पुराण शब्द अर्थ एवं पुराणों की प्रामाणिक संख्या

अनुक्रम
पुराण शब्द की व्युत्पत्ति पाणिनि, यास्क तथा स्वयं पुराणों ने भी दी है। ‘पुराभवम्’ (प्राचीन काल में होने वाला) इस अर्थ में ‘सायं चिरंप्राºवे प्रगेSव्ययेभ्यश्टयुट्युलो तुट् च’ पाणिनी के इस सूत्र से ‘पुरा’ शब्द से ‘ट्यु’ प्रत्यय करने तथा ‘तुट्’ के आगमन होने पर ‘पुरातन’ शब्द निश्पन्न होता है परन्तु स्वयं पाणिनि ने ही अपने दो सूत्रों ‘पूर्वकालैक-सर्व-जरत् पुराणनव- केवला:समाना धिकरणेन तथा ‘पुराणप्रोक्तेशु ब्राह्मण कल्पेशु में पुराण शब्द का प्रयोग किया है, जिससे तुडागम का अभाव निपातनात् सिद्ध होता है। तात्पर्य यह है कि पाणिनि की प्रक्रिया के अनुसार ‘पुरा’ शब्द से ट्यु प्रत्यय अवश्य होता है, परन्तु नियम प्राप्त ‘तुट्’ का आगम नहीं होता। ‘पुराण’ शब्द ऋग्वेद् में एक दर्जन से अधिक स्थानों पर मिलता है, यह वहाँ विशेषण है तथा उसका अर्थ है प्राचीन, पूर्व काल में होने वाला।

यास्क के निरुक्त के अनुसार, ‘पुराण’ की व्युत्पत्ति है- ‘पुरा नव’ भवति अर्थात् जो प्राचीन होकर भी नया होता है। इन व्युत्पत्तियों की मीमांसा करने से स्पष्ट होता है कि ‘पुराण’ का वण्र्य विषय प्राचीनकाल से सम्बद्ध था। प्राचीन ग्रन्थों में पुराण का सम्बन्ध ‘इतिहास’ से इतना घनिष्ठ है कि दोनों सम्मिलित रूप से ‘इतिहास-पुराण’ नाम से अनेक स्थानों पर उल्लिखित किये गये हैं। छान्दोग्य उपनिशद् में सनत्कुमार से ब्रह्म विद्या सीखने के अवसर पर नारद मुनि ने अपनी अधीत विद्याओं के अन्तर्गत ‘इतिहास-पुराण’ को पंचम् वेद बतलाया है। इस संयुक्त नाम से स्पश्ट है कि उपनिशद् युग में दोनों में अत्यन्त घनिश्ठ सम्बन्ध की भावना क्रियाशील थी।

इस प्रकार पुराण का सामान्य अर्थ प्राचीन है। प्राचीनता तथा महत्त्व में पुराण वैदिक संहिताओं के समान माने गये हैं। अथर्ववेद में कहा गया है कि पुराणों का उद्भव ऋक्, यजु: तथा साम। इन तीन वैदिक संहिताओं के साथ ही हुआ है। शतपथ ब्राह्मण में तो पुराण को भी वेद ही बताया गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि तीन वैदिक संहिताओं के साथ ही पुराण की भी अनादिकाल से ही उत्पत्ति हो चुकी थी-

ऋच: समानि छन्दांसि पुराणं यजुशा सह।
उच्छिश्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रित:।।

वृहदारण्यक उपनिशद् में वेद के साथ इतिहास ओर पुराण को परमात्मा के नि:ष्वास से निर्गत बताया गया है- अस्य महतो भूतस्थ नि:श्रति तमेतद् सदृग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोSथर्वाड़्गिरस: पुराणम्।

पुराण का निरुक्तकार यास्क ने यह लक्षण दिया है- ‘पुरा नव भवति’ अथा्रत् जो प्राचीन काल में नया था। प्राचीन होते हुए भी जो परम्पराएँ नये युग में साथ्रक बनी रहें, उनका संग्रह पुराण है। इस दृष्टि से वायु पुराण में पुराण की रोचक व्युत्पत्ति दी गयी है-यस्मात् पुरा ह्यनति-जिससे अतीत “वाँस लेता हुआ या सजीव हो जाय वह पुराण है। सायण ने सृष्टि का उत्पत्ति व विकास का प्रतिपादन करते वाले साहित्य को पुराण कहा है। मधुसूदन सरस्वती भी सृष्टि के इतिहास को पुराण मानते हैं। पुराणों में विषयवस्तु की दृष्टि से पुराण के पाँच लक्षण प्रसिद्ध माने गये हैं। अमरकोश में भी कहा गया हैं- ‘पुराण प´्चलक्षणम्’ ये पाँच लक्षण वायु पुराण तथा कूर्म पुराण में इस प्रकार बताये गये हैं -

