वृद्धावस्था के लक्षण

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सम्पूर्ण विश्व की सामाजिक व्यवस्था में वृद्धावस्था के लक्षण सामान्यत: एक जैसे ही हैं। देश एवं परिस्थितियों के अनुसार उनके स्तर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। 

वृद्धावस्था के लक्षण

वृद्धावस्था के विविध लक्षण है- 
  1. 30 से 65 वर्श की आयु में रक्त चाप (ब्लड प्रेषर) में लगभग 15 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होने लगती है। 
  2. कोलेस्ट्राल के स्तर में भी बढा़ेत्तरी होने लगती है। 
  3. 70 वर्श की आयु में पहुॅचते ही मस्तिष्क के रक्त संचार में 20 प्रतिशत की कमी होने के आसार बढ़ जाते है। 
  4. गुर्दा की क्षमता में 50 प्रतिशत तक के ह्रास की सम्भावना हो जाती है। 
  5. हृदय के विश्राम में 30 प्रतिशत का हृास तथा फेफड़ों के आयतन में विश्राम की दषा में लगभग 47 प्रतिशत का हृास हो जाता है। 
  6. आक्सीजन ग्रहण की क्षमता 60 प्रतिशत तक घटने की सम्भावना बढ़ जाती है। 
  7. शरीर में जल की मात्रा भी 15 प्रतिशत तक घट जाती है। 
  8. मस्तिष्क के भार में लगभग 40 प्रतिशत तक कमी आ जाती है। मस्तिष्क में सिकुड़न आरम्भ होने लगता है जिसके फलस्वरूप बड़ी संख्या में हमारे स्नायु कोश नष्ट होने लगते हैं। इन कोशों की एक विषेशता यह है कि ये एक बार नश्ट होने पर इनका पुर्ननिर्माण अथवा पुर्नजीवन दोबारा सम्भव नहीं हो पाता है और ये हमेशा-हमेशा के लिये नश्ट हो जाते हैं। इसका परिणाम यह हातेा है कि बुढ़ापे में तर्कषक्ति, स्मृति तथा बुद्धि में हृास होने की प्रक्रिया आरम्भ होने लगती है। एक मत के अनुसार लगभग 1,00,000 मस्तिष्क कोशों की मृत्यु प्रतिदिन की दर से हो रही है। जब व्यक्ति वयस्क होने की स्थिति में पहुॅंचता है, तो आयु के साथ इस प्रक्रिया में भी बढा़ेत्तरी होती जाती है। इस सम्बन्ध में सर्वेक्षण किये गये हैं, और यह निष्कर्ष भी निकाला जा चुका है कि यह जरूरी नहीं कि बुढ़ापे में बुद्धि का, स्मृति का आवष्यक रूप से हृास होने ही लगेगा। उनका कारण यह होता है कि स्नायु षिरायें, जो हमारे स्नायु तत्रं का ही अंग हैं, अपनी क्रियाषीलता बनाये रखती हैं, जिससे वृद्धवस्था में बुद्धिमत्ता का अभाव नहीं होने पाता है। 
  9. पुरूष तथा स्त्रियों की लम्बाई में कमी आने की सम्भावना बढ़ जाती है। 
  10. बालों की मोटार्इ में लगभग 1/5 भाग की कमी आ जाती है। 
  11. ऑखों में दृष्टिहीनता की स्थिति आने लगती है। ऑखों के नीचे झोले से पड़ने लगते हैं। 
  12. नाक चौड़ी तथा लम्बी होने लगती है। 
  13. बाल सफेद होने लगते हैं। 
  14. त्वचा संकुचित तथा शक्ति का हृास होने लगता है। 
  15. शरीर के वजन में भी हृास होने लगता है। 
  16. अंगों की गतिषीलता में भी कमी आने लगती है।
  17. वृद्धावस्था में लोग अपने को सामाजिक दृष्टि से एकाकी अनुभव करने लगते हैं, भले ही अपने परिवार वालों के साथ ही क्यों न रहते हैं। वृद्धावस्था की अपनी विशेष समस्यायें रहती हैं, इनमें कुछ का सम्बन्ध तो शारीरिक परिवर्तनों से होता है। यथा, शक्ति या बल का हृास तथा मानवीय पर्यावरण के परिवर्तन जैसे जीवन साथी, मित्र परिजनों की मृत्यु, कार्य में अवकाश और परिवार तथा समाज का बदला हुआ व्यवहार। आमतौर से इस उम्र में अधिकांश व्यक्ति किसी न किसी रोग से भी ग्रस्त हो जाते हैं और उनकी शारीरिक शक्ति भी क्षीण होने लगती है। 
  18. पाचन, निश्क्रमण एवं रक्त संचार की प्रणालियां प्राय: इस अवस्था में अनियमित होने लगते हैं। 
  19. देखने, सुनने, निद्रा आदि की क्षमताओं में हृास होने लगता है। 
