सुधा अरोड़ा का जीवन परिचय, व्यक्तित्व, कृतित्व एवं उपलब्धियाँ

अनुक्रम
सुधा अरोड़ा जी का जन्म 4 अक्टूबर 1946 में लाहौर के मोची दरवज्जे इलाके के एक पंजाबी परिवार में हुआ। सुधा जी ने अविभाजित भारत की धरती पर जन्म लिया था। सुधा अरोड़ा के पिता का नाम श्री रामलुभाया अरोड़ा तथा माता का नाम वीणा देवी था। वीणा देवी एक सरदार परिवार से हैं और शादी से पहले उनका नाम वाहेगुरू था। वीणा देवी ने साहित्य रत्न की उपाधि ली थी। वर्तमान समय में साहित्य रत्न एम.ए. की उपाधि के समतुल्य है। माता-पिता दोनों ही साहित्य प्रेमी थे। पिताजी अपने जीवन के लगभग 95वें बसंतों का आनंद भोग चुके हैं। रामलुभाया जी सामान्य जीवन जीने और आध्यात्मिक रुझान रखने वाले सहज और सफल व्यावसायिक हैं। उम्र की इस दहलीज पर पहुँचने के बावजूद रामलुभाया जी ने कभी अस्पताल के दर्शन नही किए।

लेखिका सुधार अरोड़ा की सम्पूर्ण शिक्षा दीक्षा भारत के पूवÊ क्षेत्र कलकत्ता में ही पुरी हुई थी। सन् 1962 में सुधा जी ने शिक्षायतन स्कूल से बारहवÈ कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1965 श्री शिक्षायतन कॉलेज से बी.ए. ऑनर्स तथा 1967 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी साहित्य) की उपाधि ली। सुधा जी ने बी.ए. और एम.ए. दोनों ही परीक्षा में गोल्ड मेडल अर्जित किया।

प्रसिद्ध लेखिका सुधा अरोड़ा जी का परिणय सूत्र बंधन कथाकार डॉ. जितेंद्र भाटिया जी से हुआ। डॉ. जितेंद्र भाटिया जी कथाकार, चिंतक, अनुवादक हैं। वे पेशे से केमिकल इंजीनियर और वैज्ञानिक हैं। डॉ. भाटिया जी ने ‘सदी के प्रश्न और इक्कीसवÈ सदी की लड़ाईयाँ’ विषय पर टेक्नॉलॉजी से संबंधित कई किताबों का सृजन किया है। तकनीकी विषयों के अतिरिक्त डॉ. भाटिया ने छ: कहानी संग्रह, तीन उपन्यास और तीन नाटकों की भी रचना की है। डॉ. भाटिया द्वारा विदेशी भाषाओं से अनुवाद की गई पुस्तकें इस प्रकार हैं : 1) सोचो, साथ क्या जाएगा, 2) जिस मिÍी से बने हैं हम!, 3) नदी का तीसरा किनारा। अनुवाद के साथ-साथ कई यात्र वृत्तांत भी लिखे हैं। सुधा अरोड़ा और पति डॉ. भाटिया दोनों ही साहित्य प्रेमी के साथ साहित्यकार भी हैं। लेखक पति हो इस विषय में सुधा जी कहती हैं, “हमारी टकराहट में लेखक से लेकर खाने और कार पार्क करने तक के मुद्दे शामिल हैं। आमतौर पर समानधर्मा पति पत्नी एक जंग के आदी हो जाते हैं। इस जंग के बिना निजात नही है। यह हमारी जिंदगी का हिस्सा बन जाती है। हम दोनों के रोजमर्रा के महाभारत के बीच कही एक जबरदस्त अंडरस्टैंडिंग भी मौजूद रहती है। लेखन हम दोनों के बीच एक सीमेंटिंगुैक्टर है। एक-दूसरे की हर रचना के हम पहले पाठक और क्रिटिक्स होते हैं और एक-दूसरे की राय को बेहद गंभीरता से लेते हैं।”

सुधा अरोड़ा जी दो बहनें तथा पाँच भाई हैं। बहन इंदु सदैव बहुत ही होनहार और मेधावी रही। चित्रकला और संगीत में वह पारंगत थी। इंदु का स्वभाव बेहद अन्र्तमुखी और आत्मकेंद्रित था। दुर्भाग्यवश इंदु को अस्थमा की बीमारी ने जकड़ लिया और बीमारी के चलते उसने शादी नही की। कुछ वर्षों उपरांत इंदु को शिज्जोफ्रेनिक (मनोभाजन) हो गई। अरोड़ा जी के पाँच भाई प्रदीप, प्रशांत, प्रमोद, प्रवीण और प्रताप है। भाई प्रदीप कलकत्ता की चर्चित नाटय संस्थानों जेसे अनाकिमा कला संगम, माध्यम, पदातिक अनामिका आदि से जुड़ा रहा। फिल्मी कलाकार कुलभूषण खरबंदा और अंजन श्रीवास्तव के साथ नाटकों में अभिनय और निर्देशन किया है। मृणाल सेन की एक फिल्म में भी प्रदीप ने एक छोटी भूमिका अदा की। वर्तमान समय में वह कलकत्ता के नामी व्यवसायियों में माने जाते हैं। सुधा जी के भाई प्रशांत एक नामीुोटोग्राफर हैं। प्रशांत अरोड़ा का ‘लिम्का बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड’ में उनका नाम दर्ज है। “आटोग्राफ ऑनुोटोग्राफ” सीरीज में उनके पास कला, संगीत, नृत्य, फिल्म, साहित्य, राजनीति क्षेत्र के लगभग तीन हजार से भी अधिक प्रख्यात लोगों केुोटो और उनके हस्ताक्षरों सहित संकलित (कलेक्शन) है। अन्य तीनों भाई सफल व्यवसायी हैं।

