कृषि का महत्व एवं उपयोगिता

अनुक्रम
भारत में कृषि, यहाँ की अर्थव्यवस्था व मानव-विकास तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप एवं उत्थान की आधारशिला बनी हुयी है। देश की लगभग 64 प्रतिशत जनसंख्या कृषि कार्यों में संलग्न है तथा देश के 6.38 लाख से भी अधिक गांवों में निवास करने वाली 75 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से आजीविका कृषि से ही प्राप्त करती है। देश के राष्ट्रीय आय में कृषि क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, इसलिए कहा जाता है कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है।

कुछ वर्षों पहले तक भारतीय कृषि का सीमित क्षेत्र था जो केवल भारतीय जनजीवन और भारतीय बाजारों के साथ ही साथ भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालते थे, किन्तु वर्तमान में भारतीय कृषि अपने देश का ही नही अपितु अन्य देशों के जनजीवन एवं बाजारों को भी प्रभावित कर रहा है। भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व भारी मात्रा में विनिर्मित वस्तुओं का आयात करता था तथा इसके निर्यात में मुख्यत: कृषिगत उत्पाद जैसे जूट, चाय, सूती वस्त्र इत्यादि प्रमुख थे। स्वतन्त्रता के पश्चात भारत सरकार द्वारा देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएं एवं विदेशी व्यापार नीतियाँ प्रारम्भ की गयी, जिसके परिणामस्वरूप न केवल आयात एवं निर्यात में वृद्धि हुई है बल्कि विदेशी व्यापार का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। आयात एवं निर्यात में कृषिगत उत्पादों के साथ-साथ अन्य नयी-नयी वस्तुएं भी जुड़ी हैं। कुल व्यापार तथा आयात एवं निर्यात में भारी वृद्धि भी हुई व आयात एवं निर्यात दोनों नये-नये देशों से बढ़ा है। भारत के विदेशी व्यापार में कृषिगत उत्पादों की विविधता भारतीय अर्थव्यवस्था को पहले से और अधिक मजबूत बनाती रही है।

परन्तु समय परिवर्तन के साथ ही साथ अर्थव्यवस्था में भारतीय कृषि के योगदान में परिवर्तन देखने को मिला जो कि निराशाजनक रहा है अर्थात भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का हिस्सा कम होते जा रहा है। जहाँ कुल निर्यातों में कृषि एवं सम्बद्ध उत्पादों का अंशदान वर्ष 1950-51 में 52.5 प्रतिशत था वह घटकर वर्ष 2013-14 में लगभग 13 प्रतिशत हो गया। वर्ष 1950-51 में कृषि का राष्ट्रीय आय में योगदान 57 प्रतिशत था वह वर्ष 2013-14 में घटकर लगभग 14 प्रतिशत हो गया। यह स्थिति व क्रमिक गिरावट देश के अन्त: भाग में तेजी से हो रहे औद्योगिकरण के कारण है। औद्योगिकरण के कारण लगभग सभी विकसित देशों के राष्ट्रीय आय में कृषि क्षेत्र का योगदान कम होता जा रहा है। जैसे कि अमेरिका के राष्ट्रीय आय में वहां के कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 3 प्रतिशत व कनाडा में 4 प्रतिशत तथा आस्टे्रलिया में 5 प्रतिशत है अत: यह इस बात को इंगित करता हैं कि विकासशील देशों के राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान अधिक होता हैैं वहीं दूसरी ओर विकसित देशों के राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान बहुत ही कम होता है।

भारत में कृषि राष्ट्रीय आय के साथ ही देशवासियों के आजीविका व रोजगार का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। भारतीय कृषि क्षेत्र लगभग 64 प्रतिशत श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है अत: यह सबसे बड़ा निजी व्यवसाय क्षेत्र है तथा यह औद्योगिक विकास में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। विभिन्न कृषि उत्पाद एवं कृषि सम्बन्धित उद्योग के उत्पाद जैसे - चीनी, तेल, तम्बाकू व मसाले आदि का भारतीय निर्यातों में प्रमुख योगदान है और इसी प्रकार कुछ फल, फूल एवं सब्जियां भी अन्य देशों को निर्यात किया जा रहा है। इन दिनों बासमती चावल का निर्यात बहुत तेजी से व अधिक मात्रा में किया जा रहा है।

