भूमंडलीकरण क्या है?

भूमंडलीकरण क्या है?

भूमंडलीकरण, बाजारीकरण, साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की संश्लिष्ट व्यवस्था है। आज समकालीन समय में भूमंडलीकरण का अभिप्राय वर्तमान बाजारवादी व्यवस्था से है जहां व्यापारी और उपभोक्ता तथा सामान एक साथ मिलते हैं। इस बाजारवाद को परिभाषित करते हुए डॉ. अर्जुन चव्हाण लिखते हैं कि ‘‘बाजार मूलत: खरीदने-बेचने और लेने-देन के व्यवहार का नाम है। जहां चीजें बेचने और खरीदने की बड़े पैमाने पर व्यवस्था होती है, जहां सौदागरों और ग्राहकों की बड़ी कतार होती है .........। जिस स्थान पर किस्म-किस्म की सजी दुकानें, किस्म-किस्म के लोग मिलते हैं। उस स्थान को बाजार कहते हैं। बाजार बेचने और खरीदने की व्यवहार की मंडी है।’’

वर्तमान सन्दर्भों में यदि देखा जाए तो ‘‘आज हमारे समाज और साहित्य में बहुत कुछ ऐसा घट रहा है या विगत वर्षों में घटा है जिसके कारण समाज और साहित्य की समझ में परिवर्तन होना लाजमी है। सन् 1991 में भारत की सरकार ने मुक्त बाजार वाली व्यवस्था को अपनाया। इससे भारत में संचार क्रान्ति का सूत्रपात हुआ। इस संचार क्रान्ति और मुक्त बाजार ने भारतीय जीवन को अनेक कोणों से प्रभावित किया। इससे बाजार में प्रोडक्स की उपलब्धता बढ़ी, एक सामान के कई विकल्प हो गये। विकल्पों की बाढ़ और वस्तुओं की उपलब्धता ने केवल नागरिकों की जीवन शैली में ही परिवर्तन उपस्थित नहीं किया इसने विचारों में भी बदलाव किया। बाजार के साथ विज्ञापनी संस्कृति का भी प्रचार-प्रसार काफी बढ़ा। बाद में उसमें आक्रामकता भी बढ़ी। इस आक्रामक विज्ञापनी संस्कृति ने विचार और व्यवहार को काफी बदला है।’’

भूमंडलीकरण के यथार्थवादी निहितार्थ को स्पष्टत: नंगा करते हुए सच्चिदानन्द सिन्हा लिखते हैं कि ‘‘यह व्यवस्था सारे संसार को कुछ सशक्त पूंजीवादी प्रतिष्ठानों यानी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और उनके सकेन्द्रण के सबसे सफल केन्द्र अमेरिका के हितों की रक्षा का माध्यम बनी हुई है। संसार को एक करने की इसकी दृष्टि पूरी तरह एक आयामी है। यह सिर्फ व्यापार के लिए दुनिया को एक करना चाहती है, सारे संसार के मंगल के लिए नहीं ........।

उदारीकरण और भूमंडलीकरण का अगर कोई अर्थ है तो यही है। वैश्वीकरण के अभियान का आशय है पूंजीवाद को राष्ट्रीय दायरे से परे ले लाने की अभिलाषा और मुनाफे के लिए कुछ भी जायज-नाजायज करना। इसलिए भूमंडलीकरण दर असल पूंजीवाद की एकछत्रता का उद्घोष है।’’

