सूफी मत क्या है ?

सूफी मत इस्लाम धर्म का ही एक अंग है; इसलिए अपनी पृष्ठभूमि के लिए इसे अन्तत: मुस्लिम धर्म ग्रन्थों का ही आश्रम ग्रहण करना पड़ता है। इस्लाम मत के विचारों और सिद्धान्तों से अनुप्राणित हुआ समझा जाता है।, फिर भी, भिन्न-भिन्न देषों और उनके महापुरूशों का प्रभाव निरंतर पड़ते रहने के कारण, इसके कई बाºय बातों का भी समावेश हो गया और इसके मौलिक सिद्धान्तों एक साधनाओं तक में बहुत कुछ मतभेद आ गया है। यही कारण है कि ईश्वर जगत् अथवा मानव सम्बन्धित दार्शनिक प्रश्नों पर सभी सूफी एक प्रकार का मत प्रकट करते हुए नहीं जान पड़ते और यही बात कभी-कभी उनकी धार्मिक साधना संबंधी विचारधारा की विभिन्नता में दीख पड़ती है।

सूफियों के कुछ सम्प्रदाय इस्लाम धर्म के दार्शनिक सिद्धान्तों और नियमों से दूर जाना नहीं चाहते जबकि कुछ संप्रदाय इस्लामी सिद्धान्तों और नियमों की कुछ परवाह नही करते और स्वतंत्र मार्ग के अनुगामी दिखलायी पड़ते है। सूफियों में इस सम्प्रदाय स्वछन्द हो कभी-कभी ‘दीने-इस्लाम’ के मार्ग से भटकते हुए भी संकोच नहीं करते ना ही खेद प्रकट करते है। वह स्वछन्द रूप से अपनी विचारधारा के प्रवाह में बहते रहते हैं संक्षेप में सूफी मत के बारे में हम यह कह सकते हैं कि यह विश्व धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ। दिव्य-प्रेम की आड़ में सूफी मत ने विश्व प्रेम का पाठ पढ़ाया है, वह मनुष्य समाज के लिए ही नहीं अपितु प्राणिमात्र के लिए भी एक वरदान के स्वरूप में रहा है।

सूफी मत के प्रारंभिक पैगंबर हज़रत मुहम्मद के जीवन की कतिपय अलौकिक अनुभूतियों पर आधारित थे। उनके जीवन में दो ऐसी दिव्य घटनाएं हुई थी जो उत्यंत रहस्यपूर्ण एवं चमत्कारी थीं। पहली घटना हीरा पर्वत की कंदरा में घटित हुई थी जब हज़रत मुम्मद को ईश्वर का दिव्य संदेश प्राप्त हुआ था। दूसरी घटना थी मक्का से येरूसलम की रात्रि यात्रा जब उन्हे दिव्य स्वरूप का सामीप्य-लाभ हुआ था। उनके इस अद्भुत अनुभवों को प्रारम्भिक सूफियों ने अपनी उपासना एवं आचरण की आधारशिला बनाया पैगंबर की चरित्र उनका आदर्श था। उनके द्वारा उपदिष्ट सादगी, सदाचार एवं ईश भक्ति के संदेश उनके मूलभूत सिद्धान्त बने। उनका अनुकरण करते हुए सूफी साधक तपश्चर्या, प्रभु-उपासना एवं लोक कल्याण के कार्यो में रत हुए। सांसारिक कृत्यों की उपेक्षा कर उन्होंने अपना जीव ईशोपना हेतु समर्पित कर दिया। 

इस्लाम के पैगम्बर हज़रत मुहम्मद के जीवन-काल में सूफी मत का सूत्रपात हो गया था। हज़रत मुहम्मद साहब के देहावास हो जाने के पश्चात् उनके उत्तराधिकारी खलीफाओं का युग आरंभ हुआ और वे इस्लाम धर्म का उत्तरोत्तर प्रचार-प्रसार करते गये तथा उनके प्रयासों के फल स्वरूप वह अरब देश से लेकर क्रमशः शाम, फिलिस्तीन, मिस्त्र, ईरान, स्पेन, तुर्किस्तान अदि विभिन्न देशों तक बहुत जल्दी ही इस्लाम धर्म फैल गया।

तसव्वुफ या सूफी विचारधारा- तसव्वुफ या सूफीवाद की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों ने विभिन्न प्रकार के विचार कर तसव्वुफ को विभिन्न परिप्रेक्ष में देखने का प्रयास किया है। विचारको का कथन है कि इस्लाम में इसका समावेश ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म तथा हिन्दू धर्म व पारसी धर्म से हुआ। 

प्रो0 लुईस मेसीयनुन, जो इस्लामी तसव्वुफ के अध्ययन के लिए विशेष रूप से ख्याति प्राप्त विद्वान् माने जाते है, इन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि तसव्वुफ का श्रोत मूल रूप से ‘हदीस’ और ‘कुरान’ है और यह आंदोलन शुद्ध रूप से इस्लामी है।

जुनेद का मत है कि- ‘‘तसव्वुफ परमात्मा के द्वारा व्यक्तित्व का लोप और ईश्वरत्व को जाग्रत करने का नाम है।’’ मआरूफ अल करखी का कथन है कि हक़ (सत्य) को जानना सम्पत्ति का त्याग करना ‘तसव्वुफ’ हैं।

सूफी मौलाना मुग़ीसुद्धीन (उज्जैन) का कथन था- ‘‘ईश्वर को एक मानों सम्पूर्ण सृष्टि को उसका परिवार समझो दोनों का प्रेम हृदय में रखकर सेवा करते रहे। यही तसव्वुफ है।’’

अबू अली करमीना के अनुसार- ‘‘तसव्वुफ उत्कृष्ट नैतिकता का नाम है और उत्कृष्ट कार्य वह है, जिससे बन्दा (दास) सभी दशाओं में ईश्वर को पर्याप्त समझता है। ईष्वर की इच्छा से सन्तुश्ट होता हैं।’’ शेख नसीरूद्धीन चिराग देहलवी के विचारानुसार ‘‘तसव्वुफ सत्य मार्ग एवं अच्छे कर्म का नाम है।