भारत एक विकासशील देश है जो विकसित देशों की श्रेणी की ओर तेजी से बढ़ रहा है। यह एक कृषि प्रधान देश भी है यहां का भौगोलिक वातावरण में विभिन्नता पायी जाती है इस लिये यहां पर कृषि उत्पादों में विभिन्नता होती है। भारत के अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का अहम भूमिका प्राचीन काल से दिखाई पड़ रहा है। वर्तमान में भारतीय कृषि उत्पादों का वैश्वीकरण हुआ है एवं भारतीय कृषिगत विदेशी व्यापार का चहुुमुखी विकास हो रहा है जो देश की अर्थव्यवस्था और सुदृढ़ बना रहा है। भारत सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र के विकास के लिए विभिन्न योजनाएं चलायी जा रही है। पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि क्षेत्र पर अधिक ध्यान दिया गया हैं, इनके बावजूद हमारे देश की कृषिगत विदेशी व्यापार अन्य कुछ देशों के कृृषिगत विदेशी व्यापार की तुलना में पिछड़ा हुआ है तथा भारतीय निर्यातों में कृषिगत उत्पादों का योगदान विर्निमित उत्पादों की तुलना में कम होते जा रहा है। जिसका प्रभाव ग्रामीण विकास पर नकारात्मक रूप से पड़ रहा हैं एवं किसान वर्ग को अपने कृषि उत्पादों का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है, जिससे उनके आर्थिक व सामाजिक जीवन स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है तथा भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व समय के साथ साथ कम होता जा रहा हैं। यही कारण है कि भारतीय कृषि उत्पादों के विदेशी व्यापार का अध्ययन समय समय पर करना आवश्यक हो जाता है, जिससे कृषि व्यापार एवं भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की अनिश्चितता से बचा जा सकता हैं।

भारतीय कृषि का महत्व

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नियोजन काल में हुए औद्योगीकरण, सेवा क्षेत्र के विकास एवं भावी विकास की प्रबल संभावनाओं के बावजूद भी आज भारतीय कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मेरूदण्ड है। भारतीय कृषि दुनिया की सबसे पुरानी कृषि प्रणाली है विश्व की भूमि का लगभग 2.4 प्रतिशत क्षेत्रफल, 16.7 प्रतिशत आबादी व 16 प्रतिशत पशु संख्या भारत में है। यहां भौगोलिक दृष्टि से विश्व में सबसे अधिक क्षेत्रफल पर खेती किया जाता है। कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के रिपोर्ट के अनुसार 184 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि वाले भारत का दूध उत्पादन में इसका विश्व में दूसरा स्थान , पशुधन में संख्या की दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान, खाद्य अनाजों के उत्पादन में विश्व में तीसरा स्थान तथा मछली उत्पादन में इसका विश्व में तीसरा स्थान है।

प्राचीन काल से ही कुल निर्यात में कृषि उत्पादों के निर्यात की अहम भूमिका रही है परन्तु वर्तमान में भारतीय कुल निर्यातो में कृषि उत्पादों के निर्यात का अंशदान केवल 13 प्रतिशत ही है। इसके बावजूद भारत खाद्यान्न एवं अन्य कृषि उपजों का आयातक ही नहीं बल्कि आज प्रमुख निर्यातक बन गया है। भारत में कृषि निगमीकरण, बाजारीकरण तथा अनुबन्ध आधारित खेती को महत्व दिया जा रहा है। भारत में कृषि क्षेत्र से अपेक्षाएं केवल पेट भरने तक ही सीमित नहीं है बल्कि भारतीय किसान बिना किसी बाधा एवं प्रतिबन्ध के अपनी उपज को देशी एवं विदेशी बाजारों में बेचना चाहता है ताकि कृषि उपजों का उचित मूल्य कृषि को लाभकारी व्यवसाय बना सकें। कृषि क्षेत्र में उपलब्धियों की तो कमी नहीं है लेकिन आधारभूत चुनौतियां भी ज्यों की त्यों खड़ी है। कृषि विकास की मानसून पर निर्भरता आज भी बनी हुयी है तथा समयानुसार कृषि भूमि छोटे होते व बिखरते जा रहे हैं, कृषि शिक्षा, शोध एवं अनुसंधान का लाभ किसानों को पूर्णतया नहीं मिल पा रहा है।