आज के वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व में उपभोक्तावादी प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है जिससे यह मनुष्य जीवन विकास के साथ-साथ तेजी से पतन की ओर भी बढ़ रहा है। यही कारण है कि आज बाजारों की वैश्वीकरण, निजीकरण तथा उदारीकरण की नीति ने विशाल रूप मे उपभोक्तवादी संस्कृति को जन्म दे दिया है। जिससे आज सम्पूर्ण मानव जाति, व्यापारी और उपभोक्ता दो भागों में विभाजित होती जा रही है। दुनिया के सारे देश एक दूसरे से व्यापार की प्रतिस्पर्धा करने लगे हैं। आजादी के पश्चात देश ही नही विश्व में बहुत ही तेजी से बदलाव हुआ है। भूमंडलीकरण के इस दौर में आज लोकतन्त्र भी एक बाजार बन गया है। दुनिया का सबसे बड़ा बाजार लोकतन्त्र है। इसलिए यहां की सम्पूर्ण मानव जाति उपभोक्ता बनने के लिए विवश है। आज की दुनिया में यदि आपके पास पैसा है तो आप अपनी इच्छित वस्तु यहां तक कि न्याय को भी खरीद सकते हैं, आज विज्ञापन के नाम पर सभी ने अपने को बेच रखा है।

भूमंडलीकरण के इस दौरे को और अधिक परिभाषित करते हुए कमल नयन काबरा लिखते हैं कि-’’शक्ति, सत्ता, सम्पदा और व्यापक सामाजिक सम्मान की अदम्य और अन्तहीन लालसा के तहत कुछ तबकों ने इतिहास की दिशा को कुछ खास दिशाओं में मोड़ा है। आज जिसे भूमंडलीकरण, जगतीकरण, नवसाम्राज्यवाद, विश्वव्यापी पूंजीवाद, विश्वव्यापी बाजारीकरण, नवउदारवाद का विश्वव्यापी विफोट आदि नामों से जाना जाता है, जिसे न केवल आज का यथार्थ माना जाता है बल्कि उसे आज के विश्व की विकल्पहीन, अपराजेय और अपरिवर्तनीय नियति बताया जा रहा है। ........ भारत की दुनिया में एक विशेष भूमिका है। भारत में भी हिन्दी संसार का एक विशेष स्थान है। आज भूमंडलीकरण की अन्धी दौड़ बेलगाम चल रही है।’’

इस भूमंडलीकरण को सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक दृष्टियों से प्रभावित मानते हुए तथा इसे परिभाषित करते हुए पुष्पपाल सिंह लिखते हैं कि- ‘‘भूमंडलीकरण, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों का समुच्चय है, यानी वह हमारे भीतर और बाहर जीवन के दोनों पक्षों को प्रभावित करता है, कर रहा है। साहित्य भी इससे अछूता नहीं रह सकता वह भी उपन्यास जो जीवन का संर्वांगीण अंकन करता है।’’

आज भूमंडलीकरण ने सम्पूर्ण विश्व में अपना अस्तित्व जमा लिया है और भूमण्डल के लगभग सभी देशों में इसका प्रभाव दिखाई दे रहा है किन्तु अभी भी इसके समर्थक यह दावा करते हैं कि भूमंडलीकरण के कारण दुनिया के बाजार आपस में जुड़ रहे हैं, उनका पारस्परिक समन्वय हो रहा है लेकिन यह दावा यदि सही होता तो दुनिया भर में वस्तुओं की कीमतों में समानता होती क्योंकि ये बाजार प्रतियोगिता पर आधारित बताये जाते हैं। किन्तु वास्तविक सच्चाई यह है कि सम्पूर्ण विश्व में अलग-अलग कीमतें किसी भी समानता की ओर नहीं बढ़ रही हैं, यहां तक कि एक ही देश में किसी वस्तु की कीमत एक न होकर हर जगह अलग-अलग हैं। 

भूमंडलीकरण की सागर्भित और उसके समकालीन परिदृश्य पर चर्चा करते हुए पुष्पेश पंत कहते हैं कि- ‘‘समकालीन भूमंडलीकरण की अवधारणा किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का विकास नहीं समझी जा सकती, भले ही कुछ विदेशी विद्वान ऐसा प्रयत्न करते रहे हैं। 21वीं सदी वाले भूमंडलीकरण की जड़े हजारों वर्ष पहले नहीं तलाशी जा सकतीं। आज जिस सन्दर्भ में भूमंडलीकरण की चर्चा गर्म हुई है वह अमेरिकी पूंजीवाद पश्चिमी जनतंत्रवादी प्रणाली के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। ........... बाजार के तर्क और मुक्त व्यापार को भूमंडलीकरण का यह अवतार सबसे अधिक महत्वपूर्ण समझता है।’’

