कालिदास का जीवन परिचय एवं रचनाएँ

एक किंवदन्ती के अनुसार कालिदास प्रारम्भ में अत्यन्त ही मूर्ख, व्यक्ति थे, बाद में उन्हें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई। कालिदास के ही समय में राजा शारदानंद की पुत्री कुमारी विद्योत्तमा थी जो अत्यन्त विद्वान और रूपवती थी, उसने यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘‘जो मुझे शास्त्रार्थ में पराजित कर देगा तथा संसार में जो मेरे समान विद्वान होगा, वह ही मेरा पति होगा।’’ परन्तु विद्योत्तमा के ज्ञान के समक्ष बड़े से बड़े विद्वान परास्त हो गये। अत: विद्वानों ने छल तथा कूटनीति का सहारा लेते हुए विद्योत्तमा का विवाह ‘कालिदास’ नाम के अतिमूर्ख व्यक्ति के साथ कर दिया। 

महाविदुशी विद्योत्तमा का विवाह राजसी वैभव के साथ कालिदास से हुआ और राजा तथा रानी ने राजवंश की परम्परा के अनुसार दोनों वर और वधू को कुछ दिन के लिए अपने पास रोक लिया। महाकवि कालिदास ने अपने विवाह की स्मृति ‘कुमारसम्भव’ के आठवें संग में किया है जहाँ शिव-पार्वती के विवाह के पश्चात हिमालय ने दोनों को अपने नगर में रोक लिया था। उसी प्रकार राजा शारदानंद ने भी कालिदास और विद्योत्तमा को कुछ दिन के लिए गुप्तकाशी में ही रोक लिया था। महाविदुशी विद्योत्तमा सौन्दर्ययुक्त, युवा, स्वस्थ और सौम्य विद्वान पति समझकर प्रसन्न हो गयी। किन्तु अतिशीघ्र विद्योत्तमा कालिदास की मूर्खता को समझ गई और पंडितों के द्वारा शड्यंत्र से हुए विवाह से वह अत्यन्त दु:खी हुई। क्रोधाभिभूत होकर उसने कालिदास को छत के ऊपर से नीचे गिरा दिया। कहते हैं कि कालिदास काली देवी के ऊपर जा गिरे, जिससे उनकी जीभ कटकर काली देवी के ऊपर गिर पड़ी। भगवती प्रसन्न हो गयी और मूर्ख कालिदास के मुख से विद्या के शब्द निकलने लगे। परन्तु विद्वान लोग इस  किंवदन्ती से पूर्णतत: सहमत नहीं है क्योंकि एक विदुषी राजपुत्री बिना छान-वीन किये किसी साधारण पुरुष से विवाह कर ले ऐसा होना कठिन है। 

इसके अतिरिक्त कालिदास के विषय में एक अन्य किंवदन्ती प्रसिद्ध है। इसके अनुसार कालिदास को लंका के राजा कुमारदास का मित्र माना गया है। कहते हैं कि कुमारदास ने एक वेश्या को एक समस्या दी, उसकी पूर्ति करने पर उसे प्रचुर सुवर्ण देने को कहा। यह समस्या इस प्रकार थी ‘‘कमल कमलोपत्ति श्रूयते न च दृश्यते।’’ अर्थात् कमल में कमल की उत्पत्ति सुनी तो जाती है परन्तु देखी नहीं जाती। महाकवि कालिदास ने उस वेश्या के घर पहुँचकर उक्त समस्या की पूर्ति इस प्रकार कर दी- ‘‘बाले तब मुखाम्भोजे कथमिन्दीवरद्वयम्’’ अर्थात् हे देवी तुम्हारे मुख कमल पर ये दो (नयन) कमल जैसे हैं। इस प्रकार कालिदास द्वारा समस्यापूर्ति किये जाने पर उस वेश्या ने ‘स्वर्ण’ के लोभ में आकर कालिदास की हत्या कर दी। बाद में सही वृतान्त जानकर कुमारदास अत्यन्त दु:खी हुये और कालिदास की चिता में जलकर मर गये।

कालिदास का जन्म काल

कालिदास के समय के विषय में प्रमाणित सामग्री के उपलब्ध न हो सकने के कारण अभी तक कोई निर्णायक निष्कर्ष नहीं निकल पाया है। न तो कालिदास ने स्वयं ही और न ही उनके समकालीन अन्य किसी लेखक ने उनके विषय में कुछ विशेष बात बताई है। इसलिये उनके स्थिति-काल के विषय में विद्वानों ने जो भी अवधारणा बनाई है, वह पूर्णतया अनुमान पर आधारित है।

कालिदास के ‘काल निर्धारण’ के सन्दर्भ में जो मत प्रस्तुत किए गए हैं उनके आधार पर दो सीमाएँ सरलता से निश्चित की जा सकती है। कवि ने अपने ‘मालविकाग्निमित्रम्’ नाटक का नायक शुंगवंशीय सम्राट अग्निमित्र को बनाया है। यह अग्निमित्र मौर्यवंश का उच्छेद करके मगध साम्राज्य को हस्तगत कर लेने वाले पुश्पमित्र शुंग का पुत्र था। इसका समय विद्वानों ने ईसा से लगभग 150 वर्ष पूर्व निर्धारित किया है। अत: कालिदास 150 ई0 पू0 से पहले नहीं हो सकते। यह कवि के काल निर्धारण की पूर्व सीमा मानी जा सकती है। तथा कालिदास के नाम का स्पष्ट उल्लेख सर्वप्रथम कन्नौज नरेश हर्शवर्धन (606 ई0 - 647 ई0) के आश्रित संस्कृत के प्रसिद्ध महाकवि बाणभट्ट कृत ‘हर्शचरित’ की प्रस्तावना में और दक्षिण भारत के ‘ऐहोल’ नामक शिलालेख (634 ई0) में उत्कीर्ण प्रशस्ति में आया है। ये दोनों उल्लेख ईसा की सातवीं शताब्दी के हैं, अतएव कालिदास का स्थितिकाल इसके बाद नहीं हो सकता है- यह हुई कवि के काल-निर्धारण की अपर सीमा। कालिदास के समय के विषय में प्रधानता तीन मत हैं। पहला मत - कालिदास को शश्ठ शतक का बतलाता है। दूसरा मत - गुप्त काल में कालिदास की स्थिति को मानता है। तीसरा मत - विक्रम संवत् के आरम्भ में इनका समय बतलाता है।

