारिभाशिक अर्थो को देखा जाये तो केवल बैठकर की गयी गायन की प्रस्तुति मुजरा कहलाती है। किन्तु मुजरा के कलाकारों द्वारा जितना सरंक्षण गायन को प्राप्त हुआ उतना ही नृत्य को भी प्राप्त हुआ इसलिए इसका दूसरा पक्ष भी है, क्योंकि नृत्य के जिस रूप को मुजरे के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, वह शुद्ध रूप से शास्त्रीय नृत्य कथक का रूप नहीं था, क्योंकि उसमें श्रृँगार के भाव थे जो उपासना के लिए नहीं मनोरंजन व अर्थोपार्जन के लिए थे। 

इस प्रकार मुजरे के दो रूपों को माना जा सकता है। जिसे मुजरे के प्रकार भी कहा जाये तो गलत नहीं होगा-
  1. बैठक का मुजरा
  2. नाच मुजरा
यह एक अलग पक्ष है कि नाच मुजरे के संदर्भ में विशेष रूप से कहीं लिखित प्रमाण नही है, परन्तु ऐसे कई प्रमाण हैं जो यह स्पश्ट करते हैं कि मुजरा कलाकारो द्वारा नृत्य को संरक्षण प्राप्त हुआ और यदि संरक्षण प्राप्त हुआ है तो यह कहना कदाचित गलत न होगा कि नृत्य की प्रस्तुतियाँ भी हुई है। यहाँ प्रस्तुतियों के विशय मे कहने से तात्पर्य यह है कि नाच मुजरे का अस्तित्व था। जैसे कि पूर्व में परिभाषा के माध्यम से स्पष्ट किया गया है कि वास्तविकता में ‘मुजरा’ शब्द से क्या अभिप्राय है। 

राजदरबारो में उत्सव व विशेष अवसरों पर नृत्य की प्रस्तुतियों का आयोजन होता था। उन प्रस्तुतियों मे कुछ लोक तो कुछ शास्त्रीय तथा अर्द्धशास्त्रीय नृत्य सभाएँ भी होती थी। इस प्रकार हम यह मान सकते हैं कि मुजरे का एक प्रकार नाच मुजरा भी है।

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