यदि सच कहा जाए तो इस सदी का होने वाला यह ग्लोबल वैश्वीकरण किसी न किसी रूप में आकर अमेरिका की वैश्विक नीति पर ही रुकता है आज जिस प्रकार दुनिया में वह सुपर शक्ति बन गया है और दुनिया के देशों के साथ विभिन्न समझौते किये हैं। भूमंडलीकरण के नामकरण और अमेरिका के बढ़ते वर्चस्व पर चर्चा करते हुए कमल नयन काबरा लिखते हैं कि- ‘‘भूमंडलीकरण और उससे सम्बन्धित शब्दावली या इसके अन्य प्रचलित नामों की व्यापक लोकप्रियता पर विचार करने के पहले इस भूमंडलीकरण के दो मुख्य कर्ताओं और समर्थकों की पहचान करना और उनके विविध पहलुओं पर विचार करना उपयोगी होगा। हेनरी किसिंजर आदि मूलमत प्रतिपादकों ने जाहिराना तौर पर यह कहा है कि भूमंडलीकरण का असली अर्थ अमेरिका का विश्वव्यापी वर्चस्व है। इस तरह भूमंडलीकरण का एक रूप अमेरिका का वर्चस्व और उसका सारे संसार में पसरना हो जाता है।’’

पिछले दो दशकों से भूमंडलीकरण पर तेज बहस छिड़ी है जिसे लेकर दुनिया में घमासान मचा हुआ है और पूरा विश्व इस पर लड़ाई की मुद्रा में एक दूसरे के सामने है। भूमंडलीकरण के पक्षधर यह मानते हैं कि आर्थिक प्रगति और सामाजिक न्याय के लिए और कोई रास्ता नहीं है। इनकी सोच में वैज्ञानिक सोच वाले आधुनिकीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए भूमंडलीकरण जरूरी है।

जबकि इसके विरोधियों का मानना है कि भूमंडलीकरण की ओट में पुरानी औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी शक्तियां विश्व व्यवस्था पर अपनी पकड़ बनाये रखना चाहती हैं उनकी कुटिल रणनीति के अलावा यह भूमंडलीकरण और कुछ भी नहीं है। यह बिल्कुल यथार्थ सत्य भी है जिसकी ओट में अमेरिका, चीन जैसी साम्राज्यवादी शक्तियां साम, दाम, दण्ड, भेद अपना सब कुछ लगाकर आज सम्पूर्ण विश्व पर अपना अधिकार कर लेना चाहती हैं। ‘‘आज वर्तमान स्वरूप में वैश्वीकरण एक ऐसी धारणा है जिसका मूलाधार बाजार, बाजारवाद और उपभोक्तावाद है। पूरी दुनिया को अपने बाजार के रूप में परिवर्तित कर विश्व की सर्वोच्च सुपर शक्ति अमेरिका अपने रूप में ढालकर सांस्कृतिक दृष्टि से अपना बनाने आर्थिक दृष्टि से न्यस्त स्वार्थों की सम्पूर्ति के लिए पूरे विश्व को एक रंग में रंगने के संकल्प को कार्य रूप दे चुका है, पूरा विश्व उसके द्वारा परिकल्पित मॉल संस्कृति बनकर रह गया है। यह वैश्वीकरण एक प्रकार से पूरी दुनिया का अमेरिकीकरण है जो सारे राष्ट्रों की स्थानिक संस्कृति जातीय चेतना को पूरी तरह लील कर अपने रंग में रंग डालने की बड़ी भारी सफल कूटनीति है जिसके कारण