अबुल हसन अलनूरी के अनुसार ‘‘सूफी मत’’ संसार के प्रति विरक्ति और परमात्मा के प्रति प्रेम के गम्भीर धार्मिक भावों का प्रकाशन है। गुरुनानक वाणी है कि ‘‘जिनको मारफते हक़ (सत्य का ज्ञान) मिलता है, वही सूफी है और उन्हीं का दरबार उपस्थिति के योग्य है।

दूसरे शब्दों में ‘‘तसव्वुफ’’ उस मार्ग का नाम है, जिसके अनुसार एक व्यक्ति समस्त सांसारिक चितांओं से मुक्त हो कर सम्पूर्ण रूप से खुदा (ईश्वर) के समक्ष स्वयं को समर्पित कर दे।’’

सूफी मत ईश्वर के लिए जीवन-मरण है। सूफी मत इस्लाम धर्म की वह उदात्त आध्यात्मिक शाखा है जिसमें ब्रह्मानुभूति के लिए माधुर्य भाव का विशेष प्रश्रय दिया गया है। तसव्वुक वह ज्ञान है जो ईश्वर के अस्तित्व को समझने में सहायता करता है रचना और रचयिता दोनों में प्रेम उत्पन्न करता है।

मूल रूप से तसव्वुफ कुरान के आदेषानुसार पैगम्बर हजरत मुहम्मद के व्यावहारिक जीवन द्वारा अपनाये गये उस मार्ग का नाम है, जिसके अन्तर्गत नबी के उत्तम चरित्र एवं मधुर व्यवहार को अपने जीवन में स्थापित करना तथा तज़किए नफ्स के अन्तर्गत अपनी आत्मा को शुद्ध करना तथा इन्द्रियों के प्रभाव से मुक्ति पाने के लिए भय और आशा के साथ इबादत (आराधना) में लीन होकर, खुदा से प्रेम एवं निकट सम्बन्ध स्थापित करने के लिए तथा उसकी सहमति प्राप्त करने के लिये, स्वयं को उस पर समर्पित करने की भावना को स्वयं के अन्दर उत्पन्न करने तथा इसे स्थापित करने की वह विधि जो नबी हजरत मुहम्मद ने अपनाई व बताई, उस मार्ग का अनुसरण करने का नाम तसव्वुफ हैं।

सूफियों ने अपने हर कार्य एवं सुधार को कुरआन और हदीस द्वारा दी गयी प्रेरणा के अनुसार ही किया। उनका कहना है कि कुरान में खुदा ने कई स्थानों पर कहा है, ‘‘तुम खुदा से मोहब्बत (प्रेम) करो, खुदा तुमसे मोहब्बत (प्रेम) रखता है।’’ जिसका वर्णन कुरान में इस प्रकार किया गया है:- भावार्थ - ‘‘अगर तुम सच्चे मन से अल्लाह से प्रेम रखने वाले है। तो तुम मेरी पैरवी करो (मेरे बताये हुए मार्ग को प्रशस्त करने) इससे केवल यही नहीं होगा कि तुम अल्लाह से प्रेम करने वाले हो जाओगे, बल्कि खुदा भी तुमसे प्रेम करने लगेगा।

तसव्वुफ का मूल उद्देश्य यही था कि वह अपनी इबादत (आराधना) में इस प्रकार की संवेदना उत्पन्न कर कि वह खुदा के समक्ष समर्पित हो कर उससे साक्षात्कार करें।

सूफी शब्द की व्युत्पत्ति

सूफी शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर सूफी शब्द की व्याख्या करते हुए प्रकाष डाला है तथा उनमें मतभेद भी रहा है। सूफी शब्द का अर्थ समझना सरल नहीं है। इसके दो कारण है- प्रथमत: इसकी अलग-अलग परिभाषाएँ और व्याख्याएँ की जाती रही हैं। सूफी तथा तसव्वुफ (सूफी विचारधारा) की कितनी परिभाषाएँ की गयी है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि शेख फरीदुद्दीन अत्तार (1230 ई0) में सूफी संत से सम्बन्धित अपनी पुस्तक ‘‘तज़किरातुल-औलिया’’ में इस प्रकार की सत्तर परिभाषाओं का वर्णन किया है। द्वियीयत:, प्रारंभ में सूफी मत इस्लाम के अन्तर्गत कोई ऐसा संगठित सम्प्रदाय नही था कि उसके मतों और सिद्धान्तों को एक सुसंगठित नियमित प्रणाली के अन्दर रखा जाए।

विभिन्न प्रकार की युक्तियों द्वारा सूफी शब्द की व्युत्पत्तियों को उचित ठहराने की कोषिष की गयी है, प्राचीन अथवा आधुनिक अवधारणाओं की व्याख्या से परिलक्षित होता है कि विद्वानों ने अपने-अपने दृश्ट्रिकोण से उसे रूप देने की चेश्टा की गयी है, जिससे हर समय सूफियों के प्रति न्याय नही हुआ है। इसी को लक्ष्य करते हुए अलहुज्विरी ने कहा है कि सूफियों के लिए सूफी सिद्धान्त सूर्य से भी अधिक स्पष्ट है, अतएव उन्हें किसी प्रकार की व्याख्या की आवश्यकता नहीं है।

सूफी शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विचारकों व विद्वानों ने निम्नलिखित शब्दों पर विभिन्न सूफी मत सम्बन्धी पुस्तकों में तर्क-विर्तक तथा धारणाऐं प्रस्तुत की है- सफा, अहअल-सुफ्फाह, सफ, सूफाह, बनूसूूफा, सफवतुकलज़ा, सेफिया, सफाना एवं सूफ। 