सर्गष्च प्रतिसर्गष्च वंषो मन्वन्तराणि च।
वंषानुचरित चैव पुराण प´्चलक्षणम्।।

अथा्रत् सर्ग या सृष्टि प्रक्रिया, प्रतिसर्ग या पुन: सृष्टि अथवा प्रलय, देवता या ऋषियों के वंश का वण्रन, मन्वन्तर या मनुओं के शासन का काल, वंषानुचरित या क्षत्रिय राजाओं का जीवन-ये पाँच पुराण के लक्षण हैं। कोटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में सृष्टि, प्रवृत्ति, संहार धर्म तथा मोक्ष- इन पाँच विशयों के प्रतिपादन के आधार पर पुराण को प´्चलक्षणात्मक माना है। कुछ विद्वान पुरातन से पुराण शब्द को निष्पन्न मानते हैं। पुरातन से प्राकृत में ‘पुराअन’ ओर उसका पुन: संस्कृतीकरण करके ‘पुराण’ शब्द बना-यह उनका मत है।

पुराण को वेद का उपबृंहण करने वाला बताया गया है। महाभारत में कहा गया है-

“इतिहास पुराणाभ्या वेद समुपबृध्येत्।”
बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो भामयं प्रहरिश्यति।।

उपबृंहण का अर्थ है व्याख्या करते हुए विस्तार देना। महाभारत में पुराणों को वेदों का प्रकाशक भी कहा गया है। पुराण उस पूण्रचन्द्र के समान है, जो श्रुति रूपी ज्योत्स्ना को प्रकाषित करता है- ‘पुराणपूण्रचन्द्रेण श्रुतिज्योत्सना प्रकाषिता।

कूर्मपुराण में कहा गया है- ‘पुराण धर्मशास्त्र च वेदानामुपबृंहणम्।’ पुराणों में वेदों के आख्यानों का अनेक विस्तृत रूप में प्रयोग किया गया है। इनमें वैदिक मंत्रों को भी प्रकारान्तर से या यत्किंचित् परिवर्तन के साथ दोहराया गया है। उदाहरण के लिए, वायुपुराण में षिवस्तुति में रुद्राश्टाध्यायी के मंत्रों के पद गुंफित हैं। इसी प्रकार भागवत के द्वितीय स्कन्ध में ऋग्वेद के पुरुशसूक्ति की पंक्तियाँ उद्धृत की गयी हैं। पुरुशसूक्ति की ही ‘स भूमि सर्वतो वृत्वा•त्यतिश्ठ द्दषाड़्गुलम’ को विश्णुपुराण में कुछ परिवर्तन के साथ इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है - “सर्वव्यापी भुव: स्पर्षादत्यतिश्ठद्दषाड़गुलम्।”

पùपुराण में गायत्री मंत्र को इस प्रकार ‘प्रचोदयात्’ के स्थान पर प्रभाति क्रिया का प्रयोग करके कृश्ण के लिए प्रयुक्त किया गया है। यजुर्वेद के वेदाSहमेतम् इत्यादि मंत्र को स्कन्दपुराण में शिव के लिए प्रयुक्त किया गया है। पुराणों ने वेदों की व्याख्या दार्शनिक धरातल पर भी की। ऋवेद के द्वासुपणा्र मंत्र को भागवत में इसी दृश्टि से मनोहर रूप में पुनर्विन्यस्त करके कहा गया है-

सुपणा्रवेतो सयुजो सखायो सदृच्छयेतो कृतनीडो च वृक्षे।
एकस्तयो: खादति पिप्पलान्यन्यमन्यो निरपेक्षोपि बलेन भूयान्।।

