भारत में महिला सशक्तिकरण का प्रारंभिक उद्देश्य

महिला सशक्तिकरण का विस्तृत तात्पर्य है - महिलाओं को पुरुष के बराबर वैधानिक, राजनीतिक, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में उनके परिवार, समुदाय, समाज एवं राष्ट्र की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में निर्णय लेने की स्वयतता से है। भारत में महिला सशक्तिकरण का प्रारंभिक उद्देश्य महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक दशा को सुधारना है।

महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए उन पहलुओं को मजबूत बनाने की आवश्यकता है, जिनका सीधा संबंध स्वावलम्बन और उत्थान से है। शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक ओर राजनीतिक क्षेत्र इनमें से प्रमुख है।

महिला की प्रगति पूरे घर परिवार समाज एवं राष्ट्र की प्रगति मानी जाती है। महिलाओं के प्रति होते तमाम अत्याचारों, शोषण की समाप्ति तथा दुराग्रही प्रकृतियों की समाप्ति को लेकर कृत संकल्पना दोहराने हेतु महिला सशक्तिकरण की रूप रेखा रखी गयी। ताकि नई सदी में हम एक ऐसे समाज और राष्ट्र के निर्माण पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकें जहाँ महिलाओं को अपनी अभिव्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता हो।

इस संकल्पना के साथ ही महात्मा गाँधी के कथन भी पूर्णत: साकार हों कि ‘‘जब तक भारत की महिलाएँ सार्वजनिक जीवन में हिस्सा नहीं लेंगी, देश तरक्की नहीं कर सकता।’’ महिला सशक्तिकरण की अवधारणा मूलतः महिलाओं की कमजोर स्थिति में सुधार के परिणामस्वरूप की उत्पन्न हुए हैं। महिलाएँ जो आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं, करीब-करीब सम्पूर्ण विश्व में भेद-भाव, अन्याय एवं असमानता के चक्रव्यूह में से सदियों से ग्रसित रही हैं।(39) महिलाओं के सशक्तिकरण की स्थिति में कुछ भी नया नहीं है; बल्कि इसमें नई चीज यह है कि महिलाएँ अपनी कमजोर, भेदभाव एवं असमानता की स्थिति के विरूद्ध अब आवाज उठाने लगीं हैं। 

आज यह स्वीकार किया जाने लगा है कि मानव राष्ट्र एवं विश्व का वास्तविक विकास महिलाओं के सशक्तिकरण के माध्यम से ही संभव हो सकता है। अमर्त्य सेन ने इस बात पर जोर दिया है कि आज विश्व के विभिन्न देशों का विकास प्रक्रिया में महिला सशक्तिकरण निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

महिला सशक्तिकरण शब्द का राजनैतिक अध्ययन में अपना एक विशेष अर्थ है। ‘सशक्तिकरण’ एवं राजनैतिक सशक्तिकरण शब्द आज सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों, विभिन्न विकास एजेंसियों, यूनाईटेड नेशन्स एवं अन्य अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियों, महिला समस्याओं के अध्ययनों आदि के सन्दर्भ में सशक्तिकरण शब्द वृहत रूप से व्यवहार हो रहा है।

सशक्तिकरण के अभिप्राय का मुख्य केन्द्र, राजनैतिक सत्ता की भागीदारी, वितरण एवं पुनर्वितरण की गतिशीलता में अवस्थित है, जिसके पास एक वैधता का आधार होता है। सत्ता दूसरों पर नियंत्रण रखने हेतु व्यक्ति की क्षमता है ओर इस प्रकार जब नियंत्रण की यह क्षमता वैधता प्राप्त कर लेती है, तो वह प्राधिकार बन जाती है। दरअसल सशक्तिकरण की तर्कसंगति में प्राधिकार की गत्यात्मकता शामिल है। जब हम प्राधिकार अथवा उस अर्थ में वैधता प्राप्त सत्ता के वितरण अथवा पुनर्वितरण प्रक्रिया की बातें करते हैं तो स्वभाविक रूप से न केवल उस प्राधिकार हैतु वेधता के आधार पर; बल्कि उन सामाजिक श्रेणी-विभाजनों पर भी सवाल करते हैं, जिनके माध्यम से सत्ता संबंध कार्यरूप में व्यवहृत होते हैं। इसी तर्क के आधार पर सत्ताहीनता को भी प्रदत्त सामाजिक व्यवस्था में वैधता प्रदान कर दी गई है, ताकि सत्ता-वितरण की सशक्त प्रक्रिया बनी रहै।

