वनस्पति का वर्गीकरण

अनुक्रम
वनस्पति का वर्गीकरण प्राकृतिक वनस्पति के अन्तर्गत पेड़-पौधे, लतायें तथा घासें सम्मिलित हैं। पादप जगत में विविधता पायी जाती हैं। अब तक लगभग 40,000 पौधों की जातियों का पता लगाया जा चुका हैं। पौधों का वर्गीकरण नमी, आकारकीय लक्षणों, पदानुक्रम तथा जीवन अवधि आदि के आधारों पर किया जाता हैं, जिसमें से कुछ वर्गीकरण हैं :- 

वनस्पति का वर्गीकरण

1. जल के आधार पर पौधों का वर्गीकरण

वातावरण में जल की मात्रा के अनुसार पेड़-पौधों को बाँटा गया हैं :- 
  1. जलोद्भिद (Hydrophytes) 
  2. समोद्भिद् (Mesophytes) 
  3. मरूद्भिद् (Xerophytes) 
  4. लवण मृदोद्भिद् (Halophytes) 
  5. अधिपादप (Epiphytes) 
(1) जलोद्भिद् (Hydrophytes) :- ये पौधे जल में या ऐसी मिट्टी में जो जल से संतृप्त (Saturated) होते है, पाये जाते हैं, ये तीन प्रकार के होते हैं :- 
  • अ- निमग्न पौधे (Submerged Plants) :- इन पौधों की पत्तियाँ पूर्ण रूप से जल से ढकी रहती हैं। उदाहरण-हाइड्रिला, वैलिसनेरिया, पोटेमाजे ीटोन, सिरैटोफिलम निकामेण्ड्रा तथा इलोडिया आदि। 
  • ब- तैरने वाले पौधे (Floating Plants) :- इनकी पत्तियाँ जल की सतह पर ही तैरती रहती हैं। ये दो प्रकार के होते हैं :- (i) स्वतन्त्र तैरने वाले पौधे (Free Floating Plants) :- ये पौधे जल के ऊपर तैरते रहते हैं और इनकी जड़े मिट्टी में नहीं धंसती हैं। जैसे - वुल्फिया, लेम्बा, स्पाइरोडेला तथा समुद्र सोख। (ii) स्थिर तैरने वाले पौधे (Fixed Floating Plants) :- इन पौधों की जड़ें कीचड़ में धँसी रहती हैं। जैसे - कमल, निम्फिया, जूसिया तथा ट्रापा आदि। 
  • स- जल स्थलीय पादप (Amphibious Plants) या कच्छोद्भिद् (Helophytes) :- इन पौधों का नीचे का भाग अधिक जल वाली मृदा में धँसा रहता हैं या प्राय: तने का नीचे का भाग छिछले जल में डूबा रहता हैं। इन पौधों के तने का ऊपरी भाग व पत्तियाँ वायु में रहते हैं। कभी-कभी वर्षा के समय ये दोनों भाग जल में डूब सकते हैं। उदाहरण- परेटरा, जलघनियां, धान, सैजिटेरिया, बिगोनिया, रेननवुलस, एक्वाटिलिस आदि। 
(2) समोद्भिद् (Mesophytes) :- ये पौधे पृथ्वी पर उन स्थानों में मिलते हैं जहाँ औसत मात्रा में जल प्राप्त होता हैं। ऐसे पौधे अधिक समय तक जलीय वातावरण में जीवित नहीं रह सकते। अत्यन्त शुष्क वातावरण भी उनके लिए घातक हो जाता हैं। उदाहरणार्थ- उद्यानों में लगाये जाने वाले पौधे, वनों की भूमि, मैदानी व खेतों में उगने वाले सभी सामान्य पेड़-पौधे इस समूह में सम्मिलित हैं। 