सर विलियम जोन्स, डॉ0 पिटर्सन, आचार्य एस0 राय, आई0 आई0 बालसुब्रमहण्यम्, पं0 क्षेत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय, राजबली पाण्डेय एवं जी0 सी0 (6) झाला आदि विद्वानों के मतानुसार कालिदास ईसा की प्रथम शताब्दी पूर्व हुए थे। फग्र्युसन एवं मैक्समूलर ने कालिदास को ईसा की छठी शताब्दी का बताया है। डॉ0 भाऊदाजि, डॉ एच0कर्न, बेवर, भण्डारकर, फ्लीट, के0 बी0 पाठक इस मत के समर्थक हैं। ए0 बी0 कीथ के मतानुसार कालिदास, भास एवं अश्वघोश के परवर्ती थे। इसके अतिरिक्त कर्नल विलफर्ड का ईसा की पाँचवीं शताब्दी का मत मान्य नहीं है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी विद्वान हिपोलाइट फॉश के मतानुसार कालिदास का समय ईसा के पूर्व आठवीं शताब्दी है। जो कि मान्य नहीं है।

अतएव कालिदास का समय ईसा की पाँचवीं शताब्दी से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता तथापि उनके काव्यों में जिस वैभव एवं ऐश्वर्य का चित्रण हुआ है वह तत्कालीन भारतीय इतिहास में उदार वृत्ति वाले गुप्त सम्राटों के शासन काल में ही संभव था। कालिदास के ग्रन्थों में धार्मिक सहिष्णुता तथा दण्डनीति की विनम्रता का प्रचुर उल्लेख हुआ है और पौराणिक परम्पराएँ सर्वत्र विकीर्ण हैं। इन सभी चित्रणों से कालिदास गुप्तकाल के कवि प्रतीत होते हैं। 

कालिदास की रचनाओं में भरत की सटी उंगलियों (जालग्र्रथितांगुलिकर:) का वर्णन किया गया है। ये मूर्तियाँ केवल गुप्तकाल में ही उपलब्ध होती है। तथा गंगा-यमुना की चमर धारिणी मूतियों का उल्लेख है। इस प्रकार की मूर्तियों का आरम्भ कुशाण काल के अंत तथा गुप्तकाल के आरम्भ में हुआ है। समुद्रगुप्त के व्याघ्र लांछित सिक्कों पर गंगा की ऐसी ही मूर्ति बनी हुई है। गुप्तकाल के प्रभामण्डल पर कितनी ही आकृतियाँ उभर आयी, ऐसी ही मूर्ति बनी हुई है। गुप्तकाल के प्रभामण्डल पर कितनी ही आकृतियाँ उभर आयी, विशेषकर अंधकार को भेदने वाली बाणों की। उसके लिए साहित्य या प्रतिमा विद्वानों में लाक्षणिक शब्द न था। 

कालिदास ने नया शब्द रचना ‘स्फुरत्प्रभा-मण्डल’ जो प्रकाश बाणों के स्फुरण को प्रकट करने लगा।1 इसके अतिरिक्त गुप्त कालीन अभिलेखों तथा सिक्कों की भाशा से कालिदास के काव्यों की भाषा में असाधारण साम्य दृश्टिगोचर होता है। गुप्त सम्राट के सिक्कों पर बने मयूर पृष्ठ के ऊपर बैठे कार्तिकेय का वर्णन कालिदास ने अनेक बार किया है। वे यूनानी शब्दों से भी परिचित थे उदाहरणार्थ उन्होंने ‘जामित्र (दायामित्र) लग्न का प्रयोग किया है। उनके नाटकों में प्रयुक्त प्राकृत अश्वघोश और भास के नाटकों के प्राकृत के बाद ठहरती है। 

ब्राह्मणीय व्यवस्था का उनकी पूर्ण स्वीकृति, शक्ति एवं सामर्थ्य के संसार के साझीदार होने की भावना मालविकाग्निमित्रम् में अश्वमेघ का उल्लेख रघुवंश में रघु का दिगव्यापी विजयों का सोल्लास वर्णन में सभी तथ्य इस मान्यता के प्रकाश में समझे जा सकते हैं कि कालिदास को किसी महान गुप्त शासक का संरक्षण प्राप्त था और हमें यह अवश्य स्मरण रखना चाहिए कि चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ‘विक्रमादित्य’ का विरुद्ध ग्रहण किया था जिसके अभिधान के साथ परम्परा कालिदास को जोड़ती है। 

अतएव कालिदास का सम्बन्ध गुप्तकाल के महनीय क्षणों से विच्छिन्न नहीं किया जा सकता। ए0 बी0 कीथ ने उपर्युक्त उदाहरण में कहा है कि यह महाकवि चन्द्रगुप्त द्वितीय की राजसभा का ही दैदीप्यमान रत्न अवश्य रहा होगा, लेकिन चन्द्रगुप्त द्वितीय को कालिदास का संरक्षक नरेश स्वीकार करने के लिए उनका ‘शकारि’ और ‘विक्रमांक’ अथवा ‘विक्रमादित्य’ होना आवश्यक है।

बाण ने ‘गुप्तान्वय’ में साहसांक के शौर्य का वर्णन किया है।3 इस ग्रन्थ (हर्शचरित) के टीकाकार शंकर कवि ने बाण के संकेत को और स्पश्ट कर दिया है।1 इन उल्लेखों से चन्द्रगुप्त का शकारि होना प्रमाणित होता है। यही साहसांक चन्द्रगुप्त स्वयं काव्यकार और काव्य मर्मज्ञ भी है। ‘भोजदेव’ के सरस्वती कण्ठाभरण में और राजशेखर की काव्यमीमांसा में यह साहसांक राजा के संस्कृत प्रेम का उल्लेख हुआ है। राजशेखर ने यह भी लिखा है कि कालिदास ने गेश्ठ इत्यादि विद्वानों की तरह उज्जयिनी के विद्वत्परिशद के समक्ष परीक्षा दी थी। यही चन्द्रगुप्त उज्जयिनी का अधश्विर भी है। वासेदुव शरण अग्रवाल का कथन है कि मालव और महाराष्ट्र की विजय के उपलक्ष्य में चन्द्रगुप्त ने चांदी के सिक्के भी ढ़लवाए जिनके ऊपर उत्कीर्ण लेख में चन्द्रगुप्त को ‘परमभागवत’ विक्रमादित्य या विक्रमांक की उपाधि से मण्डित किया गया है। 

