ममता कालिया का जीवन परिचय, व्यक्तित्व, कृतित्व और उपलब्धियाँ

अनुक्रम
हिन्दी साहित्य जगत की विख्यात कथाकार ममता कालिया का जन्म 2 नवम्बर 1940 में मथुरा, वृंदावन (उत्तरप्रदेश) के केनेडियन मिशन अस्पताल में हुआ। ममता कालिया की माताजी का नाम इन्दुमती तथा पिता का नाम श्री विद्याभूषण अग्रवाल। ममता जी के दादाजी चाहते थे कि उनके पिता पुश्तैनी व्यवसाय की बागडोर अपने हाथों में ले लें, किन्तु आपके पिता जी उस समय एम.ए. कर चुके थे तथा परिवार की इच्छाओं के विरुद्ध जा नौकरी करना आरंभ कर दिया। संभूदयाल कॉलेज, गाजियाबाद में प्रिंसिपल के पद का कार्यभार संभाला। आपके पिता जी साहित्य प्रेमी थे। स्वयं भी लेखन किया करते थे। साहित्य प्रेमी होने के कारण आपके घर में साहित्यिक गोष्ठियाँ होती। आपकी माता जी शालीन, भोली तथा कुशल गृहिणी थी। आपके माताजी रूढ़ियों और परंपराओं पर विश्वास रखती थी। आपके पिताजी गाजियाबाद की प्रिंसिपली छोड़कर आकाशवाणी दिल्ली में कार्यरत रहे।


ममता कालिया का जीवन परिचय
ममता कालिया


ममता कालिया जी की एक बड़ी बहन है, जिनका नाम है प्रतिभा। आपकी दीदी बचपन से ही ललित कलाओं में निपुण रही। दीदी की कुशलता और गतिविधियों के चलते आपको उपेक्षा का पात्र बनना पड़ता था; जो आपके दिल को ठेस पहुँचाता

ममता कालिया जी की शिक्षा

ममता कालिया जी की प्रारंभिक शिक्षा गाजियाबाद के कॉन्वेंट स्कूल से आरंभ हुर्इ। आपने अपनी पूरी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से की। पिता के तबादले के कारण ममता जी ने अपनी स्कूली पढार्इ गाजियाबाद, दिल्ली, नागपुर, मुंबर्इ, पुणे, इंदैौर के विद्यालयों में ग्रहण की। इंदौर के विक्रम विश्वविद्यालय से सन 1961 में बी.ए. की परीक्षा उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण की। दिल्ली विश्वविद्यालय से सन 1963 में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। एम.एम. की उपाधि प्राप्त करते ही दौलतराम कॉलेज, दिल्ली में आपको प्राध्यापक की नौकरी मिली।

ममता कालिया जी का वैवाहिक जीवन

चंडीगढ़ की एक साहित्यिक गोष्ठी में ममता जी की भेंट रवीन्द्र कालिया जी से हुर्इ। रवीन्द्र जी और ममता जी दोनों एक-दूसरे के व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि 12 दिसम्बर, 1964 में प्रणय सूत्र में बंध गए। शादी के समय रवीन्द्र जी टाइम्स ऑफ इण्डिया में कार्यरत थे। आपके विवाह समारोह में हिन्दी साहित्य जगत के बहुचर्चित रचनाकार जेनेंद्र, मोहन राकेश, कमलेश्वर, प्रभाकर माचवे, मुन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती आदि शामिल हुए। ममता जी ने अपने पति रवीन्द्र जी के लिए अपना भविष्य अनेक बार दाँव पर लगाया। उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन में अथाह संघर्ष और कष्ट का सामना किया। नौकरियाँ छोड़ी, परन्तु अडिग चÍान की तरह पति के कदम-से-कदम तथा कंधे-से-कंधा मिला कर चली। कभी भी आत्म-विश्वास कम न होने दिया। ‘प्रेस स्वीधीनता’ की भारी चोट की चपेट में आने के बाद रवÈद्र जी ने इलाहाबाद वापस आने का निश्चय किया, तो आपने भी नौकरी से इस्तीफा दे इलाहाबाद चली आर्इं।

ममता कालिया जी की संतान

ममता कालिया जी और रवीन्द्र कालिया जी के वैवाहिक जीवन से दो पुत्रों की प्राप्ति हुर्इ। बड़ा बेटा अनिरुद्ध मुंबर्इ में एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में नेशनल सेल्स मैनेजर है तथा छोटा बेटा प्रबुद्ध इलाहाबाद में सॉफ्टवेयर तकनीकी विशेषज्ञ है। रवीन्द्र जी के स्वयं कहते थे, ‘‘बच्चों के मन में छवि कुछ-कुछ ‘सांताक्लॉज’ जेसी है। वह बहू-बेटी, पत्नी, लेखिका, प्रिंसिपल तो बहुत बाद में है, पहले माँ है। बच्चों ने जोुरमाइश रख दी, वह पूरी ही होगी, यह ममता का नियम है। बच्चों ने मेरे सामने अपनी माँग रखी ही नही। मुझे यह भी मालूम नही रहता कि बच्चों कीुीस कितनी है। उनके टयूटर को क्या दिया जाता है।”

ममता कालिया जी की साहित्य लेखन की प्रेरणा

ममता कालिया जी को बचपन से ही साहित्यिक परिवेश मिला। पिता हिन्दी और अंग्रेजी विषय के साहित्य में रूझान रखते थे और आपके चाचा भारत भूषण अग्रवाल उस समय के प्रख्यात साहित्यकार थे। बी.ए. की पढार्इ के दौरान ही आपने कविताएँ लिखना आरंभ कर दिया। ‘जागरण’ अखबार के रविवारीय अंक में आपकी पहली कविता ‘प्रयोगवाद प्रियतम’ छपी।