(3) मरूद्भिद् (Xerophytes) :- ये पौधे शुष्क वातावरण में एवं बहुत कम जल की मात्रा में अपना जीवन चक्र पूर्ण करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे पौधे मरूस्थल में अथवा चट्टानों पर पाये जाते हैं। उदाहरणार्थ- नागफनी, घीक्वार, बांसकेवड़ा, कैजुएराइना, मदार तथा म्यूहले नबेकिया आदि। ये चार प्रकार के होते हैं:- 
  1.  जलाभाव पलायनी मरूद्भिद् पौधे (Drought-escaping Xerophyte Plants) :- इन पौधों को अल्पकालिक भी कहते हैं। यह ऐसे एक वष्र्ाीय पौधे हैं जो अपना जीवन चक्र केवल 4-6 सप्ताह में पूर्ण कर लेते हैं। इन पौधों के बीज वर्षा के आरम्भ में अंकुरित होते हैं। शीघ्र ही इन पर पत्तियाँ, पुष्प फल व बीज उत्पन्न हो जाते हैं। वर्षा के अन्त में सम्पूर्ण पौधों की मृत्यु हो जाती हैं, परन्तु बीज भूमि पर रह जाते हैं, जो अगले वर्ष, वर्षा के आरम्भ में फिर से नये पौधों को जन्म देते हैं, जैसे-सोलेनम जैन्थोकार्पम।  
  2. वार्षिक या सूखाहार मरूद्भिद् पौधे (Annuals or drought-evading Xerophyte Plants) :- इन पौधों की जल की आवश्यकता कम होती हैं। ये पौधे बहुत छोटे होते हैं और इनकी वृद्धि भी बहुत कम होती हैं तथा ये एक दूसरे से दूरी पर स्थित होते हैं। इन पौधों में वाष्पोत्सर्जन को कम करने तथा नमी को संरक्षित रखने हेतु रूपान्तरण पाया जाता हैं। 
  3. जलाभाव सहिष्णु मरूद्भिद् पौधे (Drought enduring Xerophyte Plants) :- इन पौधों में जल संग्रह की कोर्इ विशेष व्यवस्था नहीं होती फिर भी इनमें लम्बे समय तक जलाभाव को सहन करने की क्षमता होती हैं। ये पौधे छोटे होते हैं। जब मृदा-जल पौधों की वृद्धि के लिए कम हो जाता हैं तो पत्तियाँ मुरझाकर गिर जाती हैं परन्तु पौधा फिर भी जीवित रहता हैं और नर्इ वृद्धि उस समय तक नहीं होती, जब तक कि जल फिर से प्राप्त न हो जाये। जल प्राप्त होते ही ये पौधे फिर से तेजी से वृद्धि करने लगते हैं जैसे कोवीलिया, ग्लूटीनोसा। 
  4. जलाभावसह या मांसलादे ्भिद् पौधे (Drought sesisting or succulent plants) :- ये पौधे जल को अपने ऊतकों में संग्रह करके उस समय प्रयोग में लाते हैं, जब मृदा में जल की कमी होती हैं उदाहरणार्थ- नागफनी, धीवक्वार। (4) लवण मृदोद्भिद् (Halophytes) :- इस प्रकार के पौधे समुद्र के किनारे की दलदल या ऐसी मिट्टी में उगते हैं, जिसमें लवण की मात्रा अधिक होती हैं। समुद्र तल एवं डेल्टा स्थलों में इस प्रकार के छोटे व नाटे आकार के वृक्षों के वन पाये जाते हैं, जिन्हें मेनग्रोव वनस्पति कहते हैं, जैस-े सोनेरेशिया, तथा राइजोफोरा। 
(5) अधिपादप (Epiphytes) :- अधिपादप पौधों का वह समूह हैं जो वृक्षों की शाखाओं पर उगता हैं। वास्तव में ये पराश्रयी नहीं होते हैं। इन्हें केवल वृक्षों पर आधार की आवश्यकता होती हैं। विभिन्न प्रकार के ऑर्किड इसी समूह में आते हैं जैसे- डिस्चिडिया, रेपिल-सियाना, तथा कुछ फर्न आदि। 

2. पौधों का आकारकीय लक्षणों के आधार पर वर्गीकरण

सामान्यत: आकृति की विविधता तथा जनन प्रक्रिया के आधार पर पौधों को निम्नांकित दो वृहद श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:- (1) पुष्परहित पौधे (Cryptogams) (2) पुष्पी पौधे (Phanerogams or Flowering Plants) 