विक्रमस्मृति ग्रन्थ में राधाकुमुद मुखर्जी जी ने यह अभिमत व्यक्त किया है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय के अभियानों एवं विजयों से यह स्पष्ट होता है कि पूर्वी मालवा के विदिशा नगर से उनका सम्बन्ध था जबकि जैसा हम पहले देख चुके हैं, उनके साथ अपना सम्बन्ध प्रदर्शित करने वाले कनारी प्रदेशों के कुछ शासकों ने उनका वर्णन पाटलिपुत्र के अधीश्वर के साथ-साथ ‘उज्जयिनी’ पुरवराधीश्वर के रूप में किया है उनका उज्जयिनी के साथ सम्बन्ध परम्परागत शकारि विक्रमादित्य से उनकी भिन्नता का अनुमोदन करता है। अतएव चन्द्रगुप्त द्वितीय, शब्दों का पराभव करने वाला विक्रमादित्य होने के साथ-साथ उज्जयिनी का अधीपति भी था और कालिदास के उसके साथ परम्पराख्यात सम्बन्ध को इतिहासवेत्ताओं का अनुमोदन मिला है। 

कालिदास के ‘विक्रमोर्वशीयम्’ नाटक के ‘विक्रम’ शब्द के प्रयोग को विद्वानों ने विशेश मान दिया है। यहाँ पुरुरवा ही ‘विक्रम’ नाम से अभिहित किया गया है और इस नाटक का अध्ययन विशाखदेव के ‘देवी चन्द्रगुप्तम’ की छाया में करने से यह स्पश्ट है कि उर्वशी का सम्बन्ध धु्रवदेवी से ही है। रघुवंश के चतुर्थ सर्ग में रघु की दिग्विजय का जो वर्णन हुआ है उसमें कालिदास द्वारा किया गया हूणों का उल्लेख महत्त्वपूर्ण है। रघु की विजय-यात्रा का प्रधान उद्देश्य पारसीकों पर विजय प्राप्त करता था। किन्तु उन्हें विजित करने के बाद रघु को उत्तर दिशा में बढ़कर हूणों को भी परास्त करना आवश्यक जान पड़ा और उन्होंने उन्हें वंक्षु नदी के तीर पर पराजित किया। इससे जान पड़ता है कि पारसीकों के सम्बन्ध होने के बावजूद हूण राजनीतिक एवं व्यूह-रचनात्मक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण थे, अतएव विद्वानों के गवेशणा के आधार पर यह स्थापना की है कि वक्षु नदी के तटीय प्रदेश में हूण ईसा की चौथी शताब्दी के अन्तिम दशक में ही शक्ति एवं महल प्राप्तकर सके थे और इस कारण कालिदास के हूण-विशयक उल्लेख का समय भी यही होना चाहिए। मैहरौली के लौह स्तंभ पर उत्कीर्ण लेख में बताया गया है कि चन्द्र नामक नरेश ने बंगाल में शत्रुओं का नाश कर पंजाब की सातों नदियों को पार किया और वंक्षु तीर पर स्थित वाहली को को परास्त किया। 

विद्वानों का बहुमत इस चन्द्र का गुप्तवंशीय नरेश चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के साथ समीकरण करता है और इस प्रकार मेहरौली स्तंभ लेख का चन्द्रगुप्त द्वितीय ही स्वीकार किया गया है। इससे सिद्ध होता है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों, कुशाणों तथा पारसीकों को समूल नश्ट करने के लिए बैक्ट्रियाना में शक्तिशाली अभियान चलाया थ। पुरातात्वीय खेजों से यह प्रमाणित होता है कि ईसा की चौथी शती के अन्तिम दशकों में बेग्नम, होपियन तथा इस्कन्दरिया-जैसे ईरानी नगरों को छोड़कर लोग अन्यत्र गए थे और सासान बादशाहों के शाहपुहर तृतीय (383-88 ई0) के शासनकाल तक बेग्नम के समीप चांदी के सिक्कों की निरंतर घटती हुई संख्या के आधार पर यह बताया गया है कि 388 ई0 के उपरान्त वह भू-भाग सामान बादशाहों के अधिकार से निकल गया था। अत: इस क्षेत्र में किसी अन्य आक्रमण का पता-नहीं है अत: यह अनुमान विश्वसनीय माना गया है कि इन नगरों से ईरानी प्रभुत्व का लोप चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के विजय अभियान का ही परिणाम था, जिसका उल्लेख मेहरौली स्तंभ लेख में उपलब्ध है। अफगानिस्तान में कापिशी के पड़ोंस में इस समय के आस-पास गुप्तकाल के उदय एवं पल्लवन से भी इस अनुमान की पुष्टि हो पाती है कि गुप्तकालीन भारत से इस भू-भाग का घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हो गया था।

