कृषि का उद्भव एवं का विकास

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कृषि की उत्पत्ति कब, कहाँ, कैसे हुई, यह एक खोज का विषय है ? इस संदर्भ में पुरात्त्वविदों, मानवषास्त्रियों, वनस्पतिषास्त्रियों, जीव विज्ञानवेत्ताओं आदि ने उद्भव एवं विकास दशाओं से सम्बंधित पर्याप्त सामग्री जुटाई है।
पृथ्वी पर मानव ने अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अनेक व्यवसाय अपनाये हैं जिनमें कृषि एवं पशुपालन अत्यन्त प्राचीन व्यवसाय है। कृषि का उद्भवात्मक पहलू फलोत्पादन तथा पशुपालन के इतिहास से ही जुड़ा हुआ है। पृथ्वी पर मानव की उत्पत्ति 10 लाख वर्ष पूर्व से अधिक पुरानी मानी गयी है, जिसने जिन्दा रहने के लिए पहले शिकार,ुलों व कन्दमूलों का प्रयोग किया होगा। इनके नहीं मिलने पर उसने कृषि क्रिया को सीखा है। अनुमान लगाया गया है कि आज से 10,000 वश्र पूर्व प्रथम बार खेती का काय्र प्रारम्भ हुआ। आरम्भिक काल में भौतिक व सामाजिक अवरोधों के कारण कृषि काय्र विधि में विकास की गति पर्याप्त धीमी रही।

पुरापाशाणकालीन मानव ने शिकार के साथ-साथुल एकत्रित करना भी सीख लिया था और इस समय तक मानव का अधिकांश समय भोजन की तलाष में ही व्यतीत होता था। शिकार न मिलने की दशा में उन्हें भूखा भी रहना पड़ा होगा। भुख की समस्या का स्थायी समाधान करने के लिए तात्कालीन मानव ने कृषि करने से पूर्व कुछ पशुओं को पालतू बनाया और कुछ पौधों की खेती की। इस प्रकार कृषि मानव के अनवरत प्रयासों काुल है। सभ्यता के साथ-साथ पशुओं के प्रति मानव का दृष्टिकोण बदला है। पहले वह जिन पशुओं को मारकर खा जाता था आज वह उनके पालन पर जोर देने लगा है। खेतों को जोतने, बोझा ढोने, ऊन प्राप्त करने, दूध, खाल, माँस प्राप्त करने की दृष्टि से पशुओं को पालतू बनाया गया है। प्रारम्भ में पौधे प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य को कुछ भोजन प्रदान करते थे। उसे कुछ भोजन स्वपोशी कीटों, पक्षियों व अन्य जीवों से भी प्राप्त होता था। उसने अग्नि की सहायता से जंगलों को साफ करके कृषि प्रारम्भ की है।

स्टीवर्स का मत है कि “यह अवस्था हमें लाखों नहीं तो हजारों वर्षों पीछे अवश्य ले जाती है।” पौधों एवं पशुओं को पालतू बनाने का काय्र 80,000 ई पूर्व प्रारम्भ हुआ था परन्तु प्रारम्भिक कृषि और चारण अवस्था के मध्य का सम्बंध विवादास्पद है। इस सम्बंध में एक मत यह है कि नविन अन्नोत्पादक अर्थव्यवस्था मिश्रित कृषि की “ौष्वस्थली से विभिन्न दिषाओं में फेली। यह पालना उर्वर चाप में स्थित था। इनमें से एक अर्थव्यवस्था य ूरेषिया के स्टेपी प्रदेश मे गयी। वहाँ यह पषुचारणिक तथा चलवासी अर्थव्यवस्था के रूप में बदल गयी। इस प्रक्रिया में पर्यावरणीय कारकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

रोमन सभ्यता के समय से यह धारणा प्रचलित रही है कि कृषि का विकास वन्य प्राणियों के शिकार, वन्युलों व खाद्य वस्तुओं के संग्रहण तथा पशुपालन के बाद हुआ है। कृषि की उत्पत्ति के सम्बंध में अमेरिकन विद्वान कार्ल सॉवर का मत है :-
- कृषि का उद्भव उन समुदायों में नहीं हुआ जहाँ अन्न की अत्यन्त कमी थी अपितु वहाँ हुआ जहाँ कृषि के उपयोग करने के लिए अभावों से उन्मुक्तता थी।
- आदिम कृषि का प्रारम्भ विशाल नदी घाटियों में न होकर पहाड़ी भूमियों में हुआ क्योंकि नदी घाटियाँ बाढ़ों से प्रभावित रहती थी।
- कृषि जंगली भूमि से प्रारम्भ हुई है क्योंकि वहाँ मिट्टी आसानी से कार्यावस्था में लायी जाती थी।
- कृषि के संस्थापक स्थायी निवासों में रहते थे क्योंिकुसलों को उगाने व उनकी देखभाल करने के लिए समय-समय पर कृषक खेतों पर जाते थे।