(1) पुष्परहित पौधे (Cryptogams) :- इस जाति के पौधों में बीज और फल नहीं होते हैं। ये अन्तर्निहित बीजाणुओं से अपनी सन्तति (Offsprings) को जन्म देकर जाति की अक्षुण्ण बनाये रखते हैं। इन पौधों की जनन प्रक्रिया इनके शरीर में ही अन्तर्निहित होती हैं। इस वर्ग के पौधों की आन्तरिक संरचना सरल होती हैं। इन्हें 6 उपवर्गों में विभक्त किया जाता हैं :- 
  1. बैक्टीरिया (Bacterial) 
  2. शैवाल (Algae) 
  3. कवक या फन्जाई (Fungi) 
  4. ब्रायोफाइटा (Bryophyta) 
  5. शिलावल्वा या काई अथवा लाइकेन (Lichen) 
  6. टेटिडोफाइटा (Pteriodophyta) 
अ- बैक्टीरिया (Bacterial) :- ये एक कोशिकीय (Unicellutar) पौधे होते हैं। ये अपनी कोशिका को दो भागों में विभक्त करके सन्तानोत्पत्ति करते हैं। अत: इन्हें शाइजोफाइटा (Schizophyta) के नाम से भी जाना जाता हैं। आहार निर्माण तथा ग्रहण के आधार पर इन्हें दो वर्गों में विभक्त किया जाता हैं :- (i) स्वपोषित (Autotrophs) :- स्वपोषित बैक्टीरियल अपना आहार स्वत: निर्मित करते हैं। ये बैक्टीरिया अपनी ऊर्जा या तो प्रकाश अकार्बनिक/अजैविक स्रोतों या प्रकाश एवं कार्बनिक (जैविक) स्रोतो से प्राप्त करते हैं (ii) परपोषित (Leterotrophs) :- परपोषित बैक्टीरिया अपना आहार स्वयं निर्मित नहीं करती वरन् अपने आहार के लिए अन्य जीवों पर निर्भर करती हैं। ये परपोषित बैक्टीरिया मृत जीवों को वियोजित तथा विघटित करती हैं तथा जीव मण्डल में पोषक तत्वों के चक्रण में सहायक होती हैं। 

ब- शैवाल (Algae) :- यह जल में रहने वाला सूक्ष्म पादप होता हैं, जिसकी संरचना अति सरल होती हैं। इसका अतिसूक्ष्म रूप एक कोशिका वाला होता हैं जबकि बड़े शैवाल कई कोशिका वाले होते हैं। कई शवै ाल मिट्टियों में भी पाये जाते हैं। ये प्रकाश रसायन (Photochemical) क्रिया द्वारा ऊर्जा प्राप्त करते हैं। 

स- कवक या फन्जाई (Fungi) :- ये पादप प्रकाश संश्लेषण करने में अक्षम होते हैं। अत: अपने भोजन के लिए अन्य जीवों के उत्पादों पर निर्भर रहते हैं। कुछ कवक परजीवी (Parasite) होते हैं जो अन्य जीवित जीवों से अपना आहार प्राप्त करते हैं तथा कुछ मृतजीवी (Saprophyte) होते हैं, जो अपने आहार के लिए जैविक पदार्थों पर निर्भर रहते हैं। कुकुरमुत्ता (Mushroom) इसका प्रमुख उदाहरण  हैं।  

द- ब्रायोफाइटा (Bryophyta) :- इस समूह के पौधे अधिकांशत: नम एवं छायादार स्थलों पर पाये जाते हैं। इसके अन्तर्गत काई (Mocs) को रखा जाता हैं। ये अधिकांशत: स्थलज होते हैं परन्तु इनकी कुछ प्रजातियाँ जल में भी पायी जाती हैं। वर्षा ऋतु में अधिक वृद्धि के कारण ये अपना वास्य-स्थान (Habitat) पर हरी सतह का निर्माण करते हैं। अधिकतर ब्रायोफाइस में क्लोरोफिल पाया जाता हैं, जिससे वे प्रकाश संश्लेषण विधि द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। ये असंवहनीय (Nonvascular Plants) होते हैं। कुछ ब्रायोफाइट्स मृतोपजीवी होते हैं। 

