सौन्दर्य का अर्थ एवं परिभाषा

अनुक्रम
सौन्दर्य का अर्थ ‘सुन्दर’ शब्द सु उपसर्ग पूर्वक उन्द् धातु में अरन् प्रत्यय लगाने से व्युत्पन्न होता है। उन्द् धातु भिण्येने या तर करने के अर्थ में प्रयुक्त होती है। मानव-मन को अपनी आभा या शोभा से भीतर तक भिगो देने वाली वस्तु, व्यक्ति या क्रिया सुन्दर कहलाती है। सुन्दर से भाववाचक संज्ञा बनती है - सुन्दरता अथवा सौन्दर्य। ‘सौन्दर्य’ शब्द का एक और प्रकार से निर्वाचन किया जा सकता है-सुन्दं राति इति सुन्दरम तस्य भाव सौन्दर्य। अर्थात सुन्द को जो लाता है वह सुन्दर और उसका भाव जहाँ हो तो वह सौन्दर्य कहलाता है।

‘सौन्दर्य’ अंग्रेजी शब्द ‘ब्यटूी’ का पर्याय है। बो+टी से ब्युटी की उत्पति होती है।’बो’ का अर्थ है प्रिय अर्थात रसिक या श्रृंगारी पुरुष और ‘टी’ भाववाचक प्रत्यय है। इस प्रकार ब्यूटी का शब्दार्थ हुआ रसिक भाव या रसिकता। अर्थात् सौन्दर्य वह गुण या गुणों का संश्लेश है जो इन्द्रियों को तीव्र आनन्द प्रदान करता है प्रधानत: चाक्षुश आनन्द तथा अन्य इन्द्रियों तथा बौद्धिक भावनाओं को आनन्द प्रदान करता है।

फ्रांसीसी भाषा में सौन्दर्य का समानार्थक शब्द ‘वले्’, लतीनी में ‘पुलक्रुम’, यू नानी भाषा में ‘क्लासे, रूसी में क्रसोता। वले् का अर्थ सुन्दरी और यूनानी भाषा क्लासे भी सामान्यतः: सुन्दर के ही निकट है। रूसी शब्द क्रसोता का वाच्यार्थ है सदुर्शन। यह सभी सौन्दर्य के निकटतम शब्द है। सौन्दर्य की वस्तुगत और व्यक्तिगत सत्ता को लेकर सौन्दर्यशास्त्र के क्षेत्र में चिन्तकों के दो वर्ग हैं। वस्तुवादी विचारक सौन्दर्य को व्यक्ति या वस्तु का गुण मानते हैं। 

कुछ विद्वान सौन्दर्य को व्यक्तिगत अथवा आनुभूतिक मानते हैं। इस अवधारणा के अनुसार सौन्दर्य दृष्टा की दृष्टि में निवास करता है। डेविड हयूम के अनसुार “सौन्दर्य वस्तुओं का स्वगत गुण नहीं है, वह तो केवल मन में रहने वाला धर्म है, जो वस्तुओं को देखता है।”

सौन्दर्य की परिभाषा

सौन्दर्य स्वयं सुधा है और हर क्षण परिवर्तित होता रहता है। मनुष्य इस जगत के कण-कण में सौन्दर्य की मनाहेारी छवि को विस्मय विमुग्ध होकर निहरता रहता है। सौन्दर्य एक ऐसा दिव्य तत्व है जो मनुष्य की चेतना को जन्म से ही आकर्षित करने लगता है। सौन्दर्य चिन्तन में रूचि भेद के कारण अपना-अपना दृष्टिकोण और अपनी-अपनी सूझ की विविधता के कारण सौन्दर्य की परिभाषाओं को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है।  कवि बिहारी लाल के अनुसार हर व्यक्ति अपनी रूचि, संस्कार तथा परिवेश के आधार पर सुन्दर वस्तु का निर्धारण करता है - “समै समै सुन्दर सबै, रूप कुरूप न काये। मन की रूचि जेती, जितै, तित तैती रूचि हाये।’’ 