शेख वस्तुत: उन्हें ही कहना चाहिए, जो मनसा वाचा एवं कर्मणा पवित्र कहे जा सकते है। एक दूसरे मत के अनुसार सफा शब्द यहाँ निष्कपट भाव के लिए व्यवहृत हुआ है, इसलिए सूफी ऐसे व्यक्ति को कहना चाहिए, जो न केवल परमात्मा के प्रति निश्छल भाव रखता है और तदनुसार सारे प्राणियों के साथ भी शुद्ध बर्ताव करता है, अपितु जिसके लिए परत्मा स्वयं भी स्नेह प्रदर्शित करता है।

सफा कतिपय विद्वान सूफी शब्द की व्युत्पत्ति सफा शब्द से मानते है। सफा (पवित्रता) शब्द के सम्बनध में शेख अल्हुज्विरी का मानना है कि सफा में ही सूफी शब्द बना है। पवित्र सदाचारी लोग सूफी कहलाए। पवित्र एवं सदाचारी लोग सूफी कहलाए। प्राय: सूफी साधकों ने सफा से ही सूफी शब्द की व्युत्पत्ति को उचित माना है।

अल्हुज्विरी जी ने सफा शब्द से ही सूफी से माना तो है, परन्तु उनका कहना है कि अगर सफा शब्द को स्वीकार लिया जाए तो उससे सूफी शब्द नहीं बनेगा, बल्कि उसका रूप सफवीं होगा।

इस धारा के विद्वानों के अनुसार सूफी अपने मन को सांसारिक मायामोह और छलकपट से साफ रहता है। सूफी का विश्वास है कि परमात्मा की छाया मन के दपर्ण पर तभी पडे़गी जब वह संसार के मोहमाया से अपने को साफ रखेगा। यही कथन आ0 परशुराम चतुर्वेद जो न भी कहा है तथा इस कथन का समर्थन श्री ए0जे0 अरबेरी ने निम्न शब्दो में किया है- तसव्वुफ की निष्पत्ति अलकुषैरी के अनुसार सफा शब्द से हुई है, जिसका अर्थ शुद्ध होना है और इसका संबंध सूफ वस्त्र से नही है। शेख फरीदुद्दीन अत्तार अपनी पुस्तक ‘‘तज़किरातुल-औलिया’’ में सूफी शब्द की उत्पत्ति सफा शब्द से स्वीकार करते है। परन्तु इस पर भाषा शास्त्रियों ने यह आपत्ति प्रकट की हैं।

 व्याकरण की दृष्टि से सफा शब्द से सफवी रूप होगा न कि सूफी। व्याकरण के नियमों के अनुसार यह व्युत्पत्ति ठीक नहीं है क्योंकि सफ्फी और सफा की धातुएं भिन्न-भिन्न है। सफा की धातु सफ़व और सूफी की धातु सूफ है। प्रसिद्ध विद्वान एवं सूफी सन्त गाजली तथा इस्लाम का विष्वकोश भी पुष्टि करता है कि सफा शब्द से सूफ शब्द की उत्पत्ति व्याकरण के नियमों के प्रतिकूल है। 

अहल-अल-सूफ्फा:- कुछ विद्वानों के विचारनुसार पैगम्बर मोहम्मद साहब के समय मदीने की मस्जिद नबवी के सामने सूफ्फा (चबूतरा) पर आसन लगाने वाले भक्त (भक्त) अहल-अल्-सूफ्फा शब्द से सूफी शब्द बना है। कालान्तर में ऐहले सुफ्फाह ही सूफी कहलाए। इस व्युत्पत्ति में यह दोश है कि सुफ्फाह से सुफ्फी शब्द बनेगा न कि सूफी नहीं। यही कथन डॉ0 राजबाला की पुस्तक में भी अंकित है-मदीने की मस्जिद के सामने बेंच पर बैठने वाले भक्तों अहल-अल-सुफ्फा के सुफ्फाह शब्द से सूफी शब्द बना है।

सफ्फ-ए-अव्वल:- कुछ विद्वानों ने सफ्फ-ए-अव्वल के सफ्फ शब्द से सूफी शब्द की संगति लगायी है। इसका अर्थ प्रर्थाना में ईमान लाने वालों की प्रथम पंक्ति से है। इसके सम्बन्ध में कहा जाता है कि सफ्फ शब्द से सफ्फी शब्द बनेगा सूफी नहीं।

सूफाह:- गियामुल लुगात में सूफाह से सूफी शब्द की उत्पत्ति मानी गयी है। कहा जाता है कि जाहिलिया काल में अरबों की एक ऐसी जाति थी, जो संसारिक व्यापारों से अलग होका मक्का देवालय की सेवा में नियुक्त हो गयी।

बनूसूफा:-  कुछ लोग बनूसूफा नामक एक यायावर (घुमक्कड़) जाति सूफा शब्द से सूफी शब्द की व्युत्पत्ति बताते है। उका तर्क है कि सूफी फकीर भी अपने षिश्यो के साथ विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते थे।

सोफिस्ता:- कतिपय विद्वानों ने ग्रीक शब्द ‘‘सोफिस्ता’’ में ‘‘सूफी’’ और थियोसोफिया शब्द से तसव्वुफ की व्युत्पत्ति करने की चेश्ट की है।

शोफिया:- कुछ विद्वान ग्रीक भाषा के शब्द सोफिया (ज्ञान) से सूफी शब्द की व्युत्पत्ति मानते हैं। सोफिया, सूफी एवं स्वभास क्रमष: ग्रीक, अरबी एवं संस्कृत शब्द है। तीनो का ही अर्थ- ‘‘आत्मज्ञान’’ है। सूफी अनुभव सिद्ध ज्ञान को महत्वपूर्ण मानते है। वे अन्तर्दृष्टि से हृदय में ईश्वरीय प्रकाश का अभेद रूप से साक्षात्कार करते है।

सूफी शब्द का सोफिया से उत्पन्न है, ऐसे भी कुछ विद्वानों ने कहा है, जिसका अर्थ ‘ज्ञान’ होता है और यदि इसके आधार पर विचार किया जाय, तो सूफ़ियों को हम ‘ज्ञानी’ या ‘परमज्ञानी’ तक समझ सकते है। कुछ लोग सूफी शब्द की व्युत्पत्ति भावनात्मक संज्ञाओं से जोड़ते है, जिनका तात्पर्य पवित्रता, निश्छलता और ज्ञान से है।

