संसाधनों का वर्गीकरण

अनुक्रम
संसाधनों का वर्गीकरण Strungera nd Devis के अनुसार संसाधनों के दो मुख्य प्रकार हैं- (i) प्राकृतिक संसाधन एवं (ii) मानवीय संसाधन। प्राकृतिक पर्यावरण के सभी पदार्थ, तत्व तथा शक्तियाँ जिन्हें मानव अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपनाता हैं, प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं। प्राकृतिक संसाधनों में भूमि, मिट्टी, खनिज (जैसे- कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, लौह अयस्क, ताँबा, सोना, यूरेनियम, गेन्राइट, चूना पत्थर, स्लेट आदि) वन एवं घास प्रदेश, जन्तु-जीवन, जल आदि सम्मिलित हैं। मानव संसाधनों का आकलन दो प्रकार से किया जा सकता हैं - (i) जनसंख्या की वास्तविक मात्रा के आधार तथा (ii) जनसंख्या के गुणों के आधार पर। मात्रात्मक अध्ययन में कुल जनसंख्या, वितरण, घनत्व, आयु-वर्ग, लिंग -संरचना कार्यशील, जनसंख्या आदि का आकलन किया जाता हैं। गुणात्मक अध्ययन में व्यक्तित्व, शिक्षा, दक्षता, श्रम आदि मूल्यों का विचार किया जाता हैं जो किसी देश के आर्थिक विकास को प्रभावित करते हैं। 

संसाधन निर्माण की प्रक्रिया में मानवीय प्रयासों की संलग्नता से अधिकांश संसाधन मानव संसाधन में बदल जाते हैं। मनुष्य प्रकृति के अनुकूलन की प्रक्रिया में इन मानवीय संसाधनों को अपनी संस्कृति द्वारा विकसित करता हैं। मानवीय संसाधनों में मनुष्य द्वारा उगायी जाने वाली फसले, उसके द्वारा पाले जाने वाले पशु, बाँध बनाकर निकाली गयी नहरे, कारखाने में उत्पन्न किये गये कृत्रिम धागे, जल-विद्युत शक्ति आदि आते हैं। 

प्रकृति के साथ संस्कृति के माध्यम से मनुष्य के हस्तक्षेप द्वारा उत्पन्न मनुष्य और पृथ्वी के अन्तर्सम्बन्धों पर आधारित उक्त वर्गीकरण के अलावा अनेक विद्वानों ने अलग-अलग आधारों पर संसाधनो का वर्गीकरण किया हैं। 

हेमर महोदय ने (1942) विनाशीलता को आधार मानकर संसाधनों को दो भागों में विभाजित किया (i) क्षयीय संसाधन तथा (ii) अक्षय संसाधन। रेनर (Renner) (1950) ने संसाधनों को उपर्युक्त दो प्रमुख वर्गों में ही विभाजित किया हैं। इन्होंने एक संरक्षात्मक कार्यक्रम बनाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों को अक्षयशील (inexhaustible) तथा क्षयशील (exhaustible) में बाँटते हुए उन्हें पुन: उपवर्गों में विभक्त किया गया हैं। इसी प्रकार क्षय संसाधनों को दो उपवर्गों में विभाजित किया गया हैं :- Maintainable एवं Non-maintainable (नव्यकरणीय तथा अनव्यकरणीय) (पुन: प्रयोजनीय एवं पुन: अप्रयोजनीय संसाधन) इस प्रकार हैडी महोदय (1950)7 ने भी संसाधनों को दो वर्गों में विभाजित किया हैं :- (1) ऐसे संसाधन जो उपयोग के द्वारा समय के साथ-साथ कम होते जा रहे हैं, उन्हें संचित (स्टॉक) संसाधन कहा जाता हैं। (2) ऐसे संसाधन जो प्रयोग के साथ प्राकृतिक रूप से पुन: स्थापित होते रहते हैं, उन्हें “वाहनीय (फ्लो) संसाधन” कहा जाता हैं। 

