त्रिपुरा का इतिहास

त्रिपुरा का इतिहास लम्बा और पुराना है। इसकी अपनी अनोखी जनजातीय संस्कृति तथा दिलचस्प लोकगाथाएँ है। इसके इतिहास को त्रिपुरा नरेश के बारे में ‘राजमाला’ गाथाओं तथा मुसलमान इतिहासकारों के वर्णनों से समझा जा सकता है। पौराणिक ग्रन्थों और महाभारत में भी त्रिपुरा का उल्लेख मिलता है। राजमाला के अनुसार त्रिपुरा शासकों को ‘फा’ के उपनाम से पुकारा जाता था जिसका अर्थ ‘पिता’ होता है। 14वीं शताब्दी के बंगाल के शासकों द्वारा त्रिपुरा नरेश की मदद किए जाने का भी उल्लेख मिलता है। त्रिपुरा के शासकों को मुगलों के आक्रमण का बार-बार सामना करना पड़ा जिसमें अनेक बार आक्रमणकारियों को कमोबेश सफलता मिली। तो अनेक बार त्रिपुरा के शासकों ने बंगाल के सुल्तानों को हराया।

त्रिपुरा

19वीं शताब्दी में महाराजा वीरचन्द्र किशोर माणिक्य बहादुर के शासनकाल में त्रिपुरा में नए युग का सूत्रपात हुआ। उन्होंने अपने प्रशासनिक ढॉचे को ब्रिटिश भारत के नमूने पर बनाया और कई सुधार लागू किए। उनके उत्तराधिकारियों ने 15 अक्टूबर 1949 तक त्रिपुरा पर शासन किया।

अक्टूबर 1949 को भारत में विलय होने वाला त्रिपुरा एक रियासती राज्य था। शुरू में यह भाग-सी के अन्तर्गत आने वाला राज्य था। यह 1 नवम्बर 1956 को राज्यों के पुर्नगठन के बाद केन्द्रशासित प्रदेश बना। 21 जनवरी 1972 को इस केन्द्रशासित प्रदेश ने पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त किया।

भौगोलिक रूप से त्रिपुरा बांग्लादेश तथा म्यांमार की नदी घाटियों के बीच स्थित है। यह 910 30’ और 920 30’ पूर्वी देशान्तर तथा 230 45’ और 250 उत्तरी अक्षांश के मध्य स्थित है। यह तीन तरफ से बांग्लादेश से घिरा है तथा उत्तर-पूर्व में यह असम और पूर्व में मिजोरम से जुड़ा हुआ है।

राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का 76.99 प्रतिशत वनों से आच्छादित है। पर्यावरण और वन मंत्रालय की वन राज्य रिपोर्ट 2009 के अनुसार राज्यों में कुल 8,073 वर्ग किमी0 क्षेत्र वनों से आच्छादित है। इसमें से 111 वर्ग किमी अधिक घने वन हैं जबकि 4,770 वर्ग किमी मध्यम घने वन हैं। शेष 3,192 वर्ग किमी0 क्षेत्र खुले वनों से आच्छादित है।

राज्य में कुल 24.3 प्रतिशत भूमि कृषि के लिए उपलब्ध है। राज्य की मुख्य कृषि फसलों में धान, गेहूॅं, पटसन, आलू, गन्ना और तिलहन है। राज्य में फलों और सब्जियों के सरकारी बाग तथा पौधशालाएं हैं, जिनमें अच्छे किस्म के पौधे उपलब्ध हैं। कुछ वर्ष पहले इस राज्य के पूर्वोत्तर क्षेत्र विपणन निगम द्वारा नलकेहा में फलों के रस कॉन्संट्रेट (सान्द्र) तैयार करने का संयत्र लगाया गया। त्रिपुरा राज्य में चाय एक प्रमुख उद्योग है। अगरतला में सरकारी क्षेत्र का एक जूट कारखाना भी है। राज्य में हथकरघा उद्योग एक मात्र प्रधान उद्योग है। बुनकरी मुख्यत: यहॉं का जनजातीय घरेलू उद्योग है। त्रिपुरा का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्योग ‘हस्तशिल्प’ है। अत्यधिक कुशल दस्तकार बॉंस और बेंत की शानदार वस्तुएॅं बनाते हैं।