सशक्तिकरण न तो ओपचारिक ज्ञान मात्र है ओर न काल्पनिक जादुई छड़ी, बल्कि यह किसी विशिष्ट स्थान तथा कालखंड में घटित होने वाली मानवीय एवं सामाजिक प्रक्रिया है, जहाँ किसी शक्तिहीन, पीड़ित या शोषित को भिन्न-भिन्न तरीके से शक्ति-सम्पन्न किया जाता है, जिससे वह मानव जीवन के चरमोत्कर्ष को वैधिक ओर नैतिक रूप में प्राप्त कर सके।

अत: सशक्तिकरण एक बहु-आयामी एवं बहुस्तरीय अवधारणा है। यह कोई अकेली चीज नहीं है; बल्कि यह कई कारकों जेसे-भोतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक आदि की क्रिया ओर अंत: क्रिया है। इसी संदर्भ में हम महिला-सशक्तिकरण को भी देखते हैं। महिला सशक्तिकरण को हम एक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं, जिनमें महिलाएँ भौतिक, मानवीय एवं बोद्धिक-जैसे ज्ञान, सूचना, विचार ओर वित्तीय स्रोतों जैसे धन अथवा धन तक पहुँच एवं घर, परिवार, समुदाय, समाज एवं राष्ट्र आदि के संदर्भ में निर्णय लेने के सम्बन्ध में अधिक सहभागिता कर सकती हैं।

‘महिला-सशक्तिकरण’ शब्द सामाजिक न्याय एवं समानता प्राप्ति हेतु महिलाओं के संघर्ष से जुड़ी हुई हैं।

महिला-सशक्तिकरण का मतलब यह नहीं है कि उन्हैं दूसरों पर प्रभुत्व जमाने की शक्ति प्रदान करना तथा अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करने हैतु शक्ति सम्पन्न बनाना। महिलाओं के लिए सशक्तिकरण का मतलब यह है कि उसे ऐसी शक्ति प्राप्त हो, जिससे उसके महत्व को स्वीकार किया जा सके तथा उसे समान नागरिक एवं समान अधिकार की स्थिति तक ला सके। उनके लिए शक्ति का मतलब यह है कि न केवल घर के अंदर; बल्कि समाज के प्रत्येक स्तर एवं पक्ष में उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो सके। उनकी शक्ति के मूल्य एवं भागीदारी को समाज द्वारा उचित मान्यता भी प्राप्त हो सके।

महिलाओं की सशक्तिकरण होने से उनमें अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं को पहचानने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है, ताकि वे एक पूर्ण नागरिक के रूप में अपने देश एवं मानवता की सेवा में सहायता पहुँचा सकें। अपनी क्षमताओं के अनुरूप वे अपने परिवार, समुदाय एवं समाज के प्रत्येक स्तर पर अपनी एक सकारात्मक छवि का निर्माण कर सकें ओर अपने अंदर आत्मविश्वास को भी उत्पन्न करें। उनमें क्षमताओं का इतना विकास हो सके कि वे किसी भी समस्या का स्वयं समाधान कर सकें।

जब महिलाएँ अपने प्रति होने वाले सामाजिक-मनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक अन्याय, लिंग-भेद, असमानता, सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक शक्तियों के नकारात्मक प्रभाव के विरूद्ध जागरूक हो जाए तो यह समझा जा सकता है कि उनका सशक्तिकरण हो रहा है। वास्तव में, इसकी शुरूआत तब होती है, जब वे अपनी सकारात्मक स्वच्छ छवि, अधिकार, कर्तव्य ओर अपनी क्षमताओं के प्रति पूरी जागरूक हो जाती है। अत: महिला सशक्तिकरण की सार्थकता यह है कि, उन्हैं इतना योग्य बनाया जाए कि वे अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं को पहचान सकें और इसका उपयोग अपने जीवन में कर सकें। वे अपने जीवन में विचारों, उसकी अभिव्यक्ति एवं कार्यों की स्वतंत्रता का उपयोग कर सकें। इतना ही नहीं, उन्हें केवल अपनी योग्यता को ही नहीं पहचानना है, बल्कि इसके लिए उन्हैं अवसर, सुविधा, बाहरी ओर आंतरिक वातावरण पर भी ध्यान देना है, ताकि वे अपनी क्षमताओं एवं आत्मसम्मान की समृद्धि भी कर सकें। अपने प्रति होने वाले अन्याय के विरूद्ध संघर्ष करने की क्षमता भी विकसित हो सके।