जिम्मरमैन (1951) में संसाधनों का वर्गीकरण उनके वितरण, मात्रा तथा बारम्बारता के आधार पर किया हैं :- 
  1. सर्वगत या सर्वसुलभ संसाधन-जैसे वायुमण्डल में आक्सीजन, नाइट्रोजन। 
  2. सामान्य सुलभ संसाधन- जैसे कृषि योग्य भूमि, मिट्टी, जल,पशु-चारण भूमि आदि। 
  3. दुर्लभ या विरल संसाधन- कुछ ही स्थानों पर उपलब्ध संसाधन जैसे-टिन, यूरेनियम, ताँबा। 
  4. एकल संसाधन- एक ही स्थान पर पाया जाने (उपलब्ध) वाला संसाधन जैसे कि व्यावसायिक स्तर पर क्रायोलाइट का उत्पादन केवल ग्रीनलैण्ड में हो रहा हैं। 
जिम्मरमैन ने संसाधनों का अन्य वर्गीकरण भी प्रस्तुत किया गया हैं जो उसके इस निरीक्षण पर आधारित हैं कि भिन्न-भिन्न अभिवृत्तियों के कारण लागे विभिन्न संसाधनों के विकास में रुचि रखते हैं। तदनुसार संसाधन निम्नलिखित प्रकार के हो सकते हैं :- (i) वे संसाधन जिन्हें व्यक्तिगत लाभ के लिए प्रयोग किया जाता हैं। (ii) वे संसाधन जिन्हें केवल सामाजिक उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाता हैं। (iii) वे संसाधन जिनके प्रयोग में व्यक्ति तथा समाज दोनों ही रुचि रखते हैं। ऐसे संसाधनों को निम्नलिखित उपवर्गों में बाँटा जा सकता हैं :- 
  1. प्रचुर मात्रा में उपलब्ध संसाधन :- जैसे कि भवन निर्माण में प्रयुक्त होने वाला पत्थर।  
  2. सीमित मात्रा में उपलब्ध संसाधन :- जैसे कि हीलियम तथा युद्धकाल में सीमित नाइलोन। 
अमेण्ड तथा ग्रेशेमर (1971)11 ने संसाधनों को उनके नव्यकरणीयता व विनाशशीलता के आधार पर तीन वर्गो में विभाजित किया हैं :- 
  • (i) अनव्यकरणीय संसाधन 
  • (ii) नव्यकरणीय संसाधन 
  • (iii) अक्षय संसाधन ।
ओवेन (1971) ने भी ऐसा ही वर्गीकरण प्रस्तुत किया हैं, जो संसाधनों की गुणवत्ता, परिवर्तनशीलता तथा पुन: प्रयोग पर आधारित हैं। उन्होंने संसाधनों के संरक्षण तथा परिरक्षण के भी उपाय भी सुझाये हैं - 

ओवेन का संसाधन वर्गीकरण हैं :- 

A  अक्षयशील संसाधन (Inexhaustible) 
  • (i) अपरिवर्तनीय (Immutable) 
  • (ii) दुष्प्रयोजनीय (Missusable) 
B  क्षयशील संसाधन (Exhaustible) 
  • (i) परिक्षणीय (Maintainable) 
    •  अ- पुनर्नवीकरणीय (Renewable) 
    •  ब- अनवीकरणीय (NonUnrenewable)
  • (ii) अपरिरक्षणीय (Non-maintainable) 
    •  अ- पुन: प्रयोज्य (Reuseable) 
    •  ब- पुन: अप्रयोजनीय (Non-reusable) 
दासमैन (1976) ने संसाधनों की नव्यकरणीयता के आधार पर उन्हें चार वर्गों में विभक्त किया है :- 

(i) अनवीकरणीय संसाधन (Non-renewable resources) :- ये संसाधन उस दर से निर्मित नहीं होते जिस दर से उनका प्रयोग किया जाता हैं। जब ऐसे संसाधन समाप्त हो जाते हैं तो इनके पुनस्र्थापना सम्भव नहीं हैं जैसे वन्य जीवन। 