राज्य का कुल सिंचाई क्षेत्र 64,665 हेक्टेयर है। अनुमान है कि जमीन का लगभग 1.7 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र सिंचाई के अन्तर्गत लिया जाएगा, जिसमें से 13,000 हेक्टेयर मंझोली सिंचाई योजनाओं से, 66,000 हेक्टेयर छोटी योजनाओं से और 38,000 हेक्टेयर भूमिजल से सींचा जायेगा। नीपको के तहत मेलाघर में 500 मेगावाट की बिजली परियोजना शुरू की जा रही है। रामचन्द्र नगर ताप बिजली परियोजना के पहले चरण में 21 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। त्रिपुरा के बारामुरा और अचतुरा में प्राकृतिक गैस के भण्डार मिले हैं। त्रिपुरा में 534 मिलियन घन मी0 प्राकृतिक गैस का उत्पादन 2007-08 में हुआ है। इससे राज्य में औद्योगीकरण की एक नयी सम्भावना नजर आ रही है। राज्य में रूखिया और बारामुरा में 42 मेगावाट की गैस आधारित बिजली परियोजना शुरू की गयी है।

त्रिपुरा का सकल राज्य घरेलू उत्पाद प्रति व्यक्ति 5083 रूपया है जो अन्य पूर्वोत्तर राज्यों से कम है।

नागा लोग मूलत: आदिवासी हैं। पूर्वोत्तर भारत के अन्य प्रदेशों की तरह नागा लोगों की उत्पत्ति और विकास के बारे में कई कहानियॉं और दंत कथाएं प्रचलित हैं। यह पूर्वोत्तर के सर्वाधिक हिंसाग्रस्त राज्यों में से एक है और यह भी एक तथ्य है कि पूर्वोत्तर में भारत के विरूद्ध विद्रोह की शुरूआत नगालैण्ड से ही हुई थी। प्रारम्भ से ही इनकी शासन व्यवस्था के सन्दर्भ में कुछ निश्चित तथ्य ज्ञात नहीं है। परन्तु 12वीं और 13वीं शताब्दी में इनका अहोम लोगों से सम्पर्क स्थापित हुआ। उसके पश्चात् इनकी स्थिति में परिवर्तन आया परन्तु इनके रहन-सहन के परम्परागत तौर तरीकों में कोई मुख्य परिवर्तन नहीं हुआ। 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों के पूर्वोत्तर में आगमन के पश्चात् यह क्षेत्र भी ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत आया।

स्वतंत्रता के पश्चात् 1952 में असम में पांच स्वायत्त जिला परिषदों का गठन किया गया परन्तु नागा बहुल, नागा हिल्स शामिल नहीं था क्योंकि ‘नागा नेशनल काउंसिल’ द्वारा उस समय एक अलगाववादी आन्दोलन का संचालन किया जा रहा था।46 बाद में 1957 में इसे केन्द्रशासित प्रदेश बनाकर असम के राज्यपाल के प्रशासनिक नियंत्रण में रख दिया गया और इसका नया नामकरण ‘नागा हिल्स’ जिला किया गया। किन्तु इससे भी स्थानीय लोगों की आकांक्षाएं पूरी नहीं हुई और न ही उनके असंतोष में कमी आयी। 1961 में इसका नाम बदलकर नगालैण्ड कर दिया गया और 1 दिसम्बर 1963 को नागाओं के लिए नगालैण्ड के नाम से एक अलग राज्य का निर्माण किया गया।

नगालैण्ड देश के उत्तर-पूर्व में स्थित है। इसके पश्चिम और उत्तर में असम, पूर्व में म्यांमार तथा दक्षिण में मणिपुर है। अरूणाचल प्रदेश इसके पूर्वोत्तर में स्थित है। इसकी भौगोलिक स्थिति 250 उत्तर से 270 उत्तर के अक्षांशों तथा 930 , 20’ पूर्व से 950 20’ पूर्व के देशान्तर के मध्य है। तराई के कुछ भागों को छोड़कर सारा राज्य पहाड़ी है। सबसे ऊँची चोटी सारामती की ऊँचाई 3780मीटर है। राजधानी कोहिमा समुद्र तल से 1440 मीटर ऊँचाई पर स्थित है। इस राज्य में बहने वाली मुख्य नदियॉं धनश्री, दोयांग, दिखु और झांजी हैं।