य- शिलावल्वा या काई अथवा लाइकेन (Lichen) :- इसके अन्तर्गत ऐसे पौधे आते हैं, जिनमें कवक तथा शैवाल के साथ ही साथ एक ही पौधे के रूप में होते हैं। इस तरह के पादप मिश्र (Composite) होते हैं। इस मिश्र पौधे का एक भाग अर्थात् कवक परजीवी होता हैं, जिसे उसी पौधे का दूसरा भाग यानी शैवाल आहार प्रदान करता हैं। 

र- टेटिडोफाइटा (Pteriodophyta) :- ये संवाहनीय पौधे (Vaculer Plants) होते हैं परन्तु इनमें संतति जनन पूर्वोक्ता असंवाहकीय पादपों के समान ही एक कोशिका के दो भागों में विभक्त होने पर होता हैं। इनके अन्तर्गत फर्न (Fern) , अश्वपुच्छ (Horsetail) आदि सम्मिलित किया जाता हैं। (2) पुष्पी पौधे (Phanerogams or Flowering Plants) :- इस श्रेणी के पौधों में फूल लगने लगते हैं एवं बीजों के माध्यम से संतति जनन होता हैं। इन्हें स्पर्मेटोफाइटा (Spermatophyta) भी कहते हैं क्योंकि इनमें शुक्राणु (Sperms) भी होते हैं। ये संवहनीय (Vascules) पौधे होते हैं। इनको दो भागों में विभक्त किया जा सकता हैं :- (i) अनावृत बीजी (Gymmosperms) (ii) आवृत जीवी (Angiosperms) 
  1. अनावृत बीजी (Gymmosperms) :- इस तरह के पौधों में बीज किसी आवरण से ढका नहीं रहता हैं, बल्कि खुला रहता हैं। कोणधारी या शक्ं वाकार वृक्ष जैसे पाइन (Pine) स्फ्रूस, जूनिफर आदि इसके अन्तर्गत सम्मिलित किये जाते हैं। 
  2. आवृत जीवी (Angiosperms) :- इस श्रेणी के पौधों में बीज रक्षक आवरण (Protective Cover) होता हैं। ये वास्तविक पुष्पी पौधे होते हैं तथा सभी प्रकार के पौधों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हैं। इनका विकास सबसे बाद में (लगभग 100 मिलियन वर्ष पूर्व) हुआ हैं। इन्हें बीज अंकुरण के समय पत्तियों की संख्या के आधार पर पुन: दो उपक्रमों में विभक्त किया जाता हैं। अ- द्विवीज पत्रीय (Dicatyelons) :- इसमें बीज अंकुरण के समय दो पत्तियाँ निकलती हैं। मानव उपयोगी फलदार पौधें तथा दलहनी खाद्यान्न पौधे इस श्रेणी में आते हैं। इनके बीज में दो भाग होते हैं। अरहर, मटर, उरद, मूगं , चना आम, महुआ आदि इसके उदाहरण हैं। ब- एक बीज पत्री (Monocotyledons) :- इस तरह के पौधों में बीज का एक ही भाग होता हैं तथा अंकुरण के समय एक ही पत्ती निकलती हैं। इसके अन्तर्गत अधिकांश खाद्यान्न (cereals) आते हैं जैसे गहे ूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि तथा अन्य घासें। 

