प्रेम का अर्थ, परिभाषा और स्वरूप

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प्रेम शब्द अपने आप में बड़ा व्यापक शब्द है। प्रेम शब्द का व्यवहार अनेक अर्थों में होता है, यथा - रूप, गुण, काम-वासना-जनित, स्नेह, प्रीति, अनुराग, अनुरक्ति आदि। प्रेम एक ऐसी अनुभूति है जिसे शब्दों के माध्यम से समझाना सम्भव नहीं। ‘प्रेम’ अहसास की वस्तु अधिक है आरै व्याख्या की कम। हमारे निकट साहचर्य से हमारी रागात्मक वृत्तियाँ के आकर्षण का केन्द्र बना रहे। जिसके पास होने पर हमें असीम सुख की अनुभूति होती हो और दूर हो जाने पर दुख का अनुभव हो और किसी कार्य में मन नहीं लगता। जिसे हम संसार भर की सारी खुशियाँ देना चाहते हैं और बिछुडने पर सुख की कामना करते हैं। प्रेम उस फूल की तरह है जिसकी खुशबू को सूंघा तो जा सकता है छुआ नहीं जा सकता। कबीरादि संतों ने भी प्रेम को ईश्वर तक ले जाने वाला बताया है। किसी ने प्रेम को ईश्वर-प्राप्ति का साधन माना है तो किसी ने आध्यात्मिक, अभौतिक तत्त्व का रूप माना। प्रेम वाणी का विषय नहीं है, गूंगे के स्वाद की भाँति अनिर्वचनीय हातेा है।

प्रेम का अर्थ

प्रेम’ अथवा ‘प्रेमन’ भाववाचक संज्ञा शब्द है। यह शब्द संस्कृत में नपुंसक लिंग और हिन्दी में दोनों लिंगों में प्रयोग किया जाता है। वाचस्पत्य कोशकार ने इसकी व्युत्पत्ति ‘प्रिय’ शब्द से मानते हुए इसका प्रयागे सौहार्द, स्नेह एवं हर्ष के अर्थ मे किया है। संक्षिप्त हिंदी शब्द सागर के अनुसार - प्रेम वह भाव जिसके अनुसार किसी दृष्टि से अच्छी लगने वाली चीज या व्यक्ति को देखने, पाने, भोगने या सुरक्षित करने की इच्छा है। कबीरदास की मान्यता है कि मानवता के विकास में प्रेम का ही अहम् यागेदान है जिस हृदय में प्रेम का संचरण नही हातेा उस घट या हृदय को श्मशान के समान समझना चाहिए - 

 ‘‘जा घट प्रेम न संचरै सो घट जान मसान। 
 जैसे खाल लाहेार की साँस लेत बिनु प्रान।।’’ 

जो व्यक्ति इस संसार में आकर प्रेम-रस का पान नहीं करते, उनका इस संसार में आना उसी व्यथ है। जिस प्रकार किसी अतिथि का सूने घर में आना - 

 ‘‘कबीर प्रेम न चाबिया, चाशिन लीया साब। 
 सूने घर का पाहुणा ज्यूँ आया त्यँ जाव।’’

जब व्यक्ति सुन्दर वस्तु के प्रति आकर्षित होता है तो स्वाभाविक है कि उसके प्रति प्रेम उत्पन्न होगा। सृष्टि का उद्भव और विकास प्रेम से ही हुआ है। जीवन के बाहर और भीतर वही व्याप्त रहता है। प्रेम से हृदय के तृप्ति, रूप, आनन्द का परिचय होता है। 

‘हिन्दी शब्द सागर’ के अनुसार ‘प्रेम’ वह मनोवृत्ति है जिसके अनुसार वस्तु या व्यक्ति के सम्बन्ध में यह इच्छा होती है। कि वह सदा हमारे पास या हमारे साथ रहे। मुहब्बत, अनुराग, प्रीति आदि। 

प्रेम : परिभाषा एवं स्वरूप

डॉ. बच्चन सिंह ने प्रेम की परिभाषा देते हुए कहा है - ‘‘प्रेम वह अनुकूल वदेनीय मनोवृत्ति है जो किसी व्यक्ति अन्य जीव या पदार्थ के सौन्दर्य, गुण, शील, सामीप्य आदि के कारण उत्पन्न हातेी है।’’ मानविकी पारिभाषिक काश्ेा के अनुसार - ‘‘किसी के प्रति प्रसन्नतामय गम्भीर आकर्शण का भाव प्रेम कहलाता है।’’ 