कालिदास के रघुवंश में वर्णित रघु के दिग्विजय अभियान से यह चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के पश्चिमोत्तरी अभियान का ही वर्णन प्रतीत होता है। 388 ई0 के आस पास पश्चिमी क्षत्रपों के राज्य पर विजय प्राप्त करने के अनन्तर ही चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के जिस विजय अभियान का आधार बना है वह 390 ई0 के मध्य घटित हुआ होगा। अतएव बुद्ध प्रकाश का भी मानना कि कालिदास का अविर्भाव काल सन् 390-95 के आस-पास रहा होगा। अन्य विद्वानों ने यह भी दर्शाया है कि रघु दिग्विजय की दक्षिणी सीमाएँ समुद्रगुप्त की दिग्विजय से मेल खाती है। इस प्रकार समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य की विजयों का समादर कवि के आदर्श नृपति रघु की दिग्विजय में हो गया है। इससे सिद्ध होता है कि समुद्रगुप्त की विजयों से परिचित होने के साथ-साथ चन्द्रगुप्त द्वितीय के संरक्षण में रहे और रघु के बयान से उसी प्रतापी ‘राजशि’ के शौर्य का व्याख्यान किया है। उपर्युक्त विवेचन से स्पश्ट हो जाता है कि कालिदास ने चन्द्रगुप्त द्वितीय के राज्याश्रम में अपने ललित या रस वर्शा काव्यों का प्रणयन किया। चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासन काल 375 ई0 से 413 ई0 तक व्याप्त है। अतएव कालिदास का स्थितीकाल ईसा की चौथी शताब्दी के उत्तरार्द्ध और पाँचवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध के बीच रहा होगा। 

कालिदास के जन्मकाल की भाँति उनके जन्म स्थान के विषय में भी विद्वान् एकमत नहीं हैं। बंगाल के संस्कृत कवियों ने इन्हें माँ काली का भक्त मानते हुए ‘बंगाल’ निवासी माना है किन्तु कवि की किसी रचना से यह प्रमाणित नहीं होता कि वह काली के उपासक थे। प्रो0 लक्ष्मीधर कल्ला ने अपने ग्रन्थ ‘कालिदास का जन्म स्थान’ में कालिदास को ‘कश्मीर’ निवासी सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। इन्होंने ‘कुमारसम्भवं’, मेघदूत, विक्रमोर्वशीयम् में कालिदास द्वारा हिमालय के अत्यन्त सूक्ष्मता के साथ विशद् वर्णन को अपने मत का आधार बनाया है। कण्व, मारीच एवं वशिश्ठ ऋशियों के आश्रम हिमालय में अवस्थित थे। यह सभी उल्लेख कवि के हिमालय प्रेम को व्यक्त करते हैं। डॉ0 भगवतशरण उपाध्याय तथा डॉ0 रमाशंकर तिवारी ने भी प्रो0 कल्ला का समर्थन करते हुए कालिदास को कश्मीरी कवि माना है। किन्तु प्रो0 मिराशी ने प्रो0 कल्ला के मत का खण्डन किया। उनका मत है कि ‘राजतरंगिणी’ में कालिदास का नाम कश्मीरी कवियों में उल्लिखित नहीं है। अत: उन्हें कश्मीर निवासी नहीं माना जा सकता है।

‘मेघदूत’ में कालिदास ने ‘विदिशा’ का विस्तृत वर्णन किया है। जिसके आधार पर हरप्रसाद शास्त्री तथा प्रो0 परांजपे ने उन्हें विदिशा निवासी स्वीकार किया है जबकि पिटर्सन जैसे विद्वानों ने कालिदास को वैदभ्र्ाी सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। कालिदास ने अनेक स्थलों पर विदर्भ का वर्णन किया है यथा, ‘मालविकाग्निमित्र‘ की नायिका मालविका विदर्भ की राजकुमारी है, ‘रघुवंशम्’ में विदर्भ राजकुमारी इन्दुमती का वर्णन है इसके अतिरिक्त ‘मेघदूत’ में जिस रामगिरि का उल्लेख है वह भी वर्तमान रामटेक, नागपुर के पास स्थित है। सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि महाकवि का वैदभ्र्ाी रीति सर्वाधिक प्रिय रहा है। पं0 चन्द्रबली पाण्डेय ने भी कालिदास को विदर्भ निवासी माना है।

‘उज्जयिनी’ को महाकवि की जन्मभूमि मानने वाले विद्वानों में श्री अरविन्द, डॉ0 वा0वि0 मिराशी, डॉ0 शिव प्रसाद भारद्वाज तथा प्रो0 झाला प्रमुख हैं। ‘मेघदूत’ में उज्जयिनी के प्रति उनका विशेष आकर्षण दृष्टिगत होता है। कवि ने इस नगरी के ऐश्वर्य, उससे सम्बन्धित लोककथाओं, प्रसिद्ध महाकाल महादेव का मन्दिर, सन्ध्या के समय होने वाली आरती में होने वाले वेश्यानृत्य, अभिसारिका स्त्रियों इत्यादि का मनोहर वर्णन किया है। इस नगरी को कालिदास ने स्वर्ग का कान्तिमान खण्ड माना है। जिसे स्वर्ग में अपने पुण्यों का फल भोगने वाले पुण्यात्मा लोग पुण्यों के समाप्त होने से पूर्व बचे हुए पुण्य के बदले अपने साथ पृथ्वी पर उतार लाए हैं।

उज्जयिनी के प्रति कवि का यह विशेश अनुराग ही है कि उन्होंने रामगिरि से अलका नगरी की ओर जाते हुए मेघ से सीधे मार्ग में न पड़ने पर भी इस नगर की ओर जाने का अनुरोध किया है, ‘‘यद्यपि उत्तर की ओर जाने से मार्ग वक्र पड़ेगा, तथापि तुम उज्जयिनी के महलों के क्रोड़ में चलने वाली प्रणय लीलाओं से विमुख मत होना।’’ इससे यह स्पष्ट होता है कि महाकवि को उज्जयिनी से अतिशय प्रेम था अत: यह माना जा सकता है कि उज्जयिनी ही कालिदास की जन्मभूमि रही हो किन्तु प्रबल प्रमाणों के अभाव में किसी एक मत को स्वीकार करना उपयुक्त नहीं होगा।

