मिट्टी के प्रकार

अनुक्रम
कृषि के लिए मिट्टी सबसे प्रमुख प्राकृतिक संसाधन है। यह मिट्टी जैविक तथा अजैविक तत्वों का मिश्रण है जिसमें पैतृक चट्टानों, वनस्पतियों, जीवाश्मों, उर्वरक तत्वों, जल तथा उष्मा आदि अभिन्न रूप में मिले हुए होते हैं। मिट्टी में सर्वाधिक खनिज पदार्थों की मात्रा होती है। किसी भी क्षेत्र की मिट्टी को निर्धारित करने वाले तत्वों में वहाँ की जलवायु, वनस्पति, उच्चावच, कीट पतंगे, कीड़े-मकोड़े, मानवीय हस्तक्षेप आदि प्रमुख हैं। मिट्टी में कुछ सक्रिय और कुछ निष्क्रिय तत्व पाये जाते हैं जो मिट्टी के निर्माण में ऊर्जा प्रवाहित करते हैं। समय के साथ-साथ मिट्टी में परिवर्तन आता रहता है। चभ् मान मृदा के सम्भावित क्षमता को दर्शाता है। यह मिट्टी में घुले हाइड्रोजन आयनों का अनुपात होता है। pH7 मान उदासीन प्रक्रिया होती है इससे नीचे अम्लता (acidity) को तथा ऊपर वाले मान क्षारीयता (alkalinity) को दर्शाते हैं। अध्ययन क्षेत्र मध्य गंगा मैदान में स्थित है जहाँ पर पूरे क्षेत्र में अवसादी मिट्टी की प्रधानता है। सम्पूर्ण क्षेत्र में जलवायुविक दृष्टि से लगभग समान है क्षेत्रीय भिन्नताओं के कारण मृदा में जैविक तत्वों में काफी अन्तर पाया जाता है। कणों की बनावट, पोषक तत्वों की उपलब्धता, रंग एवं pH मान आदि के आधार पर मिट्टी को निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है।

मिट्टी के प्रकार

1 बलुई मिट्टी

बलुई मिट्टी मुख्य रूप से गोमती नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में मुख्य रूप से पायी जाती है। वर्षा के दिनों में नदी में जल बढ़ने से आस-पास के क्षेत्रों में बालूयुक्त मिट्टी का जमाव हो जाता है जिसे खादर कहा जाता है। यह नवीनतम जलोढ़ है जिसमें लगभग 60 प्रतिशत अपरिष्कृत बालू के कण होते हैं। साथ ही साथ ह्यूमस तथा खनिज पदार्थों की प्रचुरता पायी जाती है। इसीलिए ऐसी मिट्टी वाले क्षेत्रों में अच्छी पैदावार होती है और लागत भी कम आती है। ऐसे क्षेत्रों में प्रतिवर्ष बालूकाश्म कणों का जमाव होता जाता है। बालू के कण बड़े होने के कारण जल धारण क्षमता कम पायी जाती है। इसमें चूना पदार्थों की कमी होती है। इसका pH मान 7 के आस-पास रहता है।

अध्ययन क्षेत्र के शुकुलबाजार, मुसाफिरखाना, कुरवार, दूबेपुर, भदैंया, लम्भुआ, पी.पी. कमैचा और कादीपुर विकासखण्डों में गोमती नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में बालुयुक्त मिट्टी की प्रधानता है जिसमें गेहूँ, जौ, मक्का, सरसो, आलू, शकरकन्द, तरबूज, खरबूज और सब्जियाँ प्रमुख रूप से उगायी जाती है।

2 बलुई दोमट मिट्टी

बलुई दोमट मिट्टी में बारीक बालू के कण और चिकनी मिट्टी के कण मिले होते हैं। नदी जल में तैरते हुए मिट्टी के कण नदी तलहटी से दूर जहाँ तक पानी पहुँचता है वहाँ तक परत दर परत जमा हो जाते हैं। इसमें कैल्सियम कार्बोनेट और ह्यूमस की मात्रा सामान्य रूप में पायी जाती है। इसमें रेत और चीका मिट्टी मिली होती है। इसमें बालू की मात्रा कम और रेत का प्रतिशत अधिक होता है। यह मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है और जलधारण करने की क्षमता भी अधिक पायी जाती है। इसका pH मान 6.9 के आस-पास पाया जाता है। इसमें गेहूँ, धान, मक्का, जौ और दलहनी फसलें उगाई जाती है। इस मिट्टी में कैल्शियम, नाइट्रोजन, फास्फोरस और ह्यूमस तत्वों की प्रधानता पायी जाती है। यह मिट्टी नदी तटवर्ती क्षेत्रों, जल बहाव वाले मार्गों के किनारे और जल जमाव वाले क्षेत्रों के आस-पास पायी जाती है।

3 दोमट मिट्टी

यह महीन चिकनी एवं रेत वाली मिट्टियों के मिश्रण से निर्मित होती है। इसका रंग भूरा तथा हल्का भूरा होता है। अतिसूक्ष्म कणों के कारण इसमें जलधारण करने की क्षमता अधिक पायी जाती है। इसमें क्षारीयता ( ।Alkalinity) अधिक पायी जाती है। इसका pH मान 7 से 8 के बीच पाया जाता है। इस मिट्टी में 8 से 25 प्रतिशत तक चीका मिट्टी के तत्व पाये जाते हैं। इसमें बालू के कण 30-40 प्रतिशत तक पाये जाते हैं। इसमें नमक भी मिलता है जो पौधों के लिए हानिकारक होता है। इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटास, कैल्सियम और मैग्नीशियम तत्व कम मात्रा में पाये जाते हैं। ह्यूमस तत्व भरपूर मात्रा में मिलता है। नाइट्रोजन की कमी को पूरा करने के लिए हरी खादों का प्रयोग करते हैं। इस मिट्टी में धान की फसल अच्छी होती है। ऐसी मिट्टी जल जमाव वाले क्षेत्रों जैसे तालाबों, झीलों आदि के किनारे पर्याप्त मात्रा में पायी जाती है।

