लिट्टे का इतिहास

अनुक्रम

इसमें के बारे में अध्ययन करेंगे।


लिट्टे, जिसे तमिल टाइगर्स के नाम से भी जाना जाता है, एक राजनीतिक व सैन्य संगठन है। यह श्रीलंका में एक अलग स्वतन्त्र तमिल राज्य की स्थापना के लिए संघर्षरत था, हालांकि बाद में स्वतन्त्र राज्य की जगह स्वायतता पर राजी हो गया था। 70 के दशक की शुरूआत में श्रीलंका में तमिलों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई संगठनों का जन्म हुआ जिनमें तमिल न्यू टाइगर्स (TNT) भी एक था। टी एन टी में छात्रों और नौजवान तमिलों का जमावड़ा था और इसकी बागडोर वी. प्रभाकरण के हाथों में थी। 

प्रभाकरण ने सन् 1976 में एस. सुब्रमण्यम के आतंकवादी गुट के साथ हाथ मिला लिया और इस तरह लिट्टे का जन्म हुआ। धीरे-धीरे लिट्टे सभी तमिल संगठनों में सबसे शक्तिशाली बन गया और कालान्तर में उसने अन्य संगठनों को या तो अपने साथ मिला लिया या खत्म कर दिया। इस तरह 1980 के दशक के मध्य तक आते-आते लिट्टे तमिलों का नेतृत्व करने वाला एकमात्र संगठन के तौर पर उभरा। 1983 में लिट्टे ने एक सैन्य चौकी पर हमला कर 13 सैनिकों को मौत के घाट उतार कर श्रीलंका सरकार और सेना के खिलाफ बड़े पैमाने पर सशस्त्रा संघर्ष की शुरूआत कर दी। लिट्टे की खुद की सेना, नौसेना और वायु सेना है। साथ ही लिट्टे अपने प्रभाव वाले क्षेत्र खासकर जाफना प्रायद्वीप व कुछ उत्तरपूर्वी क्षेत्रों में प्रशासनिक, न्यायिक, पुलिस, वितिय और सांस्कृतिक कार्य भी पूरे करता था। अपने आत्मघाती हमलों के लिए लिट्टे पूरी दुनिया में जाना जाता है। इसके सबसे कुख्यात हमलों में श्रीलंकाई राष्ट्रपति प्रेमदासा और भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर किये गए सफल जानलेवा हमले शामिल है।

लिट्टे की महिला शाखा को सुथाथिरप पारा वाइकल के नाम से जाना जाता है। 1987 में भारतीय शान्ति सेना के साथ मुठभेड़ में अपनी जान देने वाली सैकेण्ड लेफ्रटीनेंट मालथी लिट्टे की पहली महिला सदस्य थी। महिलाए ब्लैक टाइगर में भी शामिल है।

ब्लैक टाइगर लिट्टे का आत्मघाती दस्ता है। यह दुनिया का सबसे खतरनाक और संगठित आत्मघाती दस्ता माना जाता है। इसमें लिट्टे के पुरुष सैनिक और महिला सैनिक शामिल है। इसके हिस्से में राजीव गांधी और श्रीलंकाई राष्ट्रपति प्रेमदासा जैसी हस्तियों की हत्या करने के सफल हमले दर्ज है। जनवरी 1996 में कोलम्बों के सैन्ट्रल बैंक पर किया गया आत्मघाती हमला ब्लैक टाइगर का अब तक का सबसे खतरनाक हमला माना जाता है। इसमें 90 लोग मारे गए थे और 1400 लोग घायल हुए थे। इस दस्ते में अपनी इच्छा से शामिल होने वाले लड़ाकों को कड़ी ट्रेनिंग दी जाती थी और फिर उन्हें वापस अपनी यूनिटों में भेज दिया जाता था। जरुरत पड़ते ही उन्हें बुलाकर नया काम सौंपा जाता था और जो ब्लैक टाइगर अपने आखिरी मिशन पर जाता था, वो प्रभाकरण के साथ बैठकर अपना आखिरी भोजन करता था।