नगालैण्ड की लगभग सारी जनसंख्या अनुसूचित जनजाति की है और ये कबीले ‘झूम’ कृषि करते हैं। राज्य की 90 प्रतिशत जनसंख्या का मुख्य व्यवसाय कृषि है। चावल यहॉं की प्रमुख खाद्यान्न फसल है। यहॉं वर्ष 1999-2000 में 2,20,700 मीट्रिक टन चावल, 12,500 टन गेहूॅं, 48,000 टन मक्का और 13,000 टन दालों का उत्पादन हुआ।

राज्य में औद्योगीकरण की प्रक्रिया अपने शैशव काल में है तथा और अधिक उद्योग लगाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। दीमापुर में स्थित नगालैण्ड चीनी मिल की पेराई क्षमता 1000 टन प्रतिदिन है। राज्य में एक खांडसारी मिल भी है जिसकी वार्षिक क्षमता 200मीट्रिक टन है। टिजिट में एक प्लाईवुड फैक्टरी तथा तुली में लुगदी और कागज मिल है। दीमापुर के पास औद्योगिक विकास केन्द्र स्थापित किया जा रहा है। उद्यमियों को मार्गदर्शन और पूंजीगत सहायता देने के लिए नगालैण्ड औद्योगिक विकास निगम कार्यरत है। वजेहो में लघु सीमेन्ट संयंत्र ने उत्पादन शुरू कर दिया है। दीमापुर स्थित फल और वनस्पति प्रसंस्करण तथा शीतलीभवन संयंत्र की क्षमता 5 मीट्रिक टन प्रतिदिन है। यहॉं हथकरघा और हस्तशिल्प महत्वपूर्ण कुटीर उद्योग है। राज्य में कोयला, चूना पत्थर, सीसा आदि खनिज पाये जाते हैं।

नगालैण्ड के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 81.21 प्रतिशत क्षेत्र वनों से आच्छादित है। पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा प्रकाशित वन राज्य रिपोर्ट 2009 के अनुसार नगालैण्ड को कुल 13,464 वर्ग किमी0 वन क्षेत्र है इसमें से 1274 वर्ग किमी0 घने जंगल, 4,897 मध्यम घने जंगल तथा 7,293 वर्ग किमी0 खुले जंगल हैं।

लघु सिंचाई परियोजनाओं में छोटी पहाड़ी नदियों का उपयोग घाटियों में धान की खेती के लिए किया जाता है। लघु सिंचाई परियोजनाओं के तहत 1999-2000 में भूतलीय जल से 4,900 हेक्टेयर तथा भूमिगत जल से 21 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की व्यवस्था कर ली गई थी। राज्य में 1,196 गांवों में बिजली पहुॅंचाई जा चुकी है। लिकिमरो में 24 मेगावाट क्षमता का ताप बिजली संयंत्र लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। 

सन्दर्भ -
  1. Wolpert, Stanley A. ‘A new History of India” Oxford university Press, New Delhi, p. 390.
  2. Oxford Atlas, Oxford university Press, New Delhi 2009,
  3. “Forest and Tree resources in states and union territories”, (PDF). India State of forest report 2011. Forest survey of India, Ministry of Environment and Forests, Government of India, PP-255-9. Retrieved, April 2012.
  4. “Economic review of Tripura 2010-11 (PDF), Directorate of Economics and Statistics, Planning (statistics) Department, Govt. of Tripura, PP. 77-82. Retrieved 20 April 2012.
  5. Bhaumik, Subir, “Nagas, India and the North-East”, Sage 
  6. पर्यावरण और वन मंत्रालय रिपोर्ट, भारत सरकार-2009.
  7. भारत 2003, पूर्वोक्त, पृ0सं0-855.
  8. भारत 2007, पूर्वोक्त, पृ0सं0-1050-51.

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