हरित क्रान्ति के काल में अपनायी गयी आधुनिक तकनीकों का लाभ केवल साधन सम्पन्न क्षेत्रों एवं बड़े किसानों को ही मिल रहा है, जिससे कृषि क्षेत्र में असमानताएं बढ़ती जा रही है। फिर भी भारतीय कृषि ने राष्ट्रीय एवं सामाजिक अर्थव्यवस्था में अपने महत्व को कम नहीं होने दिया है इसके महत्व का मूल्यांकन निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर किया जा सकता है-

1. रोजगार की दृष्टि से कृषि का महत्व -

‘भारत में कृषि प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से अधिकांश जनसंख्या के जीवनयापन का साधन रही है। कृषि की इतनी अधिक प्रधानता है कि भारतीय जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग रोजगार के लिए इस पर आश्रित है। भारतीय जनगणना द्वारा उपलब्ध कराये गये ऑंकड़ों से पता चलता है कि सन् 1951 में भारतीय जनसंख्या का लगभग 69.5 प्रतिशत लोग कृषि में लगे हुये थे, यह प्रतिशत सन् 1991 में घटकर 66.9 प्रतिशत तथा सन् 2001 में 56.7 प्रतिशत हो गया, किन्तु जनसंख्या में तेजी से वृद्धि होने के कारण कृषि क्षेत्र में लगे लोगों की वास्तविक संख्या में अधिक वृद्धि हुई है। कुछ वर्षों पहले भारतीय अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों का उपयुक्त विकास न होने एवं आधुनिकरण के कारण उनमें रोजगार के अवसरों में बहुत कम वृद्धि हो पायी थी जिसके कारण बहुत से अशिक्षित व कम पढ़े-लिखे लोगों को मजबूर होकर कृषि कार्य को अपनाना पड़ता था। परन्तु वर्तमान समय में बहुत से उच्च शिक्षित व बुद्धिजीवी वर्ग भी कृषि क्षेत्र से जुड़ रहे हैं और कृषि क्षेत्र के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अत: आज भी कृषि क्षेत्र में असीमित रोजगार के अवसर उपलब्ध है और समय के साथ ही साथ यह अवसर बढ़ता ही जा रहा है।

अधिकांश अल्पविकसित देशों में जनसंख्या का कृषि पर निर्भरता अत्यधिक होती है, जैसे कि बांग्लादेश की कुल जनसंख्या का लगभग 57 प्रतिशत, पाकिस्तान की 48 प्रतिशत और चीन की 68 प्रतिशत जनसंख्या कृषि कार्यों में लगी हुयी है। इसके विपरीत विकसित देशों में जनसंख्या का बहुत छोटा भाग कृषि में लगा हुआ है, जैसे कि अमेरिका की 3 प्रतिशत, इंग्लैण्ड की 2 प्रतिशत, फ्रांस की 18 तथा जापान की 12 प्रतिशत जनसंख्या ही कृषि कार्यों में लगी है। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर भारत की कुल जनसंख्या 121.07 करोड़ थी जिसमें कृषकों की संख्या 27.3 करोड़ तथा कृषि श्रमिकों की 14.4 करोड़ थी तथा इसी वर्श कुल रोजगार में कृषि के क्षेत्र में रोजगार लगभग 51.1 प्रतिशत था।’

2. औद्योगिक विकास के लिए कृषि का महत्व -

‘भारत के औद्योगिक विकास में कृषि का महत्वपूर्ण योगदान रहा है इससे भारत के प्रमुख उद्योग जैसे सूती वस्त्र, जूट, चीनी, वनस्पति उद्योग आदि को कच्चा माल उपलब्ध होता है इसके अतिरिक्त कुछ अन्य उद्योग अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर होते हैं जैसे-हस्तकरघा, चावल व दाल मिल, खाद्य तेल उद्योग आदि तथा बहुत से लघु व कुटीर उद्योगों को कृषि से ही कच्चा माल प्राप्त होता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि कृषि क्षेत्र विभिन्न उद्योगों के अस्तित्व एवं विकास का आधार है। इसके साथ ही भारत सरकार द्वारा भारत के आर्थिक एवं सामाजिक विकास हेतु कुछ ऐसे महत्वपूर्ण उद्योगों के विकास को भी बढ़ावा दिया गया है जो कृषि पर आधारित नहीं होती है जैसे- लोहा व स्पात उद्योग, रसायन उद्योग, मशीन व औजार उद्योग एवं अन्य इंजीनियरी उद्योग, विमान निर्माण तथा सूचना प्रौद्योगिकीय उद्योग आदि। इन उद्योगों का विकास भारत के आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर होने तथा आर्थिक व सामाजिक विकास का सूचक माना जाता है। किन्तु भारत का सम्पूर्ण विकास उसके ग्रामीण विकास पर निहित है, जब तक देश के ग्रामीण क्षेत्रों का विकास पूर्ण रूप से न हो जाए तब तक भारत का पूर्णतया विकास सम्भव नहीं है ग्रामीण क्षेत्रों का विकास कुछ हद तक कृषि आधारित उद्योगों पर भी निर्भर करता है। अत: ग्रामीण क्षेत्रों का विकास कृषि आधारित उद्योगों पर तथा कृषि आधारित उद्योगों का विकास कृषि पर निर्भर होता है।’