सफ:- कुछ विद्वानों का यह कहना है कि सूफी शब्द सफ से उत्पन्न है, जिसका अर्थ ‘सबसे आगे की पंक्ति’ अथवा प्रथम श्रेणी किया जाता है और इसके अनुसार सूफी केवल उन्ही व्यक्तियों को कहा जा सकता है, जो कयामत के दिन ईश्वर के प्रियपात्र होने के कारण सबसे आगे खड़े किये जायेंगे और जिनमें इस बात की ओर संकेत करने के लिए कुछ विशेषता भी होनी चाहिए।

अन्तिम निर्णय के दिन आचरण व कर्म के कारण अन्य लोगो के अलग एक पंक्ति में खड़े किए जाएंगे, उन्हें सूफी कहते हैं। यह भी त्रुटिपूर्ण है क्योंकि सफ से सफी बनेगा न कि सूफी। प्रसिद्ध विद्वान एवं सूफी सन्त गजाली का विचार है कि व्याकरण के नियमों के अनुसार सफ से सूफी शब्द की रचना हो ही नहीं सकती।

सूफ:- सूफी शब्द को सूफ शब्द का रूपान्तर मानने वाले विद्वान अधिक हैं। अरबी शब्द सूफ का अर्थ परम अथवा ऊन अबू नस्र अल सर्राज (988 ई0) एवं इब्न खल्दून सूफ (उन) से सूफी शब्द की व्युत्पत्ति मानते हैं। यह समूह सामान्यजन के विपरीत अच्छे वस्त्र के स्थान पर मोटे ऊनी वस्त्र पहनते थे। इस्लाम के अभ्युदय के पूर्व सूफ का अर्थ ऊन के मस लगाने में किया जाता था जिसे वैरागी नामक धारण करते थे। अल-सर्राज ने अपनी पुस्तक ‘‘किताब अल-लुमा’’ में सूफी शब्द पर विचार करते हुये कहा है कि सूफी शब्द अरबी के सूफ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ ऊन है।

यह पहले-पहल केवल उन्ही व्यक्तियों के लिए प्रयोग में आता था, जो अपने पहनावे के लिए मोटे ऊनी वस्त्रो का व्यवहार किया करते थे। वे लोग ऐश्वर्य या भोग-विलाम से सदा दूर रहा करते थे और अत्यन्त सीधा-साधा जीवन व्यतीत करते हुए केवल अध्यात्मिक साधनाओं में लगे रहते थे।

इस्लामी साधकों का एक वर्ग सांसारिक सुखोपभोग के उपादानों को त्याज्य समझता था। सामान्य धार्मिक कर्मकांड एवं रूढ़िया भी उनके लिए निरर्थक थीं। इस वर्ग के साधक मोटे ऊन का कपड़ा और उन की ही ऊची टोपी पहना करते थे। उनकी यह वेश-भूशा उसी प्रकार त्याग एवं प्रमोपासना का प्रतीक बन गई जिस प्रकार भारत में गेरूए वस्त्र त्याग एवं संन्यास के प्रतीक बन गए। भाशा शास्त्री इस व्युत्पत्ति को सही मानते है। अल सर्राज़ ने कहा है कि ऊन का व्यहार अथवा उपयोग पैगम्बर सन्त एवं साधक करते आये हैं। इस बात की पुश्टि हदीसों से भी होती हैं। बोएल्द ने भी इस व्युत्पत्ति को ठीक माना है। अनेक सूफ़ियों, भाशा वैज्ञानिकों और विद्वानों ने इसी मत को समर्थन दिया है।

अलबरूनी (10 शताब्दी) के समय में भी यही मान्यता थी तथा फारसी साधकों को पष्मीनापोष (ऊनी वस्त्र धारण करने वाला) कहा गया है। इससे भी इस मत की पृश्टि होती है। प्रसिद्ध विद्वान आरबेरी, निकोल्सन, ब्राउन, मारगोलिध, डूब्ने खलदून प्रो0 नेाऐल विके मीर वलीउद्दीन आदि सभी ने सूफ शब्द से ही सूफी की व्युत्पत्ति करे माना है।

अल् हुज्विरी ने लिखा है कि हज़रत मुहम्मद साहब और उनके साथियों को सूफ कपड़ा प्रिय था। हजरत शेख शहाबुद्दीन भी सूफी शब्द की उत्पत्ति सूफ कपड़े से ही मानते है। उन्होंने हमन बस्रो का एक कथन प्रस्तुत करते हुए लिखा हैं- सदैव से पवित्र और सात्विक जीवन बिताने वालों को सूफ का ही प्रिय रहे हैं। ऊनी वस्त्र धारण का ईश्वर के चिन्तन में एकान्त जीवन व्यतीत करने वाले साधकों के जीवन को दृष्टिगत रखकर उन्हे सूफी कहा जाए तो कोई असंगति नहीं होगी।

उपयुक्त सभी मतों से यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न विद्वानों एवं साधकों ने विविध युक्तियों एवं तर्को के द्वारा सूफी शब्द की विविध अर्थ दिषाए प्रस्तुत की है तथा सूफी शब्द की व्युत्पत्ति को संगत व समीचीन ठहराने का सम्भव प्रयत्न किया है। समग्र एवं व्यापक अर्थ में सूफी उन मुसलमान सन्तों को कहते हैं जो प्रेमपरक राग-तत्व को सर्वोच्च मानकर अपने को प्रिय और परमात्मा को प्रेयसी मानकर मोक्ष का अन्तिम सीमान्त मानते हैं। सूफी मत मात्र सांसारिक तथा आध्यात्मिक चिन्तन अथवा इस जगत और परमात्मा को समझने का प्रयास मात्र है। यह एक व्यवहारिक जीवन-दर्शन है जिसमें रहस्यवादी आत्मा, परमात्मा, संसार आदि को समझाने की चेष्टा करने के साथ ही साथ उसी के समान अपने जीवन को ढालने के लिए प्रयत्नशील भी रहता है। सही मायने में सूफी परम्परा इस्लाम की कट्टरता के विरूद्ध एक प्रतिक्रिया थी, जो कालान्तर में आन्दोलन का स्वरूप धारण करके एक जीवन-दर्शन के रूप में सर्वत्र प्रतिष्ठित हो गया।