कहीं-कहीं पुराणों ने वैदिक मंत्रों की धार्मिक या सम्प्रदाय की दृष्टि से भी व्याख्या की है उदाहरण के लिए, प.पुराण में हिरण्यगभ्र सूक्त की कृश्णपरक व्याख्या की गयी हैं। हिरण्यगभ्र को यहाँ विश्णु का ही विषिश्ट रूप माना गया है। इसी प्रकार ऋग्वेद के ही “चत्वारि Üाृंगा त्रयोSस्य पादा” इत्यादि मंत्र की भागवत में अश्टम् स्कन्ध में यज्ञपरक व्याख्या की गयी है। स्कन्दपुराण के काषीखण्ड में इसी मंत्र का षिवपरक अर्थ किया गया है। वस्तुत: पुराणों में वेदों के अनेक अज्ञात अनुन्मीलित पक्षों को प्रकट किया गया है। अत: यह पारम्परिक मान्यता सर्वथा सटीक है कि वेदों को समझने के लिए पुराणों का अध्ययन परम आवश्यक है।

जो विषय-वस्तु प्राचीन होकर भी नूतन रूप में विद्यमान रहे, उसे पुराण कहते हैं। पुराण शब्द का अर्थ पुराना होता है, जो स्वयं प्राचीनता से सम्बद्ध है।

अनेक प्रकार के आख्यान एवं उपाख्यान, गाथायें, वंषावलियाँ आदि समाज के कुछ प्रबुद्ध लोग अपनी स्मृति में रखते होंगे। जन समुदाय भी इन कथाओं एवं वंषानुक्रमों के चरित्र से प्रेरित होता रहा होगा। इन्हीं परम्परागत बातों के आधार पर पुराण की उत्पत्ति हुई।

पुराण की उत्पत्ति परम्परा से ही प.पुराण में मानी गयी है। जो प्राचीनता ओर परम्परा की कामना करता है उसे पुराण नाम से जाना जाता है। वायुपुराण के अनुसार पुरा+अनति अर्थात् प्राचीनकाल में जो शास्त्र जीवित था उसे पुराण की संज्ञा दी जाती थी।

ब्रह्माण्ड पुराण में उल्लेख मिलता है कि ‘पुरा उतत् अभूत’ अथा्रत् प्राचीनकाल में ऐसा हुआ। वह पुराण कहलाता है।मत्स्यपुराण में तो पुराण को वेद से पूर्व ही उत्पन्न माना गया है।

मारकण्डेय पुराण लिखता है कि ब्रह्मा के मुख से पुराण ओर वेद दोनों ही निकले जिसमें से सप्तर्शियो ने वेदों को ओर मुनियों ने पुराणों को ग्रहण कर लिया।11 श्रीमद्भागवत महापुराण का कथानक है कि मत्स्यपुराण के अनुसार पुराणों को वेद से पूर्व उत्पन्न मानना ठीक नहीं। भागवत पुराण-पुराण का वेद से आधिक्य सिद्ध करता है, परन्तु उत्पत्ति को पष्चात्कालीन ही माना है।

आख्यान, उपाख्यान, गाथा तथा कल्प-षुद्धि को पुराणसंहिता के रूप में माना जाता है। विश्णुपुराण ने इस बात को इस प्रकार प्रतिपादित किया है-

आख्यानैष्चाप्युपाख्या नैगथामि: कल्पषुद्धिमि:। 
पुराण संहितांचक्र पुराणार्थ विषारदा:।।

इस प्रकार पुराणों की उत्पत्ति अनेकों प्रकार के उपकरणों से हुई है।

वे सभी उपकरण एकत्र होकर कृश्णद्वैपायन व्यास एवं अनेक मनीशियों द्वारा नाना पुराणों के स्वरूप में सुव्यवस्थित किये गये।

पुराणों के उदय के सम्बन्ध में अनेक धारणायें प्रचलित हैं। स्कन्ध पुराण, पùपुराण ओर मत्स्यपुराण के अनुसार कल्पान्तर में पुराण एक ही था।

यह धर्म, अर्थ, काम का साधन था। अर्थषास्त्र ओर कामषास्त्र की भाँति वह धर्म का भी प्रतिपादक था। इसमें चार लाख “लोक थे। उसका क्षेत्र बहुत ही विस्तृत था। उस समय के परिवर्तन के साथ लोगों की बुद्धि क्षीण होती जा रही थी। इतने विषाल पुराण साहित्य के गूढ़ विशयों की ग्रहण करना उसकी बुद्धि के परे था।ुलत: साक्षात् विश्णु ने व्यास के रूप में जन्म ग्रहण कर विषाल पुराण साहित्य को 18 भागों में विभाजित किया।