3. खाद्यान्न आपूर्ति में कृषि का महत्व -

भारतीय कृषि देश की सम्पूर्ण जनसंख्या के लिए खाद्यान्नों की आपूर्ति करता है। बढ़ती हुई जनसंख्या का कृषि क्षेत्र पर खाद्यान्न आपूर्ति का दायित्व बढ़ता ही जा रहा है कृषि का क्षेत्र स्थिर है किन्तु उस पर आश्रित जनसंख्या का भार बढ़ता ही जा रहा है। वर्ष 1951 की जनगणना के आधार पर 36.1 करोड़ जनसंख्या के लिए भारतीय कृषि द्वारा 5.12 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ तथा वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर 121.08 करोड़ जनसंख्या हेतु 24.48 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ। अर्थात् वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र द्वारा 1951 की जनसंख्या से लगभग तीन गुनी भारतीय जनसंख्या को खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। भारतीय जनसंख्या में आर्थिक आवश्यकताओं की बढ़त के साथ ही साथ भोजन की आवश्यकताओं में भी गुणात्मक परिवर्तन हो रहा है। अत: इन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कृषि क्षेत्रों को और अधिक प्रभावी ढंग से कृषि उत्पादनों को बढ़ाना होगा।

4. भारतीय विदेशी व्यापार में कृषि का महत्व -

कृषि का महत्व भारतीय विदेशी व्यापार में हम प्राचीन काल से देखते आ रहे हैं, चाहे यह स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व के समय में भारत का विदेशी व्यापार हो या स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की जिसमें भारतीय कृषि को सदा ही प्राथमिकता दिया जाता रहा है। समय के अनुसार विदेशी व्यापारों में कृषि उत्पादों के स्वरूप में परिवर्तन एवं नयी कृषिगत वस्तुओं का इसमें जुड़ना भारतीय विदेशी व्यापार व कृषि क्षेत्र के विकास को प्रदर्शित करता है। योजना काल के डेढ़ दषक (1951-66) तक भारतीय निर्यात में कृषि का योगदान 30 प्रतिशत तथा उसमे कृषि सम्बन्धित वस्तुओं का योगदान 70 प्रतिशत तक रहा तथा वर्ष 2014 में कृषि एवं इससे सम्बद्ध उत्पादों का अंशदान घट कर 13.56 प्रतिशत हो गया जो की भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए निराशा जनक है परन्तु दूसरी ओर यह हर्ष की बात भी बन जाती है क्योंकि भारतीय निर्यात में कृषि के प्रतिशत में कमी होने का कारण भारत में तेजी से हो रहा औद्योगिकरण है। अत: औद्योगिकरण से निर्मित वस्तुओं एवं पेट्रोलियम वस्तुओं का अंशदान भारतीय निर्यात में तेजी से बढ़ रहा है जिससे कृषि एवं सम्बद्ध वस्तुओं का अंशदान घट रहा है।

परन्तु औद्योगिकरण को बढ़ावा कृषि क्षेत्र से ही मिला है जो पूर्व काल से निर्यात में कृषि की अधिकता के कारण रहा जिससे विदेशी मुद्रा की प्राप्ति कर औद्योगिक विकास हेतु पूँजीगत माल के लिए वित्त प्रदान किया गया तथा वर्तमान में भी कृषिगत व्यापार “ोश द्वारा गैर कृषिगत व्यापार घाटे का लगभग 17 प्रतिशत क्षतिपूर्ति किया जाता है।