3. जीवनरूप के आधार पर पौधों का वर्गीकरण

रौनकियर (Rounkiare) ने पौधों का वर्गीकरण उनके जीवन रूप के आधार पर किया हैं। यह वर्गीकरण पादप जीवन तथा जलवायु कारकों के बीच सम्बन्ध पर आधारित हैं। यह वर्गीकरण करते समय पौधों के जीवन रूप तथा उनके विकास के समय प्रतिकूल मौसम के साथ समायोजन (Adjustment) का ध्यान रखा जाता हैं। रौनकियर ने यह वर्गीकरण पौधे की सुप्त (resting) या वर्ष स्थायी (perennating) कलिका या आँख (buds) की मृदा सतह के सम्बन्ध में स्थिति को ध्यान में रखकर किया हैं। जिस क्षेत्र में पौधों के विकास के लिए मौसम जितना ही प्रतिकूल होता हैं। पौधों की सुप्त आँखें (resting buds) मृदा सतह के उतनी ही करीब होती हैं ताकि वे नष्ट न हो सके बल्कि अनुकलू मौसम आने तक सुरक्षित रह सके। इस आधार पर पौधों को पाँच भागों में वर्गीकृत किया गया हैं :- (i) फैनरोफाइट्स (Phanerophytes) (ii) केमेफ़ाइट्स (Chamaephytes) (iii) हेमिक्राइटोफाइट्स (Hemicryptophytes) (iv) क्राइटोफाइट्स (Cryptophytes) (v) थेरोफाइट्स (Therophytes) 
  1. फैनरोफाइट्स (Phanerophytes) :- ये ऊँचे वृक्ष या ऊँची झाड़ियाँ होते हैं जिनमें सुप्त आँखें (resting buds) काफी ऊँचाई (मृदा आवरण से कम से कम 25 से 30 मीटर से अधिक ऊँचाई पर) होते हैं। इसके अन्तर्गत सदाबहारीय तथा पतझड़ वन आते हैं। 
  2. केमेफाइट्स (Chamaephytes) :- इसके अन्तगर्त सदाबहार छोटी झाड़ियाँ (शाकीय या जड़ी-बूटी वाली झाड़ियाँ) (Herbaceous shrubs or plants) आते हैं, जिनकी सुप्त कलियाँ या आँखें (buds) मृदा सतह के करीब (2.5 मीटर की ऊँचाई) तक होती हैं। 
  3. हेमिक्राइटोफाइट्स (Hemicryptophytes) :- इसके अन्तर्गत वे पौधे आते हैं, जिनकी सुप्त कलियां या आँखें मृदा सतह पर होती हैं तथा यह आंशिक रूप से मृदा सतह पर पर्णढेर (Leaf Litter) गिरी पत्तियों के ढेर में या मिट्टियों में ढकी रहती हैं। 
  4. क्राइटोफाइट्स (Cryptophytes) :- इस तरह के पौधों की आँखें (कलियाँ) पूर्ण रूप से वाह्य पर्यावरण से सुरक्षित रहती हैं। इस तरह के पौधों की जड़ों में ये कलियाँ (bulbs) बल्ब के रूप में होती हैं जैसे डहेलिया। भूतल तथा जल में पाये जाने वाले इस श्रेणी के पौधों का क्रमश: geophytes तथा Lydrophytes कहते हैं। 
  5. थेरोफाइट्स (Therophytes) :- इसके अन्तर्गत वे पौधे हैं जिनका जीवन एक मौसम तक ही सीमित होता हैं। इन्हें वार्षिक पादप भी कहा जाता हैं अर्थात् इनका जीवनकाल बीज से बीज के बीच होता हैं अर्थात् बीज के अंकुरण से पौधा विकसित होता हैं तथा पुन: बीज आ जाने पर समाप्त हो जाता हैं। प्रतिकूल मौसम में ये पौधे बीज के अंदर भ्रूण (embryo) के रूप में रहते हैं तथा अनुकूल मौसम आने पर पुन: विकसित हो जाते हैं। 