लैंगिक-न्याय, लैंगिक-समानता, महिला-अधिकार एवं महिला-सशक्तिकरण आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए मुद्दे हैं। इनमें आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया होते रहते हैं। जब लैंगिक न्याय एवं समानता तथा महिला-अधिकार को मानवाधिकार के अन्तर्गत स्वीकार किया जाता है तभी यह कहा जा सकता है कि महिला-सशक्तिकरण के अनुकूल स्थिति उत्पन्न हुई है तथा लैंगिक-समानता एवं न्याय को तभी प्राप्त किया जा सकता है।

महिला सशक्तिकरण को लिंग-समानता से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। महिला-सशक्तिकरण से लिंग समानता की स्थिति उत्पन्न होती है एवं लिंग-समानता की स्थिति से महिला-सशक्तिकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। समान एवं स्थायी मानवीय विकास तभी संभव हो सकता है, जब समाज के हर स्तर पर स्त्रियों एवं पुरुषों के बीच समानता की स्थिति आ जाए। लिंग-समानता का मतलब संसाधनों तक पहुँच के समान अवसरों, समानता से विश्वास के साथ मूल्य-व्यवस्था का निर्माण, निर्णय निर्धारण करने में पुरुष के समान सहभागिता तथा संसाधनों पर समान नियंत्रण से तात्पर्य लगाया जाता है।

महिला सशक्तिकरण का अर्थ है ‘शक्तिसम्पन्न’ करना अर्थात् जो पहले से शक्तिहीन है, या शक्तिहीन बनाया गया है या शक्तिहीन माना गया है या जिसे शक्तिहीन रूप में देखा जाता है उसे ऐसी शक्तियाँ प्रदान की जाएँ जो उसके बहु-आयामी व्यक्तित्व के सम्मान हेतु, पुष्पित-पल्लवित और समृद्ध करने हैतु आवश्यक है। इस सम्मान ओर समृद्धि की कोई सीमा नहीं हैं ओर विभिन्न समाज में यह भिन्न-भिन्न स्वरूप व्यापकता, गहराई या अन्तर्वस्तु में परिभाषित हो सकती है। किन्तु एक मापदण्ड यह तो हो ही सकता है कि यह सम्मान एवं समृद्धि पुरुषों से किसी भी अर्थ में कम न हो।

सशक्तिकरण किसी भी र्पकार के भेदभाव विषमता, स्तरण, अधीनता, हिंसा, अश्पृश्यता, वंचना तथा किसी भी आभाव को मिटाने वाली वह प्रक्रिया है जो अन्तत: सकारात्मक शक्ति का उपयोग करने की क्षमता पेदा करती है।

महिलाओं के संदर्भ में सशक्तिकरण का अर्थ है संसाधनों पर उनका नियंत्रण तथा निर्णय का अधिकार।

वस्तुत: सशक्तिकरण के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक यह है कि महिलाओं की सैद्धान्तिक ओर सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में उनकी दयनीय स्थिति को समझना महिलाओं के दोयम दर्जे के लिए सैद्धान्तिक ओर सांस्कृतिक विचारधारा जिम्मेदार है। इन विचारधारों के कारण शक्ति संतुलन पुरूषों के पक्ष में रहा है। इसलिए सशक्तिकरण का तात्पर्य सिर्फ संसाधनों पर महिलाओं के अधिकार स्थापित होने से नहीं है इसका मूल तात्पर्य है समाज में मौजूद पुरुषों के अधिकार को निरापद बनाने वाली विचारधारा को चुनौती देना ओर समाप्त करना। इसके अतिरिक्त संसाधनों पर अधिकार, निर्णय की स्वतंत्रता, राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी, स्वंय में विश्वास, इच्छा की अभिव्यक्ति अवसर की समता, आदि तत्व भी सशक्तिकरण की अवधारणा के परिधि में आता है।

