मोतीलाल नेहरू का जीवन परिचय एवं व्यक्तित्व

अनुक्रम
मोतीलाल नेहरू का जीवन परिचय
पं0 मोतीलाल नेहरू

नेहरू परिवार मूलरूप से कश्मीर का निवासी था। कश्मीर अपने ऊॅचे पहाड़ों, प्रसून पल्लवित केसर की क्यारियों तथा अपनी प्राकृतिक छटा के लिए प्रसिद्ध था। 18वीं शती के प्रारम्भ में विद्धानों के लिए यह घाटी विख्यात थी। उन विद्वानों मे पं0 राजकौल भी थे, जिनकी विद्वता ने मुगल बादशाह को आकर्षित किया। मुगल बादशाह फर्रूखसियर ने पं0 राजकौल को दिल्ली बसने के लिए बुलाया। शहर के बीच से एक नहर निकलती थी। नहर के किनारे बसने के कारण पं0 राजकौल की सन्ताने ‘नेहरू’ अथाव ‘कौल नेहरू’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।

पं0 राजकौल को मुगल बादशाह ने जागीर के रूप में कुछ गांव दिये थे। जब धीरे-धीरे बादशाही अधिकारों का अवसान होने लगा तो उनकी जागीरें भी सिमटकर कुछ जमींदारी अधिकारों तक सीमित रह गयीं। पं0 राजकौल के पौत्र मौसाराम कौल तथा साहबराम कौल इन अधिकारों के अन्तिम उपभोक्ता थे। मौसाराम के पुत्र लक्ष्मीनारायण मुगल दरबार मे ईस्ट इण्डिया कम्पनी के वकील थे। पं0 लक्ष्मीनारायण के पुत्र पं0 गंगाधर 1857 के विद्रोह के समय दिल्ली में पुलिस अधिकारी थे।

पं0 गंगाधर का विवाह ‘जियोरानी’ के साथ हुआ। गंगाधर के दो पुत्र वंशीधर तथा नन्दलाल थे। 1861 में 34 वर्ष की अल्पायु में गंगाधर की मृत्यु हो गयी। उसके तीन माह बाद ‘ 6 मई 1861’ को जियोरानी ने ऐतिहासिक नगर ‘आगरा’ में अपनी तीसरी सन्तान को जन्म दिया, जिसका नाम पं0 मोतीलाल रखा गया। पति की मृत्यु से जियोरानी मर्माहत थीं। वे भाग्यशाली थीं कि उनके दोनों बड़े बेटे बंसीधर तथा नन्दलाल परिश्रमी तथा आज्ञाकारी थे। बंसीधर आगरा की सदर दिवानी में ‘फैसला लेखक’ के पद पर नियुक्त हुए। नन्दलाल को राजस्थान के खेतड़ी रियासत में नौकरी मिली। बाद में नन्दलाल राजा फतेह सिंह के निजी सचिव तथा अन्त में दिवान बने। तत्पश्चात कानून का अध्ययन कर आगरा में वकालत करने लगे। वंशीधर सरकारी नौकरी में थे। उनका बराबर स्थानान्तरण होता रहता था, इसलिए मोतीलाल का पालन-पोषण नन्दलाल ने किया। दोनों भाइयों में उम्र के साथ स्नेह का बन्धन भी दृढ़ होता गया। इस प्रेम में पितृवात्सल्य तथा भाई-चारे का सुखद समन्वय था। 1870 तक नंदलाल राजा फतेहसिंह के यहॉ रहें। इस बीच राजा फतेह सिंह के निजी अध्यापक काजी सद्रूद्दीन ने मोतीलाल को अरबी तथा फारसी का अध्ययन कराया। फारसी में मोतीलाल को विषेश योग्यता थी। लगभग 12 वर्ष की अवस्था में पं0 मोतीलाल अपने बड़े भाई वंशीधर के पास कानपुर चले गये। कानपुर में इन्होनें ‘क्राइस्ट चर्च ‘ नामक विद्यालय में अपना नामांकन कराया।

