औषधि का अर्थ, भेद एवं वर्गीकरण

अनुक्रम
औषधि का अर्थ

औषधि शब्द के अनेक अर्थ दिये गए हैं। सायण ने व्युत्पत्ति दी है-ओश: पाक: आसु धीयते इति ओशधय: जिनके फल पकते हैं, उन्हें औषधि कहते हैं। यास्क ने इसकी निरुक्ति की है-ओशधय: ओशद् धयन्तीति वा। ओशत्येना धयन्तीति वा। दोशं धयन्तीति वा जो शरीर में शक्ति उत्पन्न कर उसे धारण करती है या जो दोशों को दूर करती है। 

शतपथ ब्राह्मण ने भी औषधियों को दोशनाषक कहा है। औषधियों में त्रिदोश नाषन की शक्ति है और ये वातावरण के प्रदूषण को नष्ट करती है। अत: मानव जीवन में और आयुर्वेद में इनका विशेष महत्व है।

औषधियों के भेद

औषधियों के मुख्य रूप से दो भेद हैं और उनके दो-दो भेद होने से चार भेद होते हैं। औषधि के मुख्य दो भेद हैं-वनस्पति औश्र औषधि। वृक्षों के लिए वनस्पति शब्द है और छोटे पौधों के लिए औषधि। ऋग्वेद में वृक्ष और वनस्पति के लिए ‘वनिन्’ शब्द भी आता है। वनस्पति के दो भेद किए गए है-वनस्पति और वानस्पत्य। बड़े वृक्षों के लिए वनस्पति शब्द है और अपेक्षाकृत छोटे वृक्षों के लिए वानस्पत्य शब्द। इसी प्रकार औषधि के भी दो भेद किए गये हैं-औषधि और वीरुध्। छोटे पौधे के रूप में होने वालों की औषधि और लता गुल्म आदि के रूप में होने वालों को वीरुध् कहा गया। अथर्ववेद में इन चार भेदों का उल्लेख है। अथर्ववेद में औषधि के लिए भेशजी शब्द का प्रयोग हुआ है।

औषधियों का वर्गीकरण

वैदिक वांगमय में औषधियों का वर्गीकरण विस्तृत रुप से मिलता है। जिससे उनके स्वरुप तथा गुणकर्म पर प्रकाश पड़ता है। प्राचीन महर्शियों ने वर्ण, पत्र, पुष्प, फल, कांड आदि अवयवों, अन्य रचनात्मक विषेशताओं, उद्भव स्थानों तथा गुणकर्म का सूक्ष्म निरीक्षण कर उसके आधार पर वनस्पतियों को विभिन्न वर्गों में स्थापित किया है। सामान्यत: औषधियों का वर्गीकरण औभिद्र द्रव्य वनस्पति, वानस्पत्य, वीरुध् तथा औषधि इन चार वर्गों में विभाजित किये गये हैं। चरक संहिता में भी ऐसा ही वर्गीकरण उपलब्ध होता है। ऋग्वेद में ‘वानस्पत्य’ शब्द नहीं मिलता है, इसके स्थान पर वनिन् शब्द प्रयुक्त हुआ है। सायण ने इसका अर्थ पलाष आदि वृक्ष किया है। अथर्ववेद में उर्पयुक्त चारों विभाग स्पश्ट रुप से मिलते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों में औषधि, वनस्पति और वानस्पत्य शब्द मिलते हैं किन्तु ऋग्वेद का वनिन् शब्द नहीं मिलता तथा वीरुध् भी नहीं है। वृक्ष शब्द मिलता है इसी प्रकार उपनिशदों में औषधि और वनस्पति तो मिलते हैं किन्तु वानस्पत्य और वीरुध् नहीं हैं। वृक्ष का प्रयोग हुआ है। सामान्य रुप से छोटे पौधों के लिए औषधि तथा बड़े वृक्षों के लिए वनस्पति शब्द का प्रयोग प्रारम्भ काल से होता रहा है, तथा इनका युग्म रुप औषधि-वनस्पति समस्त वानस्पतिक जगत् का बोधक रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारम्भ से वनस्पतियों के यही दो विभाग रहे होगें जो आगे चलकर पुन: दो-दो भागों में विभक्त होकर चार हो गये होगें। औषधि को ही गुल्म, लता आदि विषिश्ट स्थान का बोध कराने के लिए वीरुध् एक वर्ग हो गया। उसी प्रकार वनस्पति का एक विभाग वानस्पत्य हो गया जो अपेक्षाकृत छोटे वृक्षों का बोधक है।