महिला-सशक्तिकरण’ शब्द सामाजिक न्याय ओर समानता प्राप्ति हैतु महिलाओं के संघर्ष से जुड़ी हुई है। वास्तविक सशक्तिकरण विचारों जो व्यक्ति की सोच, उम्मीद, विश्वास, मूल्य एवं मनोवृत्तियों में विद्यामान है को नियंत्रित करता है। यह नियंत्रण महिलाओं के शक्ति को निर्धारित कर स्रोतों पर उनकी पकड़ को मजबूत बनाता है, अर्थात् सशक्तिकरण का अर्थ शक्तिहीनता से शक्ति समान्नता की ओर जाना है। यह महिलाओं में शक्ति की वृद्धि करता है तथा उनमें एक सकारात्मक सोच का निर्माण करता है।

भारत में महिला सशक्तिकरण से आशय प्राथमिक रूप से महिलाओं की सामाजिक ओर आर्थिक दशा में सुधार लाना है। यहाँ सशक्तिकरण के विभिन्न आयामों पर भी दृष्टिपात करना उचित होगा। उल्लेखनीय है कि शक्ति कोई वस्तु नहीं है जिसका आदान-प्रदान किया जा सकता है। इसे बाहर से थोपा नहीं जा सकता है। शक्ति वस्तुत: एक आंतरिक ऊर्जा है। जिसे प्राप्त किया जा सकता है। पुन: यह एक प्रक्रिया है। जिसे एक प्रक्रिया के रूप में उत्तरोत्तर ग्रहण किया जा सकता है। साथ ही यह कोई एकल परिघटना नहीं है बल्कि एक संबंध श्रृंखला है। इसीलिए सशक्तिकरण की सार्थकता के लिए आवश्यक है कि इसे मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्वीकार करना इस दृष्टिकोण से महिला सशक्तिकरण के विभिन्न आयाम है -

महिला सशक्तिकरण के आयाम 

1. आर्थिक सशक्तिकरण 

कार्ल माक्र्स ने कहा है कि :- ‘‘जिसके पास आर्थिक गतिविधियों पर नियंत्रण की ज्यादा शक्ति होगी, वह शक्तिशाली होगा।’’ तथा मैब्सबेवर ने ‘मार्केट वेल्यु’ की बात तथा शक्ति, राजनीति सत्ता के आधार पर वर्चस्व की बात को कहा। महिलाओं की शक्तिहीनता का मुख्य कारण उनकी आर्थिक पराधीनता है।(51) महिला उत्पीड़न का एक प्रमुख कारण महिलाओं की पुरूषों पर आर्थिक निर्भरता है।चूंकि घरेलु महिलाएं जो काम करती हैं, उसके लिए उन्हें कोई अलग से मजदूरी नहीं दी जाती है। उसके परिश्रम को मूल्यवान नहीं समझा जाता है, इसलिए मजदूरी लाने वाले पुरुष के प्रति वह स्वत: अधीनता स्वीकार कर लेती है। यही आर्थिक निर्भरता स्त्री के ‘स्व’ को परजीवी बना देती है। 

इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि महिलाओ को हमेशा से धन, धरती ओर सत्ता से वंचित रखने के कारण इस वर्ग की आर्थिक ओर सामाजिक स्थिति अत्यन्त दुर्बल रही है, साथ ही कम वेतन, श्रम विभाजन में निम्नतम स्थान भी आर्थिक निर्योग्यता को सम्पुष्ट करती है।