देवी भागवत ने पुराण के उदय का कारण लोगों की अल्पायु ओर अल्प-षुद्धि ही बतायी है। वैदिककाल में कर्मकाण्ड ही प्रधान था। ब्राह्मण, क्षत्रिय ओर वैष्य के अतिरिक्त समाज के अन्य बहुसंख्यक जातियों को दीक्षित होकर जीवन की साथ्रकता सम्पादन करने का अधिकार नहीं था।

वैदिक साहित्य को हृदयंगम करने की क्षमता समाज के कुछ ही लोगों में थी। दीक्षा ओर उपनयन संस्कार से वंचित होने के कारण समाज के निम्न स्तर के लोग असन्तुश्ट थे। वे अपनी इस हीनता की पूर्ति हेतु दूसरे धमोर्ं की ओर अग्रसर होने लगे। समाज की इस विशय परिस्थिति ओर कमी को ध्यान में रखकर लोगों के कल्याणाथ्र व्यासदेव ने 18 पुराणों की रचना की। यही पुराणों के उदय का हेतु है।

आधुनिक विद्वानों ने मूल साहित्य का अवलोकन करके पुराणों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अपने मत व्यक्त किये हैं। उदाहरणाथ्र पी.वी. काणे पी.वी. काणे पी.वी. काणे तथा पार्जिटर का मत प्रस्तुत किया जा सकता है। काणे के अनुसार, बोद्ध धर्म के मनोरम आकश्रणों में जीवन-यापन करने वाले शूद्रों को वहाँ से निकाल कर वैदिक धर्म में पुन: प्रतिष्ठापित करने की विशम समस्या थी। इस समस्या का निराकरण पुराणों के नवीन संस्करण बनाकर किया गया। काणे की ही तरह श्री पार्जिटर का भी मत है कि जैन ओर बोद्ध धर्म ने ब्राह्मणों और उनकी परम्परा को चुनोती थी।

इस चुनोती को व्यासदेव ने स्वीकार किया ओर इसका सामाना करने के लिए उन्होंने समाज के शिक्षित, अर्द्धषिक्षित और अशिक्षित, जो वेद विद्या से वंचित थे, उनके लिए लोमहश्रक ओर उनके पुत्र उग्रसुवा के द्वारा पुराण विद्या का प्रचार कराया गया। इस कार्य के लिए उन्होंने समाज के निम्न वर्ग को चुना और इस कार्य के लिए उन्हें प्रशिक्षित किया।

आष्वालायन गृह्यसूत्र में कहा गया है कि इतिहास एवं पुराणों का अध्ययन करने वालों के पितरों को अमृत की नहर प्राप्त होती है। रामायण में सूत्र ने राजा को पुराण की दुरावृत्त को यथापूर्व सुनाया है। वाल्मीकि रामायण में सुमन्त को पुराणवेत्ता ओर सूत बतलाया गया है। वह राजा दषरथ की सन्तानहीनता तथा उसके निवारण की बात पुराणों से सुन चुके हैं। आर.सी. हाजरा ने पुराणों की स्थिति को वेदों के बाद का माना है। महाकवि वाणभट्ट ने बडे़ आदर के साथ वायुपुराण, के पाठ का उल्लेख किया है। कादम्बरी में जाबालि ऋषि ने आश्रम-वण्रन में वायुपुराण की चचा्र की है।

इस प्रकार निश्कश्र रूप में हम कह सकते हैं कि वेद, अरण्यक, उपनिशद्, स्मृतिग्रन्थ, रामायण महाभारत से लेकर बाद तक के दाष्रनिकों एवं कवियों के ग्रन्थों में पुराणों के अनेक उल्लेख प्राप्त होते हैं। अतएव भारतीय संस्कृति में पुराणों की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूण्र है।