डॉ0 हरिश्चन्द्र वर्मा के शब्दों में, “द्रष्टा को अपने अन्दर रमाने की क्षमता से युक्त होने के कारण सुन्दरता को रमणीयता भी कहते है।” डॉ0 हरिश्चन्द्र वर्मा ने सौन्दर्य के उक्त समन्वित दृष्टिकाण्ेा पर प्रकाश डालते हुए लिखा है, “वस्तु और व्यक्ति का सम्बन्ध ही सौन्दर्य की वास्तविक जन्म-भूमि है। जब किसी वस्तु को सुन्दर कहा जाता है, उस समय दर्शक और द्रश्टव्य वस्तु के मध्य के सम्बन्ध को विश्लेशण करने से ज्ञात होता है। सौन्दर्य वस्तुगत भी है और व्यक्तिगत भी। कान्ति, कामेलता, रंग, गठित आकार आदि के रूप में वह वस्तुगत धर्म है, किन्तु दर्शक के बिना वस्तुगत सौन्दर्य की अभिव्यक्ति ही न हो सकने के कारण उसकी सार्थकता में ही संदेह होने लगता है। दर्शक उस वस्तु के आकार-प्रकार, रंग-रूप में अपने ही आन्तरिक सौन्दर्य को प्रतिबिम्बित अथवा मूर्ति देखता है। इस प्रकार सौन्दर्य व्यक्तिगत भी है।” 

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सौन्दर्य के सन्दर्भ में लिखते है कि ‘‘कुछ रंग-रूप की वस्तुएँ एसेी होती हैं जो हमारे मन में आते ही थाडे़ी देर के लिए हमारी सत्ता पर एसेा अधिकार कर लेती है कि उसका ज्ञान ही हवा हो जाता है और हम उन वस्तुओं की भावना के रूप में ही परिणत हो जाते है। .......जिस वस्तु के प्रत्यक्ष ज्ञान या भावना से तदाकार परिणति जितनी अधिक होगी उतनी ही वह वस्तु हमारे लिए सुन्दर कही जाएगी।’’ शकुंक के मतानुसार नायक में रस की अवस्थिति आरै नट में रस की अनुभूित मानी जाती है। प्रमाता (सामाजिक, द्रष्टा या पाठक) काव्यगत पात्रों एवं नटों को अभिन्न मान लेता है और नटों में ही रस की स्थिति का अनुमान कर लेता है। परिमाणात: नटों की तरह ही वह भी रसानन्द प्राप्त करता है। यही रसानन्द ही शकुंक का “सौन्दयार्नन्द है।” सौन्दर्य के वस्तुपरक रूप के सन्दर्भ में आचार्य शुक्ल की मान्यता है - “जिस सौन्दर्य की भावना में मग्न होकर मनुष्य अपनी पृथक् सत्ता की पत्रीति का विसर्जन करता है, वह अवश्य ही एक दिव्य विभूति है।” अरस्तु की मान्यता है कि “किसी भी सुन्दर वस्तु में चाहे वह जीवधारी हो अथवा अवयवों से संघटित कोई अन्य पूर्ण पदार्थ, अंगों का व्यवस्थित अनुक्रम मात्र पर्याप्त नहीं है, वरन् उसका एक निश्चित आयाम भी होना चाहिए क्योंकि सौन्दर्य आयाम और व्यवस्था पर ही निर्भर होता है।”

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल- ‘‘वस्तुगत सौन्दर्य के समर्थक होते हुए भी समन्यवादी है। बुद्धितत्व और आत्मतत्व दोनों के संयोजन को स्वीकार करने के कारण इनकी सौन्दर्य दृष्टि समन्वयात्मक है। आचार्य शुक्ल भीतर आरै बाहर का भेद व्यर्थ मानते हुए कहते है कि जा ेभीतर है वहीं बाहर है। हमारी अन्त:सत्ता की तदाकार-परिणति तभी सम्भव है जब कोई सुन्दर वस्तु, सुन्दर व्यक्ति, सुन्दर दृश्य या सुन्दर कार्य हमारे अन्त:स् को अपनी प्रीति की तरलिमा से रंजित कर दे।” डॉ. रामजसन पाण्डेय ने विषयगत् आरै विषयीगत सौन्दर्य की अवधारणाओं के सामजंस्य को युक्तिसंगत मानते हुए कहते है, “पूर्ण सौन्दर्य-दर्शन के लिए वस्तु एवं अनुभूित का सदभाव सर्वथा आवश्यक है।” 

