गोपालदास नीरज का जीवन परिचय

गोपालदास नीरज का जन्म 4 जनवरी, 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरावली नामक ग्राम में एक साधारण कायस्थ परिवार में बाबू ब्रज किशोर शर्मा के यहाँ एक बालक का जन्म हुआ। ‘गोपालदास नीरज’ का प्रारम्भिक जीवन दुखों के संघर्षमय तूफान से गुजरा है। अपने अबोध बचपन में ही जीवन की कठोर परिस्थितियों की मार उन्हें झेलनी पड़ गई थी। ‘गोपालदास नीरज’ मात्र छह वर्ष के थे, तब अचानक उनके पिता श्री ब्रज किशोर शर्मा का देहावसान हो गया और पिता के स्नेह से वंचित उस बालक को जीवन की धूप ने बिना किसी रोक-टोक के सताना आरम्भ किया तथा गोपालदास नीरज के सुख का अध्याय बचपन में ही समाप्त हो गया और संघर्षों का इतिहास प्रारम्भ हुआ। मृत्यु से पूर्व बाबू ब्रजकिशोर शर्मा ने गरीबी के चलते अपनी जमीन-जायदाद बेचकर पहले तो खानपुर स्टेट में नौकर कर ली थी। 

परन्तु वहाँ भी वे अधिक समय तक न रह सके और कानपुर जिले में एक मवेशी खाने में नौकरी करने लगे। इस प्रकार पिता के देहावसान के पश्चात पैतृक सम्पत्ति के नाम पर बालक गोपालदास नीरज के असहाय परिवार के भरण-पोषण के लिए कुछ भी नहÈ बचा था और छ: वर्षीय गोपालदास नीरज के अतिरिक्त उनकी दु:खी माँ तथा तीन अन्य भाई भी परिवार में थे। परिणामस्वरूप बालक गोपालदास नीरज को माँ की विवशता एवं परिस्थिति के आग्रहवश अपने घर इटावा से अपनी बुआ-फूफा के पास एटा आना पड़ा क्योंकि वे पढ़ लिखकर शीघ्रातिशीघ्र अपने पैरों पर खड़े होना चाहते थे। अपने फूफा बाबू हरदयाल प्रसाद वकील के यहाँ गोपालदास नीरज अपनी माँ के स्नेहांचल से दूर रहकर लगभग 11 वर्ष तक अथक जीवन-संघर्ष किया। उन्होंने स्वयं एक जगह स्वीकार किया है कि- ‘‘छह वर्ष की अल्पायु में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण और पढ़ाई के सिलसिले में माँ तथा भाइयों से बिछुड़ जाने के कारण एक अनाथ असहाय बालक के समान जैसा भयावह अकेलापन और दुःख मैंने भोगा और जिन्दा रहने के लिए समय, समाज और नियति से जिस तरह मैंने संघर्ष किया, वह मेरे जीवन का एक दुखद अध्याय है।’’

गोपालदास नीरज की शिक्षा एवं आजीविका

गोपालदास नीरज के फूफा श्री हरदयाल प्रसाद एटा में वकालत करते थे और अपने भतीजे की एटा में ही प्राइमरी (प्राथमिक कक्षओं) से शिक्षा आरम्भ की। अब तो उनके जीवन का सबसे बड़ा आकर्षण था पाठशाला और तपते सूरज तथा जलती धरती के मध्य पाठशाला का वह मार्ग जीवन का सर्वाधिक दीर्घ मार्ग था। जीवन-यापन के साधन सुलभ करने की चिंता में उनके अध्ययन का क्रम भी प्रारम्भ में अवरूद्ध सा हो गया था। खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने के दिनों में बालक को चिलचिलाती धूप में मेहनत-मजदूरी करनी पड़ी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहÈ हारी ओर अपनी प्रारम्भिक शिक्षा भी जारी रखी।