5.   सेवा क्षेत्र में कृषि का महत्व -

भारतीय कृषि विभिन्न क्षेत्रों में अपनी महत्वता के साथ ही साथ सेवा क्षेत्र में भी अपने महत्व को बनाये रखा है। भारतीय कृषि सेवा क्षेत्र में सम्मिलित लगभग समस्त उद्योगों जैसे- बैंकिंग, रेलवे व सड़क परिवहन इत्यादि उद्योगों को प्रभावित करता है अधिकांशतः उद्योग कृषि वस्तुओं को लाने व ले जाने का कार्य करती है। अत: जब अधिक उत्पादन होता है तो इन उद्योगों के व्यापार में प्रगति होती है साथ ही जब कृशकों की आय व क्रय शक्ति बढ़ जाती है तो अन्य उद्योग-निर्मित वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग और कीमत बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप उद्योगों की प्रगति होने लगती है इसके विपरीत कम उत्पादन होने पर व्यापार में मन्दी आ जाती है। अत: सेवा क्षेत्र के उद्योगों का विकास कुछ हद तक कृषि की सम्पन्नता पर निर्भर करता है।

भारतीय विदेशी व्यापार एवं कृषि

वर्तमान विदेशी व्यापार को समझने हेतु अवधियों के आधार पर इसे दो भागो में बांटा गया है पहला स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व की अवधि में विदेशी व्यापार तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के अवधि में विदेशी व्यापार । जो अग्रलिखित है-

1.  स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व विदेशी व्यापार : भारत में लगभग डेढ़ सौ वर्ष तक ब्रिटिश शासन रहा और सन् 1947 में भारत को आजादी मिली। आजादी से पूर्व भारत का सम्पूर्ण विदेशी व्यापार ब्रिटिश शासकों के हाथ में था, फलस्वरुप भारत से अत्यधिक मात्रा में खाद्य वस्तुओं एवं कच्चे माल ब्रिटेन को भेजा जाता रहा एवं ब्रिटेन से वहां के विनिर्मित वस्तुओं का आयात किया जाता था। अंग्रेजों ने ब्रिटेन निर्मित वस्तुओं के भारत में होने वाले आयात को पूर्ण रूप से स्वतंत्र रखा और दूसरी ओर भारत से ब्रिटेन व योरोपीय देशों में होने वाले निर्यातों को अत्यधिक हस्तक्षेप कर उसे हतोत्साहित किया गया। भारत का अधिकांश विदेशी व्यापार इंगलैण्ड और उसके साम्राज्य के अन्य देशों के साथ केन्द्रित हो गया। ब्रिटिश शासन के समय भारतीय निर्यात व्यापार की संरचना में चाय, कपास, तिलहन, मसालें, तम्बाकू आदि खाद्य पदार्थ ही मुख्य रूप से शामिल थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय विदेशी व्यापार के प्रति अपनाये गये पक्षपाती व्यवहार के कारण भारत का व्यापार संतुलन सदैव ब्रिटेन के पक्ष में ही बना रहा यह स्थिति भारत के लिए अनुकूलता की नहीं अपितु इसके अधिकतम शोषण की थी।

2. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद/वर्तमान में भारतीय विदेशी व्यापार : स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के विभाजन का भी भारत के विदेशी व्यापार पर अत्यधिक विपरीत प्रभाव पड़ा। विभाजन के कारण देश में भोजन एवं आवश्यक वस्तुओ की पूर्ति की समस्या तथा उद्योगों के समक्ष कच्चे माल की समस्या उत्पन्न हो गयी तथा उद्योगों के पास मषीनरी एवं पूँजीगत वस्तुओं का भी अभाव पैदा हो गया। इसका दुष्प्रभाव यह पड़ा की भारत की आयात पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ गयी तथा निर्यात में कोई बढ़त नहीं मिल पायी। भारत के आर्थिक व सामाजिक विकास एवं विदेशी व्यापार को बढ़ावा देने हेतु भारत सरकार द्वारा विभिन्न नीतियों एवं योजनाओं का शुभ आरम्भ किया गया, इन्हीं नीतियों, योजनाओं व सुधारवादी उपायों के आधार पर भारतीय विदेशी व्यापार की स्थिति को समझने हेतु स्वतंत्रता प्राप्ति से अब तक के समय को दो भागों में बांटा गया है।
  1. उदारीकरण के पूर्व योजनाकाल में विदेशी व्यापार की स्थिति।
  2. उदारीकरण के बाद योजनाकाल में विदेशी व्यापार की स्थिति।
उदारीकरण के पूर्व योजनाकाल में विदेशी व्यापार की स्थिति : ‘भारत के विदेशी व्यापार में कृषि का महत्वपूर्ण योगदान है। भारत से बड़ी मात्रा में कृषि व सम्बद्ध उत्पादों का निर्यात किया जाता है। कृषिगत निर्यातों में कॉफी, चाय, खली, काजू, मसाले, तम्बाकू, चीनी, कच्चा जूट, चावल, फल व सब्जियां, दालें आदि मुख्य हैं। स्वतन्त्रता के समय से लेकर वर्ष 1980 तक भारत के निर्यातों में कृषि व सम्बद्ध क्षेत्र की उल्लेखनीय भूमिका रही। वर्श 1960-61 में भारत का कुल निर्यात 642 करोड़ रुपए था। जिसमें कृषि व सम्बद्ध क्षेत्र का निर्यात 284 करोड़ रुपए था जो कुल निर्यात का 44.24 प्रतिशत था। बाद के दषकों में निर्यात में कृषि व सम्बद्ध क्षेत्र की भूमिका कम हुई है। वर्श 1980-81 में कुल निर्यात 6711 करोड़ रुपए था जिसमें कृषि व सम्बद्ध उत्पादों का निर्यात 2057 करोड़ रुपए था जो कुल निर्यात का 30.65 प्रतिशत था।’