(ii) पुनर्चक्रीय संसाधन (Recyclable resources) :- कुछ संसाधन ऐसे हैं जो प्रयोग में लाने पर भी समाप्त नहीं होते। उन्हें पुनर्चक्रीय (recycling) संसाधन कहते है। ऐसे संसाधन द्वारा बार-बार प्रयोग में लाया जा सकता है जैसे कि धातुएँ (Metals) 

(iii) पुनर्नवीकरणीय संसाधन (Renewable resources) :- सभी जीवित वस्तुएँ जिनमें पुनरुत्पादन (reproduction) की क्षमता हैं, पुनर्नवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं। जब तक उनके प्रयोग की दर उनके पुनरुत्पादन की दर से कम रहती हैं उनका पर्यावरण सुरक्षित रहता हैं तब तक वे स्वयं को पुन: स्थापित कर सकते हैं किन्तु जीवित समुदाय अनिवार्यत: पुनर्नवीकरणीय नहीं होते क्योंकि उनका विनाशकारी प्रयोग अधिक हो रहा हैं। यदि जीवित समुदायों का आवास (habitat) नष्ट कर दिया जाता हैं तब भी उनका लापे हो जाता हैं। उदाहरणार्थ अनेक जन्तुओं तथा पक्षियों की प्रजातियाँ लुप्त हो गयी हैं या विलोप के कगार पर हैं क्योंकि वन-विनाश (deforestation) तथा पर्यावरण-विघटन के कारण अनेक आवास नष्ट कर दिये गये हैं। 

(iv) अक्षयशील संसाधन (Inexhaustible resources) :- सौर्य ताप, जल तथा वायु अक्षयशील संसाधन हैं। ये संसाधन मानव अस्तित्व समाप्त होने पर भी मौजूद रहेंगे आधुनिक पर्यावरण के प्राकृतिक, मानवीय तथा सांस्कृतिक पहलुओं का इतना अधिक जटिल अन्तर्मिश्रण (Intermingling) हो गया हैं कि अनेक नये संसाधन विकसित हो गये हैं।  इस प्रकार संसाधनों को तीन वर्गों में रखा जा सकता हैं :- (i) प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources) (ii) सांस्कृतिक संसाधन (Cultural Resources) (iii) मानवीय संसाधन (Human Resources) 
  1. प्राकृतिक संसाधन :- ये संसाधन प्राकृतिक पर्यावरण में सरलता से मिलते हैं। इनमें वे सभी पदार्थ अथवा तत्व आते हैं जो मनुष्य को प्राकृतिक पर्यावरण से निशुल्क उपहार के रूप में उपलब्ध हैं। जैसे- मिट्टियाँ, जल, वन, वन्य, जीवन, खनिज आदि। 
  2. सांस्कृतिक संसाधन- मानव अपने प्राकृतिक पर्यावरण के संसाधनों का प्रयोग प्राविधिकी की सहायता से करता हैं तथा सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण करता हैं। कृषि, उद्योग, अवसरंचना (Infrastructure) के साधन ‘सांस्कृतिक संसाधन’ हैं। 
  3. मानवीय संसाधन- मानव जिन संसाधनों का निर्माण तथा उपयोग करता हैं तथा संस्कृति का निर्माण करता हैं, स्वयं सबसे बड़ा संसाधन हैं। 
जिम्मरमैन के अनुसार मानवीय संसाधन सबसेअधिक शक्तिशाली, गतिशील तथा सबसेअधिक मूल्यवान हैं क्योंकि वे ही संसाधन निर्माण प्रक्रिया में उत्पादन कर्ता हैं। वे ही इस प्रक्रिया में अन्तिम मूल्यों का निर्धारण करते हैं।