सूफी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग

सूफी शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम कब और किसके लिए हुआ यह विवादास्पद है। मौलाना जामी के अनुसार सर्वप्रथम सूफी शब्द का प्रयोग कूफा के शेख अबू हाशिम कूफी के लिए प्रयुक्त हुआ। आ0 परशु राम चतुर्वेदी ने भी ‘सूफी काव्य संग्रह’ प्रथम सूफी शेख हाशिम का ही नाम उल्लेखत किया है। इनका मोसल नगर में हुआ था, किंतु वे शाम देश के कूफा नगर में निवास करते थे और मेसोपोटामिया के रमला नामक स्थान में इन्होंने एक खानकाह (मठ) कि स्थापन की थी।

मासिओं ने अबू हाशिम के साथ कूफा में एक कीमियागर ज़ाबिर इब्न हेयान का भी उल्लेख किया है। परन्तु अधिकांश विद्वान जामी के मत से सहमत है शेख अबूर हाशिम यहॉ पर विक्रम की 9वी शताब्दी के आंरभ काल तक वर्तमान रहे। परन्तु; उनके विषय में इससे अधिक कुछ भी ज्ञात नहीं होता, अपितु इतना ही पता चलता है कि तब से लगभग 50 वर्षों के भीतर इस नाम का पूरा प्रचार हो गया और बहुत से व्यक्ति इसके द्वारा अभिहित किये जाने लगे।

सूफी संन्तों में सन्यास जीवन और रहस्यवादी प्रवृति का समन्वय उमैय्या वंश के खलीफाओं के शासन के अन्तिम दिनों दिखायी देता है। अब्बास-वंश के शासन काल का आंरभ हो चुका था। सूफी मत के इतिहास का यह प्रथम युग था, जो हिज़री सन् की दूसरी शताब्दी के अंतिम चरण तक पता चलता रहा और जिसमें वर्तमान समय में कम से कम आधे दर्जन के नाम और संक्षिप्त से परिचय अभी तक सुरक्षित है।

अब्वासी सलीफाओं के शासन के प्रारम्भिक काल में सूफी शब्द का प्रयोग अधिक होने लगा। उस समय सूफी शब्द व्यक्तियों के नाम के साथ सन्तत्व की उपाधि के रूप में जुड़ा रहता था, किन्तु पचास वर्षो के भीतर ही इसका प्रयोग संपूर्ण ईराक के रहस्यवादी साधकों के लिए होने लगा।

भारत में प्रथम सूफी

प्रामाणिक रूप से नहीं कहा जा सकता कि सर्वप्रथम कौन सूफी सन्त भारत में आये पर ऐसी मान्यता है कि सर्वप्रथम भारतवर्ष में मुस्लिम तीर्थ यात्रियों का एक दल शेख बिन मलिक ने नेतृत्व के करडगनोर (मालावबार) में आया और स्थानीय शासक को धर्मोपदेश द्वारा मुमलमान बनाने में सफल हुआ। 16वीं शताब्दी के एक मुसलमान इतिहासकार के अनुसार शेख शरफ बिन मलिक ने मालाबार राज्य को धर्मोपदेश द्वारा मुसलमान बनाने में सफल हुआ। लोगों का यह विश्वास भी है कि यह घटना मुहम्मद साहब के जीवन काल की है। उत्तरी भारत में पहले पहल आने वाले सूफियों में शेख इस्माइल का नाम आता है यह 1005 ई0 में लाहौर आये। इन्होंने बहुत से लोगों की अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करके मुसलमान बनाया। शेख इस्माइल का विद्वानगण भारत के प्रथम सूफी के रूप में मानते है।

भारत में आने वाले प्रारम्भिक सूफ़ियों में सबसे ज्यादा जिनकी प्रसिद्ध हुयी। उनमें सूफी हसन बिन इसमान अलीअल् हुिज्वेरी नाम आत है कहीं-कहीं पर तो इन्हें भारत में आने वाले सर्वप्रथम सूफी के नाम से भी उल्लेखित किया गया है यही इनकी प्रसिद्धी के कारण कहा गया है अल्हुज्विरी अफगानिस्तान देश गजनी नगर के निवासी थे और इस्लाम धर्म के एक बहुत बड़े विद्वान तथा धर्माचार्य थे। इनको दाता गंज बख्श भी कहा जाता है। सूफी मत पर इनकी रचना ‘कश्फुल महजूब’ प्रसिद्ध हैै।

इन्होंने ऐसा लिखा है कि वह कैदी बनाकर वहां लाया गया था। इनकी इस रचना में सूफी मत का विशद् विवेचन प्रस्तुत किया है। अबुल हसन अल्हुज्विरी के शिष्य फज़ल मुहम्मद बिन अलहसन अल्हुिज्वेरी से सूफी मत की शिक्षा ग्रहण की थी। बहुत से सूफ़ियों का वह विश्वास है कि अल्हुज्विरी भारतवर्ष के सन्तों के ऊपर अधिष्ठित है और यद्यपि उनकी मृत्यु हो गयी है फिर भी कोई सन्त बिना उनकी आज्ञा के भारत वर्ष में प्रवेश नहीे करता। सूफी मत के दृष्टिकोण से अल्हुिज्वेरी प्रसिद्ध जुनैद सिद्धांतो का मानने वाले थे और लगभग 60 वर्षो तक वे भ्रमण एवं धर्म प्रचार में लग रहे।

उन्होंने अविवाहित जीवन व्यतीत किया था और उनके मर जाने पर भी उनका नाम एक उच्चकोटि के वली की भॉति सदा आदर तथा सम्मान के साथ लिया जाता रह है। उनकी मृत्यु लाहौर नगर में हुई जहाँ पर उनकी समाधि आज भी वर्तमान है।