‘भारत की पहली योजना से सातवीं योजना तक के योजनाओं में विदेशी आयात, निर्यात की तुलना में ज्यादा रहा तथा व्यापार “ोश नकारात्मक ही बना रहा। प्रथम पंचवर्शिय योजना में खाद्यान्नों की समस्या दूर करने हेतु कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता दी गयी। द्वितीय योजना के अंतर्गत सार्वजनिक क्षेत्र में औद्योगिकीकरण को प्राथमिकता दिए जाने के कारण पूँजीगत वस्तुओं तथा मषीनों का आयात किया जाना अनिवार्य हो गया था। तीसरी योजना में आयात की अधिकता का कारण भारत-चीन तथा भारत-पाक युद्ध के कारण रक्षात्मक सामान की जरूरत तथा अकाल आपदा के कारण खाद्यान संकट उत्पन्न होना था। चौथी योजना से पूर्व वर्ष 1966 में रूपये का 36.5 प्रतिशत अवमूल्यन करना पड़ा, जिससे निर्यात तो प्रोत्साहित हुआ परन्तु चौथी योजना के तहत वर्श 1973 में पेट्रोलियम अखबारी कागज, उर्वरक, इस्पात आदि के अन्तर्राश्ट्रीय मूल्यों में तेज वृद्धि से भारतीय आयात में भी तेजी से वृद्धि हुयी।

इसका प्रभाव पॉंचवीं योजना (1974-75 से 1977-78) के आयात पर भी पड़ा, परन्तु निर्यात प्रोत्साहन के लिए सरकार द्वारा विषेश रूप से प्रयास किये गये। छठीं व सातवीं योजना में पेट्रोलियम पदार्थो के आयात में कमी की गयी। लेकिन औद्योगिक विकास दर को तेजी से बढ़ाने हेतु उदारवादी आयात की नीति अपनायी गयी। वर्श 1990 तक भारत में विदेशी व्यापार असन्तुलन की स्थिति तेजी से बढ़ी तथा विदेशी मुद्रा कोश लगातार कम होने लगा।’

उदारीकरण के बाद योजनाकाल में विदेशी व्यापार की स्थिति : आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत के विदेशी व्यापार में नीतिगत परिवर्तन हुए हैं। अन्तर्राश्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में खुली विदेशी व्यापारिक नीति का सहारा लिया गया ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था को विष्व अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सके। विदेशी व्यापार नीति के सुधारों के अन्तर्गत जुलाई 1991 में दो बार भारतीय रूपये का 18 प्रतिशत अवमूल्यन किया गया, एकीकृत विनिमय दर प्रणाली, आयातों में उदारीकरण व खुलेपन की नीति के तहत मात्रात्मक प्रतिबन्धों की समाप्ति, प्रतिस्पर्द्धात्मक सीमा शुल्क दरें, विश्व व्यापार संगठन के अनुबन्धों की अनुपालना, निर्यात को विषेश प्रोत्साहन प्रदान करने के उपाय समय-समय पर किए गए हैं। विदेशी पूंजी विनियोग नीति में भी निरन्तर उदारीकृत व्यवस्था लागू की जा रही है तथा यह प्रक्रिया अभी भी चालू है। सीमा शुल्क को धीरे-धीरे कम करने की नीति अपनायी गयी तथा सीमा शुल्क की उच्चतम दर को 300 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया।