कालिदास की रचनाएँ

संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि कालिदास ने महाकाव्य, खण्डकाव्य एवं नाटक तीनों विधाओं में काव्य रचना की है। विद्वानों ने महाकवि कृत कुल सात रचनाएँ स्वीकार की है जिनमें दो महकाव्य रघुवंश एवं कुमारसम्भव दो खण्डकाव्य ‘ऋतुसंहार’ एवं ‘मेघदूतम्’ तथा तीन नाटक- ‘मालविकाग्निमित्रम्’, ‘विक्रमोर्वशीयम्’ तथा ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ है। महाकाव्य कुमारसम्भव यह कालिदास की उत्कृष्ट काव्यशैली की परिचायक मनोरम कृति है। इसमें सत्रह सर्ग हैं। इसकी काव्यशैली अत्यन्त रमणीय एवं आकर्षक है। इस ग्रन्थ का काव्य क्षेत्र हिमालय है। कालिदास ने इसमें हिमालय का गुणगान कर उसके वैभवपूर्ण ऐश्वर्य का वर्णन किया है। गंगा का उद्गम, भारत माता का राजमुकुट, तपस्या की पावन भूमि, प्राकृतिक सौन्दर्य का मूलस्थान, औषधियों का भण्डार तथा पार्वती की जन्मभूमि, गन्धर्वों की संगीतमयी भूमि, नर-नारायण का दर्शनीय स्थान और वेदव्यास की साधना स्थली है हिमालय का सभी दृश्टियों से अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। कालिदास ने कुमारसम्भव के प्रथम श्लोक में ही हिमालय की इस प्रकार प्रशंसा की है और उसे सभी दृश्टियों से सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया है- ‘‘उत्तर दिशा में देवता के समान हिमालय नामक पर्वतों का राजा पूर्व और पश्चिम समुद्र में प्रविष्टि होकर पृथ्वी के मानदण्ड की तरह विद्यमान है।’’

कवि काव्य के प्रारम्भ में ही कहता है कि संसार के माता-पिता शिव और पार्वती के रूप में और उनके सौन्दर्य का वर्णन अत्यन्त मधुर ढंग से किया गया है। कुमारसम्भव में पार्वती के जन्म, भगवान शंकर की समाधि, पार्वती की साधना, मदन के पुश्प-बाण का प्रहार, शिव का नियम भंग, पार्वती के प्रति आकर्षण, शिव और पार्वती का विवाह, शिव का पुन: आत्मनियंत्रण, कामदेव पर क्रोध, मदन दहन पर रति का विलाप, शिव का दया-भाव, मदन का पुनर्जन्म, शिव-पार्वती का परिणय आदि प्रसंग इसमें आये हैं।

कुमारसम्भव साहित्य की दृष्टि से बहुत ही सुन्दर है। इस काव्य में कालिदास की आध्यात्मिक विचारधारा छिपी मिलती है। शिव के द्वारा कामदेव का दहन करना तथा पार्वती की तपस्या के पश्चात शिव के द्वारा उन्हें स्वीकार करने की घटना, जिस आध्यात्मिक तत्त्व की ओर संकेत कर रहा है। वास्तव में वह कितना सच्चा और कितना गूढ़ है। श्री अरविन्द ने इस काव्य के विषय में इस प्रकार लिखा है- ‘‘इस महान् काव्य का केन्द्र बिन्दु शिव और पार्वती का विवाह है जो अपने मूल भाव से पुरुष और प्रकृति के मंगल मिलन का प्रतीक है। इस कहानी में आत्मा के द्वारा परमेश्वर की खोज एवं प्राप्ति का प्रतीक है।’’ कुमारसम्भव महाकाव्य की दृष्टि से अपने युग की सर्वश्रेष्ठ रचना है। विद्वानों का ऐसा कथन है कि कुमारसम्भव के सत्रह सर्गों में से केवल प्रथम से आठ तक सर्ग ही कालिदास की रचना मानी जाती है। कवि ने जगतजननी पार्वती के संभोग शृंगार का जैसा सूक्ष्म एवं विशुद्ध वर्णन किया है, उसी से क्रोधित होकर पार्वती जी ने उन्हें शाप दिया, जिसके कारण यह काव्य पूर्ण न हो सका।

कुमारसम्भव में दैविक, लौकिक स्वर्ग, त्याग, योग, भोग, तप एवं विलासता का पूर्व सामंजस्य दिखाई पड़ता है। संभोग शृंगार इसका लक्ष्य है परन्तु ऐसा संभोग जिसका उद्देश्य लोक कल्याणकारी संतान की प्राप्ति है न कि विशयावसान की पूर्ति।

रघुवंश

कालिदास का दूसरा महाकाव्य रघुवंश है। रघुवंश महाकाव्य को कालिदास की सबसे अन्तिम काव्य रचना माना जाता है। इसके साथ ही साथ उसे उत्कृष्ट और प्रौढ़ रचना भी माना गया है। कवि कालिदास की प्रतिभा, कवित्वशक्ति, विस्तृत ज्ञान एवं प्राचीन भारतीय इतिहास का सम्यक् परिचय इस महाकाव्य के द्वारा उपलब्ध होता है। भारतीय आलोचक रघुवंश को कालिदास की सर्वश्रेष्ठ कृति मानते हैं। रघुवंश में 19 सर्ग हैं। कालिदास का मुख्य उद्देश्य रामायण से प्रभावित होकर राम के आदर्श एवं सीता के पावन चरित्र को अपने समाज के समक्ष रखना था। भारतीय यशस्वी महिला सीता का सहिश्णुतापूर्ण जीवन अनुकरण एवं इस कथा से अपनी वाणी को पवित्र करने के उद्देश्य से ही कविकुलगुरू कालिदास ने रघुवंश को लिखा है। यदि रघुवंश को रचकर सूर्य वंश के प्रतापी राजाओं का चरित्र चित्रण करना कालिदास का मुख्य उद्देश्य न होता तो वे प्रथम सर्ग के द्वितीय श्लोक में कवि अपने हृदय की सच्ची बात इतने स्पष्ट शब्दों में कभी भी न लिखते।

क्वसूर्यप्रभवो वंश: क्व चाल्पविशया मति:। 
तितीश्र्ाुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्।। रघुवंशम् 1/2 

 ‘‘मैं रघुवंश का वर्णन करने तो बैठा हूँ पर मैं देख रहा हूँ कि कहांँ सूर्य से उत्पन्न हुआ वह तेजस्वी वंश जिसमें रघु और राम जैसे पराक्रमी राजा उत्पन्न हुए हैं तथा कहाँ मैं अल्प बुद्धि वाला मैं एक तिनके से बनी हुई छोटी सी नाव से समुद्र पार करने की सोच रहा हूँ।’’ 

