जल-चिकित्सा क्या है?

अनुक्रम
जल-चिकित्सा का बहुत अधिक महत्व दिया गया है। रूद्र और वरूण देवों को जल-चिकित्सा के क्षेत्र में अग्रगण्य बताया गया है। रूद्र को प्रथम दिव्य भिशक् माना गया है। इसीलिए रूद्र को जल-चिकित्सक भी कहा जाता हैं। इसी प्रकार वरूण को वैद्यों का स्वामी और चिकित्सक कहा गया है।

सोम राजा का कथन है कि जल में सभी ओषधियों के गुण विद्यमान हैं, जल से सभी रोगों की चिकित्सा हो सकती है।एक मंत्र में यह कहा गया है कि जल अमृत है क्योंकि इसमें ही ओषधि के गुण हैं। जल शरीर को शक्ति देता है इसीलिए रोगनाशक है। जल में सोम आदि रसों को मिलाकर सेवन करने से मनुष्य दीर्घायु होता है। जल-चिकित्सा के विषय में यहॉं तक कहा गया है कि सभी रोगों का इलाज जल ही है, यहॉं तक कि यह आनुवंशिक रोगों को भी नष्ट करता है। जल को सर्वोत्तम वैद्य बताया गया है और यह कहा गया है कि ऑंख और पैर आदि के दर्द को दूर करता है। जल हृदय के रोगों को भी दूर करता है।
 
जल के विविध गुणों का वर्णन अनेक सूक्तों में किया गया है। हिमालय से निकलने वाली नदियों का जल विषेश लाभकारी है। इनका हृदय रोगों में प्रयोग करना चाहिए।171 बहता हुआ जल शुद्ध और गुणकारी होता है। यह मनुष्य को शक्ति और गति देता है। कर्मठता के लिए जल का सेवन करें।

वर्षा के जल को सबसे उत्कृष्ट और अमृत बताया गया है। इससे सभी रोग दूर होते हैं और दीघार्यु की प्राप्ति होती है।जल के अन्य गुण भी बताए गये हैं जल बलवर्धक है। यह रमणीयता और सौन्दर्य का वर्धक है। जल मनुष्य को माता के तुल्य शान्ति और सुख देता है। जल मानव की स्थिति का आधार है, अर्थात् जल के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता है। जल वरणीय वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ है। यह जीवन के लिए ओशधि का काम करता है।

जल के ये लाभ बताए गए हैं - वैद्यों के लिए जल अधिक उपयोग की वस्तु है गहराइ से निकाला हुआ जल अत्युत्तम होने के कारण सर्वोत्तम चिकित्सा का साधन है। जल पापों और पाप-भावनाओं को नष्ट करता है। यह कुस्वप्नों का भी नाषक है। जल रोगों को नष्ट करता है और शरीर को नीरोग रखता है। जल में संजीवनी शक्ति है। इसके ठीक उपयोग से मनुष्य सौ वर्ष की आयु प्राप्त कर सकता है।180 जल लाभप्रद है। इसमें घी-के तुल्य बलवर्धन की शक्ति है। जल में अग्नि और सोम दोनों तत्त्व हैं, अत: इसका प्रभाव तीव्र होता है। यह आग्नेय तत्त्व के द्वारा ही प्राणशक्ति  देता है और सोमीय तत्त्व के द्वारा तेजस्विता देता है। जल में शक्ति है, दिव्य गुण है अत: जल तेज प्रदान करता है। जल में अग्नि रहती है, अत: जल की रगड़ से विद्युत उत्पन्न होती है, यह जल शक्ति और तेज देता है।
स्थान और आश्रय आदि के भेद से जल के गुणों में भेद हो जाता है, अत: जल उत्तम, मध्यम और अधम होता है। सूर्य की किरणों में रहने वाला जल उत्तम होता है। बहता हुआ जल निर्दोष और विषेश गुणकारी होता है। अत: रूका हुआ या अपवित्र वस्तुओं से युक्त जल गुणकारी नहीं होता है।

जल अनेक प्रकार से प्राप्त किया जाता है-वर्षा से, नदियों और समुद्रों से, जलीय प्रदेशों से, रेगिस्तान या रेतीले प्रदेश से, खोद कर बनाए हुए कूप आदि से। हिमालय पर्वत से आने वाला जल, स्रोतों का जल, वर्षा का जल और निरन्तर वेग से बहने वाले जल का वर्णन है। इन स्थानों से प्राप्त होने वाला जल शुद्ध होता है, अत: लाभकारी है। इनमें भी वर्षा के जल को सर्वोत्तम माना गया है। 