भूमंडलीकरण की उत्पत्ति

भूमंडलीकरण कोई परिस्थिति या परिघटना नही है। यह एक प्रक्रिया हे जो काफी समय से चली आ रही हे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के वर्षों को वैश्वीकरण के प्रारंभिक वर्ष माना जा सकता हे। मार्क्स पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इस बात की ओर ध्यान दिलाया था कि एक एकीकृत विश्व बाजार की ओर ले जाना पूंजीवाद के तर्क में शुरू से ही अंतर्निहित रहा था और उपनिवेशवाद ने ऐसे बाजार के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाई हे लेकिन 15वीं शताब्दी से लेकर जब ये प्रक्रिया शुरू हुई तो 18वीं शताब्दी के अन्त तक वास्तविक उपनिवेश की प्रक्रिया अधिकतम अमेरिका महाद्वीपों तक ही सीमित रही और केवल 19वीं शताब्दी में ही एशिया और अफ्रीका के आंतरिक भागों में गहन रूप से उपनिवेश स्थापित किए गए और विश्व को अंतत: उन्नत पश्चिम के केंद्रीय औद्योगिकृत देशों तथा गेर-औद्योगिकृत उपनिवेशों एवं आश्रित राज्यों के जिनमें से कइ्र नाममात्र के लिए स्वाधीन थे और समूहों में बंट गया।

वैज्ञानिक तकनीकी प्रगति और औद्योगिक क्रान्ति ने जो पूंजी में वृद्धि की, उसके परिणाम स्वरूप साम्राज्यवादी व्यवस्था विकसित हुई। साम्राज्यवाद ने उन देशों में अपने उपनिवेश बनाए जो कि वैज्ञानिक, तकनीकी, आधुनिक औद्योगिक प्रगति की दृष्टि से पिछड़े थे। इस प्रक्रिया ने एशिया, अफ्रीका और लातीन तथा अमेरिका जैसे देशों को गुलाम बनाया। मालिक देशों ने अपने गुलाम देशों का जी भरकर शोषण किया।

इन देशों को निरन्तर ऐसे बाजार चाहिए थे जहां उनके माल की खपत बेरोक टोक हो सके। ये देश इतने चतुर थे कि उद्योगों के लिए कच्चे माल के बदले में गुलाम देश को कुछ नहीं देते थे। ये देश कंपनियों के जरिये अपनी पैठ बनाते थे कि गुलाम देशों को एक साथ विरोध न झेलना पड ़े। ये धीरे-धीरे करके अपनी योजनाओं को लादते थे, और एक-एक कर और देशों को अपनी गिरफ्त में लेने जाते थे। यह प्रक्रिया वहीं से चली आ रही हे। यह सब ठीक ऐसे ही हुआ जैसे पहले-पहल हमारे देश में ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापार के जरिये घुसी थी। बाद में वह भारत के माल को ले जाकर यूरोप के बाजारों में बेचने लगी। इसके बदले भारत में यूरोप का सोना आने लगा था लेकिन धीरे-धीरे ऐसी स्थिति हो गयी थी। इंग्लैंड और अन्य औद्योगिक एवं साम्राज्यवादी देशों में बना माल ही भारत के बाजारों में अधिक आने लगा। जिससे भारत का धन व संपत्ति इंग्लै्रंड व अन्य देशों में जाने लगा ऐसे अनेक देश थे जिनका भारत की तरह शोषण किया गया। इससे वे देश कमजोर पडते गए जिनके माल को बेचकर व्यापारी देश और धनी बनते जा रहे थे और गुलाम देश गरीबी का सामना करने लगे थे।