इस महाकाव्य का शुभारम्भ शिव-पार्वती की वंदना से होता है। रघुवंश के आरम्भ में त्याग-तपस्या का चित्रण तथा अन्त में भोग-विलास एवं मिथ्याबिहार का वर्णन मिलता है। रघुवंश के प्रारम्भ में दिलीप, रघु, दशरथ, राम जैसे महान सम्राटों का चरित्र-चित्रण तथा उत्तरार्द्ध में परवर्ती राजा अग्निवर्ण को भोग-विलास की भावना में लीन होता दिखाया गया है।

इस महाकाव्य का प्रारम्भ अयोध्या के सूर्यवंशी राजा दिलीप के वर्णन से होता है। राजा दिलीप की पत्नी सुदक्षिणा जिसकी कोई सन्तान नहीं थी। अत: इससे खिन्न होकर दोनों दम्पत्ति वशिष्ठ के आश्रम गये वशिष्ठ ने उन्हें बताया कि नन्दिनी गाय की सेवा करने से तुम्हें पुत्र प्राप्त हो सकता है। नन्दिनी गाय की सेवा करने के फलस्वरूप उन्हें ‘रघु’ नामक पुत्र रत्न प्राप्त होता है। रघु ने ‘विश्वजित’ नामक यज्ञ का अनुष्ठान किया और अपनी समस्त सम्पत्ति दान कर दी। उनकी दरिद्रावस्था में ‘परतन्तु’ के शिष्य ‘कौत्स’ उनके पास धन-याचना के लिए पहुँचे। धनाभाव के कारण रघु ने कुबेर के खजाने से धन लाकर कौत्स को दे दिया। कौत्स प्रसन्न होकर राजा रघु को पुत्र की प्राप्ति का वरदान देता है। राजा रघु को ‘अज’ नामक पुत्र प्राप्त होता है। उसका विवाह विदिशा की सुन्दर राजकुमारी इन्दुमती के साथ होता है। लेकिन इन्दुमती की अकस्मात् ही मृत्यु हो जाती है और उसके वियोग में अज भी स्वर्गधाम पहुँच जाते हैं। अज के पुत्र दशरथ हुए उनके द्वारा ऋशि कुमार-श्रवण कुमार की भ्रम से हत्या हो जाने पर श्रवण कुमार के माता-पिता द्वारा दिये गये शाप से पुत्र के शोक में राजा दशरथ की भी मृत्यु हो गयी। इसके बाद दसवें सर्ग से लेकर पन्द्रहें सर्ग तक रामचरित का वर्णन है। रघुवंसियों के गुणगान के लिए कालिदास ने अपने को अल्पज्ञ और असमर्थ कहा है।1 अन्त के कुछ सर्गों में उन्होंने विभिन्न राजाओं के चरित्र को साधारण ढंग से वर्णित किया है। परन्तु महाकाव्य के अन्तिम उन्नीसवें सर्ग में अग्निवर्ण की शृंगार लीलाएं बड़े विस्तार से वर्णित किया है। यह महाकाव्य भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाला

ग्रन्थ है। इसमें कवि ने रघुवंशी राजाओं के चरित्र-चित्रण करने में अत्यन्त निपुणता दिखायी है। राजाओं द्वारा वर्ण और आश्रम धर्म के अनुरूप कार्य करते हुए, सन्तान प्राप्ति के लिए विवाह, बाल्यकाल में विद्याध्ययन युवाकाल वृद्धावस्था में मुनियो के समान वनों में तपस्या और अन्त में ईश्वर का भजन करते हुए अपने शरीर को त्याग करते हुए दिखाया गया है।

ऋतुसंहार

ऋतुसंहार भी कालिदास की अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण खण्डकाव्य विहार की कृति मानी जाती है। विद्वानों का यह विचार है कि कालिदास ने इसी गीतिकाव्य से अपनी काव्य कला का प्रारम्भ किया होगा। विश्व भर में वास्तविक रूप से छ: ऋतुओं का सच्चा आनन्द भारतवर्ष के अतिरिक्त कहीं और इतना सुन्दर रूप नहीं दिखाई देता है। कवि कालिदास ने इन छ: ऋतुओं का स्वाभाविक वर्णन ऋतु संहार के छ: सर्गों में विस्तृत रूप से वर्णन किया है। प्रत्येक सर्ग में एक-एक ऋतु का वर्णन किया गया है। इसमें ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर और बसन्त इन छ: ऋतुओं को अत्यन्त सरल, स्वाभाविक तथा ललित वर्णन प्रस्तुत किया गया है। इसमें मनोरम प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण किया गया है। इसमें ‘विप्रलम्भ शृंगार’ की प्रधानता हैं। ऋतु वर्णन के माध्यम से स्त्री पुरुष के प्रेम के भाव का चित्रण करने में कवि को सफलता प्राप्त हुई है। मानव हृदय की भावनाओं को ऋतुओं के अनुरूप बताने का प्रयास किया गया है। बसन्त ऋतु में बौरे हुए आमों को देखकर एक विरही पार्थिव की मनो दशा का चित्रण किया गया है।

कवि ने ग्रीष्म ऋतु जैसी विशद ऋतु से आरम्भ करके बसन्त जैसी सुखदाक ऋतु के वर्णन के साथ इसका सुखद अन्त किया है। प्रत्येक सर्ग के अन्त में कवि ने यह हार्दिक इच्छा व्यक्त किया है कि यह ऋतु सभी मनुष्यों के लिए सुखदायक हो, आनंददायिनी हो और कल्याणकारी हो। मेघदूत यह खण्डकाव्य है। मेघदूत कवि कालिदास की विरह गाथा की सच्ची कथा और मानवीय जीवन की एक अद्वितीय रचना है। यह ग्रन्थ इतना अधिक लोकप्रिय है कि इसका प्रमाण इसकी भारतीय भाषाओं और कई विदेशी भाषाओं में की गयी टीकाओं से मिलता है। इसमें प्रिय वियोग में यक्ष मेघ के द्वारा अपने संदेश को अपने प्रिये के पास भेजता है।