इन अर्थों में महिलाओं का आर्थिक पक्ष सशक्त होना आवश्यक है। महिलाओं का आर्थिक रूप से सुदृढ़ होना, महिला सशक्तिकरण का आधारभूत तथ्य है क्योंकि पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व होने में महिलाओं की आर्थिक आश्रिता की प्रमुख भूमिका होती है।(53) इसलिए आर्थिक रूप से महिलाओं को संबल बनाने की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसके लिए उन्हें शिक्षा एवं तकनीकी कुशलता से युक्त करने की आवश्यकता है ताकि आर्थिक पारिश्रमिक वाले कार्यों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का तात्पर्य उनकी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता एवं सशक्त क्षमता से है। यह तभी संभव है जब नारी अपना श्रम उत्पादक कार्य में दे, चाहे प्राथमिक क्षेत्र, द्वितीयक क्षेत्र या तृतीयक क्षेत्र हो, अपना उचित पारिश्रमिक हक ओर समानता से प्राप्त करे। महिलाओ के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए उन्है जमीन-जायदाद, बैंक-खाता, बचत, निवेश में निर्णय लेने, सम्पत्ति पर समान अधिकार इत्यादि होना ही चाहिए।

आर्थिक सशक्तिकरण (54) जमीन एवं सम्मत्ति में शिक्षा और उत्पादन में समान अधिकार तकनीकी प्रशिक्षण सक्रिय भूमिका महिलाओं के नियंत्रण में आय आय में वृद्धि महिलाओं के निर्णय-बचत और खर्च में महिलाओं के निर्णय - उपभोग ओर निवेश में आर्थिक गतिविधियों में नियंत्रण स्व-मजदूरी, वेतन, कार्य के शर्त्तों का अधिकार सम्पूर्ण विकास

2. सामाजिक सशक्तिकरण 

महिलाओं के दोयम दर्जे की हैसियत को निर्धारित करने में परिवार एवं अन्य सामाजिक प्रथाओं में परिवार एवं अन्य सामाजिक प्रथाओं की भूमिका सर्वोपरि रही है। पितृ सत्तावादी मूल्यों के विकास एवं संरक्षण में समाज की ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। स्त्रियों की पराधीनता की कथा यहीं से प्रारम्भ होती है। इसलिये महिलाओं का सामाजिक सशक्तिकरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, ताकि समाज में उनकी गरिमा बहाल हो।

प्रत्येक समाज का अपना रीति-रिवाज, संस्कृति एवं जीवन शेली होती है, परन्तु एक बात प्राय: समानता लिए हुए है कि हर समाज में स्त्रियों की दशा निम्न स्थिति में है। उन्हैं धर्म, संस्कार, रीतियों के नाम पर अनेकानेक बंधनों में जकड़ दिया गया है जिसे स्त्री भी अपनी नियति मान चुकी है। इसके पीछे मूल कारण पुरुष प्रधान या पितृप्रधान समाज है जो सदियों से ओरतों को हांकने का काम करते आ रहा है। वह ओरतों को अपनी सम्पत्ति समझता है और उस पर अपना अधिकार जताते रहा है। परिवार समाज का सबसे छोटा रूप है। यहीं से भेदभाव शुरु होता है ओर सामाजिक पृष्टभूमि में यह विकराल रूप लेता चला गया। जेसे बेटा-बेटी मेुंर्क या कहैं लिंग भेद। पुत्री का जन्म-मरण का निणर्य, रहन-सहन मे भेद, शिक्षा-स्वतंत्रता में भेद, कार्य का विभाजन, रीतियों और धर्म के नाम पर अनेक बंधनों को थोपना ओर इससे स्त्री की स्वतंत्र अस्तित्व कहीं दब गया है।

अत: आज समानता एवं स्वत्रंतता के मानवीय अधिकारों पर जिस पर प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है, के तर्ज पर सामाजिक रूप से महिलाओं के सशक्तिकरण की आवश्यकता है। यह तभी संभव है जब प्रत्येक समाज में नारी को पुरुष की सहगामी मान कर उसे वह सब अधिकार समानता के साथ दिया जाय जिसकी वह अधिकारिणी रही है। उन पर कोई बंधन न रहै और समानता का व्यवहार किया जाय।

3. राजनीतिक सशक्तिकरण

भारत में राजनीति परिवर्त्तन का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी एक ऐसे वातावरण सृजित करने में सफल हो सकती है जहाँ महिलाओं के बुनियादी सवालों पर विमर्श किया जा सकता है। राजनीतिक भागीदारी एक उत्प्रेरक भूमिका निभा सकती है। इनकी राजनीतिक भागीदारी से महिलाओं से जुड़े सवाल को राष्ट्रीय नीति में केन्द्रीय स्थान मिलना आसान हो जाएगा।