इस प्रकार सौन्दर्य हृदयागत भाव है। जो वस्तु आरै भाव-संयोग में ही पूर्ण होता है। पूर्ण सौन्दर्य दर्शन के लिए वस्तु और अनुभूति दोनों का सद्भाव सर्वथा आवश्यक है। किसी एक में ही अनुभूित या वस्तु में ही सौन्दर्य के दर्शन करना सम्पूर्ण नही बल्कि आंशिक है। 

सौन्दर्य का  स्वरूप 

सृष्टि अनन्त सौन्दर्य से परिपूर्ण है। सौन्दर्य के ही आलाके में जीवन धारा बहती रहती है। सौन्दर्य मन के निश्चल विश्राम का सुख-नीड़ है। मनुष्य पर्वत, झरने, नदी, वन आदि के सौन्दर्य को निहार कर बरबस आकर्षित हो जाता है। सुन्दर, दृश्य, वस्तु, दृष्टि पथ में आते ही आँख उस पर टिक जाती है और मन उसकी ओर आकर्षित हो जाता है और सुन्दर दृश्य में लीन हो जाता है। सौन्दर्य में एसेा आकर्षक है कि मानवतेर प्राणी भी उसकी आरे खींच जाते है। यही कारण है कायेल बसन्त के आगमन पर मधुर वाणी में कुहू-कुहू अलापती है, तितलियों का रंग-बिरंगे फूलों पर मंडराने का कारण सौन्दर्य ही है। सुषमा के मधु में भीग कर मन रूपी भ्रमर के पंख ऐसे चिपक जाते है कि वह कहीं उड़ नहीं पाता। पशु हरित तृण से भरी भूिम को पाकर प्रफुल्लित हो उठते है। साहित्य मनीशियों ने क्षत्रे की दृष्टि से सौन्दर्य को प्रकृति-सौन्दर्य, मानव-सौन्दर्य, दिव्य-सौन्दर्य और कला-सौन्दर्य शीषर्क चार वर्गो में रखा जा सकता है। पक्रृति मनुष्य को आदिकाल से अपनी आरे आकर्षित करती आई है। 

प्रकृति मनुष्य की चिर सहचरी है। प्रकृति के अंग-इन्द्रधनुष, तारों से भरी हुई रात, पुष्प, पर्वत, निर्झर आदि अपनी सौन्दर्यपूर्ण विराटता के कारण मनुष्य के हृदय का परिष्कार कर उसे उदार बनाते हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश भौतिक पक्रृति में आते हैं। लता, वृक्ष आरै तृण वानस्पतिक प्रकृति के तीन रूप है। पशु-पक्षी, कीट-पतगं और सरीसृप जैविक प्रकृति में आते हैं। मनुष्य की आँख, नाक, कान, रसना, स्पर्श नामक पाचं ज्ञानेन्द्रियों के लिए प्रकृति तृप्तिदायक है। कविता में प्रकृति-निरूपण, आलम्बन, उद्दीपन, मानवीकरण, अलंकार-विधान, प्रतीक-विधान, रहस्यानुभूित, उपदेश-ग्रहण, वातावरण या पृष्ठभूमि के रूप में आता है। 