साम्राज्यवादी देश ऐसे बाजारों की तलाश में रहते थे जहां उनके माल की खपत अधिक हो सके और उनके लाभ का प्रतिशत ओर बढ़ सके। वैश्वीकरण की इच्छा यहीं से शुरू हुई होगी। विकसित देशों ने वैश्वीकरण को अपना हथियार बना लिया था। दूसरी वजह से वे निर्भय होकर अपना व्यापार कर सकते थे। जिन देशों ने वैश्वीकरण से अधिक लाभ उठाया हे। अमेरिका का नाम सबसे पहले आता है। अमेरिका ने ही वैश्वीकरण को पूरी दुनिया पर लादा हे। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन चुका था। वह ऐसी ताकत बन चुका था कि जो अपनी मनमर्जी से गुलाम देश का शोषण करता था और जिसका दुनिया का कोइ्र भी देश विरोध नहीं कर सकता था। लेकिन सत्तर के दशक तक आते-आते अमेरिका को जापान, जम्रनी आदि देशों से उत्पादित एवं आर्थिक शक्ति के विषय में चुनौतियां मिलने लगी थी। उसने अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए अपने आंतरिक और बाहरी खर्च तथा फलस्वरूप बजट व भुगतान संतुलन का घाटा बेहद बढ़ा लिया था। जिससे डालर की अन्तराष्ट्रीय स्थिति डावांडोल हो गयी। उसी समय ओपेक (पेट्रोलियम पदाथों के निर्यातक देशों का संगठन) ने तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ा दी थी। पूर्ण रोजगार की स्थिति के कारण यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका के धनी देशों में वहां के श्रमिक संगठनों की ताकत भी बहुत बढ़ गयी थी। कमल नयन खाबरा लिखते हैं ‘‘इसके साथ ही धनी देशों के आंतरिक बाजारों व उनके विदेशों से प्राप्त होने वाली उनकी बड ़ी कम्पनियों के लिए मुनाफे की दर बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा हे।

तेल निर्यातक देश की सफलता से उत्साहित होकर विदेशी कर्ज पूंजी तथा तकनीक के आयात पर बाहरी निर्भरता की बढ़ती लागत और दिक्कतों के कारण तीसरी दुनिया के देशों में आत्मनिर्भर विकास की भावना प्रबल होने लगी। इसके लिए उन्होंने नयी विश्व आर्थिक व्यवस्था की परिकल्पना को साकार करने का प्रयास संयुक्त राष्ट्रसंघ आदि संस्थाओं के माध्यम से शुरू किए। पूर्ववतोर्ं उपनिवेशी शासकों तथा धनी देशों की नींद इन सब कारणों से उड़ी।’’

इस तरह की उभरती हुई प्रवृत्तिरयों के खात्में के लिए अमेरिकन राष्ट्रपति रीगन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेचर आगे आए। उन्होंने नवउदारवादी नीतियां लागू करनी शुरू कर दी बाजार पर से वे नियंत्रण हटाये जाने लगे जिससे उन्हें मनचाहा लाभ मिल सके। राज्य की भूमिका को कम किया गया। साथ ही मजदूरों के कल्याण और उनकी सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों और नीतियों में काफी कटौती की जाने लगी। बेरोजगारी में वृद्धि होने लगी। उदारीकरण से पूंजी-प्रधान तकनीक के आयात को बढ़ावा मिला हे। इससे मशीनीकरण व कम्प्यूटरीकरण में वृद्धि हुइ्र हे। इससे पर्याप्त रोजगार अवसर उत्पन्न नही हो पाए हें। इस तरह उदारीकरण से बेरोजगारी की समस्या बहुत बढ़ गई हे।

उदारीकरण में विदेशी कम्पनियों का भारतीय अर्थव्यवस्था में आगमन बढ़ा हे। भारत की घरेलू कम्पनियों अभी भी इतनी सुदृढ नही है कि विदेशी की उन्नत कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा का सामना कर पाएं बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण कई छोटी घरेलू औद्योगिक इकाइयाँ रूग्ण होकर बंद हो गई हे। प्रगतिशील कर दरों के स्थान पर करों में भी कटौती की जाने लगी। अमेरिका ने डालर की जगह सोना देने की अपनी बाध्यता समाप्त कर दी।