अलकापुरी में कुबेर के यहाँ एक यक्ष काम करता था। वह बड़ी निष्ठा से प्रात: काल उठकर ताजे पुष्प तोड़ कर पूजा के लिये लाता था, कुछ दिन के पश्चात् उसका विवाह हो जाता है, और उसका पूरा ध्यान हमेशा अपनी यक्षिणी में ही लगा रहता था। वह रात को ही फूल तोड़कर ले आता था, परन्तु कुछ दिनों के बाद कुबेर को यह पता चल जाता है कि फूल बासी हैं क्यों कि प्राय: बासी फूलों की डठल काली पड़ जाती है। अपने कर्त्तव्य का पालन ठीक प्रकार से न करने के कारण कुबेर उससे रूश्ट हो जाते हैं, और कहते हैें कि तू एक वर्श तक अपनी पत्नी से नहीं मिल सकेगा। इस खण्ड काव्य में यक्ष अपनी प्रेयसी को अपने मन की व्यथा, यातायात की कठिनाई उस युग की सीमा की दूरी के कारण तथा पत्रव्यवहार की कठिनाई के कारण उस बेचारे विरही यक्ष ने आशाढ़ के प्रथम दिन अपने समक्ष मेघ को देखकर उसे ही अपना दूत बनाकर अपने हृदय की सभी बातें उसे बताकर अपनी विरहिणी प्रेयसी के पास अपनी मन:स्थिति को बताने के लिए संदेश भेजना चाहता था।

मेघदूत कवि कालिदास के द्वारा लिखा गया एक ऐसा काव्य है। जिसमें सरल, सुन्दर एवं आकर्शक युक्त भावों को पिरोया गया है। श्री शांतिप्रिय द्विवेदी ने ठीक ही कहा है कि ‘‘उनके काव्य शब्द प्रयोगों के लिए नहीं बल्कि शब्द काव्य के लिय है।’’ उनकी सरल सूक्तियों से ‘बाणभट्ट’ जैसे कवि भी प्रभावित हो जाते हैं। नाटक ग्रन्थ कालिदास ने तीन नाट्य ग्रन्थों की रचना की है। इनके नाटकों में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र का सूक्ष्म अवलोकन किया जा सकता है। नायक-नायिका का प्रणय, राजा का कर्त्तव्य तथा उनका पराक्रम, राज्य का वैभव एवं विलास, वर्णाश्रमधर्म के प्रति लोगों में गहरी आस्था इत्यादि का वर्णन कवि का प्रधान उद्देश्य रहा है। मालविकाग्निमित्रम्

यह महाकवि का प्रथम नाटक ग्रन्थ है। इस नाटक में 5 अंक है। इसकी कथावस्तु ऐतिहासिक एवं शृंगारिक है। इसमें शुंगवंश के संस्थापक पुश्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र तथा विदर्भ के माधवसेन की बहन मालविका की प्रणय-कथा का वर्णन है। इसमें वह माधुर्य एवं भाव-गाम्भीर्य दृश्टिगत नहीं (20)  होता जैसा कि इनकी अन्य नाट्यकृतियों में विदिशा के राजा अग्निमित्र के व्यक्तित्व में धीरोदात्त की अपेक्षा धीरललित कोटि के नायक के गुणों का आधिक्य है। रानी धारिणी की परिचायिका के रूप में रहने वाली तथा नृत्य-संगीत में कुशल मालविका को चित्र में देखकर राजा उस पर आसक्त हो जाता है। रानी धारिणी तथा इरावती मालविका को राजा से दूर रखने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहती है किन्तु अग्निमित्र विदूशक गौतम की सहायता से उसे प्राप्त करने में सफल हो जाता है। कथावस्तु की सम्पूर्ण घटनाएं विदूशक की प्रतिभा एवं प्रणय शड्यन्त्रों पर आश्रित हैं।

विक्रमोर्वशीयम्

रचनाक्रम की दृष्टि से यह कालिदास की द्वितीय नाट्यकृति है। ‘मालविकाग्निमित्रम्’ की भाँति यह भी 5 अंकों में विभक्त तथा शृंगारश्रित है। इसमें राजा पुरूरवा तथा अप्सरा उर्वशी के प्रणय कथा का वर्णन है। इसकी कथावस्तु का आधार ‘ऋग्वेद’ है। ऋग्वेद के ‘दशवें मण्डल’ के ‘पंचवे-सूक्त’ में पुरूरवा उर्वशी की कथा संवाद रूप में वर्णित है। इसके अतिरिक्त शतपथ ब्राह्मण, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, मत्स्य पुराण, कथासरित्सागर इत्यादि में भी पुरूरवा एवं उर्वशी की कथा परिवर्तित रूप में मिलती है। कथावस्तु के 5 अंक में विभक्त होने तथा नायक-नायिका का मानवीय एवं दैवीय कोटियों से सम्बन्ध होने के कारण शास्त्रीय शब्दावली में इसे ‘त्रोटक’ कहा जाता है। किन्तु सभी अंकों में विदूषक की उपस्थिति न होने के कारण कुछ विद्वान इसे त्रोटक नहीं मानते हैं। 

शृंगाराश्रित एवं गीत-संगीत की अधिकता के कारण इसे ‘सट्टक’ भी कहते हैं। नाटक का आरम्भ कुबेर-भवन से आती हुई उर्वशी का केशी नामक दैत्य द्वारा अपहरण कर लिए जाने से होता है जिसे पुरूरवा मुक्त कराता है। प्रथम दर्शन में ही दोनों एक-दूसरे के प्रेमपाश में फँस जाते हैं।