सुधा अरोड़ा जी की दो बेटियाँ हैं, गरिमा और गुंजन। गरिमा बचपन से ही पढ़ने में होशियार थी। कक्षा आठ से उसे राष्ट्रीय योग्यता छात्रवृत्ति मिलती रही है। गरिमा ने मुंबई के प्रतिष्ठित संस्थान आय.आय.टी. से उसने केमिकल इंजीनियरिंग में बी. टेक किया एवं वॉशिंगटन विश्वविद्यालय, सेंट लुइस, अमेरिका से गरिमा ने पर्यावरण इंजीनियरिंग में पी.एच.डी. की उपाधि ली। बैंगलोर की एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी जनरल मोटर्स के रिसर्च सेंटर में शोध समूह प्रबंधक के रूप में सात साल काम करने के उपरांत वह पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर कार्यरत है। जनरल मोटर्स संस्थान में इस पद की नियुक्ति के लिए पहली महिला है। गरिमा का विवाह नागपुर के सुप्रसिद्ध कॉमरेड आर.वी. रानाडे के छोटे सुपुत्र रणजीत से हुआ है। रणजीत भी आय.आय.टी. से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर है।

सुधा जी की दूसरी बेटी गुंजन का रूझान विज्ञान में ना होकर कला क्षेत्र में है। गूुंजन कत्थक और विदेशी शास्त्रीय नृत्यों में साल्सा, लैटिन अमेरिकन औरुूलैमेंको में पारंगत है। गुंजन ने मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से प्राचीन भारतीय संस्कृति में स्नातक की शिक्षा ली और तत्पश्चात डांस एवं कल्चर व स्टडीज में स्नातक कोर्स, यू. के. के यूनिवर्सिटी ऑफ सरे से किया। बाल धारावाहिक ‘तरंग’ की तेरह कड़ियों के लिए काम किया। जेनेन्द्र कुमार के ‘सुनीता’ धारावाहिक में सुनीता की छोटी बहन का रोल अदा किया।

गुंजन का विवाह अनुराग कामंडूरी के साथ हुआ। अनुराग चेन्नई आय.आय.टी. से सिविल इंजीनियर है। गुंजन और अनुराग शिकागो में रहते हुए सामाजिक कार्यों से जुड़े हैं और एनीमल वेल्फेयर सोसायटी में पशु उत्पीड़न के खिलाफ अहम कदम उठाए हैं।

सुधा अरोड़ा जी लिखने-पढ़ने के अलावा अन्य क्षेत्र में भी विशेष रूझान रखती हैं। विख्यात लेखिका को अच्छी फिल्में देखना, बेहद साधारण तरीके का जीवन यापन करना, नाटक और भारतीय शास्त्रीय संगीत और चित्रकला में भी विशेष रुचि है। सुधा जी ने कभी भी श्रृंगार में लिपिस्टिक, पाउडर, नेलपॉलिश आदि नही लगाया। यहाँ तक कि आभूषण पहनना भी पसंद नही। सूती या सिल्क की बंगाली साड़ियाँ अतिप्रिय हैं। चटपटा, तीखा, तला खाना कतई पसंद नही है। सुधा जी शुद्ध शाकाहारी हैं।

प्रथम रचना : सुधा अरोड़ा की पहली प्रकाशित कहानी ‘मरी हुई चीज़’ ज्ञानोदय जो सितंबर 1965 में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद जून 1966 में ‘बगैर तराशे हुए’ कहानी धर्मयुग में प्रकाशित हुई। 