मानव-सौन्दर्य का पुरुष सौन्दर्य, नारी सौन्दर्य तथा शिशु सौन्दर्य के रूप में अध्ययन किया जाता है। मानव-सौन्दर्य बाह्य सौन्दर्य आरै आन्तरिक सौन्दर्य के रूप में चरिताथर् होता है। बाह्य सौन्दर्य के अन्दर नख-शिख का विशेष महत्व है। आन्तरिक सौन्दर्य मानसिक निर्मलता, वैचारिक पवित्रता, वाचिक मदृुलता और आचारिक सात्विकता के रूप में व्यक्त होती है। अन्त: और बाह्य दानेों के संयागे में ही सौन्दर्य को आकां जा सकता है। मनुष्य सदा से ही सौन्दर्य में लीन रहा है। प्राकृतिक और मानवीय सौन्दर्य की सीमाओं को निरस्त करने पर प्रकृति और मानव उदात्त और असीम रूप से परिकल्पित करने पर दिव्य-सौन्दर्य की सृष्टि होती है। मर्यादा पुरूषोतम राम और योगेश्वर श्रीकृष्ण के दिव्य सौन्दर्य की माधुरी विश्व के प्रत्येक जन को प्रभावित करती है आरै उनका दिव्य रूप मन को तुरन्त अभिभूत कर लेता है। यह दिव्य सौन्दर्य अनिर्वचनीय और अलौकिक है। उन्नत पर्वतों के Üाृगों के प्रलय प्रकोप से उन्मुख झंझावत, उत्तुंग तरंगों से ताण्डव नृत्य करने वाला समुद्र आदि एसे दृश्य है जिनको देखते ही हम भयकंपित हो जाते हैं, परन्तु बाद में यही दृश्य हमें सौन्दर्य का आभास कराते हैं। 

जगत में सौन्दर्य की कमी नहीं है। जीवन-व्यापार के किसी न किसी क्षेत्र में हमेशा मोहक और रमणीय दृश्य उपलब्ध हो जाते हैं और सौन्दर्य भोगी मन उन सुन्दर दृश्यों में लीन हो जाता है। प्रकृति की विविधता और विस्तृत भूखंड जितना अधिक मानव को उपलब्ध होगा, उतना ही उसका सौन्दर्य ज्ञान अधिक होता जाएगा। आधुनिक सभ्यता की कसौटी भी सौन्दर्य-बोध को ही माना गया है। आधुनिक युग में मनुष्य का जीवन संघर्ष और उपलब्धियों से भरा हुआ है। परंतु जीवन में संघर्ष ही नहीं बल्कि प्रेम और सौन्दर्य जैसे कामेल प्रसंग भी है, जो विषम परिस्थितियों में मनुष्य को जीवित रहने की प्रेरणा और शक्ति प्रदान करते है। 

सन्दर्भ -
  1. डॉ. माया मलिक, धमर्वीर भारती के काव्य में अनुभूति और अभिव्यक्ति, पृ. 26 
  2. डॉ. धीरेन्द्र बहादुर सिंह, तुलसीदास की कलागत चतेना, पृ. 44 
  3. डॉ. वेद प्रकाश जुनेजा, भारतीय एवं पाश्चात्य सौन्दर्य शास्त्र, पृ. 12-14 4 वही, पृ. 12-13 
  4. डॉ. माया मलिक, धमर्वीर भारती के काव्य में अनुभूति और अभिव्यक्ति, पृ. 26 6 वही, पृ. 26-27 
  5. जयशंकर प्रसाद, कामायनी, लज्जा सर्ग, पृ. 12 3
  6. डॉ. हरिश्चन्द्र वर्मा, संस्कृत-कविता में रोमांटिक प्रवृत्ति, पृ. 264 
  7. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, चिन्तामणि, भाग-1, पृ. 113 
  8. डॉ. रामसजन पाण्डेय, विद्यापति का सौन्दर्य बोधक, पृ. 166 
  9. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, चिन्तामणि, भाग-1, पृ. 113डॉ. नगेन्द्र, अरस्तु का काव्यशास्त्र, पृ. 27 
  10. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, चिन्तामणि, भाग-1, पृ. 113 
  11. डॉ. रामसजन पाण्डेय, विद्यापति का सौन्दर्य बोध, पृ. 32 107 105

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