9/11 के बाद आतंकवाद के खिलाफ बने वैश्विक माहौल के बाद लिट्टे ने दिसम्बर 2001 में एक पक्षीय युद्ध विराम की घोषणा कर दी और शान्तिवार्ता की इच्छा जताई, 2001 के संसदीय चुनावों में प्रधानमंत्री का पद राष्ट्रपति चंद्रिका कुमार तुंग की पार्टी के हाथों से निकल गया और रनिल विक्रमसिंघे नऐ प्रधानमंत्री बने। विक्रमसिंघे ने लिट्टे के साथ शान्ति-वार्ता आगे बढ़ाई। दोनों पक्षों के बीच फरवरी 2002 में एक समझौते पत्रा पर हस्ताक्षर हुए। नार्वे ने इस वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाई। जब शान्ति वार्ता पर तरक्की हुई तो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण देश में राजनीतिक अस्थिरता का दौर आ गया जिससे शान्ति वार्ता को नुकसान पहुंचा। 2004 में राष्ट्रपति ने संसद को भंग कर नए चुनाव करवाए। इसी दौरान लिट्टे का एक प्रमुख कमाण्डर कर्नल करुणा लिट्टे से अलग हो गया और लिट्टे दो भांगों में बंट गया। इन दोनों गुटों में आपस में लड़ाई आरम्भ हो गई। 

लिट्टे और सरकार के बीच युद्ध विराम सन्धि का उल्लंघन करने के आरोप प्रत्यारोप चलते रहे और 15 अगस्त 2005 को विदेश मंत्री लक्ष्मण कादिरगमार की एक बन्दुकधारी द्वारा हत्या कर देने से शान्ति वार्ता को गहरा धक्का लगा। 2005 के राष्ट्रपति चुनावों का लिट्टे ने बहिष्कार किया और इन चुनावों में महिंद्रा राजपक्षे को जीत मिली जिन्होंने अपनी चुनावी सभाओं में लिट्टे के खिलाफ कड़ी भाषा का प्रयोग किया था।

राजपक्षे के सत्ता में आने के बाद, लिट्टे प्रमुख वी.प्रभाकरण ने अपने सम्बोधन में कहा कि यदि सरकार शान्ति के लिए कोई गम्भीर कदम नहीं उठाती है तो लिट्टे 2006 में अपना संघर्ष दोबारा शुरु करेगा। इस सम्बोधन के बाद से ही हिसंक घटनाओं में वृ(ि शुरु हो गई। इस हिंसा को रोकने के लिए नार्वे के विशेष दूत एरिक सोल्हेम और लिट्टे के वार्ताकार एटम बाल सिंघम ने श्रीलंका का दौरा कर शान्ति वार्ता का स्थल तय करने पर बात की। 7 फरवरी 2006 को श्रीलंका और सरकार के बीच 22-23 फरवरी को जिनेवा में शान्ति वार्ता करने पर सहमति बन गई। इस वार्ता में हिंसा में कमी करने पर सहमति बनी और हिंसक घटनाओं में कमी भी आई। लेकिन अप्रैल शुरु होते ही हिंसा भड़क उठी। इससे दोनों के बीच 19 से 21 अप्रैल के बीच होने वाली वार्ता खट्टाई में पड़ गई। लिट्टे ने इस वार्ता को 24-25 अप्रैल को आयोजित करने की मांग रखी जिसे सरकार ने मान लिया। लिट्टे ने सरकार से एक असैन्य वोट (Boat) की मांग की जिसमें उसके पूर्वी कमाण्डर वार्ता से पहले लिट्टे की अन्तरिम बैठक में भाग लेने हेतु उत्तरी इलाके में आ सके। श्रीलंका सरकार ने नौसेना की सुरक्षा निगरानी में ऐसी बोट उपलब्ध कराने की हामी भर दी। फिर अचानक लिट्टे ने अपनी वार्ता यह कहकर रद्द कर दी कि सरकार ने नौसैना बोट के लिए सहमति नहीं दी। इससे 24-25 अप्रैल को होने वाली शान्ति वार्ता भी रद्द हो गई और इसके बाद देश में हिंसक घटनाओं में बेतहासा वृद्धि हो गई।

हिंसा के मामलों में आई अत्यधिक तेजी एवं तत्पश्चात तमिलों और सिंहलियों के एक-दूसरे के प्रति दृष्टिकोण एवं रवैये में आए बदलावों ने श्रीलंका को एक बार फिर 2002 के युद्ध विराम समझौते से पूर्व की स्थिति में ले जाकर खड़ा कर दिया।

जनवरी 2007 में श्रीलंकाई सेना ने तमिल चीतों के विरुद्ध एक नऐ सैन्य अभियान की शुरूआत की। 19 जनवरी को श्रीलंकाई सेना ने पूर्व में लिट्टे का गढ़ माने जाने वाले वक्राई पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया। इसके फलस्वरूप लिट्टे की उत्तरी कमान का पूर्व में सक्रिय उसके गुट से सम्पर्क लगभग कट गया और रसद की सप्लाई भी बुरी तरह प्रभावित हुई। इस कारण पूर्व में पहले से कमजोर पड़ते लिट्टे का नियन्त्रण कमजोर हो गया।

