रामकृष्ण मिशन की स्थापना, कार्य एवं इसके प्रमुख उद्देश्य

अनुक्रम
रामकृष्ण मिशन एक ऐसा संगठन है जो एक अध्यात्मिक आंदोलन है जिसे रामकृष्ण आंदोलन और वेदान्त आंदोलन। रामकृष्ण मिशन एक स्वैच्छिक संगठन है जिसकी स्थापना उनके मुख्य शिष्य स्वामी विवेकान्नद जी द्वारा 1 मई 1897 में की गयी। मिशन ने निम्न क्षेत्र में प्रमुखता से की। जैसे स्वास्थ्य, सेवा, प्राकृतिक आपदा बचाव, ग्रामीण प्रबंधन, जनजाति कल्याण, प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा एवं सास्कृतिक क्षेत्र मे। सगंठन के संचालन में लगभग सैकडों भिक्षु एवं हजारों ग्रहस्थ आश्रम वाले शिष्यों का हाथ रहा। मिशन मुख्यत: कर्म यागे के सिद्धान्त पर कार्य करता है।

रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय बेलूर मठ (हावड़ा) कलकत्ता पश्चिम बगांल में स्थित है। रामकृष्ण परमहसं (1836-1886) 19वी शताब्दी के प्रमुख सन्त जाने जाते है, जो रामकृष्ण मिशन के आध्यात्मिक प्रवर्तक माने जाते। रामकृष्ण जी दक्षिणशेवर मंदिर के मुख्य पुजारी रहे। और उन्होंने बहुत से मठ में रहने वाले ग्रहस्थ जीवन/आश्रम में रहने वाले शिष्यों को अपनी और आकर्षित किया। नरेन्द्र नाथ दत्त जो कि बाद में विवेकानन्द जी के नाम से प्रसिद्ध हुये उनके मुख्य शिष्य थे। परमहसं जी ने अपनी मृत्यु (सन् 1886) से ठीक पहले अपने सन्यासी वस्त्र, अपने नौजवान शिष्य विवेकानन्द जी को प्रदान किये और अपनी सन्यास की योजना बनाई।

रामकृष्ण मिशन के संस्थापक स्वामी विवेकानन्द
रामकृष्ण मिशन के संस्थापक स्वामी विवेकानन्द

रामकृष्ण जी को अपने प्रमुख शिष्य ‘‘स्वामी विवेकानन्द’’ जी से अत्यधिक लगाव था और उनकी इच्छा थी कि आगे की जिम्मेदारी विवेकानन्द जी ही संभाले। रामकृष्ण जी की मृत्यु के प्श्चात 1886 ई. उनके शिष्यों ने प्रथम मठ की स्थापना बरंगारे (Barengare) में की। कुछ समय पश्चात स्वामी विवेकानन्द्र जी घुमन्तु सन्त के रूप में जाने गये और सन् 1893 ई. में उन्हें ‘‘विश्व धर्म महासभा’’ में प्रतिनिधि के रूप में बुलाया गया। यहां उनका भाषण ‘‘अमेरिका के बहनों और भाइयों’’ से शुरू हुआ जिसे विश्वव्यापी समर्थन मिला। विवेकानन्द जी व्याख्यान भ्रमण पर गये और उन्होनें अपने व्यक्तिगत भाषण हिन्दुत्व और आध्यात्मिकता पर दिये। और उन्होंने प्रथम वेदान्त समिति की स्थापना अमेरिका के न्यूयार्क सभा में की। और जब वह पुन: भारत लौटे तो उन्होंने 1 May 1897 ई. में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। यद्यपि वह हिन्दू धर्म के साधू थे लेकिन उन्होंने अपने शिष्यों को विश्व के सभी धर्मों के प्रति आस्था रखने को कहा जैसा कि उनके मुख्य रामकृष्ण जी ने उन्हें शिक्षा दी थी कि सभी धर्म ईश्वर की प्राप्ति के रास्ते है। 
रामकृष्ण मिशन के संस्थापक रामकृष्ण परमहंस जी थे। परन्तु वास्तव में मिशन को आगे बढ़ाने का श्रेय उनके प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानन्द जी को है। अत: उनके जीवन परिचय से अवगत हानेा अति आवश्यक है।