मोहम्मद बिन कासिम (711ई0) के सिन्ध व पंजाब विजय से लेकर मेहमूद गजनवी के आक्रमण के दौ सौ वर्ष पश्चात् तक कई सूफी सन्तों, धर्म प्रचारकों के नाम सुनाई देते है यथा-सय्यद नयर शाह, बाबा फरवरअलदीन, शेख, इस्माईल तथा शेख् अल्हुिज्वेरी आदि।

ईसा की 13वीं -14वीं शताब्दी में सूफी सन्तों का भारत देश के लगभग सभी भागों में आगमन हो गया था जैसे- सिन्ध, पंजाब, कश्मीर, दक्षिण भारत, बंगाल, उत्तरी भारत, कच्छ, गुजरात, राजस्थान तथा मालवा।

सूफी सम्प्रदायों की संख्या के बारे में मतभेद है, यों तो 175 तक मानी जाती है। 16वीं शताब्दी में अबुल फज़ल ने ‘‘आइने-अकबरी’’ में प्रचलित 14 सम्प्रदायों का उल्लेख किया है :- हबीबी, तफूरी, कख्र्ाी, सक्तों, जुनैदी, काजरूनी, तूसी, फिरदौसी, जैदी, अयाज़ी, अदहमी, हुबेरी, सहरवर्दी और चिश्ती।

उपरोक्त सम्प्रदायों के अतिरिक्त कादरी, शत्त्ाारी नक्शबन्दी मदारी आदि सम्प्रदायों ने भी भारत के विभिन्न भागों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 

सूफी मत के चार मार्ग

भारतीय सूफीमार्ग की चार मंजिले और उन मंजिलों की चार अवस्थायें मानते हैं। सूफियों ने इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चार प्रकार की साधनावस्थाओं को निश्चित किया है:-
  1. शरीअत
  2. तरीक़त
  3. हक़ीक़त
  4. मारिफत
1- शरीअत- इस्लाम धर्म और ग्रन्थों में वर्णित तथा निर्धारित विधियों एवं कानूनों को मानना शरीअत कहलाता है अथार्त इसमें धर्मग्रन्थ के बताये कायदे कानूनों और पाबन्दियों को माना है। इस मंजिल में साधक की पृथक अवस्था बनी रहती है जिसे सूफी ‘नासूत’ कहते हैं। 

2- तरीक़त- हदय की पवित्रता, स्पष्ट तथा शुद्ध मन द्वारा ध्यान-चिंतन की अवस्था तरीकत है। इसमें साधक पवित्रता का सहारा लेता है। भौतिक जगत् की तुच्छताओं व वर्जनाओं से वह ऊपर उठ जाता है और उसमें देवदूतों के गुण आ जाते हैं। इस मंजिल में साधक की जो अवस्था रहती है उसे सूफी ‘मलकूत’ कहते हैं। 

3- हक़ीक़त- जिस अवस्था में अल्लाह अथवा परम-तत्व की एकता तथा उसके गुणों और उसकी कृपा का ज्ञान अनुभव किया जाए वह हक़ीक़त कहलाती है। हक़ीक़त का मतलब परम सत्य है। इस अंतिम मंजिल में साधक की जो अवस्था होती है उसे ‘लाहूत’ कहते है। जायसी ने इन चारों मंजिलों की ओर संकेत ‘पद्मावत’ में किया है। 

4- मारीफत:- सत्यानुभूति जनित सिद्धावस्था मारीफत है। परमात्मा के मिलन के मार्ग की सारी बाधायें इस मंजिल में दूर हो जाती है। साधक राग-विराग से परे हो जाता है और उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है। साधक की यह अवस्था ‘‘जबरूत’ की है। इसमें तीनों प्रकार के ज्ञान के सत्य का बोध निहित है। इसके दो रूप हैं-

मारीफत -
  1. हाली
  2. इल्मी
मारीफत के दो भेद हाली व इल्मी हैं, जिसमें हाली अवस्था में ईश्वर की साधना संगीत नृत्य आदि माध्यमों से की जाती है अनेक सूफी सन्तों ने इसी मार्ग को अपना कर मोक्ष प्राप्त करने के लिए फना और फकद् (त्याग व प्राप्ति पक्ष का) अर्थात् ईश्वरीय सत्ता में विलीन होकर अहंकार को छोड़कर परम तत्व को पाने के लिए इनका आश्रय लिया है।

इश्क़े मज़ाजी और इश्क़े हक़ीक़ी- सूफी मत में प्रेम का अत्यधिक महत्व है। सूफी इश्क़ मजा़जी को इश्क़ हक़ीक़ी का सोपान मानते हैं। मौलाना जामी कहते है कि इश्के़ मज़ाज़ी पुल के समान होता है। पुल केवल पार जाने के लिए होता है, रहने के लिए नहीं होता। अतएव साधक को इश्क़ मज़ाज़ी का सहारा लेकर इश्क़ हक़ीक़ी तक पहुँचना है। इश्क़ हक़ीक़ी में सब्र की कोई सीमा नहीं होती।

भारतवर्ष में ब्रह्मनान्द का ज्ञान कराने के लिए रत्यानन्द की उपमा देने की प्रथा उपनिषद् काल से चल चुकी है। अफलातून ने शरीर-सम्पर्क रहित प्रेम की कल्पना करके नर-नारी के सम्बन्ध को पवित्रता के धरातल पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया था।

सूफी मत में इश्क़े मज़ाजी और इश्क़े हक़ीक़ी का उल्लेख तो रहा है, परन्तु कुछ सूफी सन्त इश्क़े मज़ाज़ी को अच्छा नहीं समझते। सूफी ‘लौकिकता’ से ‘अलौकिकता’ की ओर जाने वाला पवित्र और सरल मार्ग है जो कि व्यक्ति को अल्लाह से सीधा जोड़ने का कार्य करता है। सूफी ईश्वर को प्रियतम (माशूक) मानते हुए स्वयं प्रेमी (आशिक) के समान उससे अनंत प्रेम करते हैं।