पुराणों की प्रामाणिक संख्या

पुराणों की संख्या प्राचीन काल से 18 मानी गयी है। अठारह पुराणों का नाम प्राय: प्रत्येक पुराण में उपलब्ध होता है। उनके क्रम में अन्तर तो मिलता है किन्तु उनकी संख्या में कोई अन्तर नहीं मिलता। महापुराण तो 18 हैं ही, उपपुराणों की संख्या थी 18 ही मानी गयी है। एक प्रसिद्ध “लोक में 18 पुराणों के प्रथम अक्षर लेकर उनकी गणना की गयी है। मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुश्टयम्। अनापलिंग कूसकानि, पुराणानि प्रचक्षते।।  इसमें 18 पुराणों का उल्लेख इस प्रकार से है- म वाले 2, भ वाले 2, ब्र वाले 3, व वाले 4 तथा अ, ना, प, लिंग, ग, कू तथा स्क से प्रारम्भ होने वाले एक-एक। 2+2+3+4+7=18। इनके नाम क्रमष: इस प्रकार हैं- 1- मत्स्थ, 2- मार्कण्डेय, 3- भविष्य 4- भागवत, 5- ब्रह्माण्ड, 6- ब्रह्मवैवर्त, 7- ब्रह्म, 8- वामन, 9- वराह, 10- विष्णु, 11- वायु (शिव), 12- अग्नि, 13- नारद, 14- प., 15- लिंग, 16- गरुड़, 17- कूर्म, 18 स्कन्दपुराण।

पुराणों की प्रामाणिक संख्या

इस पुराणों का महत्त्व हमारे लिए धर्मशास्त्र एवं नीतिशास्त्र के सदृश है। ये अनेक शास्त्रों के उपयोगी ज्ञान के कोश हैं। पुराण भारतीय इतिहास के प्राचीन अंधकारमय युगों के प्रकाष-स्तम्भ भी हैं। प्राचीन भोगोलिक स्थिति का ज्ञान भी हमें इनके द्वारा प्राप्त होता है। इस प्रकार पुराणों को आर्य संस्कृति का कोश तथा भारतीय विद्याओं का विष्वकोश कहने में कोई अत्युक्ति न होगी।

भागवत पुराण ने सभी पुराणों की सूची एवं “लोक संख्या इस प्रकार दिया है-
बह्म दषसहस्त्राणि पाद्मं पंचानेशश्टि च।
श्री वैश्णव त्रयोविषच्चतुविंषति रोवकम्।।
दषाश्टो श्रीभागवत नारद पंचविंषति:।
मार्कण्डं नवं वाहनं च दषपच्च चतु:षतक।।
चतुदर्ष भविश्यं स्यात्तथा पंचषातानि च।
दषाश्टो ब्रह्मवैवर्त लिंग मेकादषेव तु।।
चतुर्विषति वाराहमे काषीतिसहस्त्रकम्।
स्कान्दं शतं तथा चैकं वामनं दषकीर्तितम्।।
कोर्म सप्तदषाख्यातं मात्स्यं तक्षु चतुर्दष।
एकोन विंषत्सोपर्ण ब्रह्माण्ड द्वादषेव तु।।
एव पुराणसंदोहष्च तुलक्ष उदाहृत्त:।
मत्स्यपुराण में प्राचीनता की छाप लिए हुए पुराणों की जो सूची प्रस्तुत की गयी है उसके अनुसार भी पुराणों की संख्या अठारह ही बतायी गयी है। पùपुराण ने सात्विक, राजस तथा तामस-इन तीन प्रकार के वर्णों में सभी पुराणों का विभाजन किया है।

संस्कृत साहित्य में 18 संख्या अत्यन्त पवित्र व्यापक और गौरवषाली मानी जाती है। महाभारत में पर्वों की संख्या भी 18 है। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्यायों की संख्या भी 18 है तथा भागवत्पुराण में “लोकों की संख्या भी 18 हजार है। इसी प्रकार पुराणों की प्रामाणिक संख्या भी 18 मानी गयी है। शतपथ ब्राह्मण के अश्टम् काण्ड में सृश्टि नामक इश्टियों के उपाधान का जो विधान है वहाँ 17 इश्टिकाओं के रखने का कारण बताया गया है। कारण यही है कि तत्सम्बद्ध सृश्टि भी 17 प्रकार की है तथा उसका उदय प्रजापति से होता है जिससे दोनों को एक साथ मिलाने पर सृश्टि के सम्बन्ध में 18 के संख्या की निश्पत्ति होती है।
इस प्रकार सृश्टि से अश्टादष संख्या को सम्बद्ध होने के हेतु पुराणों को अश्टादषविध मानना उचित ही है।