डॉŒ श्रीमती देव कथूरिया ने प्रेम की परिभाषा देते हुए कहा है कि ‘‘प्रेम एक ऐसा तत्त्व है जिसमें व्यक्ति या वस्तु का आकर्शण पे्ररक के रूप में विद्यमान रहता है, पे्रम वस्तु या व्यक्ति के लिए उसकी भौतिक अथवा मानसिक उपलब्धि अर्थात् सानिध्य के लिए, मन में उत्पन्न होने वाली इच्छा, कामना, भावना या सच्चाई का नाम है।’’ 

गोस्वामी तुलसीदास ने प्रेम के अभाव में, मनुष्य के सुख, सम्पदा और ज्ञान को तुच्छ मानते हुए कहा है - 

‘‘जो सुखु करमु जरि जाऊ, जहै न राम पद पंकज भाऊ। 
 जागेु कुजोगु ग्यानु अग्यानू, जहै निहे राम पमे परधानू।।’’ 

प्रेम स्वयं में व्यापक, विराट् व शक्तिशाली अनुभूति हैं। इसके जागृत होते ही आत्मा की तत्काल अनुभूति हो जाती है। प्रेम की अनुभूति जाग्रत होने से पहले सब कुछ निर्जीव, आनन्दरहित व जड़ है। किन्तु इसके जागतृ हाते ही सभी कुछ प्रफुल्लित, दिव्य, चैतन्य और आलाकेमय हो जाता है। इस अवस्था में पहुँचने के पश्चात् प्राणी प्रकृति के सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है तथा देह तथा चित्त से ऊपर उठकर आत्मा के आनन्दमय स्वरूप में विलीन हो जाता है। 

पाश्चात्य विद्वानों ने भी प्रेम को जीवन के लिए अनिवार्य बताया है। पाश्चात्य विद्वान प्लेटो के अनुसार, - ‘‘प्रेमानुभूव से रहित व्यक्ति सदा अंधकार में भटकता रहता है।’’ हैवलॉक वासना और प्रेम में अन्तर मानते हैं और कहते हैं कि तुच्छ वासना के रहते हुए प्रेम का कमल नहीं खिल सकता।’’ इस प्रकार पाश्चात्य विद्वानों ने भी प्रेम की अनिवार्यता को स्वीकार किया है। प्रेम और वासना में स्पष्ट अन्तर करते हुए जीवन के लिए उदात्त प्रेम को श्रेयस्कर माना है। प्रेम का प्रस्फुटन अनेक रूपों में होता है। कभी उस पर भक्ति का रंग चढ़ा होता है, कभी प्रकृति के प्रति अनुराग में अनुरंजित होता है, कभी सन्तान के प्रति तो कभी स्थूल नारी-सौंदर्य होता है। प्रेम वह मणि है जिसमें से प्रसारित होने वाली हर रंग की किरण अपना वैशिश्टय बनाए रहती है। वदेों में प्रेम के सद्-असद् रूपों के बारे में बताया गया है। वेदों में धर्म-सम्मत प्रेम को ही आदर्श प्रेम के रूप में स्वीकार किया है। नारी-पुरुष के दैहिक सम्बन्धों को केवल दाम्पत्य-प्रेम के अन्तगर्त ही स्वीकृति मिली है। दाम्पत्यतेर नारी-पुरुष के शारीरिक प्रेम को धर्म-विरूद्ध आरै अकल्याणकार कहा गया है। 

सन्दर्भ-
  1. डॉ. रामेश्वर लाल खण्डेलवाल, आधुनिक हिंदी कविता में प्रेम और सौन्दर्य, पृ. 87 
  2. रामचन्द्र वर्मा, संक्षिप्त हिन्दी शब्द सागर, पृ. 66 
  3. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, चिन्तामणि भाग एक, पृ. 45 162 
  4. सम्पा. अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध, कबीर वचनावली, पृ. 103 
  5. भू. सम्पा. श्याम सुन्दर दास, हिन्दी शब्द सागर, छठा भाग, पृ. 3244 
  6. डॉ. बच्चन सिंह, रीतिकालीन कवियो की प्रेम व्यंजन, पृ. 89 
  7. सम्पा. डॉ. नगेन्द्र, मानविकी पारिभाषिक कोश साहित्य खण्ड, पृ. 162 
  8. डॉ. श्रीमती देव कथूरिया, कहानी साहित्य मे प्रेम और सौन्दर्य, पृ. 34 
  9. तुलसीदास, रामचरित मानस, अयोध्या काण्ड, चौपाई 29, पृ. 89 163

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