आपने 1960 से साहसी और उत्तेजक कविताओं की रचना की। इन कविताओं ने सभी साहित्यकारों का ध्यान आकर्षित कर लिया। आपकी आरंभिक कविताओं में आक्रोश प्रतीत होता है। ममता कालिया जी अपने साहित्य लेखन की प्रेरणा के लिए मथुरा और मुंबर्इ को विशेष मानती हैं। “मथुरा मेरी कहानियों में बी धड़कती रहती है- कभी आवेश बनकर कभी परिवेश बनकर। मथुरा की यादें दराज में पड़े मुड़े-मुड़े कागजों की तरह हैं जिनमें तारतम्य नही बैठा पायी हूँ।”36 रवीन्द्र जी लिखते हैं, ‘‘ममता के लिए लेखन सबसे बड़ा प्यारा पलायन भी है। वह किसी बात से परेशान होगी तो लिखने बैठ जायेगी। उसके बाद एकदम संतुलित हो जाएगी।”37

कार्यक्षेत्र : सन् 1963 में दिल्ली विश्वविद्यालय में एम.ए. की उपाधि प्राप्त करते ही दिल्ली के दौलतराम कॉलेज में आपको प्राध्यापक की नौकरी मिल गर्इ। कुछ दिनों बाद पिता के तबादले के चलते वह मुंबर्इ चली आर्इं। सन् 1964 में रवÈद्र जी से शादी करने के उपरान्त एस.एन.डी.टी. यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक कार्य किया। रवीन्द्र जी ने ‘धर्मयुग’ की नौकरी से इस्तीफा दे, साझेदारी में प्रेस की शुरुआत की, मगर ‘स्वाधीनता प्रेस’ ने उन्हें सड़क पर ला खड़ा कर दिया। इस वजह से रवीन्द्र जी मुंबर्इ से इलाहाबाद वापस आ गए तो ममता जी भी नौकरी छोड़कर इलाहाबाद आ गर्इ। ममता जी सन् 1973 में इलाहाबाद में संप्रति महिला सेवा सदन डिग्री कॉलेज की प्राचार्य बनÈ। सेवानिवृत्ति उपरांत भी आप लेखन और सम्पादन कार्य से जुड़ी रही। महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की अंग्रेजी पत्रिका ‘हिन्दी’ का संपादन कार्य किया।

ममता कालिया जी का कृतित्व

ममता कालिया जी अपनी रचनाओं और नवीन साहित्यिक प्रयोग के कारण बहुचर्चित और विख्यात साहित्यकार हैं। आपने अपनी रचनाओं में समाज के उन पहलुओं को दर्शाया है जो अब तक अछूते थे।

उपन्यास

  1. बेघर
  2. नरक दर नरक
  3. प्रेम कहानी
  4. एक पत्नी के नोट्स
  5. दौड़
  6. दुक्खम-सुक्खम

कहानी संग्रह

  1. छुटकारा
  2. सीट नंबर छह
  3. एक अदद औरत
  4. प्रतिदिन
  5. उसका यौवन
  6. जांच अभी जारी है
  7. चर्चित कहानियाँ
  8. बोलने वाली औरत
  9. मुखौटा
  10. निर्मोही
  11. थियेटर रोड के कौवे
  12. पचीस साल की लड़की
  13. काके दी हट्टी

कविता संग्रह

  1. एक ट्रिब्यूट टु पापा एंड अदर पोएम्स (अंग्रेजी कविता संग्रह)
  2. खाँडी घरेलू औरत

नाटक तथा एकांकी

  1. आत्मा अठन्नी का नाम है।
  2. आप न बदलेंगे।
  3. यहाँ रोना मना है।

ममता कालिया की उपलब्धियाँ

  1. सन् 1963 में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ दिल्ली की ओर से तथा सन् 1976 में ‘सरस्वती प्रेस’ की ओर से सर्वश्रेष्ठ कहानीकार एवं कहानी का पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया।
  2. ‘उसका यौवन’ कहानी संग्रह पर सन् 1985 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘यशपाल कथा सम्मान’ से विभूषित किया गया।
  3. सन् 1990 में ‘अभिनय भारती’ कोलकाता की ओर से समग्र कथा-साहित्य पर रचना सम्मान तथा इसी वर्ष में ‘रोटरी क्लब’ इलाहाबाद की ओर से ‘वाकेशनल पुरस्कार’ प्राप्त हुआ।
  4. सन् 1998 में ‘एक पत्नी के नोट्स’ उपन्यास के लिए ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान’ की ओर से ‘महादेवी वर्मा अनुशंसा सम्मान’ मिला।
  5. सन् 1999 में ‘बोलने वाली औरत’ कहानी संग्रह पर ‘सावित्री बार्इुुले’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  6. सन् 2002 में ‘मानव संस्थान मंत्रलय’ के तरफ से सृजनात्मक लेखन के लिए सम्मानित किया गया।
  7. सन् 2004 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का ‘साहित्य भूषण’ सम्मान भी दिया गया।
  8. सन् 2011 में आपको प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढाने के लिए ‘लमही सम्मान’ से पुरस्कृत किया गया।
  9. ‘कितने शहरों में कितनी बार’ पुस्तक के लिए सन् 2012 में आपको द्वितीय ‘सीता पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

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