भौगाेिलक अध्ययन की क्रमबद्ध शैली (Systematica pproach) के आधार पर संसाधनों को निम्न 10 वर्गों12 में विभाजित किया हैं :- (i) भौगाेिलक स्थिति, आकार, स्वरूप (ii) भू-संरचना (iii) उच्चावच (iv) जलवायु (v) मृदा (vi) जल (vii) खनिज (viii) प्राकृतिक वनस्पति (ix) वन्य जीव (x) मनुष्य। इस प्रकार सामान्यत: संसाधनों को सामान्यत: दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता हैं :- 1- भौतिक संसाधन (Physical Resources) 2- जैवीय संसाधन (Biotic Resources) 

1- भौतिक संसाधन (Physical Resources) :- ये अजैविक संसाधन होते हैं। इस प्रकार के संसाधनों के अन्तगर्त चट्टान धरातल, मिट्टी, खनिज-सम्पदा, जलीय संसाधनों को सम्मिलित किया जाता हैं। ये सभी संसाधन मानव को प्रकृति की ओर से उपहार स्वरूप प्राप्त हुए हैं। विश्व के अनेक भागों में जहाँ मानव ने अधिक तकनीकी ज्ञान अर्जित कर लिया हैं, वहाँ इन संसाधनों का अनेक स्तर पर एवं विविधतापूर्वक उपयोग किया जा सकता हैं, परन्तु जिन प्रदेशों में प्रकति के साथ-साथ किसी भी प्रकार का सामंजस्य स्थापित नहीं किया गया है, वहाँ उनका उपयोग सीमित स्तर पर ही हो पाया हैं। भौतिक संसाधन के अन्तर्गत खनिज-पदार्थ, जल, भूमि, वन, हवा, मिट्टी, धरातल या उच्चावच आदि मुख्य हैं। इसी कारण इन्हें प्राणिशास्त्र में अजैविक संसाधन भी कहा गया हैं। इनमें से अनेक संसाधन प्रत्येक स्थान पर उपलब्ध होते हैं, इसी कारण इन्हें सर्वसुलभ संसाधन (Ubiquities) कहते हैं। विश्व में ऐसे भौतिक संसाधन धरातल पर समान रूप से वितरित नहीं हैं। 

2- जैवीय संसाधन (Biotic Resource) :- वे संसाधन जिनमें जीवन पाया जाता हैं, जैविक संसाधन कहलाते हैं। जैविक संसाधन मानव की आर्थिक क्रियाओं को लम्बे समय तक प्रभावित करते हैं। जैविक संसाधन को उचित देख-रेख तथा परिक्षण के माध्यम से अक्षुण्ण बनाया जा सकता हैं। जैसे वनों के काटे जाने पर वर्षा तथा ताप के कारण वहाँ वनस्पति पुन: उग जाती हैं। मत्स्य क्षेत्रों में मछलियाँ पकड़ लिए जाने पर भी वहाँ मछलियों की उत्पत्ति धीरे-धीरे होती रहती हैं। जैविक संसाधन के वितरण एवं विकास पर प्राकृतिक परिवेश विशेषकर जलवायु एवं धरातल का गहरा प्रभाव पड़ता हैं। जैवीय संसाधन पृथ्वी पर जल एवं थल दोनों ही स्रोतों से प्राप्त होते हैं। 

जैवीय संसाधनो से प्राकृतिक वनस्पति, पेड-़ पौधे तथा कृषिगत फसलों, बागान और जीव जन्तुओं को सम्मिलित किया जा सकता है। जगत में तीन प्रकार के जीवधारी पाये जाते हैं- 1. वनस्पति 2. जन्तु 3. मानव। तीन के पारस्परिक योग से ही तीनों का सह-अस्तित्व होता हैं। जैवीय संसाधनों के अन्तर्गत तीन संसाधनों का वर्णन सम्मिलित हैं :- A- प्राकृतिक वनस्पति (वन-संसाधन) B- जीव जन्तु (पशु-संसाधन) C- कृषिगत फसलें एवं बागवानी (कृषि-संसाधन)

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