आयात-निर्यात पर प्रतिबन्ध हटाकर सरकारी एजेन्सियों के एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया। निर्यात सम्वर्द्धन के अन्तर्गत कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों के लिए निर्यातोन्मुखी इकाईयों की स्थापना, पूँजीगत माल की निर्यात संवर्द्धन योजना का सरलीकरण, निर्यात एवं व्यापार गृहों की मान्यता तथा निर्यात प्रोसेसिंग क्षेत्र की स्थापना प्रमुख है तथा कृषि उत्पादनों सुदृढ़ता लाने हेतु कृषि नीति एवं कृषि क्षेत्र सम्बंधि व कृषि उत्पाद सम्बंधि विभिन्न निगमों व संस्थाओं की स्थापना किया गया।

उदारीकरण के बाद नब्बे के दषक में भारतीय निर्यातों में कृषि व सम्बद्ध क्षेत्र की भूमिका निरन्तर कम हुयी है। कुल निर्यात में कृषि व सम्बद्ध क्षेत्र का भाग वर्श 1990-91 में 19.40 प्रतिशत, 1994-95 में 16.58 प्रतिशत था। वर्श 1999-2000 में कुल निर्यात 162925 करोड़ रुपए था जिसमें कृषि व सम्बद्ध क्षेत्र का निर्यात 24578 करोड़ रुपए था। जो कुल निर्यात का 15 प्रतिशत था। भारत की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है। कृषिगत उत्पादनों को बढ़ाकर निर्यात व्यापार में कृषि की भूमिका को बढ़ाया जा सकता है।

वर्तमान समय में भारत लगभग 367 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भण्डार है जबकि वर्ष 1991 में विदेशी मुद्रा भण्डार भारत के पास बिल्कुल नहीं (शून्य) था। वर्ष 2002-03 में पहली बार भारत का निर्यात 51 बिलियन डॉलर के लक्ष्य को प्राप्त किया जो कि पूर्व वर्ष की तुलना में लगभग 18.5 प्रतिशत वृद्धि दर दर्शाता है। वर्ष 2007 में भारतीय निर्यात विश्व निर्यात का एक प्रतिशत के लक्ष्य को अर्जित करने में सफल रहा, तथा यह प्रतिशत क्रमिक वृद्धि के साथ वर्ष 2014 में 1.69 प्रतिशत तक पहुंच गया। यह उपलब्धियां भारत ऐसे समय में अर्जित करता है जब समस्त विश्व अर्थव्यवस्था मंदी से उभरने के लिए संघर्ष कर रही है।

कृषि पर वैश्वीकरण का प्रभाव 

‘प्रत्येक देश के द्वारा अन्य देशों के साथ वस्तु, सेवा, पूँजी एवं बौद्धिक सम्पदा का बिना किसी प्रतिबन्ध के आदान-प्रदान ही वैश्वीकरण कहलाता है। वैश्वीकरण तभी सम्भव है जब ऐसे आदान-प्रदान के मार्ग में किसी देश द्वारा अवरोध उत्पन्न नहीं किया जाए और उन्हें कोई ऐसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था संचालित करें जिसमें सभी देशों का विश्वास हो और जो सर्व अनुमति से नीति-निर्धारक सिद्धान्तों का निरूपण करें। एक समान नियम के अनुशासन में रह कर जब सभी देश अपने व्यापार और निवेश का संचालन करते हैं तो स्वाभाविक रूप से वह एक ही धारा में प्रवाहित होंगे और यही वैश्वीकरण है।

वैश्वीकरण के कारण वित्त और बैंकिंग, व्यापार और राजकोशीय सम्बन्धों तथा मानवीय जीवन के तौर तरीकों में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तनों ने भारतीय कृषि क्षेत्र में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं संस्थात्मक शक्तियों का निर्माण किया है। जिसका भारत के ग्रामीण क्षेत्रों एवं कृषि क्षेत्रों पर विशिष्ट प्रभाव देखने को मिला है तथा ये ग्रामीण क्षेत्र व ग्रामीण जनजीवन एवं कृषि अपने भौगोलिक सीमा एवं सामाजिक सीमा को लांघकर अन्तर्राश्ट्रीय स्तर से जुड़ चुकी है। अत: यह कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण ने कृषि से सम्बन्धित आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, “ौक्षिक, मनोरंजन, मनोवैज्ञानिक आदि सभी क्षेत्रों को प्रभावित कर विश्व को सम्बद्ध संस्थाओं एवं तकनीकों से जोड़ दिया है लेकिन वर्तमान में वैश्वीकरण ने कृषि एवं व्यापार में विकसित एवं विकासषील देशों के बीच बड़ी खाई बना दी है, जिसे पाटना आवश्यक है। 

