पंचायती राज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

पंचायती राज भारत की विलक्षण विशेषता हैं जन-जन को शासन की गतिविधियों में सक्रिय बनायें जाने के दृष्टिकोण पर आधारित पंचायती राज व्यवस्था ऐतिहासिक अवधारणा हैं। शासनिक संगठन एवं स्वरूप चाहें जो रहा हो। पंचायती राज संस्थाये मानव की मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहारिक आवश्यकताओं के रूप में विद्यमान रही हैं।

चाल्र्स मैटकॉक के अनुसार, “जहाँ कुछ भी नहीं टिकता, वहाँ वे टिके रहते हैं। राजवंश एक के बाद एक धरालुढिंत होते रहते हैं, एक क्रान्ति के बाद दूसरी क्रान्ति आती हैं। हिन्दू, पठान, मुगल, मराठा, सिक्ख व अंग्रेज सभी बारी-बारी से अपना स्वामित्व स्थापित करते हैं। किन्तु ग्राम समाज ज्यो के त्यो बने रहते हैं। संकटकाल में वे अपने शस्त्र सज्जित करते हैं। तथा अपनी किलेबन्दी करते हैं। उन ग्रामीण समाजों की, जिनमें से प्रत्येक अपने मे एक छोटा सा राज्य था- यह एकता ही वह चीज थी जिसने भारत की जनता को उन सभी क्रान्ति ओर परिवर्तनों के बीच सुरक्षित रखा, जिनका समय-समय पर उसे शिकार होना पड़ा। उसकी यह एकता बहुत अंशों में उनके सुख तथा उनकी स्वतंत्रता व आत्मनिर्भरता का कारण रही हैं।”

स्थानीय स्वशासन के अभियन्त्र के रूप में पंचायती राज संस्थाओं के अतीत से वर्तमान कालखण्ड तक के विकास का अध्ययन निम्नाकिंत शीर्षकों में किया जा सकता हैं।

प्राचीनकाल में ग्रामीण स्थानीय प्रशासन

पंचायत अथा्रत् ‘पंच-आयत’ शाब्दिक दृष्टि से गाँव वालों द्वारा चयनित पांच व्यक्तियों का समूह हैं। व्यवहारत: यह उस प्रणाली को इंगित करता हैं जिसके द्वारा भारत की असंख्य ग्रामीण जनता को शासित किया जाता था एवं जो स्वशासन की मनोवृत्ति को इंगित करता हैं। प्राचीन भारत के साहित्यिक ग्रन्थों में भी पंचायत शब्द को परिभाषित करने के प्रयास किए गए हैं। इसके अनुसार ‘पंचायतन्’ के नाम से संबोधित किया जाता थ। संस्कृत भाषा के ग्रन्थों के अनुसार किसी आध्यात्मिक पुरुष सहित पांच पुरुषों के समूह अथवा वग्र को ‘पंचायतन्’ के नाम से संबोधित किया जाता था। परन्तु शनै-शनै पंचायत की ज्ञान आध्यात्मिकता युक्त अवधारणा मे परिवर्तन होता गया। पश्चात्वती्र काल में पंचायती राज का अभिप्राय पांच जन प्रतिनिधियों की निवा्रचित सभा हैं जो स्थानीय स्तर के विवादों को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निवा्रह करती हैं।

सम्भवत: मानव समाज के उद्भव के साथ ही पंचायती राज संस्थाओं का उद्भव हुआ है। प्राचीन भारत में ‘पंच परमेश्वर’ की मान्यता एवं वेदो में पांच व्यक्तियों के समर्पित रूप से यज्ञ करने की भावना को उजागर करते हैंं। भारतीय वैदिक ग्रन्थों में सभा एवं समितियों जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं का वण्रन मिलता हैं। वैदिक युग के पश्चात रामायण युग में भी सभा एवं समितियों का वण्रन देखने को मिलता हैं। श्री रामचरित मानस में पंचायती राज व्यवस्था के अनैक उद्धरण किये गये हैं
“जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।
सो नृप अवसि नरक अधिकारी।।”