औषधियों को गुण-धर्मों और रूपादि के आधार पर भी वर्गीकरण किया गया है, जो इस प्रकार से है -

1-रंग के आधार पर वर्गीकरण-औषधियाँ इन विभिन्न रंगों की होती है-बभु (भूरे रंग वाली), शुक्र (सफेद रंग की), रोहिणी (लाल रंग की), पृष्चि (चितकबरी), असिक्नी (नीले रंग की ), कृश्णा (काले रंग की)। तृणती (चारों और फेलने वाली), अंषुमती (अनेक सूक्ष्म अवयव या रेशों वाली), काण्डिनी (पौरुओ वाली), विशाखा (अनेक शाखाओं वाली)।

2-गुणों के आधार पर वर्गीकरण-जीवला (जीवनशक्ति देने वाली), नधारिशा (हानि न देने वाली), अरुन्धती (मर्मस्थल भरने वाली), उन्नयन्ती (उन्नत करने वाली), मधुमती (मधुर रस वाली), प्रचेतस् (चेतना देने वाली), मेदिनी (स्त्रिग्धता देने वाली), उग्र (तीव ्र गन्ध वाली), विशदूशणी (विशनाषक), बलासनाषनी (कफनाषक या कैंसर को नष्ट करने वाली)।

3-फल आदि के आधार पर-पुष्पवती (फूलों वाली), प्रसूमती (कली या अंकुरों वाली), फलिनी (फल वाली), अफला (बिना फलों वाली)।

कुछ औषधियाँ पर्वतों पर होती हैं अनेक औषधियाँ समतल भूमि पर होती हैं। कुछ औषधियाँ नदी तालाबों आदि में होती हैं। समुद्र के अन्दर भी औषधियाँ होती है। गहरे समुद के अन्दर भी औषधियाँ होती है। गहरे समुद्र के अन्दर गोताखोर ऐसी औषधियाँ निकालते हैं। कुछ. औषधियाँ भूमि से खोदकर निकाली जाती है। कुछ खनिज औषधियाँ भूगर्भ से निकाली जाती है। कुछ औषधियाँ प्राणिज भी हैं, जो जीवों के सींग आदि से उत्पन्न होती हैं। प्राकृतिक तत्त्व सूर्य, चन्द्र, जल, अग्नि, वायु स्वयं औषधि रूप हैं और ये अनेक रोगों के नाषक हैं। 

इनके आधार पर सूर्यकिरण चिकित्सा, जल चिकित्सा आदि का वेदों में विस्तृत वर्णन है। इस प्रकार औषधियों को हम इन रूपों में प्राप्त करते हैं -
  1. प्राकृतिक औषधियाँ-सूर्य, चन्द्र, मिट्टी, जल, अग्नि और वायु।
  2. उद्भिज्ज या ओद्भिद औषधियाँ-पृथ्वी को फाड़कर निकालने वाले वनस्पति औषधियाँ।
  3. खनिज द्रव्य-अंजन, सुवर्ण, रजत, सासा आदि।
  4. प्राणिज द्रव्य-मृग का सींग आदि।
  5. समुद्रज या समुद्रिय द्रव्य-शंख आदि।
औषधियाँ चिकित्सक का बल है। वैद्य औषधियों का संग्रह करते हैं और इनका ठीक उपयोग करते हैं वैद्य औषधियों से जीवन-यात्रा के लिए धन, गाय, वस्त्रादि प्राप्त करते हैं। औषधियों का क्रय-विक्रय भी होता है। अत: उन्हें ‘अपक्रीता’ कहा गया है। कुछ औषधि धन से खरीदी जाती थी। वरणावती औषधि वस्त्र, शाल या मृगचर्म क े विनिमय से प्राप्त की जाती थी।

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