इससे सबसे अधिक लाभ अमेरिका को हुआ। जिसे अब डालर के बदले सोना नहीं देना पडता था। इस तरह अमेरिका शक्तिशाली संपक्र राष्ट्र बनता चला गया। कुछ समय बाद वह स्वयं नीति निर्धारक बन गया। अमेरिका ने ऐसी नीतियां बनानी शुरू कर दी। अब अमेरिका अपनी बनाई नीतियों के कारण अपने मंसूबों में कामयाब हो गया। अब अमेरिका का सबसे धनी राष्ट्र बनने का सपना पूरा हो रहा था। गिरीश मिश्र प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ने भूमंडलीकरण की शुरूआत 1989 से मानते हें। दिलीप एस. स्वामी ने भूमंडलीकरण की शुरूआत के विषय में लिखा हे कि ‘‘विश्वीकरण की प्रक्रिया 1991 में शुरू हुई है, वह स्वाधीनता के समय से चली आ रही विकास की जन विरोधी प्रक्रिया को जारी रखे हुए है और बढ़ा रही है।’’

इससे पता चलता हे कि 1989 और इसके बाद से ही वैश्वीकरण ने भारत में अपने पाँव पसारने आरम्भ कर दिये थे।’’

अन्त में यही कहा जा सकता हे कि वैश्वीकरण की शुरूआत भारत में 1990 से मानी जाती हे। 1990 से भारत में जन संचार के माध्यम का भी आधुनीकरण होना शुरू हो रहा था। इस कारण 1990 में भारत में भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण की शुरूआत मानी जाती है। 

भारत, चीन जैसे विशाल राष्ट्रों की युग युगों की प्राचीन संस्कृतियों की चूलों को भी उसने पूरी तरह हिलाकर रख दिया है। भूटान जैसे अलग-थलग पड़े बन्द समाज के राष्ट्रों तक भी अपनी मैक्डोलन संस्कृति को पहुँचाया हे। प्रत्येक देश की संस्कृति, भाषा, वेषभूषा और जीवन पद्धति को आमूल-चूल परिवर्तित कर स्थानिकता पर वैश्वीकरण को हावी कर दिया है। ‘‘

भूमंडलीकरण का तत्व एवं आधार

इक्कीसवीं शताब्दी में भूमंडलीकरण ने अधिक पाँव फ़ैला लिये है और विश्व के सभी देश एक-दूसरे की संस्कृति को वैश्वीकरण के माध्यम से अधिक प्रभावित कर रहे हैं। वैसे तो प्रत्येक व्यवस्था के कुछ आधार एवं तत्व होते हें, जिन के सहारे पर टिकी होती है। उसी प्रकार ही वैश्वीकरण के भी कुछ आधार हे जिनके सहारे वह टिकी हुई है और विश्व के सभी देशों में जिनके सहारे वैश्वीकरण फ़ैल चुका हैं और फ़ैल रहा हैं। वैश्वीकरण की अपनी नीतियाँ और अपने सिद्धान्त भी हे जिनके सहारे वह पूरे संसार पर अपना प्रभाव जमा रही हे। इसकी नीति उन देशों ने बनायी है जो देश किसी दूसरे देश में जाकर अपने उपनिवेश स्थापित करते हें और वह देश उस देश में कम पूंजी लगाकर अधिक लाभ कमाना चाहता हे और उस देश से पूंजी लूटकर अपने देश में लगाता हे। धीरे-धीरे जिस देश में वह कम्पनियां लगाता हे वह देश गरीब होता चला जाता हैं। 

वैश्वीकरण के नीति एवं नियम उन्हीं देशों के द्वारा ही बनाए गए हें जो एक स्थान पर बैठे रहकर पूरे विश्व की पूंजी लूट लेना चाहते हें। इन देशों के सहयोग के लिए वैश्वीकरण संस्थाएं और अनेक कंपनिया हें जो वैश्वीकरण की नीति और नियमों की अधिक जानकारी रखते हैं। 

सन्दर्भ-
  1. कमल नयन खाबरा, कमल नयन खाबरा, ‘‘भूमंडलीकरण: विचार, नीतियाँ और विकल्प’, पृ0 22 पृ0 22 
  2. दिलीप एस. स्वामी, ‘विश्व बेंक और भारतीय अर्थव्यवस्था का वैश्वीकरण’। 
  3. डॉ0 पुष्पपाल सिंह, ‘‘21वीं शदी का हिन्दी उपन्यास,’ पृ0 11

Bandey

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