सांख्य दष्रन की सृश्टि प्रक्रिया पुराणों में स्वीकृत की गयी है। सांख्य में 25 तत्त्व स्वीकृत किये गये हैं। इन तत्त्वों की समीक्षा से इसके स्वरूप का परिचय मिलता है। पुरुश तथा प्रकृति तो नित्य मूलस्थानीय तत्त्व है, जिनकी सृश्टि नहीं होती। इन से इतर तत्त्व हैं- महत् तत्त्व, अहंकार, पंच तन्मात्राएँ = 7 प्रकृति-विकृति, केवल विकृति = 16 (मन को मिलाकर 11 इन्द्रियाँ तथा पंच महाभूत पृथ्वी, जल, तेज वायु ओर आकाष)। इस योजना में तन्मात्रों से ही महाभूतों का साक्षात् सम्बन्ध है, अन्तर केवल स्वरूप का है। तन्मात्र होते हैं सूक्ष्म ओर महाभूत होते हैं, स्थूल। इसके स्वरूप का वैषिश्ट्य न मानकर दोनों को एकत्र गणना की जाती है। लत: 25 तत्त्वों में से इन सात तत्त्वों को निकाल देने पर सूक्ष्म मान तत्त्वों की संख्या 18 ही होती है ओर सृष्टि-प्रतिपादक पुराणों की संख्या का 18 होना इस तर्क से भी प्रमाणित माना जा सकता है।

इस प्रकार पुराणों के अश्टादष होने के अनेक हेतु उपस्थित हैं। पुराण मुख्य रूप से पुराण पुरुश-परमात्मा का ही प्रतिपादन करता है। आत्मा स्वरूपत: एक ही है, परन्तु उपाधि तथा अवस्था को विभिन्नता के कारण वह 18 प्रकार का होता है। इन अठारहों प्रकार के आत्मा का प्रतिपादन होने के कारण पुराण भी 18 प्रकार के माने गये हैं।  9 गरुड़ पुराण में 18 उपपुराणों के श्री नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं- 1- सनत्कुमार 2- नारसिंह, 3- स्कन्द (षिवपुराण) 4- षिवधर्म, 5- आश्चर्य, 6- नादरीय, 7- कपिल, 8- वामन, 9- ओषनस, 10- ब्रह्माण्ड, 11- वरुण, 12- कालिका 13- माहेष्वर, 14- साम्ब, 15- सोर, 16- पराषर, 17- मारीच, 18- भार्गव।

इसमें अनेक महत्त्वपूर्ण पुराणों को छोड़ दिया गया है, जबकि वामन ब्रह्माण्ड जैसे पुराणों को सम्मिलित कर लिया गया है। अन्य उल्लेखों में चण्डीपुराण, मानवपुराण, गणेषपुराण, नंदपुराण, विश्णुधर्मोंत्तरपुराण, दुवा्रसापुराण, माहेष्वरपुराण, भार्गवपुराण, कल्किपुराण आदि को जोड़कर पुराणों की संख्या तीस या इससे भी अधिक कर दी गयी है।

‘देवी भागवत’ में स्कान्द, वामन, ब्रह्माण्ड, मारीच ओर भार्गव के स्थान पर क्रमष: शिव, मानव, आदित्य, भगवान ओर वषिश्ठ नाम दिये गये हैं। इनके नाम, संख्या, महापुराण या उपपुराण में गणना के विषय में पया्रप्त मतभेद है। उपपुराणों में सवा्रधिक प्रचालित पुराण षिवपुराण है। इसमें स्रोत खण्ड तथा 24000 “लोक हैं। शिव की उपासना, शैव धर्म तथा दर्शन ओर शिव विषयक कथाओं का यह प्रामाणिक तथा विस्तृत संग्रह है। दूसरा अत्यधिक प्रचलित उपपुराण देवी भागवत है। भ्रमवश कहीं-कहीं भागवत पुराण को भी देवी भागवत समझ लिया जाता है जबकि देवी भागवत महापुराण से सर्वथा पृथक स्वतन्त्र पुराण है। यह शाक्तपुराण है तथा देवी या शक्ति की पूजा, उनके अवतारों ओर तद्विशयक कथाओं का विपुल संग्रह इसमें हुआ है। इसका रचनाकाल नवीं से ग्यारहवी शताब्दी ई. के मध्य माना गया है। देवी के विभिन्न रूप इस पुराण में वण्रित है, जिनमें राधा के चरित्र को महिमान्वित किया गया है।