वैदिक काल में ग्रामीण स्थानीय प्रशासन

प्रारम्भिक आर्यों के काल में भी विकास की प्रमुख इकाई के रूप में ग्राम पंचायतें विद्यमान थी। 5000 ई.पू. से 3500 ई.पू. तक वेदों में राज्य के विभिन्न कर्मचारियों की भूमिका के अन्तग्रत पंचायतों का उल्लेख मिलता हैं। इस काल में ग्रामीण पंचायत का प्रमुख होता था। ऐतरेय ओर शतपथ ब्राह्मण में भी ग्राम मुखिया के रूप में ग्रामीण का उल्लेख मिलता हैं। महा काव्यकाल (1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के मध्य) के दोरान भी ग्राम पंचायतें हुआ करती थी। इस अवधि में प्रशासन की सुविधा राज्य कई इकाइयों में विभाजित था एवं सबसे छोटी ग्राम होती थी।

बौद्ध काल में ग्रामीण स्थानीय प्रशासन

बौद्ध काल (600ई.पू. से 400 ई.पू.) में ग्रंथों की शासन व्यवस्था सुनिश्चित एवं सुगठित थी। सम्पूर्ण जनपद के शासन की इकाई ग्राम थे। ग्राम के शासक को ग्रामयोजक कहते थे। ग्राम योजक का पद बड़ा ही महत्वपूर्ण था। ग्राम संबंधित सभी मामलों को सुलझाने का कार्य ग्राम योजक के ऊपर था। वह ग्राम के अभियोगों के निण्रय करता था। ग्राम पंचायतों को ग्राम सभा कहा जाता था ओर इसका मुखिया ग्रामयोजक होता था। ग्रामयोजक का चुनाव सभा द्वारा होता था। उस दोरान गाँव सभी दृष्टियों से छोटे रूप में पूण्र प्रजातंत्र था।

मौर्यकाल में ग्रामीण स्थानीय प्रशासन

इस युग में ग्रामशासन की सबसे छोटी इकाई थी व ग्राम की जनता द्वारा चयनित व्यक्ति ग्रामिक ग्राम का मुखिया था। चन्द्रगुप्त के साम्राज्य में गाँव का शासन ग्राम सभा के द्वारा होता था। हालांकि ग्रामिक की नियुक्ति सरकार द्वारा होती थी किन्तु उसकी सहायता के लिए ग्राम सभा होती थी, जिसके सदस्य वयोवृद्ध गाँववालों के द्वारा चुने जाते थे। ग्रामसभा को काफी अधिकार मिले हुए थे।

गुप्तकाल में ग्रामीण स्थानीय प्रशासन

गुप्तकालीन साम्राज्य में भी ग्राम पंचायतों का उल्लेख मिलता हैं। गुप्तकाल में शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होती थी जिसका मुख्य अधिकारी ग्रामिक महत्तर अथवा योजक होता था। पुष्यभूति वंश ओर काव्य कुदज साम्राज्य के बारे में हष्रचरितम में ग्रामीण शासन व्यवस्था की उत्कृष्टता का उल्लेख मिलता हैं। ऐसा माना जाता हैं कि उस दोरान स्थानीय शासन में नगर शासन का अस्तित्व नहीं था अपितु अपने सम्पूर्ण प्रभाव से ग्राम पंचायतें ही शासन की बागडोर संभालती थी।

तत्कालीन उत्कीर्ण लेखों में अनुसार ग्राम सभा का प्रमुख महत्तर या ग्रामिक होता था जो एक सरकारी अधिकारी होता था। उसके अधीनस्थ कई कर्मचारियों की व्यवस्था होती थी जिसे चित्र द्वारा दशा्रया जा रहा हैं
:-
ग्रामीण
अष्टकुलाधिकरण (आठ कुलों का निरीक्षक)
शेल्मिक (चुंगी सग्राहक)
गोल्मिक (उपवन का निरीक्षक)
अग्रहारिक (गावो की देखभाल करने वाला)
धु्रवाधिकरण (भूमिकर का अध्यक्ष)
भाण्डागारधिकृत विक्रम(भण्डार अध्यक्ष)
तलवाटक (गांवों का लेखा रखने वाला)
अक्षपटलिक(कागज पत्रों का संरक्षक)
लेखक