पं0 मोतीलाल नेहरू की प्रारम्भिक शिक्षा कानपुर में हुई। उन्होनें मैट्रिक की परीक्षा वही से उत्तीर्ण किया। किषोरावस्था में उनका आत्मविश्वास और साहस एक विदेशी भाषा ‘अंग्रेजी’ के प्रति उमड़ा। वे नवयुवक थे जिन्होनें ‘ पाश्चात्य’ से शिक्षा ग्रहण करने के लिए इलाहाबाद के ‘म्योर सेन्ट्रल कालेज’(Muir Central College) मे प्रवेश लिया। वे इलाहाबाद में ही अपने बड़े भाई नंदलाल के पास रहने लगे। 

कश्मीरी ब्राह्मणों में बाल-विवाह की प्रथा का प्रचलन था। पं0 मोतीलाल नेहरू का विवाह भी कम उम्र मे ही हो गया। बीस वर्ष की अवस्था में पं0 मोतीलाल नेहरू को एक पुत्र भी हुआ लेकिन इस हर्ष का बहुत ही विषादपूर्ण अन्त हुआ। मॉ तथा पुत्र दोनों काल कवलित हो गये। शायद नियति को यही स्वीकार था। पं0 मोतीलाल नेहरू का दूसरा विवाह एक सुशील कन्या ‘स्वरूपरानी’ के साथ हुआ। स्वरूपरानी तथा पं0 मोतीलाल नेहरू का दाम्पत्य जीवन बहुत ही सुखमय था। उन्होने अपना दाम्पत्य जीवन कुछ वर्षों तक आनन्दपूर्वक व्यतीत किया। स्वरूपरानी की अस्वस्थता उनके पारिवारिक जीवन पर एक लम्बी स्याह-छाया छोड़ती गयी। उनका पहला सन्तान एक पुत्र हुआ, जो जीवित नही रहा। 14 नवम्बर 1889 को उनके दूसरे पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम जवाहरलाल नेहरू रखा गया। पं0 मोतीलाल नेहरू के लिए यह सुख का विषेश अवसर था।

1886 में पं0 मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद में चर्च रोड पर मकान खरीदे जिसे बाद में ‘आनन्द भवन’ कहा गया। यह भवन भारद्वाज आश्रम के निकट था। पं0 मोतीलाल नेहरू अब इलाहाबाद में ही वकालत प्रारम्भ कर दिये। उनकी गणना शीघ्र ही एक ख्याति प्राप्त बैरिस्टर के रूप में होने लगी। पं0 मोतीलाल नेहरू ‘इन्डिपेडेन्ट’ तथा ‘लीडर’ नामक समाचार पत्र के संचालक मण्डल के अध्यक्ष भी रहे। 1919 में अमृतसर तथा 1928 के कलकत्ता के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्षता भी किया। 1905. से 1931 तक भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन को दिषा प्रदान किया, तथा उसे नयी गति दिया। 6 फरवरी 1931 को वे पंचतत्व में विलीन हो गये।

मोती लाल नेहरू का व्यक्तित्व

पं0 मोतीलाल नेहरू निश्चय ही युग पुरुष थें। उनका वाह्य रूप जितना मोहक और तेजस्वी था, अन्तरंग भी उतना ही कोमल और ओजस्वी था। उनके व्यक्तित्व के विकास में निसर्ग, परिस्थितियों तथा उनके आत्मबल, अध्यवसाय और दृढ़ संकल्प शक्ति का योगदान रहा है। प्रकृति ने उन्हें विलक्षण मेधा दी थी। चिन्तन शक्ति तथा संवेदनषीलता भी उनके प्रकृति प्रदत्तद गुण थे। इन गुणों का विकास करने में परिस्थितियां भी सहायक सिद्ध हुई। अभय और साहस यदि प्रकृति प्रदत्त गुण थे, तो अध्ययन शीलता, निरालस्य, समय का सुदपयोग तथा त्याग भावना उनके अर्जित गुण थे।