शरीर विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण बात कही गयी है कि शरीर में आठ प्रकार का जल है, अर्थात् आठ प्रकार के जल से शरीर की रचना हुई है। इसमें अस्थियों को समिधा और वीर्य को घी का रूप माना गया है। जल सभी देवों और ब्रह्म के साथ शरीर में प्रविष्ट हुआ। शरीर में सारे देवों का निवास है, अत: पुरूश को ब्रह्म कहा जाता है। शुद्ध जल अमृत और रोगनाशक है, परन्तु दूषित जल और दूषित रस सामान्य रोग ही नहीं, अपितु क्षेत्रीय अर्थात् वंश-परम्परागत रोगों के भी कारण होते हैं।

रूद्र को जल-चिकित्सा का आविष्कारक माना गया है। इस चिकित्सा से चोट, घाव, बाणों के घाव भी ठीक हो जाते हैं। जल-चिकित्सा को ‘जलाशभेशज’ कहा गया है और रूद्र को जल-चिकित्सक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।जल-चिकित्सा को उग्र भेशज अर्थात् शीघ्र लाभकारी दवा कहा गया है। इसमें रोगग्रस्त अंष को जल में भिगोया जाता है। और उस पर जल धार के रूप में या छीटें के रूप में डाला जाता है ऐसा करने से वह अंष नीरोग हो जाता है।

जल-चिकित्सा की उपयोगी विधियां

चरक, सुश्रुत और वाग्भट ने जल के विविध रूपों और उनके उपयोग पर विचार प्रस्तुत किया है। इसमें वर्षा का जल, नदियों का जल, समुद्र का जल, ठंडा जल, गर्म जल, पेय जल, अपेय जल आदि का सेवन करते हुए ग्राह्य और अग्राह्य का विवरण दिया गया है तथा इनकी चिकित्सा की दृष्टि से उपयोगिता पर प्रकाश डाला गया है।

जल के तीन विशिष्ट गुण हैं-
  1. रक्त में विद्यमान विकृत पदार्थों को घुलाना,
  2. घुले हुए का निष्कासन,
  3. स्वच्छ रक्त का संचालन और शरीर को बल प्रदान करना।
इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित प्रयोग प्रस्तुत किये हैं -
  1. गीली घास पर, गीले पत्थर पर, ओस से भीगी या वर्षा से गीली रेत या जमीन पर, ताजी पड़ी बर्फ पर नंगे पैर टहलना चाहिए।
  2. पैरों और हाथों को शीतल जल से धोना चाहिए।
  3. घुटनों पर धार से पानी डालना अर्थात् अभिसिंचन करना चाहिए।
  4. प्रत्येक ठंडे जल के प्रयोग के बाद व्यायाम या श्रम के द्वारा शरीर में गर्मी लाना चाहिए।
भारत में जल-चिकित्सा लुई कूने की पुस्तक "New Science of Healing’ के साथ आयी। उनका मत था कि सभी रोगों का कारण एक है और उन सबकी चिकित्सा भी एक है। उन्होंने स्नान, वाष्प-स्नान आदि स्नानों पर विषेश बल दिया है।

एडोल्फ जूस्ट ने जल-चिकित्सा में मिट्टी के व्यापक प्रयोग का उल्लेख किया है। उन्होंने आहार-नियंत्रण पर भी बल दिया है। मिट्टी में विजातीय विघ्रों और कीटाणुओं से उत्पन्न गर्मी को रूग्ण स्थान से खींच लेने की भारी शक्ति है। अत: उन्होंने चोट, घाव, जलना, फोड़े-फुन्सी, दाद, खाज, एक्जिमा आदि चर्मरोग, बिच्छू-सॉंप आदि के काटने पर तथा हड्डी के टूट जाने पर गीली मिट्टी का प्रयोग लाभदायक है।