स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म् 12 जनवरी 1863 ई. कलकत्ता में हुआ था। उनकी माता जी धार्मिक विचारों की थी। उनका परिवार एक पारंपरिक कायस्थ परिवार था, विवेकानंद के 9 भाई-बहन थे। उनके पिता, विश्वनाथ दत्ता, कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील थे। दुर्गाचरण दत्ता जो नरेन्द्र के दादा थे, वे संस्कृत और पारसी के विद्वान थे जिन्होंने 25 साल की उम्र में अपना परिवार और घर छाडे़कर एक सन्यासी का जीवन स्वीकार कर लिया था। उनकी माता, भुवनेश्वरी देवी एक देवभक्त गृहिणी थी। स्वामीजी के माता और पिता के अच्छे सस्कारो और अच्छी परवरिश के कारण स्वामी जी के जीवन को एक अच्छा आकार और एक उच्चकाेिट की सोच मिली।

युवा दिनों से ही उनमे आध्यात्मिकता के क्षेत्र में रुचि थी, वे हमेशा भगवान की तस्वीरों जैसे शिव, राम और सीता के सामने ध्यान लगाकर साधना करते थे। साधुओ और सन्यासियों की बाते उन्हें हमेशा प्रेरित करती रही।

रामकृष्ण मिशन के कार्य एवं शिक्षाऐं

रामकृष्ण मिशन की प्रमुख शिक्षाएँ

(1) वेदान्त ही सार्वभौमिक धर्म:- सामान्यत: प्रत्येक धर्म के व्यक्ति यह कहने में हिचकते नहीे है कि उनका धर्म ही सार्वभौमिक धर्म है जिसके माध्यम से सम्पूर्ण जगत के व्यक्तिओं का कल्याण हो सकता है। किन्तु स्वामी विवेकानन्द जी का अपना विश्वास है कि संसार में अगर काईे सार्वभौमिक धर्म बनने की शक्ति और क्षमता रखता है तो वह वेदान्त है, उनका मत है वेदान्त धर्म के सिवाय रंगमंच धर्म है। वह किसी व्यक्ति विशेष या धर्म सस्ंथापक के जीवन के आधार पर खडे़ हैं। उसी व्यक्ति विशेष के द्वारा वे अपने विवादग्रस्त प्रश्नों के सामधान करने और उसे ही अपने धर्म-बल का केन्द्र बिन्दु समझते। और सबसे आश्चर्य की बात यह है कि उसी अधिश्ठाता विशेष को जीवन की ऐतहासिक सत्यता पर ही उन धर्मो की सारी नींव प्रतिश्ठित है। स्वामी विवेकानन्द जी कहते हैं कि भारतीय धर्म को छोडकर सभी बड़ धर्म ऎतहासिक जीवनियों के आधार पर खडे़ हैं।

स्वामी जी का कहना है कि भारतीय ईश्वर सगुण और निर्गुण दोनों है। ठीक उसी प्रकार हमारा धर्म भी पूर्णत: निर्गुण हो अर्थात किसी व्यक्ति विशेष पर धर्म निर्भर नहीं करता है। फिर भी हम यह पाते हैं कि इस धर्म में अनके अवतारों का वर्णन किया गया है और भविष्य के अनके अवतारों के जन्म की व्याख्या की गयी है। बल्कि इस धर्म में नये धर्म के प्रवर्तकों के आने की पूर्ण स्वतन्त्रता रहती है और भविष्य में यह प्रमाणित हो भी जाए कि जिन अवतारों व वर्णन किया गया है वे ऎतहासिक व्यक्ति नहीं है तो भी हमारे धर्म को किसी प्रकार की क्षति नही पहुंचगेी। क्योकि वह धर्म किसी व्यक्ति विशेष पर आधारित नही ंहै। यह धर्म सनातन तत्वों पर आधारित है। अगर कभी ससांर के सभी व्यक्तिओं को किसी एक मत का अवलम्बी बनाना सम्भव है, तो वह किसी एक व्यक्ति विशेष को महत्व के आधार पर नहीं बनाया जा सकता है। बल्कि सनातन सत्य सिद्धान्तों के ऊपर विश्वास करने से ही हो सकता है।