फरवरी में सेना ने पूर्वी प्रान्त से लिट्टे का पूरी तरह से सफाया करने के उद्देश्य से एक नए सैन्याभियान की शुरुआत की। यह अभियान मुख्य रूप से विशेष बलों के छोटे दस्तों एवं कमांडो टुकड़ियों के माध्यम से चलाया गया। इस अभियान में सफलता के रूप में श्रीलंका की सेना ने 28 मार्च को लिट्टे के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अड्डे कोकाडिचोलाई पर तथा 12 अप्रैल को सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण राजमार्ग-5 पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। पिछले 15 वर्षो में यह पूरा राजमार्ग पहली बार श्रीलंका सरकार के कब्जे में आया। इसका एक अन्य परिणाम यह भी हुआ कि लिट्टे का प्रभाव बट्टीकलोआ के उत्तर-पश्चिम में थोपीगल्ला के निकट लगभग 140 वर्ग कि.मी. के जंगली इलाकों तक ही सीमित रह गया। इस अभियान के प्रत्युत्तर में लिट्टे ने अपने इतिहास का पहला वायुसैनिक हमला किया, जिसमें उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के करीब स्थित एक सैन्य शिविर को अपना निशाना बनाया। इसके ठीक बाद लिट्टे ने तथा कथित रूप से एक और हवाई हमला किया, जिसके फलस्वरूप विश्व की कई बड़ी एयरलाइन कम्पनियों ने श्रीलंका जाने वाली अपनी सभी उड़ाने अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी।

जून 2007 में एक सरकारी आदेश पर पुलिस ने सुरक्षा मामलों और उपायों को कारण बताते हुए सैंकड़ों तमिलों को कोलम्बो से निष्कासित कर दिया। हालांकि सरकार ने इस कदम को कोर्ट के आदेश पर वापस ले लिया। जुलाई में श्रीलंका सरकार ने ये घोषणा की कि उसकी सेना ने विद्रोहियों को थोपिगल्ला के जंगलों में उनके अन्तिम गढ़ से भी खदेड़ दिया और इस प्रकार पूर्वी प्रान्त को पूरी तरह लिट्टे से मुक्त करा लिया गया है।

सन् 2008 में श्रीलंका की सेना ने अपनी कार्यवाही श्रीलंका के उत्तरी इलाकों में भी शुरू कर दी। श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे के प्रमुख नौसैनिक ठिकाने वुलाइतिवू पर अपना अधिकार जमा लिया। कई दिनों तक श्रीलंका के उत्तरी भाग में लिट्टे और श्रीलंका की सेना के बीच सैनिक झड़पे होती रही जिनमें दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। सन् 2009 के आते-आते लिट्टे अत्यन्त कमजोर पड़ चुका था। सेना ने उसकी राजनीतिक राजधानी किलीनोच्ची पर अपना कब्जा कर लिया। अब लिट्टे सिर्फ जाफना द्वीप में ही सिमट कर रह गया। अप्रैल के आते-आते श्रीलंका की सेना ने जाफना में लिट्टे के सभी प्रमुख ठिकानों पर अपना कब्जा कर लिया।

श्रीलंका सेना द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 18 मई 2009 को लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण अपने सहयोगियों पोटटु अम्मन और सुसाई के साथ एक बख्तर बन्द वाहन से भागने की कोशिश की इस वाहन के ठीक पीछे चल रही एम्बुलैंस में लिट्टे के कई लड़ाके सवार थे। करीब दो घण्टे तक चली मुठभेड़ के दौरान विशेष बल के जवानों द्वारा किये गए हमलों में प्रभाकरण और उसके साथियों की मौत हो गई। इस मुठभेड़ में पोट्टु अम्मन, लिट्टे की समुद्री शाखा का प्रमुख सूसाई और लिट्टे की वायु शाखा का प्रमुख एंथनी भी मारा गया। लड़ाई में लिट्टे का राजनीतिक प्रमुख बालासिंघम नदेसन, शान्ति सचिवालय के प्रमुख एस. पुलीदेवन, ब्लैक टाइगर्स प्रमुख रमेश, पुलिस शाखा के मुिख्या इलंगो और शीर्ष कमाण्डर सुंदरम और कपिल अम्मन भी मारे गए। इसके बाद श्रीलंका के प्रधानमंत्री रत्नाश्री विक्रमशिंघे ने प्रभाकरण की मौत और लिट्टे के समाप्त होने की घोषणा कर दी। इस प्रकार श्रीलंका में तीन दशकों से लिट्टे का खूनी संघर्ष समाप्त हो गया।

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