वैश्वीकरण के कारण भारत के गरीब किसानों की समस्या का औद्योगीकृत राष्ट्रों में किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी से सीधा सम्बन्ध है। भारत के किसान अपना कृषि उत्पाद विश्व के बाजारों में स्वतन्त्र रूप से नही बेच पा रहें है। भारतीय किसान की पैदावार कम और खर्चीली है क्योंकि पश्चिमी देशों में कृषि का औद्योगिकीकरण हो चुका है। लेकिन भारत में कृषि अभी भी जीवन का आधार है तथा इसका पूर्ण रूप से औद्योगिकीकरण होना “ोश है। भारत के किसानों की अन्य देशों के किसानों की तुलना में पैदावार की क्षमता बहुत कम है। वैश्वीकरण के कारण भारत को कृषि क्षेत्र में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए उत्पादन क्षमता को बढ़ाना होगा।

वैश्वीकरण एक प्रक्रिया के रूप में भारतीय कृषि व्यवस्था को अनेक प्रकार से प्रभावित करने की क्षमता रखता है। भारत आज भी कृषकों का राष्ट्र है। जिसकी कुल कार्यकारणी जनसंख्या का लगभग 64 प्रतिशत जनसंख्या कृशक वर्ग की है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया कृषक समाज में निरक्षरता के कारण कम प्रभाव एवं परिवर्तन ला पा रही है। जिन कृषकों की आर्थिक स्थिति सुधरी है वो वैश्वीकरण के प्रभावों के अवसरों का लाभ उठा रहें हैं। भारतीय कृषि व्यवस्था विश्वव्यापी संस्कृति के प्रभावों से अछूती नहीं रह सकती है। वैश्वीकरण ने कृषकों को अनेक नये विचारो, उपकरणों, उत्पादन के साधनों तरीकों, प्रौद्योगिकी आदि को प्रदान किया है। जो कि यह ग्रामीण क्षेत्रों व कृषक वर्गों के लिए सकारात्मक पहल है।’

भारतीय कृषि का राष्ट्रीय आय में योगदान

भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारषिला कृषि है। आर्थिक जीवन का आधार, रोजगार का प्रमुख स्रोत तथा विदेशी मुद्रा अर्जन का माध्यम होने के कारण कृषि का देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है। यही नहीं, देश की दो तिहाई जनसंख्या कृषि व कृषि से सम्बन्धित क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से आश्रित है। अत: कृषि की समृद्धि, सम्पन्नता व उत्पादकता में ही देश की खुशहाली व समृद्धि सन्निहीत है। ऐसे देश का स्थायी आर्थिक विकास बिना कृषि विकास के सम्भव नहीं है। अनेक उद्योगों को कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारषिला होने के बावजूद भी पिछले कुछ वर्षों से कृषि का अंशदान राष्ट्रीय आय में निरंतर कम होता जा रहा है। वर्ष 1950-51 में जहां सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 56 प्रतिशत था वहीं वर्श 2000-01 में जी.डी.पी. में कृषि का योगदान 26 प्रतिशत तथा वर्ष 2013-14 में जी.डी.पी. में कृषि का योगदान 15.80 प्रतिशत रहा। इस गिरावट का प्रमुख कारण कृषि क्षेत्र में निवेष की कमी है जिससे उत्पादकता में कमी हो गयी है। जबकि रोजगार में कृषि के प्रतिशत में गिरावट औसतन कम है। अर्थात् भारत में आज भी लगभग 64 प्रतिशत लोग कृषि में ही रोजगार प्राप्त करते हैं।

विकास की दृष्टि से यह उचित प्रतीत नहीं होता है। जहाँ खाद्यान उत्पादन में 1950-51 की तुलना में वर्तमान में लगभग चार गुना वृद्धि हुई है वहीं जनसंख्या की वृद्धि दर भी लगभग उतनी ही बनी हुई है इसलिये अतिरिक्त खाद्यान की स्थिति देश में नहीं आ पा रही है। भारत में श्रम की औसत उत्पादकता की बात करें तो विकसित देशों की तुलना में हम बहुत पीछे हैं। 

 संदर्भ -
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