4. प्राकृतिक वनस्पतियों का सामान्य वर्गीकरण

सामान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत प्राकृतिक वनस्पति को मुख्यत: तीन वर्गो में विभक्त किया गया हैं :- (A) वन या जंगल समुदाय (B) घास समुदाय (C) मरूस्थलीय वनस्पतियाँ सामान्य रूप से जंगल आर्द्रता पूर्ण जलवायु के प्रदेशों में होते हैं और मरूस्थलीय झाड़ियाँ शुष्कतम जलवायु में तथा घासे दोनों के बीच की दशाओं में मिलती हैं। प्राकृतिक वनस्पति कटिबंधीय उष्ण कटिबंधीय शीतोष्ण कटिबंधीय ख- उष्ण ख-समशीतोष्ण निम्न अंक्षाशीय सवाना मध्य अंक्षाशीय कटिबंधीय पर्णपाती पर्णपाती ग- समशीतोष्ण प्रेयरी स्टेपी मिश्रित 

A वन समुदाय (जंगल) :- वृक्ष जंगल का मुख्य पौधा होता हैं। वनस्पति साम्राज्य में वृक्ष सिर्फ शक्तिशाली पौधा नहीं होता बल्कि जंगल के नाम को सार्थक करने वाला भी होता हैं। जब पौधे इतने विकसित हो जाते हैं कि उनकी शाखायें आपस ही में उलझ जाती हैं तब वन (जंगल) को वास्तविक स्वरूप प्राप्त होता हैं। वनों का वर्गीकरण के चार दृष्टिकोण से होता हैं :- (i) जलवायु की विभिन्नताओं के आधार पर :- उदाहरणार्थ उष्ण कटिबंधीय, समशीतोष्ण कटिबंधी, शीतोष्ण कटिबंधीय वृक्ष। (ii) पत्तियों के आकार के आधार पर- नुकीली या चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष। (iii) हरीतिमा रहने के आधार पर- पतझड़ या सदाबहार वाले वृक्ष। (iv) वृक्षों की लकड़ी के आधार पर- मुलायम या कड़ी लकड़ी वाले वृक्ष। अधिकांश चौड़ी पत्तियों से युक्त वृक्ष कड़ी लकड़ियों वाले होते हैं। दूसरी ओर नुकीली पत्तियों वाले जैसे देवदार, मुलायम लकड़ियों वाले वृक्ष होते हैं, जो काफी मात्रा में वर्ष भर अपनी पत्तियाँ बचाकर रखते हैं उन्हें सदाबहार वन कहते हैं। पर्णपाती वृक्ष वर्ष के एक काल में अपनी पत्तियों का परित्याग कर देते हैं। अत: कुछ समय के लिए नग्न हो जाते हैं। कठोर लकड़ियों के वृक्ष पतझड़ और सदाबहार दोनों कोटि के होते हैं। इन्हें जंगल की अन्य वनस्पतियों की अपेक्षा जल की अधिक आवश्यकता होती हैं। 

B घास समुदाय :- निम्न अक्षांशों में घास की भूमि को ‘सवाना’ कहते हैं। मध्य अंक्षाश्ं ों में इन्हें ‘प्रेयरी’ कहते हैं। आर्द्र और कम विकसित जल प्रवाह क्षेत्रों में घास की भूमि को बांगर या ‘मीडो’ कहते हैं। अधिकांश घासों की जड़ें छोटी होती हैं इसलिए वे लम्बी शुष्कता के शिकार बन जाते हैं। उन्हें सबसे अधिक क्षति तब होती हैं जब उनका विकासकाल और शुष्कता का काल एक समय होता हैं। जलवायु के दृष्टिकोण से घास अर्द्धशुष्क प्रदेशों की उपज हैं, जहाँ अधिकांश वर्षा ग्रीष्म ऋतु में होती हैं। 

C मरुस्थलीय वनस्पतियाँ :- मरुस्थलीय वनस्पतियों को पौध जीवन के आधार पर दो कोटि में रखा जा सकता हैं। एक सहारा प्रकार का हैं जहाँ जल किसी भी रूप में विद्यमान नहीं हैं। दूसरा ध्रुवीय प्रकार का हैं, जो अधिकांशत: हिमाच्छादित रहता हैं। जल, बर्फ या हिम के रूप में विद्यमान रहने कारण पौधों के लिए उपलब्ध नहीं रहता। इन दोनों प्रकार के मरुस्थलों में शुष्कतारोधक पौधे ही पनप पाते हैं।

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