  20. वृद्ध व्यक्ति प्राय: आन्तरिक द्वन्द से ग्रस्त हो जाते हैं, उनकी निर्णय तथा इन्द्रियों पर नियंत्रण की क्षमता षिथिल हो जाती है, ऐसे लोग अपने को दसूरों के द्वारा वृद्ध और अक्षम समझा जाना पसंद नहीं करते है। प्राय: ऐसा देखा गया है कि वृद्ध व्यक्ति अपनी मान्यताओं को नर्इ पीढी़ पर थोपना चाहते हैं और अपने विचारों तथा मनोभावनाओं के अनुरूप दूसरों को चलाना चाहते हैं। उनमें ज्ञानार्जन और स्मृति की शक्ति कमजोर हो जाती है। परिवर्तनषील और नए तरीकों तथा मूल्यों से उन्हें चिढ़ होती है। नये परिवेष और नये मूल्यों को स्वीकार न कर पाने के कारण पारिवारिक और सामाजिक अन्र्तद्वन्द का सामना उन्हें अपने जीवन में पग-पग पर करना पड़ता है। 
  21. प्राय: भावनात्मक तनाव के षिकार हो जाते हैं। उनमें भौतिक कमी असुरक्षा की भावना बढ़ जाती है। सम्पत्ति के प्रति उनका मोह बढ़ जाता है तथा वे शंकालु, झगड़ालू, कंजूस, चिड़चिड़े और क्रोधी हो जाते हैं। 
  22. वृद्धावस्था आने के साथ व्यक्ति में श्रम-षक्ति का अभाव हो जाता है। एसे व्यक्ति प्राय: भुलक्कड़, सामाजिक विमुखता एवं एकाग्रचित्तता की कमी के षिकार हो जाते हैं। उनमें नौजवानों की अपेक्षा कैलोरी की आवष्यकता कम हो जाती है।  
  23. पाचन प्रणाली कमजोर होने लगती है ओर इस अवस्था में आक्सीजन की खपत भी घटने लगती है। 
  24. शारीरिक षिथिलता के साथ-साथ सर्दी और गर्मी सहने की क्षमता भी घटने लगती है। 
  25. वृद्ध व्यक्ति के शरीर का तापमान सामान्य से कुछ कम हो जाता है। 
  26. उच्च रक्तचाप और धमनी सम्बन्धी विकार भी वृद्धावस्था में प्राय: देखने को मिलते हैं तथा स्नायु सम्बन्धी लोच में भी कमी आने लगती है।
  27. गुर्दे भी इस अवस्था में सामान्य रूप से काम नहीं कर पाते हैं जिससे रूधिर सम्बन्धी विकार उत्पन्न होने लगते हैं।
  28. पाचन रसों और अम्लों की कमी से आंतों की क्षमता क्षीण हो जाती है तथा ग्रन्थियों में स्रावों की कमी के कारण व्यक्ति की वाह्य त्वचा शुष्क और झुर्रीदार हो जाती है। 
  29. फेफड़ों के उतकों में लोच की कमी आने से “वास सम्बन्धी विकार उत्पन्न होने लगते हैं।
  30. वृद्धावस्था में स्नायु-दौर्बल्य प्रमुख समस्या बन जाती है, ऐसे व्यक्तियों को खांसी, जुकाम, प्राय: अधिक होने लगती है। 
  31. वृद्धावस्था में आंख की पुतलियां धसं जाती है तथा उनके स्पर्ष घ्राण और श्रवण की शक्ति क्षीण होने लगती है। 
  32. व्यक्ति झुक जाता है और जोडा़ें में पीडा़ का अनुभव करता है। 
  33. वृद्धावस्था में मल-मूत्र प्रणाली में भी शिथिलता आ जाती हैं। उनमें चलने फिरने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे वे अपने को अधिक पराश्रित अनुभव करते हैं। 
  34. वृद्ध व्यक्तियों में रोगाणुओं से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और वे जल्दी-जल्दी बीमारियों के शिकार होने लगते हैं तथा बीमारी लगने के बाद उसे ठीक होने में भी अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। 
  35. वृद्धों की काम क्षमता में शिथिलता बढ़ने लगती है। काम “ौथिल्य के कारण भावनात्मक अस्थिरता, घबराहट, भारीपन, इत्यादि का सामना करना पड़ता है। 
  36. शारीरिक और मानसिक आराम पसंदगी, एकातं प्रियता, भाग्यवादिता, ध्वनि विचलन, एकाग्रता की कमी, शंकालु मनोस्थिति, आदि बातें जीवन में आ जाती है। शरीर में ऊर्जा की कमी का आरम्भ होते ही विविध रोगों के आने की सम्भावना बलवती हो जाती है, और तमाम प्रकार की बीमारियां आ घेरती हैं। 
  37. शारीरिक रोगों के साथ मानसिक रोगों के तीव्रगति से आरम्भ होने की सम्भावना बढ़ जाती है। 
  38. अहंकार केन्द्रित जीवन में लोभ-मोह क्रोध, आसक्ति, र्इश्र्या, भय, बुढ़ापे के प्रमुख संवेगों के रूप में आने लगते हैं। 
  39. बुढ़ापा आते ही स्वभाव में भी व्यापक परिवर्तन होने लगते हैं और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर व्यापक प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

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