4 चिकनी दोमट मिट्टी

इस मिट्टी में क्षारीयता अधिक पायी जाती है इसका pH मान 8.1 से 8. 5 तक पाया जाता है। इसकी जलधारण क्षमता 65 से 75 प्रतिशत के बीच मिलती है। इसमें जैविक तत्व अल्प मात्रा में पाये जाते हैं। यह मिट्टी अध्ययन क्षेत्र के अधिकांश विकास खण्डों में विद्यमान है। अखण्डनगर, जयसिंहपुर, कादीपुर, लम्भुआ आदि में विशेष रूप से मिलता है। पानी पाने पर यह मिट्टी मुलायम और चिपचिपी हो जाती है। इसमें ह्यूमस की कमी पायी जाती है।

5 बलुई चिकनी दोमट मिट्टी

अध्ययन क्षेत्र के लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्रफल पर यह मिट्टी पायी जाती है। यह धूसर या हल्के भूरे रंग की होती है। इसमें क्षारीयता 8.5 के आस-पास पायी जाती है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटास तत्वों की कमी पायी जाती है। काबर्निक तत्वों, कैल्शियम, फेल्सकार आदि अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इसमें जल धारण क्षमता 70 प्रतिशत के आस-पास पायी जाती है। जामों, अमेठी, भेटुआ, भादर, भदैंया, पी.पी. कमैचा, मुसाफिर खाना, कूरेभार, विकास खण्डों में इसका अधिक विस्तार पाया जाता है।

6 चिकनी मिट्टी

यह बारीक कणों वाली धूसर रंग की मिट्टी होती है। इसमें अम्लीयता पायी जाती है। क्योंकि इसका pH मान 4 पाया जाता है। इसमें 40 प्रतिशत से अधिक चीका मिट्टी के कण पाये जाते हैं। यह मिट्टी तराई, निम्नभूमि, तालाबों और जल लग्नता वाले क्षेत्रों अवरोध युक्त प्रवाहित जल के निम्न क्षेत्रों में पायी जाती है।

इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता 70-80 प्रतिशत तक पायी जाती है। इसमें जैविक तत्व और ह्यूमस की अधिकता पायी जाती है यह बह ुत उपजाऊ मिट्टी होती है। गर्मी के दिनों में इसमें दरारें विकसित हो जाती है। लेकिन पानी पाने पर एक दम लिसलिसी मुलायम हो जाती है। इसम ें कैल्शियम कार्बोनेट कम मात्रा में उपलब्ध होता है। इस मिट्टी में बारीक कणों के फलस्वरूप पानी रिसकर नीचे आसानी से नहीं जा पाता है। इस मिट्टी को नाइट्रोजन की आवश्यकता पड़ती है। यह नम और उपजाऊ मिट्टी होती है। इस प्रकार की मिट्टी अध्ययन क्षेत्र के लगभग सभी विकास खण्डों में पायी जाती है। अखण्ड नगर, मोतिनगरपुर, जयसिंहपुर, कूरेभार, धनपतगंज विकास खण्डों में इस प्रकार की मिट्टी का क्षेत्र अधिक है।

7 ऊसर मिट्टी

ऊसर युक्त मिट्टी में लवणीय अथवा हाइड्राक्सिल आयन अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। ऊसर मिट्टी में सोडियम तत्वों की प्रधानता रहती है। इसमें कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्निशियम, सल्फेट, ह्यूमस बहुत कम मात्रा में उपलब्ध होते है। ऊसर को ‘रेह’ भी कहा जाता है। यह अनुर्वर मिट्टी होती है इसे भूमि का ‘कैंसर’ भी कहा जाता है। इसमें कोई भी पौधा जीवित नहीं रह पाता है। वर्षा के दिनों में ये नमक के कण एक परत बना लेते हैं जिससे पानी नीचे नहीं रिसने पाता है। ग्रीष्मकाल में ये नमक के कण ऊपरी सतह पर आ जाते हैं। अमेठी, भेटुआ और संग्रामपुर विकास खण्डों में ऊसर भूमि का विस्तार सर्वाधिक पाया जाता है। जल लग्नता और निम्न भूमि वाले क्षेत्रों में ऊसर या रेह का जन्म होने लगता है।

8 अन्य मिट्टियाँ

उपर्युक्त मिट्टियों के अतिरिक्त स्थानीय स्तर पर गाँव से सटे हुए खेतों को ‘गोयड़’ कहा जाता है जिसकी उत्पादकता बहुत अधिक होती है क्योंकि उसमें गोबर की खाद, मल-मूत्र त्याग आदि के द्वारा पर्याप्त पोषक तत्व विद्यमान रहते है। यह गाँव के चतुर्दिक फैली हुई होती है। ऐसी मिट्टी म ें धान, गेहूँ, आलू, गन्ना, सब्जियाँ आदि भारी मात्रा में पैदा होती है।

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