कार्ल सॉवर का मत है कि सम्भवत: कुछ उत्तम स्थित मिठे जल के भण्डारों के किनारे तथा मृदुल जलवायु वाले भागों में कृषि व्यवसाय प्रारम्भ किया गया होगा। वे मानते है कि दक्षिणी-पूर्वी एशिया प्रारम्भिक कृषि की “ौषव स्थली रही है। उनका तर्क है कि दक्षिणी-पश्चिमी एशिया के पशु समूहों के विपरीत यहाँ कुत्ता, सुअर, कुक्कुट, बत्तख तथा हंस जैसे घरेलू पशु पालतू बनाएं गये। उन्होंने यह स्वीकार किया कि यह पौध रोपण तकनीकी और वानस्पतिक पुरूत्पादन का प्रमुख केन्द्र भी है जिसे मनुष्य ने बीजों सेुसलों को तेयार करने से पूर्व सीखा।

कार्ल सॉवर ने कृषि संस्कृतियों का प्रसार पुरानी दुनिया के उत्तर की ओर चीन, हिन्द महासागर के चारों और से अफ्रीका तथा भूमध्यसागरीय भूमियों के य ूरोप में माना है। इसी प्रकार नई दुनिया में वानस्पतिक पौधा रोपण की उत्तरी-पश्चिमी अंतिम सीमा और मैक्सिकन मध्य अमेरिका को मुख्य बीज पौधों की जन्म स्थली स्वीकार किया है। उन्होंने वानस्पतिक पुनरूत्पादन उष्ण कटिबन्धीय अमेरिका में माना है। कार्ल सॉवर ने पुरानी दुनिया में बीजों को उपजाने के तीन केन्द्र माने हैं-(1) उत्तरी चीन, (2) पश्चिमी भारत से पूर्वी भूमध्यसागर तक तथा (3) अफ्रीका से इथोपिया तक।

कृषि पौधों के उत्पति केन्द्रों के विषय पर सबसे पहले डि कैन्डोल ने अपने विचार प्रस्तुत किये थे। इसके बाद में रूसी वैज्ञानिक एन. आइ्र. वेविलोव ने 1931 तथा 1951 में कृश्य पौधों की निकट सम्बंधित जातियों के विषद् विश्लेषण द्वारा “जीन केन्द्र” प्रतिपादित किये है। वेविलोव ने माना है कि खाद्यान्नों तथा अन्य कृश्य पौधों के उत्पति केन्द्रों पर प्रभावी जीनों की प्रधानता है जबकि कृश्य पौधों में केवल अप्रभावी जीन्स की अधिकता पायी जाती है। ये उत्पति केन्द्र मुख्यत: उष्ण तथा उपोश्ण कटिबंधों के पर्वतीय प्रदेषों में स्थित है। वेविलोव के अनुसार 2 जीन केन्द्र नई दुनिया में तथा 6 जीन केन्द्र पुरानी दुनिया में है। इस प्रकार कुल 8 जीन केन्द्र है।

नई दुनिया के जीन केन्द्र :- 1. दक्षिणी मैक्सिकों तथा मध्य अमेरिकी जीन केन्द्र, 2. दक्षिणी अमेरिकन जीन केन्द्र।
पुरानी दुनिया के जीन केन्द्र :- 1. निकट पूर्वी जीन केन्द्र, 2. भूमध्यसागरीय जीन केन्द्र, 3. चीनी जीन केन्द्र, 4. दक्षिणी-पूर्वी एशियाई जीन केन्द्र, 5. मध्य एशिया जीन केन्द्र, 6. दक्षिणी इथियोपिया तथा पश्चिमी अफ्रीका जीन केन्द्र।

एल. पी. रीड्स के अनुसार:- “कृषि एक विषेश मानवीय क्रिया कलापों की समग्र विशेषताओं प्रदर्शित करती है, जिसमें भूमि की तलाष करना, पौधों का चयन करना, पौधा लगाना, सिंचाइ्र करना,ुसल काटना, अन्न निकालना एवं खाने योग्य बनाना आदि सभी क्रियाएँ सम्मिलित होती है।

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