(2) सम्प्रदाय और साम्प्रदायिकता : स्वामी विवेकानन्द जी भी अन्य विद्वानों की भाँति साम्प्रदायिकता को समाज विराध्ेाी मानते है। जब कि अनेक सम्प्रदायों का समाज में होना स्वाभाविक मानते हैं। उनका मत है कि भारत में अनके सम्प्रदाय है और भविष्य में भी वे उपस्थित रहेगी। इसका मुख्य कारण है है कि भारत का धर्म इतना उदार और विशाल है, कि उसमें अनके सम्प्रदायों के उत्पन्न होने की सम्भावनायें सदैव रहती हैं। इसलिए यहां एक ही सम्प्रदाय की शाखा-प्रशाखाएं अधिक देखने को मिलती है। किन्तु इन सम्प्रदायां ेसे किसी भी प्रकार की साम्प्रदायिकता समाज में नही विकसित होनी चाहिए। बल्कि सम्प्रदाय तो रहे किन्तु साम्प्रदायिकता का अन्त हानेा चाहिए। वह यह कहते हैं कि साम्प्रदायिकता से समाज में किसी भी प्रकार की उन्नति नही होती है, किन्तु सम्प्रदायों के न रहने से समाज का काय सही चल सकता है ? इसलिऐ वह कहते है कि समाज का सम्पूर्ण कार्य कोई एक दल नही कर सकता है, बल्कि अनके दलों की आवश्यकता पड़ती है यह अनेक दल सम्प्रदाय भेदरूपी श्रम विभाजन अवश्यसम्भावी बन गया है। 

(3) धर्म का मानवीय रूप : स्वामी विवेकानन्द जी अपनी प्रतिभा एवं गम्भीर अध्ययन के द्वारा धर्म की एक वैज्ञानिक दृष्टिकाण्ेा देने में सफल हुये। धर्म को इस प्रकार होना चाहिऐ कि वह निर्धन दरिद्र व्यक्तियों की सहायता कर सके। स्वामी जी ने धर्म की व्याख्या प्राचीन रूढ़िवादी विचारधारा की लीक से उठकर की ‘‘धर्म मनुष्य के भीतर निहित देवत्व है विकास है’ धर्म न तो पुस्तकों में है, न धार्मिक सिद्वातों में केवल अनुभूति में निवास करता है।  ‘‘धर्म अन्ध विश्वास नही है, धर्म अलौकिकता में नही, वह जीवन का अत्यन्त स्वाभाविक तत्व है। ‘‘धर्म के मर्म तत्व की व्याख्या करते हुये वे कहते है’’ जीवन का स्तर जहां हीन है इन्द्रियों का आनन्द वही प्रखर होता है। खाने में जो उत्साह भेड़ियो और कुत्ते दिखाते हैं, वह उत्साह मनुष्य में भाजेन के समय नही दिखाई देता। कुत्तों और भेड़ियों का सारा आनन्द उसकी इन्द्रियों में केंिन्द्रत होता है। इसी प्रकार सभी देशों को निचले स्तर के मनुष्य इन्द्रियों को आनन्द में अत्यन्त उत्साह दिखाते हैं। किन्तु जो सच्चे अर्थो में शिक्षित और सुसंस्कृत व्यक्ति है, उनके आनन्द का आधार विचार और कला होती है, दर्शन और विज्ञान होता। किन्तु आध्यातिमकता तो और ऊंच े स्तर की होती है। अतएव इस स्तर का आनन्द भी अत्यन्त सूक्ष्म और प्रचुर होता है।