सूफियों ने इस प्रेम की सिद्धि के लिए इश्क़ मज़ाज़ी (सांसारिक प्रेम) की भी छूट दी क्योंकि इश्क़ हक़ीक़ी (आध्यात्मिक प्रेम) तक पहुँचने की सीढ़ी है। सूफी इश्क़ मज़ाज़ी को इश्क़ हक़ीक़ी का सोपान मानते हैं। इसकी परम्परा अति प्राचीन है, ईसाई सन्त ईसा मसीह को दुल्हा और अपने को उनकी दुलाहिन कहा करते थे। सूफी संत लौकिक प्रेम को ईश्वरीय प्रेम का साधन समझते है। अत: वे लौकिक प्रेम भी करते थे तथ लौकिक कथाओं के माध्यम से आध्यात्मिक प्रेम की व्यंजनों किया करत थे।

सूफियों के अनुसार प्रेम अत्यधिक विरह विशिष्ट होता है। यही प्रेम-तत्व साधक को प्रेरणा देता है। इसी को पाकर वह उन्मुक्त हो उठता है। रूमी ने इस स्थिति का बडे़ सुन्दर ढंग से चित्रण किया है। प्रेम की ज्वाला ने ही मुझे प्रज्वलित किया है, उसी की मदिरा ने मुझे उन्मुक्त बनाया है। यही दिव्य-सौन्दर्य साधक को सिद्धि के द्वार पर ले जाता है अर्थात् प्रेम सच्चे प्रेमी को कभी थकने नहीं देता, उसे वह नित्य नवीन शाश्वत सौन्दर्य की अनुभूति कराता रहता है और वह प्रत्येक पद पर नित्य नयी विभूति प्रदान करता है। प्रसिद्ध सूफी सन्त और दार्शनिक इब्नुल अरबी ने स्त्री-प्रेम को ईश्वरीय प्रेम का प्रतीक माना है। 

अल्-गजाली ने लिखा है कि स्त्री-प्रेम को ईश्वरीय प्रेम को प्रतीक माना है। अल् गजाली ने लिखा है कि स्त्री-पुरुष का प्रेम उस ईश्वर-मनुष्य प्रेम के लिये एक पुल मात्र है। ईश्वर की प्राप्ति के लिये ही इसकी उपयोगिता है, उसकी अनुभूति कर लेने के बाद, इसकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है। बुल्ले शाह ईश्वर-भक्ति अथवा प्रेम में सराबोर थे किन्तु उन्होंने इश्क़ मजा़जी के विषय में भी कहा है:-

जिचर ना इश्क़ मजा़जी लागे,
सूई सीवे ना बिन धागे।
इश्क़ मजाज़ी दाता है,
जिस पिछो मस्त हो जाता है।

(इश्क-मजा़जी का अपनाए बिना कोई भी मनुष्य इश्क़-हक़ीक़ी (ईश्वर-प्रेम) में उसी प्रकार असफल हो जाता है जिस प्रकार सुई के बिना धागे के नहीं सीती। इश्के़-मजाजी तो वह दाता है जिसके प्रताप से मनुष्य को आनन्दानुभूति होती है।)

सूफियों में एक कहावत प्रचलित है- ‘‘अल मज़ाज़ो कंतरतुल हक़ीक़ी’’ मनुष्य जब तक सांसारिक प्रेम को नहीं जान पाता उसके लिए आदर्श प्रेम तक पहुँचना सम्भव नही। सूफियों के अनुसार जो कुछ सौन्दर्य है वह ईश्वर का सौन्दर्य (हुस्न) है। अतएव जहाँ भी सौन्दर्य के दर्शन होते हैं, वहाँ हमें ईश्वर के दर्शन होते हैं। हुस्न मज़ाज़ी (सांसारिक सौन्दर्य) को सर्वप्रथम ध्यान का केन्द्र बनाया जाता है। जब ध्यान एवं लक्ष्य पर जाता है इश्क़ मज़ाज़ी की चिगांरी अन्धकार में हृदय को प्रकाशित कर ‘इश्क़ हक़ीक़ी’ की मशाल जलाती है। इश्क़-मज़ाज़ी गन्तव्य नही केवल मार्ग के लिए दीपक के समान होता है।

सूफियों की वेशभूषा

सूफी साधक प्राय: एक विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करते रहें। प्रारम्भ के सूफी साधक में ऊन का व्यवहार अधिक होता था। पैगम्बर साहब ने कहा था-’’ऊनी’’ वस्त्र का व्यवहार करो जिसमें ईमान (धर्म) की मिठास का तुम्हें अनुभव होगा।’’ प्रारम्भिक काल के सूफी साधक, सहाबी ऊन के चोगे धारण करते थे। सूफ़ियों के परिधान से सम्बन्धित कोई सामान्य नियम नहीं रहा। वे लम्बा लबादा, खिरका, खुदड़ी, ऐहराम, लुंगी, कुर्ता, टोपी, पगड़ी आदि का उपयोग करते थे। पीरों मुर्शिद द्वारा प्रदत्त खिरका शिष्य के लिए विशेष महत्व रखता था। चिश्ती सन्तों ने अधिकतर हल्के बादामी रंग को प्राथमिकता दी। कादिरिया पन्थी लाल पगड़ी पहनते थे उनके वस्त्र का कोई न कोई भाग हल्के बादागी रंग का होता था।

