एल.एम. सिंघवी समिति क्या है?

जून, 1986 में डॉ. एल.एम. सिंघवी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की। इस समिति ने यह अनुभव किया की पंचायतों की अवधारणा पूर्ण स्वराज्य के दर्शन का एक अंग है। इसने पंचायती राज संस्थाओं को स्वषासन की मूल इकाई के रूप में माना। इस समिति का विचार था कि “पंचायती राज संस्थाओं को मुख्य रूप से प्रशासनिक कार्यक्रमों और विकास सम्बन्धी परियोजनाओं के क्रियान्वयन हेतु सुविधाजनक उपकरण मानना मौलिक त्रुटि रही है। इस त्रुटि का कम या अधिक प्रभाव भी दिख रहा है। इस त्रुटि ने स्वषासन की इकाईयों के रूप में इन संस्थाओं की भूमिका का न केवल अवमूल्यन किया है बल्कि उसकी महत्ता को भी कम किया है और इसने इन्हें मध्यम स्थिति में पहुँचा दिया है जिससे लोकतंत्र और विकास दोनों को न केवल क्षति पहुँची है बल्कि बाधित भी किया है।”

इस समिति का विश्वास था कि पंचायती राज संस्थाओं की संकल्पना के लिए ग्राम स्वराज्य के शुद्धतम अवधारणा से प्रेरणा ली जानी चाहिए। समिति के अनुसार यह संविधान के अनुच्छेद 40 की पृष्ठभूमि में सुस्पष्ट आदेश है। समिति इस मत की थी कि स्वषासन की इकाई के रूप में ग्राम पंचायतों की संकल्पना संवैधानिक आदेश का सन्निहित एवं मुख्य बिन्दु है और आज ग्रामीण वास्तविकताओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण है इस समिति ने ग्राम सभा को बहुत सारे महत्व के साथ जोड़ दिया और इसे प्रत्यक्ष लोकतंत्र के प्रतीक के रूप में मान्यता दी।

इस समिति की प्रमुख संस्तुतियां निम्न थीं-

1. स्थानीय स्वषासन को, संविधान में एक नया अध्याय जोड़कर, संवैधानिक रूप से मान्यता, सुरक्षा और संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। स्थानीय स्वषासन और उससे अधिक विषेश रूप से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक रूप से सरकार का त्रिस्तरीय स्वरूप घोषित किया जाना चाहिए। पंचायत राज की संस्थाओं का चुनाव निर्धारित कार्यकाल की अवधि के समाप्त होते ही तत्काल कराना चाहिए।

2. पंचायती राज की संस्थाओं का चुनाव निर्धारित कार्यकाल की अवधि के समाप्त होते ही तत्काल कराना चाहिए। पंचायती राज संस्थाओं के नियमित स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को सुनिश्चित करने के लिए एक संवैधानिक प्रावधान करना चाहिए और यह कार्य भारत के चुनाव आयोग को सौंप दिया जाना चाहिए जो इसे राज्य चुनाव आयोगों अथवा उसी तरह के उपकरणों के माध्यम से सम्पन्न करवाएँ। किसी भी पंचायत राज संस्था को 6 से 7 महीनों से अधिक समय के लिए स्थगित या निलम्बित रखने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

3. किसी भी राजनैतिक पक्षपात अथवा हस्तक्षेप के आशंकाओं और आरोपों से बचने के लिए इस समिति ने यह संस्तुति की कि पंचायत राज न्यायिक प्राधिकरण की स्थापना प्रत्येक राज्य में की जानी चाहिए जो चुनावों, निलम्बन, अधिग्रहण और भंग किये जाने सम्बन्धी विवादों और कार्यरत पंचायत राज संस्थाओं की कार्य प्रणाली और उनके चुने गये प्रतिनिधियों से सम्बन्धित अन्य दूसरे विशयों में उत्पन्न विवादों का भी निर्णय करें।

4. पंचायत राज संस्थाओं के प्रभावशाली ढंग से कार्य करने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न तरीकों एवं साधनों को खोजा जाना चाहिए। समिति ने सुझाव दिया कि इसके लिए संघीय सरकार द्वारा संविधान के अन्तर्गत नियुक्त वित्त आयोग को पंचायती राज संस्थाओं के लिए पर्याप्त आर्थिक र्सोतो को चिन्हित करने का प्रावधान किया जाना चाहिए।

5. राजनैतिक दलों से जुड़े हुए व्यक्तियों की भागीदारी को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। समिति ने यह भी मत व्यक्त किया कि पंचायती राज संस्थाओं में राजनैतिक दलों से जुड़े व्यक्तियों की भागीदारी को कानून द्वारा जोड़ना न तो व्यावहारिक है और न ही वांछित है।

6. न्याय पंचायतों को न्याय के साथ ही साथ मध्यस्थता और सुलह समझौता कराने का कार्य भी दिया जाना चाहिए। समिति इस मत की थी कि न्याय पंचायतों की संस्था कानून के राज्य और स्वषासन के सामाजिक आचरण के विकास में बहुमूल्य सहायता देने में उपयोगी है। इसलिए इसने यह भी सुझाव दिया कि गाँव के एक समूह के लिए, जो चुनाव के द्वारा अथवा विशिष्ट पैनल द्वारा किसी उद्देश्य से निर्मित किया गया है, में एक न्याय पंचायत हो सकती है।

समिति इस मत की थी कि पंचायती राज संस्थाओं को शक्तिशाली बनाने और पंचायती राज संस्थाओं से सम्बन्धित मतदाताओं, प्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और स्वयं सेवकों की कार्य करने की क्षमताओं को विकसित करने के लिए भी पर्याप्त प्रशिक्षण और सार्वजनिक शिक्षा दी जानी चाहिए। यह अनुभव किया गया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को निर्मित करने की प्रक्रियाओं में यह सर्वाधिक उत्पादक और लाभदायक निवेश होगा। इस समिति ने यह संस्तुति की कि संविधान में प्रस्तावित नये अध्याय के ढाँचे के अन्तर्गत एक आदर्श कानून निर्मित किया जाना चाहिए जिसमें उपयुक्त स्थानीय अनुकूलन के लिए पर्याप्त अवसर हो।

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