जल ही जीवन है अर्थात् जल हमारे जीवन का आधार है। यह आयुवर्धक रसायन है। इसमें दो तत्त्व मुख्य हैं-हाइड्रोजन (सोम) और आक्सीजन (अग्नि) अत: जल दोशनाषक और शोधक दोनों है। वैज्ञानिकों ने मानव शरीर तथा उसके विभिन्न अंगों के विश्लेषण द्वारा बताया है कि जल शरीर में 70 प्रतिषत, लार में 99 प्रतिषत, मूत्र में 93 प्रतिषत, पित्त में 88 प्रतिषत, रक्त में 79 प्रतिषत, मांसपेषियों में 75 प्रतिषत, पसीने में 56.8 प्रतिषत और हड्डी में 13 प्रतिषत विद्यमान है। अत: शरीर में जल का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है अन्यथा विभिन्न रोगों का जन्म होता है, कुछ मुख्य विधियां इस प्रकार से हैं -

1. टब बाथ - टब बाथ का अर्थ रोग ग्रस्त अंष को पानी में भिगोया जाए। इस प्रयोग में टब या बड़े पात्र में पानी भर कर व्यक्ति उसमें बैठता है, निर्धारित समय तक टब में बैठने से पानी का प्रभाव उसके शरीर और अंगों पर पड़ता है। परिणाम स्वरूप व्यक्ति के रोग ग्रस्त अंग नीरोग हो जाते हैं और धीरे-धीरे शरीर नीरोग होकर स्वस्थ और पुश्ट होते हैं।

2. कटिस्नान - यह लुई कूने की आविश्कृत चिकित्सा विधि है। टब या बड़ा टीन का बर्तन लेना चाहिए, उसमें ठंडा पानी इतना भरना चाहिए कि जिसमें बैठने पर जल नाभि तक आ जाए। पैर टब से बाहर रहते हैं। कपड़े से पेट को धीरे-धीरे मलते हैं। ऐसा 5 से 10 मिनट तक करें। बाद में गर्मी के लिए व्यायाम या श्रम करें। इससे गर्मी के दस्त ठीक होते हैं। मोटापा दूर होता है, ख्ूान शुद्ध होता है। स्नायुमण्डल को लाभ होता है। उच्च रक्त चाप में भी लाभ प्रद है। इससे पेट की वायु निकल जाती है। पाचन शक्ति प्रबल होती है। रक्त प्रवाह नियमित होता है और बल प्राप्त होता है। पादस्नान - इसके लिए पिंडली या घुटने तक गहरे ठंडे पानी में एक से तीन मिनट तक खड़ा रहना होता है। इससे शरीर में ताजगी आती है और शक्ति बढ़ती है। इससे नाड़ी-दुर्बलता, रक्ताल्पता, सिर और गर्दन के रोग, व्रण, घाव, संधिवात, गठिया और पैरों के समस्त रोग दूर होते हैं।

3. अर्धस्नान - टब में बैठने पर जल पेट तक पहुॅंचे। पानी ठंडा होना चाहिए। एक मिनट में तीन मिनट तक करें, इससे अधिक नहीं। इससे शरीर के निचले भाग की विकृतियॉं और रोग समूल नष्ट होते हैं। इससे आतें बलिष्ठ होती हैं। शक्ति की वृद्धि होती है। अर्ष (बवासीर), वायु, उदरषूल, हिस्टीरिया आदि रोग नश्ट होते हैं। सहस्रधारा-स्नान या फब्बारे का स्नान - शरीर में शीतलता लाने के लिए उत्तम साधन है। इससे मानसिक और शारीरिक शान्ति मिलती है और इससे रोग निरोधक शक्ति आती है।

4. घुटनों पर धारापात - घुटनों पर धारापात कुर्सी पर बैठकर दोनों घुटनों पर टोटी वाले बर्तन से दो से दस मिनट तक धार से पानी डालना चाहिए। फादर क्नाइप ने इस विधि की बहुत प्रशंसा की है। इससे पैर में रक्त की कमी, कमजोरी एवं पैर की सभी बीमारियों में विषेश लाभ होता है।

5. एनीमा (Enema) - आंतों की धुलाई और सफाई के लिए एनीमा विधि है। यह जल-चिकित्सा का प्राण है। जिन्हें कब्ज की षिकायत रहती है, उन्हें सप्ताह में एक बार एनीमा लेने से लाभ होता है। इसका अधिक प्रयोग हानिकारक है।