(4) समाजिक सेवा में आध्यात्मिकता : आधुनिक भारत में जिन महान विभूतियों ने जन्म लिया, उनमें स्वामी जी ने ही सर्व प्रमुख घाश्ेणा की कि भारतीय मानव की जड़ें आध्यात्मिकता में निबद्ध है। स्वामी जी के कथनानुसार यदि भारत आध्यात्मिकता की अपक्ष्ेाा करता है, तो उसका राश्ट्रीय जीवन समाप्त हो जायेगा। स्वामी जी के गुरू भगवान रामकृष्ण एक बार फिर इस आध्यात्मिकता को भारतीय जनजीवन का अगं बनाना चाहते थे। उन्होंने कहा था ‘‘परमहंस दो तरह के हैं। ज्ञानी परमहसं और प्रेमी परमहंस। जो ज्ञानी हैं, उन्हें काम से काम। जो प्रेमी हैं, जैसे सुकदेव आदि, वे ईश्वर को प्राप्त करके फिर लोक शिक्षा देते हैं। काईे अपने आप ही आम खाकर मुंह छदे डालता है, और कोई पांच आदमियों को खिलाता है, काईे कुआं खोदते समय टोकरी और कुदाल अपने घर उठा ले जाते। काईे कुंआ खुद जाने पर टोकरी और कुदाल उसी कुंऐं में डाल देते है। काईे दूसरों के लिऐ रख देते है, ताकि पड़ाेिसयों के भी काम आ जाय सुकदेव आदि ने दूसरों के लिऐ टोकरी और कुदाल रख दी थी। तुम भी दूसरों को लिए रखना।

रामकृष्ण मिशन का विकास एवं इसके प्रमुख उद्देश्य 

स्वामी विवेकानन्द जी ने 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य जहां वेदान्त सम्बन्धी शिक्षा का प्रसार करना है। वहीं नि:स्वार्थ होकर हरिजन तथा निर्धनों की सवेा करना भी है। मानवसेवा और मानव कल्याण इसके परम धर्म है। रामकृष्ण मिशन सस्ंथा के निम्न मुख्य उद्देश्य है।
  1. मानव सवेा और मानव कल्याण की भावना का प्रचार करना तथा व्यक्तियों को प्रेरित करना कि वे मानव सवेा कार्य में नि:स्वार्थ भाव से लगें।
  2. सामाजिक कार्य-कर्ताओं को शिक्षित एवं प्रशिक्षित करना। 
  3. हरिजन तथा निर्धन व्यक्तिओं की सवेा करना। 
  4. वेदान्त ज्ञान एंव दर्शन का सन्देश घर-घर पहुंचाना। 
  5. सभी धर्मा के व्यक्तिओं में सदंभावना, प्रेम तथा भाईचारे की भावना को बढ़ाना। 
  6. विभिन्न प्रकार की कलाओं को प्रोत्साहन देना। 
  7. नि:शुल्क शिक्षण-सस्ंथाओं की स्थापना करना। 
  8. नि:शुल्क अस्पतालों का प्रबन्ध करना। 
  9. मानवतावादी विचारों का प्रसार व प्रचार करना। 
  10. ‘‘आत्मनों मोक्षर्थ जगत्हितायच्-’’ अर्थात अपनी मुक्ति के साथ जगत् कल्याण क े बारे में सोचना। 
  11. सच्चरित्र, त्यागी, तपस्वी व्यक्तियों को समान सवेा हतेु तैयार करना और जन्साधारण की भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति हतेु प्रयत्न करना। 
  12. भारतीय सस्ंकृति, साहित्य तथा भारतीय शिल्प कला की उन्नति के प्रयास करना। 
  13. संघ के उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक होने वाले वृतपत्रों और नियतकालिक पत्र पत्रिकाओं तथा पुस्तकों और पत्रकों के मुद्रण और प्रकाशन करवाकर उनका नि:शुल्क या अन्य प्रकार से वितरण करवाना। 
रामकृष्ण परमंहस को केन्द्र बनाकर जो सघं बीज रूप में स्वामी विवेकानन्द जी ने स्थापित किया, अब वह विशाल वृक्ष का रूप धारण कर चुका है जिसकी शाखायें ससांर के सभी देशां ेमे स्थापित हो चुकी है तथा सघं का कार्यक्रम एक आन्दोलन का रूप धारण कर आम आदमी के दरवाजे तक पहुंच गया है।

Comments