गोपालदास नीरज ने सन् 1953 में कानपुर के डी0ए0वी0 कालेज से हिन्दी साहित्य विषय में एम0ए0 की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। एम0ए0 करने के उपरान्त गोपालदास नीरज को दो वर्ष तक बेकार रहना पड़ा लेकिन यह बेकारी भी उनके लिए एक प्रकार से वरदान सिद्ध हुई; क्योंकि इन दो वर्षों में उन्होंने सारे देश का भ्रमण किया और कवि-सम्मेलनों के माध्यम से बहुत लोकप्रियता प्राप्त की। यद्यपि निरन्तर यात्राओं में लगे रहने के कारण गोपालदास नीरज ने अपने स्वास्थ्य को बहुत अधिक क्षति पहुँचाई परन्तु इन दो वषों में उन्होंने न केवल अखिल भारतीय ख्याति प्राप्त की अपितु अनेक ऐसी कविताएँ लिखÈ जो उनके काव्य व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी सिद्ध हुई। 

सन् 1955 में गोपालदास नीरज एक वर्ष तक मेरठ कॉलेज में प्राध्यापक भी रहे परन्तु मेरठ कालेज के अधिकारियों ने उन्हें वहाँ अधिक दिनों तक टिकने न दिया और सत्र के मध्य में ही गोपालदास नीरज ने नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। कालेज के अधिकारियों ने गोपालदास नीरज पर कुछ ऐसे आरोप लगाए, जो बाद में असत्य प्रमाणित हुए। परिणामस्वरूप उन्हें वहाँ पर फिर नियुक्त किया गया, किन्तु अपने स्वाभिमान और गौरव की रक्षा के लिए फिर वहाँ आना उचित न समझा।

इस प्रकार सन् 1956 में गोपालदास नीरज अलीगढ़ के धर्म समाज कालेज में हिन्दी प्राध्यापक नियुक्त हुए और इस नौकरी में ही उन्हें स्थायित्व भी प्राप्त हुआ। 55 साल पहले जो अलीगढ़ से रिश्ता बना वह आज भी बरकरार है। वे अलीगढ़ की पहचान बन गये हैं वहाँ के इस कॉलेज में उन्होंने जिन्दगी के बेहतरीन दिन बिताए।

इसी बीच 8 फरवरी 1960 को गोपालदास नीरज का फिल्मी क्षेत्र में पदार्पण हुआ तथा उनकी कविता को लेकर फिल्म बनाई गई। मुम्बई मायानगरी में गोपालदास नीरज ने एक से बढ़कर एक हिट फिल्मी गीत दिये- ‘कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे- फिल्म नई उमर की नई फसल-’देखती ही रहो आज दर्पन न तुम प्यार का ये महुरत निकल जायेगा। ‘ए भाई जरा देख के चलो- मेरा नाम जोकर, आज मदहोश हुआ जाय रे- शर्मीली आदि अनेक फिल्मों में सुपरहिट गीत लिखें।

इसके अतिरिक्त 1967 में वे चुनाव भी लड़े पर असफल रहे। इसी बीच गोपालदास नीरज जी सन् 1973 में फिल्मों की रंगीन दुनिया से वापस आ गए, तब से गोपालदास नीरज अलीगढ़ के और अलीगढ़ उनका हो गया।

संदर्भ -
  1. कारवाँ गुज़र गया- नीरज, हिन्द पॉकेट बुक्स प्रकाशन, सं0 2011, पृ0 117
  2. हिन्दी गीत और गीतकार- डॉ0 उपेन्द्र, सं0 2000, स्वराज प्रकाशन, पृ0 58
  3. कारवाँ गुज़र गया- नीरज, हिन्द पॉकेट बुक्स प्रकाशन, सं0 2011, पृ0 13
  4. वही पृष्ठ, कारवाँ गुज़र गया
  5. नीरज रचनावली-I, आत्माराम एंड संस प्रकाशन, नई दिल्ली, सं0 2010, पृ0 38
  6. एक मस्त फ़कीर नीरज, सं0- प्रेमकुमार, आत्माराम एंड संस प्रकाशन, सं0 2014, पृ0 98
  7. नीरज रचनावली-I, पृ0 167
  8. नीरज रचनावली-I, पृ0 5-6
  9. नीरज की पाती-नीरज, हिन्द पॉकेट बुक्स, संस्करण 2012, पृ0सं0 27
  10. कारवाँ गुज़र गया- नीरज संस्करण-2011, हिन्द पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, पृ0सं0 117
  11. कारवाँ गुज़र गया- नीरज संस्करण-2011, हिन्द पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली, पृ0सं0 21
  12. नीरज रचनावली-2, आत्माराम एंड संस प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2010, पृ0सं0 249

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