5. मिट्टी की पट्टी का प्रयोग - जल-चिकित्सा में मिट्टी भी सहायक है। स्वच्छ मिट्टी खूब ठंडे पानी में भिगोकर गाढ़ा सान लें, रूग्ण स्थान पर इसकी आधा इंच मोटी तह बनाकर रखें और ऊपर से कपड़ा बॉंध दें। आवष्यकतानुसार आधे घंटे बाद पट्टी बदल दें। जूस्ट का कथन है कि गीली मिट्टी की पट्टी चोट, घाव, आग से जलने, फोड़े फुन्सी, दाद, खाज, एक्जिमा, बिच्छू आदि के काटने पर विषेश लाभप्रद है। पेट पर मिट्टी की ठंडी पट्टी बॉंधने से ज्वर, दस्त, हैजा, बवासीर, पेचिष, कब्ज आदि ठीक होते हैं। यह भोजन से एक घंटा पूर्व या ढाई घंटे बाद बॉंधनी चाहिए।

6. उशापान - प्रात: उठते ही शौच से पूर्व एक गिलास ठंडा पानी पीना चाहिए। इससे कब्ज की षिकायत दूर होती है। फेफड़े और दिल स्वस्थ होते हैं, शरीर में स्फूर्ति आती है, ऑंखों की ज्योति बढ़ती है और मनुश्य दीर्घायु होता है।

7. तैरना - जल में तैरना उत्तम व्यायाम है। इससे हाथ-पैर का अच्छा व्यायाम हो जाता है। इससे नसों में स्फूर्ति आती है, मन और मस्तिष्क में नया जीवन आता है, रक्त प्रवाह में प्रगति होती है और भूख अच्छी लगती है।

8. ऑंख के रोगों की चिकित्सा - लाल फिटकिरी के ऊपर पतली धार से पानी डालना और Eye Glass में उस लोषन को लेकर क्रमष: दोनों ऑंखों को धोना। एक ऑंख को हाथ से बंद करके दूसरी ऑंख को Eye Glass में डुबोना और 8 से 10 बार खोलना और बन्द करना चाहिए। जल बदल कर इसी प्रकार दूसरी ऑंख को धोना चाहिए। इससे ऑंख की बीमारियॉं दूर होती हैं। नियमित रूप से प्रतिदिन एक बार करने से ऑंख की कोई बीमारी नहीं होने पाती।

9. उदर-कृमि एवं उदर रोग - ताजी पड़ी हुई बर्फ को गुड़ के साथ खाने से पेट के सभी कीड़े मर जाते हैं एवं वर्षा का शुद्ध जल उपवास आदि के समय पान करने से शरीर के प्राय: सभी रोग नष्ट हो जाते हैं।

10. ज्वर-ताप - ज्वर का ताप अधिक होने पर रोगी के माथे पर शीतल जल की पट्टी रखने से ताप न्यून हो जाता है और उसकी बेहोषी आदि दूर हो जाती है। गीली मिट्टी की पÍी भी ज्वर का ताप कम कर करती है।

11. कुस्वप्न, स्वप्नदोश आदि - कुस्वप्न और स्वप्न दोष आदि के निवारण के लिए सोते समय शीतल जल से पैरों को धोना बहुत लाभप्रद होता है। मूत्रेन्द्रिय को शीतल जल से धोने से भी रोग नष्ट होते हैं।

12. प्रमेह - पुरूशों और स्त्रियों के प्रमेह रोग को दूर करने के लिए कटि स्नान (टब बाथ) उत्तम उपाय है। कटि-स्नान और षिष्न-स्नान वीर्य सम्बन्धी रोगों को दूर करने के लिए लाभप्रद है।

13. चर्मरोग - वर्षा के स्वच्छ जल में स्नान करना और रोगग्रस्त अंष पर शीतल जल धार से डालना चर्मरोग को नश्ट करता है।

14. जलपान - आधुनिक चिकित्सा शास्त्रियों का मत है कि पर्याप्त मात्रा में जल न पीने से मनुष्य को सैकड़ों रोग हो जाते हैं। अत: प्रत्येक मनुष्य को दिन में कम से कम दो लीटर पानी पीना चाहिए। जल शरीर के अन्दर के सभी दूषित तत्त्वों को बाहर निकाल देता है और शरीर को स्वस्थ रखता है।

इस प्रकार से विभिन्न रंग की बोतलों में सूर्य की किरणों में रखा हुआ जल ओषधि के रूप में हो जाता है और यह विविध रोगों की चिकित्सा के काम आता है।

Comments