महिलाओं की शक्तिहीनता का एक मुख्य कारण यह भी है कि राजनीतिक परिदृश्य पर उनकी अत्यन्त सीमित प्रतिनिधित्व होना।(56) उनमें राजनीतिक चेतना की कमी होती है। उनका अपना कोई अलग संगठन या दल नहीं होता। तथा मुख्य धारा के राजनैतिक दलों में उनका खास महत्व नहीं होता। राष्ट्रीय और प्रान्तीय विद्यायिका द्वारा बनायी गयी विधियों ज्यादातर एकांगी और स्त्री विरोधी होती है तथा सामाजिक परम्परा और रीति रिवाज के आधार पर ही राजनैतिक नियमावली बनती है।

महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण से तात्पर्य उन्हैं देश की राजनीति में सशक्त भूमि मिले। उन्हैं वे सभी अधिकार और शक्ति मिले जिससे कि वे देश की राजनीति को चलाने में अहम भूमिका निभा सके। महिलाओं के मुद्दे, निर्णय विचार, दृष्टिकोण को देश की राजनीति में, कानून व्यवस्था में उचित जगह मिले। महिलाओं में राजनीतिक जागृति उत्पन्न हो उन्हैं शासन व्यवस्था में भागीदारी मिले इस हैतु अनेक आरक्षण एवं कानूनी निर्णय कड़ाई से लागू करने होंगे।

पंचायती राज व्यवस्था के त्रिस्तरीय व्यवस्था ने महिलाओं में राजनीतिक जागृति लाने का काम किया है। बिहार में 50 प्रतिशत महिलाऐं पंचायत मुखिया हैं यह एक सराहनीय कदम है। परन्तु लोक सभा ओर विधान सभाओं में अभी भी बहुत कम प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो पायी है। 33 प्रतिशत आरक्षण का मुद्दा अभी भी लटका पड़ा है।

4. धार्मिक सशक्तिकरण 

धर्म ने महिलाओं की गोण सामाजिक भूमिका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। धार्मिक कर्मकांडों एवं धार्मिक नैतिकताओं ने उन्हैं हाशिये पर पहुँचा दिया। इसलिए इस बात की भी महत्ती आवश्यकता है कि महिला धर्म के बाहरी स्वरूप एवं कर्मकांड के आडम्बर की वास्तविकता को समझे। उसे चुनोती दे एवं धर्म के आंतरिक मर्म को अंगीकार करे।(58) यह सर्वविदित है कि प्रत्येक धर्म में धार्मिक रीतियों एवं क्रियाओं का संचालन प्राय: पुरूष ही करते है। चाहै वह हिन्दु धर्म हो, सिख धर्म हो, मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म या जैन धर्म प्राय: धर्म के ठेकेदार पुरूष ही है। ऐसा क्यों? यह एक विवादित प्रश्न है। खेर कुछ स्त्रियाँ नन ओर भिक्षुवियाँ रहती है परन्तु इनका अधिकार क्षेत्र बहुत विस्तृत न होकर सीमित ही है। धर्म के मुख्य कर्मकाण्डों में पुरूषों को ही अधिकार मिले हैं।

ऐसे में धर्म के प्रति स्त्रियों के क्या कर्त्तव्य हैं क्या होने चाहिए इन सब का निर्णय कोन करें? जरूरत यह है कि यह स्त्रियों के हक में हो इस हैतु धर्म की किताबों के गूढ़ रहस्यों को जानने समझने एवं साकारात्मक निर्णय की जरूरत हैं क्योंकि प्रत्येक धर्म समानता एवं नैतिकता पर ही टिका है।

इस प्रकार महिला सशक्तिकरण एक वृहत् अवधारणा है ओर इसे सम्पूर्णता में एक प्रक्रिया के तहत ही ग्रहण किया जा सकता हैं सरकार की जागरूकता इस दिशा में बढ़ी है ओर मूर्त्त रूप देने की पुरजोर कोशिश भी की जा रही है। सरकार विशेषकर शिक्षा के प्रसार एवं आर्थिक अवसरों के सृजन के साथ महिला सशक्तिकरण की अवधारणा को सफल करने का प्रयास कर रही है। 

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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