दक्षिण में चोल साम्राज्य में ग्रामीण स्थानीय प्रशासन 

चोल शासकों के सामाज्य में भी स्थानीय स्वशासन में ग्राम महत्वपूर्ण थे। ऐसा माना जाता हैं कि दक्षिण भारत में स्व शासन या पंचायत प्रथा को संगठित करने एवं उसके स्वरूप को मुखरित करने में सवा्रधिक भूमिका चोल शासकों की ही रही ओर राजराजे चोल (प्रथम) को श ुरूआत करने का श्रेय दिया जाता हैं। चोल शासकों के साम्राज्य में ग्रामीण शासन सवा्रधिक संगठित ओर विकसित होता था। पंचायतों को महासभा कहते थे। महासभा का मुखिया ग्रामिक होता था। महासभा के संदस्य ग्रामवासियों द्वारा नियमानुसार निवा्रचित होते थे। निवा्रचन ओर सदस्यता की योग्यता के विशेष नियम बने हुए थे। यह निवा्रचन एक वष्र के लिए होता था। निवा्रचन का संयोजन पुरोहित होता था, उसकी उपस्थिति में सभी नामों के टिकट एक पात्र में मिलाकर एक बालक से उन्हें निकलवाया जाता था। वास्तविक रूपों में ग्रामीण महासभा पूण्रत विकसित एवं संगठित शासन प्रणाली थी, जो पूण्र आन्तरिक स्वतंत्रता का अधिकार रखती थी। प्रत्येक ग्रामीण महासभा शासन की सुविधा के लिए कई समितियों में विभक्त थी:-
  1. पंचावर वारीयम् (सामान्य प्रबन्ध समिति)
  2. उपवन समिति
  3. सिचांई प्रबन्ध समिति
  4. कृषि समिति
  5. लेखा-जोखा समिति
  6. भूमि प्रबन्ध समिति
  7. माग्र समिति
  8. देवालय समिति।

मध्यकाल एवं मुगल काल में ग्रामीण स्थानीय प्रशासन

मध्यकाल (1200-1526) के सल्तनत काल के दोरान राज्य की सबसे छोटी शासकीय इकाई गांव थी। गांवों की प्रबन्ध व्यवस्था लम्बरदारों, पटवारियों एवं चोकीदारों पर थी। तथा मध्यकाल में ग्राम इकाई पूण्रत: स्वतन्त्र थीं

मुगलकाल (1526-1707) में भी गांव ही प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी। आइने अकबरी के अनुसार परगनों को गांवों में विभाजित कर रखा था। पंचायतों द्वारा गांवों का प्रबन्ध होता था ग्राम में चार महत्वपूर्ण अधिकारी थे मुकद्धम, पटवारी, चौधरी, चोकीदार।

ब्रिटिश काल में पंचायती राज

ब्रिटिश शासन काल में भारत की प्राचीन सुदृढ़ प्रणाली को तहस नहस करने में सर्वप्रथम पंचायत व्यवस्था को चुना गया, परन्तु यह सुदृढ़ शासन प्रणाली टूटी नहीं ओर उसका स्वरूप बिरादरी ने ले लिया, लेकिन इसके बाद विकास के मूल में अंग्रेजों ने पंचायत के महत्व को समझा ओर सन् 1920 ई. में सभी प्रान्तों में ग्राम पंचायत अधिनियम पारित कर इसे अत्यल्प अधिकारी के साथ क्रियान्वित किया गया। अंग्रेजी शासन प्रणाली में पंचों का जनता द्वारा चुनाव न होकर वे सरकार द्वारा मनोनीत किये जाते थे। उन्हें न्यायिक अधिकार भी सोपें गये थे। चूंकि पंचायती राज की स्थापना के मूल में अंग्रेजों का लक्ष्य कुछ भी रहा हो पर वे शासन का सुदृढ़ संगठन अवश्य मानते थे। इसी तथ्य की वास्तविकता के सन् 1907 में ब्रिटिश सरकार द्वारा विकेन्द्रीकरण के लिए गठित रॉयल समिति की सन् 1909 में निम्न सुझावों को दिया गया :-
  1. पंचायतों को छोटे स्तर के सिविल तथा फोजदारी मुद्दों को स्वयं हल करना चाहिए।
  2. चयनित पंचायतों को ईंधन एवं लकड़ी के संसाधनों पर अपना नियन्त्रण रखना चाहिए।
  3. ग्राम पंचायत को सफाई व्यवस्था, निमा्रण व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था का भार सोप देना चाहिए।
ब्रिटिश सरकार के गवर्नर जनरल लार्ड रिपन ने ग्राम पंचायतों की स्थापना एवं ग्रामीण विकास में उल्लेख योगदान दिया। आधुनिक भारत में लार्ड रिपन को स्थानीय स्व शासन का जनक कहा जाता हैं, उन्होंने सन् 1882 ई. में ग्राम पंचायत, न्याय पंचायतों का पुनर्गठन करने एवं पुन: निमा्रण के लिए एक ब्ल्यू प्रिन्ट निकाला, लेकिन इस पर उचित कार्यवाही नहीं हो सकी।

ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत के ग्रामीण विकास को अनेक बार हतोत्साहित किया गया। उनकी मानसिकता केन्द्रीय प्रशासन में किसी भी स्वरूप, निकाय या संस्था के द्वारा भारतीय हस्तक्षेप की नहीं थी। अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 25 वें इलाहाबाद अधिवेशन 1910 के दोरान भारतीय राष्ट्रीय कांगेस के नेताओं ने ब्रिटिश सरकार से ग्राम पंचायतों की स्थापना की मांग रखी। अन्तत: ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय नेताओं के दबाव में आकर ग्राम पंचायत के निम्न अधिनियमों को समय-समय पर विभिन्न प्रान्तों में पारित किया गया :-
  1. बंगाल स्थानीय सरकार अधिनियम 1919
  2. मद्रास स्थानीय सरकार अधिनियम 1920
  3. बम्बई ग्राम पंचायत अधिनियम IV 1920
  4. उत्तर प्रदेश पंचायत अधिनियम 1920
  5. बिहार स्व-सरकार अधिनियम V 1920
  6. सी.पी. पंचायत एवं अधिनियम V 1920
  7. पंजाब पंचायत अधिनियम III 1922
  8. आसाम स्व सरकार अधिनियम 1925
  9. मैसूर ग्राम पंचायत अधिनियम II 1928
स्पष्ट हैं कि ब्रिटिश शासन काल में स्थानीय शासन संस्थाओं को संगठन एवं कार्यप्रणाली की दृष्टि से व्यवस्थित रूप दिया गया। स्थानीय शासन की इकाईयों को निवा्रचित स्वरूप देना, उसे करारोपण की विस्तृत शक्तियाँ देना व प्रजातंत्र की पाठशाला के रूप में विकसित करने का कार्य ब्रिटिश काल में ही हुआ था।

स्पष्टत: पंचायती राज संस्थाओं के उक्त विकास क्रम से यह स्पष्ट हो जाता हैं कि पंचायती राज के मूल में निहित स्थानीय शासन संस्थाओं के माध्यम से विकास एवं लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की मनोभावना सुदूर अतीत से विद्यमान रही हैं। पंचायती राज संस्थाओं की अतीत से ब्रिटिश काल तक की इस विकास यात्रा से स्पष्ट हैं कि मानव की मनोवैज्ञानिक एवं व्यावहारिक आवश्यकताओं के कारण पंचायत संस्थाओं को अपरिहार्य माना गया हैं।

सन्दर्भ-
  1. जोशी आर.पी. एवं मंगलानी रूपा, भारत में पंचायती राज, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर 2010, पृष्ठ संख्या -7
  2. गांधी एम.के., ग्राम स्वराज, नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद, 1962, पृष्ठ संख्या -67
  3. पाण्डेय राजबली, प्राचीन भारत का इतिहास, विश्वविद्यालय प्रकाशन, जयपुर, 2009, पृष्ठ संख्या-56
  4. जैन सुगनचन्द, भारत में पंचायती राज एवं सामुदायिक विकास, एलाइड पब्लिकेशंन्स, नई दिल्ली, 1967 पृष्ठ संख्या 77-78
  5. राठोड़ अमरसिंह, पंचायती राज एक परिदृश्य, राजस्थान सुजस, जयपुर, 2001, पृष्ठ संख्या -4
  6. पाण्डेय राजबली, प्राचीन भारत का इतिहास, विश्वविद्यालय प्रकाशन, जयपुर, 2009, पृष्ठ संख्या-153
  7. .शमा्र के.के., भारत में पंचायती राज, विश्व भारती पब्लिकेशंन्स, नई दिल्ली, 2012, पृष्ठ संख्या-3
  8. .शमा्र हरिशचन्द्र, भारत में स्थानीय प्रशासन, विश्व भारती पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली, 2013, पृष्ठ संख्या 15-16
  9. गग्र लक्ष्मी चन्द्र एवं जिन्दल साधना, ग्रामीण विकास- एक मूल्यांकन, निताशा पब्लिकेशन्स सोनीपत, 1989, पृष्ठ संख्या-23
  10. कुरूक्षेत्र, ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, अक्टूबर 1991, पृष्ठ संख्या-23

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