आधुनिक भारत के राश्ट्रवादियों में व्यक्तित्व की दृष्टि से पं0 मोतीलाल नेहरू अद्वितीय थे। एक तो निसर्ग ने ही उन्हें भव्य बनाया था, दूसरे उस भव्यता में जिन भव्य गुणों का समावेश हुआ उस कारण उनके व्यक्तित्व में यह उक्ति चरितार्थ हो गयी थी कि ‘‘सोने में सुगन्ध’’ का मिश्रण हुआ है।

पं0 मोतीलाल के व्यक्तित्व तथा कृतित्व का प्रभाव स्वतन्त्रता से पूर्व तथा स्वतन्त्रता के पश्चात भी बना रहा। वह एक अनथक स्वातन्त्रयवीर, एक लोक प्रिय नेता, प्रतिभाशाली अधिवक्ता तथा आधुनिक भारत के निर्माता है। पं0 मोतीलाल नेहरू मध्यम कद के व्यक्ति थे। उनका शारीरिक सौश्ठव बहुत सौम्य था। स्वभाव शान्त व आकर्षक था। वे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी थे। कश्मीरी लोगो की भॉति पं0 मोतीलाल नेहरू भी गौरवर्ण के थे। सुन्दर स्वरूप, रोबिला चेहरा, चेहरे पर नुकीली मुंछे और सवॉरे हुए बाल उनकी शारीरिक कान्ति को और भी बढ़ा देते थे। उनका पहनावा पश्चिमी था। वे सिर पर बाल लगी हुई विषेश प्रकार की किष्तीनुमा टोपी, आगे की तरफ कटा हुआ छोटा कोट, घुटने पर बटन वाला तंग पाजामा और घुटने तक “वेतवर्ण के मोजे, एक विषेश प्रकार के बकल लगे हुए जूते तथा कमर में कमरपट्टा धारण करते थे।

पं0 मोतीलाल नेहरू म्योर सेन्ट्रल कालेज के प्रोफेसर्स के गहन सम्पर्क में रहे। इस सम्पर्क ने उनके स्वाभाविक स्वतन्त्रता वृत्ति को और शक्तिशाली बना दिया। किसी भी सामाजिक अत्याचार को सहन कर पाना उनके लिए असम्भव था। 1890 की यूरोप यात्रा उनके जीवन में बहुत निर्णायक सिद्ध हुई। उस समय कश्मीरी ब्राह्मणों में एक रूढ़िगत व्यवस्था थी जिसके अनुसार विदेश यात्रा सामाजिक अपराध था।

वकालत का पेशा

इलाहाबाद अपनी पौराणिक कथाओं तथा ऐतिहासिक विशेषताओं के लिए सुप्रसिद्ध है। वह संयुक्त प्रान्त की राजधानी था। यहॉ विश्वविद्यालय और हाईकोर्ट भी था, जो आज भी है।

यह नगर यूरोपीय एवं भारत के शिक्षित व्यक्तियों की विचारधारा को ढ़ालने वाली ब्रिटिश समाचार पत्रों का केन्द्र भी था। उत्तर भारत का यह अत्यन्त जागरूक नगर पं0 मोतीलाल नेहरू के व्यावसायिक जीवन का केन्द्र बना।

पं0 मोतीलाल नेहरू नें 1883 में पं0 पृथ्वीनाथ के सानिध्य में कानपुर मे वकालत प्रारम्भ किया। तीन वर्ष बाद 1886 में जब वे इलाहाबाद आये तो इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। पं0 मोतीलाल नेहरू दीवानी के वकील थे। उनके अधिकतर मुकदमें जमींदारों तथा तालुकेदारों के उत्तराधिकार से सम्बन्धित होते थे। ऐसे मुकदमों में अच्छी आमदनी होती थी। 1894 में ‘लखना सिंह’ जमींदारी का मुकदमा पं0 मोतीलाल नेहरू को मिला। यह उनके पास तीस वर्षों से भी अधिक समय तक रहा। इसी मुकदमे में चीफ जस्टिस सर ग्रीमवुड मियर्स ने प्रशंसा करते हुए लिखा था कि- ‘‘ इस संसार में कोई भी वकील इस मुकदमें की इससे अच्छी पैरवी नही कर सकता था। जैसा कि पं0 मोतीलाल नेहरू ने की।’