सुधा अरोड़ा का कार्यक्षेत्र

  1. सुधा अरोड़ा ने सन् 1965 से सन् 1967 तक कोलकाता विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘प्रक्रिया’ का संपादन किया।
  2. सन् 1969 से 1971 तक कोलकाता के दो कॉलेजों - श्री शिक्षयतन कॉलेज और आशुतोष कॉलेज के प्रात: कालीन महिला विभाग जोगमाया देवी कॉलेज में अध्यापन का कार्य किया।
  3. सन् 1977 में 1978 के दौरान कमलेश्वर के संपादन में ‘कथायात्र’ में सहयोगी संपादक के रूप में कार्य किया।
  4. सन् 1993-1999 तक तक सुधा अरोड़ा ने महिला संगठन ‘हेल्प’ से संबंधित कई कार्यशालाओं में अपना अहम योगदान दिया।
  5. सन् 1999 के बाद से सुधा अरोड़ा वसुंधरा सलाहकार केंद्र एवं प्रज्ञालय में अपना योगदान दे रही हैं। इसके साथ ही वे अपनी कई अधूरी किताबों पर काम कर रही है।

सुधा अरोड़ा की कृतित्व

उपन्यास

यही कही था घर कहानी
1) बगैर तराशे हुए
2) युद्धविराम
3) महानगर की मैथिली
4) काला शुक्रवार, कांसे का गिलास
5) मेरी तेरह कहानियाँ
6) रहोगी तुम वही
7) 21 श्रेष्ठ कहानियाँ
8) एक औरत तीन बटा चार
9) मेरी प्रिय कथाएँ
10) प्रतिनिधि कहानियाँ
11) बहुत जब बोलते हैं
12) चुनी हुई कहानियाँ

स्त्री विमर्श

1) आम औरत : जिन्दा सवाल
2) एक औरत की नोटबुक
3) सांकल, सपने और सवाल

साक्षात्कार

स्त्री समय संवाद
संपादन

1) औरत की कहानी
2) मन्नू भंडारी : सृजन के शिखर
3) करतूते मरदां
4) मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
5) मन्नू भंडारी की चुनी हुई कहानियाँ
6) स्त्री संवेदना : विमर्श के निकष- दो खंडों में कविता संकलन
1) रचेंगे हम साझा इतिहास (2010) - मेघा प्रकाशन
2) कम से कम एक दरवाजा (2015) - बोधि प्रकाशन, जयपुर

टेलीफिल्म

1) सुधा जी की कहानियों ‘युद्धविराम’, ‘दहलीज पर संवाद’, ‘इतिहास दोहराता है’ तथा ‘जानकीनामा’ पर मुंबई, लखनऊ, कोलकाता दूरदर्शन तथा प्रसार भारती दिल्ली द्वारा लघु फिल्में निर्मित।
2) दूरदर्शन के ‘समांतर’ कार्यक्रम के लिए कुछ लघु फिल्मों का निर्माण। 3) राजस्थान के भटेरी गाँव की कार्यकर्ता साथिन भँवरी देवी पर आधारित फिल्म ‘बवंडर’ का पटकथा लेखन।
4) पाकिस्तान के चैनल ‘हम टीवी’ द्वारा कहानी ‘रहोगी तुम वही’ पर इसी नाम से चार एपीसोड में 2013 में धारावाहिक का निर्माण और प्रसारण।
5) ताजिकिस्तान की एक छात्र जुबैदा पकिवा ने सुधा अरोड़ा के नारीवादी लेखन पर तुलनात्मक शोध कार्य (पीएच.डी.) किया।

साक्षात्कार

उर्दू की प्रख्यात लेखिका इस्मत चुगताई, बांग्ला की सम्मानित लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी हिन्दी के रचनाकार भीष्म साहनी, मन्नू भंडारी, राजेन्द्र यादव, नाटककार लक्ष्मीनारायण लाल का कोलकाता दूरदर्शन के लिए साक्षात्कार।

स्तम्भ लेखन

1) सन् 1977-78 में पाक्षिक ‘सारिका’ में ‘आम आदमी : जिन्दा सवाल’ का नियमित लेखन।
2) सन् 1996-97 में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर एक वर्ष दैनिक अखबार ‘जनसत्ता’ में महिलाओं के बीच लोक-प्रिय साप्ताहिक कालम ‘वामा’।
3) मार्च 2008 से मार्च 2009 तक मासिक पत्रिका ‘कथादेश’ में ‘औरत की दुनिया’ स्तम्भ बहुचर्चित।
4) अप्रैल 2013 में ‘कथादेश’ में ‘राख में दबी चिंगारी’ स्तम्भ।

सुधा अरोड़ा की उपलब्धियाँ

1) सन् 1978 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा विशेष पुरस्कार।
2) सन् 2008 का साहित्य क्षेत्र का भारत निर्माण सम्मान।
3) सन् 2010 का प्रियदर्शिनी सम्मान।
4) सन् 2014 का राजस्थान का वाग्मणि सम्मान।
5) सन् 2014 का मुंशी प्रेमचंद कथा सम्मान।
6) सन् 2016 का मीरा स्मृति सम्मान।
7) सन् 2011 का वीमेंस अचीवर अवॉर्ड
8) सन् 2011 का केन्द्रीय हिंदी निदेशालय का पुरस्कार
9) सन् 2012 का महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का पुरस्कार

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