राजकीय प्रेमदवन में उनका पुनर्मिलन होता है। उर्वशी द्वारा लिखे गए भोजपत्र को रानी औशनरी प्राप्त कर लेती है तथा राजा पर क्रोध करती है। उधर स्वर्गलोक में ‘लक्ष्मी स्वयंवर’ नामक नाटक में अभिनय करती हुई उर्वशी ‘पुरुशोत्तम’ के स्थान पर ‘पुरूरवा’ नाम उच्चरित करने के कारण स्वर्गलोक से निकाल दी जाती है। रानी औशनरी पुरूरवा को उर्वशी के साथ विवाह की अनुमति प्रदान करती है। कुछ समयोपरान्त गन्धमादन पर्वत पर उर्वशी एवं पुरूरवा विहार हेतु जाते हैं। पुरूरवा द्वारा गन्धर्व-कन्या को निहारने से खिन्न उर्वशी कुमारवन में प्रवेश कर लतारूप में परिणत हो जाती है। राजा प्रिया-विरह में विलाप करता है। संगमनीय मणि के प्रभाव से उर्वशी पुन: प्रकृत रूप को प्राप्त करती है। नाटक के अन्त में पुत्र आयुश् का पता चलता है जिसे उर्वशी ने महर्षि च्यवन के आश्रम में रखा था। नारद के आगमन से उर्वशी एवं पुरूखा जीवनपर्यन्त साथ रहने का सुख प्राप्त करते हैं तथा पुत्र आयुश् का राज्याभिशेक करते हैं।

अभिज्ञानशाकुन्तलम्

यह नाटक कालिदास की समस्त रचनाओं में सर्वोत्कृष्ट है। इसके विषय में कहा गया है ‘काव्येशु नाटक’ रम्यं, तत्र रम्या शकुन्तला’। इस नाटक में सात अंक है। दुश्यन्त एवं शकुन्तला सम्बन्धी कथा ‘महाभारत’ के ‘आदिपर्व’ के ‘शाकुन्तलोपाख्यान’ में तथा ‘पद्म पुराण’ के ‘स्वर्गखण्ड’ में प्राप्त होती है। महाकवि ने महाभारत की नीरस कथावस्तु को अपनी अद्वितीय प्रतिभा के सामथ्र्य से नए रूप में प्रस्तुत कर संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया है। इसकी कथावस्तु केवल नायक-नायिका के प्रणय एवं मिलन तक ही सीमित नहीं है। अपितु यह मानव जीवन यात्रा का सम्पूर्ण वृत्तान्त है। नाटक का आरम्भ दुश्यन्त के मृगया प्रेम से हुआ है। पुरूवंशी राजा दुश्यन्त शिकार करते हुए महर्षि कण्व के आश्रम में प्रवेश करता है। वहाँ ऋषि कन्या शकुन्तला के रूप सौन्दर्य को देखकर मुग्ध हो जाता है। शकुन्तला अप्सरा मेनका तथा ऋषि विश्वामित्र की कन्या है इस रहस्योद्घाटन के पश्चात् राजा शकुन्तला से गान्धर्व विवाह करता है। विवाहोपरान्त राजा शकुन्तला को अपनी नामांकित अंगूठी देते हुए उसे शीघ्र बुलाने का आश्वासन देकर राजधानी लौट जाता है।

जब महर्षि कण्व को शकुन्तला के विवाहित एंव गर्भवती होने की सूचना प्राप्त होती है तब वह शकन्तला को पतिगृह भेज देते हैं किन्तु दुर्वासा के शाप के कारण राजा शकुन्तला सम्बन्धी समस्त वृत्तान्त को भूल जाता है तथा ऋशिकुमारों एवं गौतमी के साथ आयी हुई शकुन्तला का परित्याग कर देता है। तत्पश्चात् परित्यक्त शकुन्तला महर्शि मारीच के आश्रम में जीवन व्यतीत करती है। इधर हस्तिनापुर में धीवर के माध्यम से अंगूठी प्राप्त करने के पश्चात् राजा को सम्पूर्ण वृत्तान्त स्मरण हो जाता है। अन्तत: महर्षि मारीचा के आश्रम में पुत्र सर्वदमन सहित शकुन्तला के साथ राजा का पुनर्मिलन होता है। डॉ0 रमाशंकर तिवारी में ‘शाकुन्तलम्’ में वर्णित जीवन दर्शन के सन्दर्भ में टिप्पणी की है, ‘‘सौन्दर्य की पवित्रता एवं मादकता, प्रेम की निश्छलता एवं विवशता, प्रकृति-जन्य सरलता एवं मुग्धता, ऋषि कुल की उदारता एवं दयालुता, महर्षि कण्व का आदर्श वात्सल्य, दुर्वासा का निर्मम दण्ड, वासना की मांसलता का प्रक्षालन तथा आत्मा का सुशान्त निर्मलीकरण, रोमांस के आसव एवं संस्कृति के पीयूश का मंगलमय सम्मिलन, प्रेयस् एवं नि:श्रेयस् का मनोग्राही ग्रन्थि बन्धन- इन सभी उपादानों को एक साथ मिश्रित कर कालिदास ने ‘शाकुन्तलम्’ में जो प्रपाणक रस तैयार किया है, वह जीवन के लिए निश्चित ही नितान्त मूल्यवान् है।’’

सन्दर्भ -
  1. हरिदत्त एवं द्विवेदी, डॉ0 शास्त्री शिवबालक, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, पृ0 सं0 5 (4) 
  2. H.C.P. Chauchari, Political History of Ancien India, Page 317 
  3. ए0 बी0 कीथ, संस्कृत ड्रामा, पृ0 सं0 50 (7) 
  4. एपीग्राफिया इण्डिया, भाग-7 और 18 2 रमाशकर तिवारी, पूर्वोक्त, पृ0 सं0 13-17 3 ‘अरिपुरे’ परकलत्र कामुक कामिनी वेश उदय दिति निवासी, रमाशंकर तिवारी, पूर्वोक्त, पृ0 सं0 15 
  5. काल श्री साहसांकस्य के न संस्कृतवादिन: भोजदेव, सरस्वती कण्ठाभरण, 2/15 2 उदय नारायण गुप्तसम्राट और उनका काल, पृ0 सं0 242 3 चन्द्रबली पाण्डेय, कालिदास, पृ0 सं0 13-14 (9) 
  6. बुद्ध प्रकाश, स्टडीज इन इण्डिया हिस्ट्री एण्ड सिविलाइजेशन, पृ0 सं0 390-94 (11) 
  7. डॉ0 वासुदेव, गुप्त साम्राज्य का इतिहास- पृ0 सं0 4 2  

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