सन्दर्भ -
  1. पाणिनि अश्टाध्यायी सूत्र - 4.3.23
  2. पाणिनि सूत्र - 2.1.49
  3. पाणिनि सूत्र- 4.3.105
  4. निरूक्त- 3.19
  5. छान्दोग्य उपनिशद्- 7.1
  6. भागवतपुराण - 11.2.16
  7. पुराण (सृश्टिखण्ड), अध्याय-2, “लोक -54 पुराणपरम्परा वस्टि पुराणां तेन तत् स्मृतम्। निरुक्तस्य यो वेद सर्वपापै: समुच्यते।।
  8. वायुपुराण - 01.20.3. यस्मात् पुराह्यनतीदं पुराणं तेन तत् स्मृतम्। निरुक्तस्य यो वेद सर्वपापै: प्रमुच्यते।।
  9. ब्रह्माण्ड पुराण - 01.01.173. यस्मात् पुरा प्रमुच्चैतत् पुराणं तेन तस्य स्मृतम्। निरुक्तस्य यो वेद सर्वपापै: प्रमुच्यते।।
  10. मत्स्यपुराण- अध्याय-3, “लोक- 3-4 पुराणं सर्वषास्त्राणां प्रथमं वरुणास्मृतम्। नित्यं शब्दमयं पुण्यं शतकोटि प्रविस्तरम्।। अनन्तरं च वक्तेभ्यो वेदास्तस्य विनि:सृता:।।
  11. मार्कण्डेय पुराण- अध्याय 45, “लोक- 23 वेदान् सप्तश्रस्तस्याजन गृहुस्तस्य मानसा:। पुराणं जर्गहुष्चाया मुयस्तस्य मानसा:।।
  12. श्रीमद्भागवत्- तृतीया स्कन्ध, अध्याय- 12, “लोक 37 ऋकयजु: सामाथ्रवाख्यान् वेदाने पूवा्रदिभिमुखे। शास्त्रातिभज्यां स्तुतिस्तोतम प्रायष्चितंव्यघात् क्रमाद।।
  13. विश्णुपुराण, अंष-2, अध्याय- 6, “लोक- 15
  14. स्कन्द पुराण- रेखा महात्मा- 1/23/30 पद्मपुराण-सृश्टिखण्ड, अध्याय-1, मत्स्यपुराण- अध्याय-53
  15. देवी भागवत् पुराण- 1/3/19-20
  16. श्री मद्भागवत् पुराण- 1/4/25
  17. पी0वी0 काणे: धर्मषास्त्र का इतिहास, भाग-2, पृ0- 924-934
  18. एफ0ई0 पार्जिटर: एन्सिएण्ड इण्डिया हिस्टोरिकल ट्रेडिषन, पृ0- 334।
  19. यद्दचो धीते पयस: कुल्पा अस्थ पितृन एवधा कुल्या:।
  20. वाल्मीकि: रामायण (बालकाण्ड), सर्ग-9, “लोक-1, 240।
  21. वाल्मीकि: रामायण (बालकाण्ड), सर्ग-9, “लोक- 1, 240।
  22. दि ओनली स्पेसिस ऑफ इण्डियन लिटरेचर द्विवच कैन क्लेम, नेवस्ट टू दि वेदाज टू रिच बैंक एन्टिक्विटी इज दि पुराण।
  23. श्रीमद्भागवत् स्कन्ध- 12, अध्याय- 13, “लोक, 4-9
  24. मत्स्यपुराण- अध्याय-53, “लोक-11 से 12 पाराणं दषाश्टो च साम्पतं तदिहोच्यते। नामस्तानिवदयामि श्रृणु ध्वंमुनि सत्तमा:।।
  25. पदम्पुराण- (उत्तरखण्ड), अध्याय-263, “लोक-81 से 84
  26. शतपथ ब्राह्मण- 8/4/1/13, यजुर्वेद- 14/23 तस्य द्वावषमासा: पच्च्तर्व: संवत्सर एवं प्रतूर्ति:। प्रेतूर्तिरश्टादष:।

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