1896 में चीफ ‘जस्टिस सर जान एज’ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रबुद्ध अधिवक्ताओं की एक सूची जारी किया। इस सूची में वरीयता क्रम इस प्रकार था-पं0 मोतीलाल नेहरू, सर सुन्दर लाल, मुंशी राम प्रसाद और श्री योगेन्द्र नाथ चौधरी। अगस्त 1909 में पं0 मोतीलाल नेहरू को इंग्लैण्ड की प्रिवी कौन्सिल की न्याय समिति के सम्मुख उपस्थित होने तथा वकालत करने की भी आज्ञा प्राप्त हो गयी।

पं0 मोतीलाल नेहरू में एक स्वाभाविक चतुराई थी। किसी को समझाकर अपना दृश्टिकोण मनवा लेने की उनमें अद्वितीय क्षमता थी। उनमें सहज ज्ञान था। पं0 मोतीलाल नेहरू के ये असाधारण गुण उनको इस स्वतन्त्र व्यवसाय में सफलता के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया। इसमें उन्होने असाधारण सफलता प्राप्त किया। वे पूर्ण मनोयोग से बीस वर्षों तक व्यवसाय में व्यस्त रहे। ज्यों-ज्यों वे सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुॅचते गये, उनका आत्मविश्वास भी दृढ़ होता गया। इस व्यवसाय में उन्होंने काफी धन तथा यश अर्जित किया। वे अपने निवास ‘आनन्द भवन’ की सजावट के लिए 1899, 1900, 1905 तथा 1909 में यूरोप की यात्रा किये, तथा वहॉ से फर्नीचर तथा अन्य विलासितापूर्ण वस्तुओं की खरीदारी की। जिस समय साइकिल एक नवीनता की वस्तु थी उस समय उन्होने साइकिल खरीदा। उनका हर नया सामान ‘राजाराम मोतीलाल गुजदर एण्ड कम्पनी’ के द्वारा मंगवाया जाता था। इस कम्पनी के वे भागीदार भी थे। 1904 में एक विदेशी कार मंगवाया जो इलाहाबाद में पहली और सम्भवत: संयुक्त प्रान्त में भी पहली कार थी। इसके बाद ‘फियेट’तथा ‘लैन्सिया’ जैसी कीमती कारे उनके पास हो गयी।

पं0 मोतीलाल नेहरू की व्यावसायिक सफलता और आर्थिक समृद्धि ने उनके सार्वजनिक जीवन का मार्ग प्रशस्त किया। 

सन्दर्भ-
  1. S.P.Chablani and Preet Chablani-Motilal Nehru-Essays and Reflection on his life and times-p-25 S.Chand & Company New Delhi-1961.
  2. बी0आर0 नन्दा-आधुनिक भारत के निर्माता पं0 मोतीलाल नेहरू, पृश्ठ-1. प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, 1966. (1) प्रथम-अध्याय प्रथम-अध्याय (2)
  3. D.N.Panigrahi- Selected workes of Motilal Nehru- Page-17
  4. डा0 गोविन्ददास-पण्डित मोतीलाल नेहरू- पृश्ठ-2 (3)
  5. अमृत राय-विविध प्रसंग (इलाहाबाद 1960) पृश्ठ-17
  6. S.P.Chablani and Preet Chablani op cit-p-25
  7. B.R.Nanda- The Nehrus- Motilal and Jawaharlal, George Allen and Unwin London, 1962, pp-16-17 2- op.cit-p-6 
  8. Ravindra Kumar and D.N.Panigrahi- Selected Works of Motilal Nehru-Voll-I-P-8. 2. Ibid. 3- B.R.Nanda- The Nehrus- Page-11. 

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