सूफियों के विभिन्न नामकरण

सूफियों को विभिन्न नामों से उनकी दशा एवं स्थिति के अनुसार पुकारा जाता है। यथा - 
  1. ‘‘ग़ौस : वह सूफी जो अपनी आध्यात्मिक यात्रा में उन्नति की चरम सीमा पर पहुँच गया हो।
  2. ‘‘कुत्ब’’ : सूफ़ियों के अनुसार प्रत्येक समय प्रत्येक नगर का एक आध्यात्मिक शासक होता है जो ‘‘कुत्ब’’ कहलाता है। कुछेक कुत्ब को उच्च श्रेणी का मानते हैं तो कुछ ग़ौस को।
  3. ‘‘दरवेश’’ : फ़क़ीर के लिए फारसी में प्रयुक्त शब्द।
  4. ‘‘वली’’ : मित्र। सूफी अल्लाह का वली (मित्र) होता है। वली का बहुवचन औलिया है। सभी पैगम्बर औलिया होते हैं परन्तु कोई वली पैगम्बर नहीं होता।
  5. ‘‘आरिफ’’ : जिसे ईश्वर की मारिफत (ज्ञान) प्राप्त हो अर्थात् ज्ञानी।
  6. ‘‘मलंग’’ : ब्रह्मचारी बेशरा सूफी सन्त।
  7. ‘‘कलंदर’’ : स्वतन्त्र विचार के ब्रह्मचारी बेशरा सूफी। हैदरी भी स्वतन्त्र सूफी थे।
  8. ‘‘मज्ज्ाूब’’ : वह बेशरा सूफी जिसे अपनी दशा का भी भान न हो।
  9. ‘‘शेख’’ : सूफी के लिए एक सम्माननीय अरबी सम्बोधन इसका बहुवचन ‘‘मशाईख’’ है।
  10. ‘‘पीर’’ : शेख का फारसी अनुवाद पीर (गुरु) है।
  11. ‘‘मुर्शिद’’ : शिक्षा देने या सिखाने वाला। पीर को ‘‘मुर्शिद’’ अथवा ‘‘पीरोमुश्र्ाीद’’ (दीक्षा गुरु) भी कहा जाता है।
  12. ‘‘सालिक’’ : सूफी मार्ग में चलने वाला साधक।
  13. ‘‘फ़क़ीर’’ : फ़क़ीर से तात्पर्य ऐसे साधक से है जो ईश्वर पर विश्वास करके संसार के स्थान पर ईश्वर की ओर प्रवृत्त रहें। हदीस के अनुसार फ़क़ीर का बहुत उच्च स्थान है। पैगम्बर मोहम्मद साहब स्वयं को सदैव फ़क़ीर के समूह में रखने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते थे।
  14. ‘‘सूफी’’ : अल्लाह के दर्शन के लिए ‘‘तरीक़त’’ के मार्ग पर चलने वाले इस्लाम के रहस्यवादी साधक ‘‘सूफी’’ कहलाते हैं। 
शेख हुज्वेरी तसव्वुफ की दृष्टि से सूफी के तीन प्रकार बतलाते हैं : -
  1. सूफी - वह जो स्वयं को हक में फना कर दें।
  2. मतसूफ - वह जो सच्चा सूफी बनने के प्रयास में लगा हो।
  3. मुस्तसूफ - वह जो मान सम्पत्ति आदि प्राप्त करने के लिए सूफी मार्ग पर चलता हो।

महिला सूफी सन्त

इस्लाम ने न केवल पुरुष सूफियों को उत्पन्न किया बल्कि कुछ महिला भी इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय हैं जिनके प्रेम, भक्ति, समर्पण, परोपकार, करुणा आदि गुणों ने लोगों को प्रभावित किया। उनमें से प्रमुख निम्नांकित हैं।-बसरा की राबिया, गिलान की राबिया, दमिश्क की राबिया, निशापुर की फातिमा, फखरीया, फिज्ज्ाा, मुजगाह, नफीसा, आमना, तुहफा, तेजकारपई खातून, अफसाह, हकीमाह, शेराना, सफ़िया, खदीजा, उमयहया आदि। 

 प्रसिद्ध बसरा की सन्त शिरोमणि रूबिया अल अदाविया अल बसरी थी। राबिया बसरी स्त्री सूफ़ियों में ही अग्रगण्य नहीं, पुरूषों में भी यदि सबसे आगे नहीं तो किसी से कम भी नहीं थीं। उनके जीवन की श्रेष्ठता और विचारों की शुद्धता किसी भी जाति और काल के सन्तों के लिए अभिनन्दनीय कही जा सकती है। उनकी जन्म 717 ई0 अत्यन्त निर्धन परिवार में हुआ। अनाथ होने के बाद उन्होंने एक दास का जीवन भी व्यतीत किया। 

परमात्मा के प्रति इतना प्रेम रखती थी जिसे किसी भी वस्तु की आवश्यकता प्रतित नहीं होती थी।

सन्दर्भ -
  1. हिफ़ाजुर्रहमान डॉ0 मुहम्मद, तसव्वुफ का उत्कर्ष एवं सूफ़ियों का इतिहास, प्रकाशक-सोमनाथ दल संजय प्रकाशन 4378/4-बी0, 209 जे0एम0 डी0 हाउस, गली मुरारीलाल, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली।
  2. चतुर्वेदी आचार्य परशुराम, सूफी-काव्य-संग्रह, प्रकाशक-श्री गोपालचन्द्र सिंह, सचिव, प्रथम शामन निकाय, हिन्दी सम्मेलन, प्रयाग प्रकाशन वर्ष-शक 1886.1964 संस्करण-चतुर्थ
  3. सिंह डॉ0 हरदेव, भारतीय इतिहास और साहित्य में सूफी दर्शन, प्रकाशक-उ0प्र0 हिन्दी संस्थान राजर्षि पुरूषोत्तम टण्डन, हिन्दी भवन 6-महात्मा गांधी मार्ग, हजरतगंज, लखनऊ, प्रथम संस्करण-2005
  4. शर्मा डॉ0 सुनीता, भारतीय संगीत का इतिहास (आध्यात्मिक दर्शन), संजय प्रकाशन, (100/184 ब्लाक-ए Som Bazar) नई दिल्ली-110053 प्रथम संस्करण-1996
  5. सिंह डॉ0 हरदेव, भारतीय इतिहास और साहित्य में सूफी दर्शन, प्रकाशक-उ0प्र0 हिन्दी संस्थान राजर्षि पुरूषोत्तम टण्डन, हिन्दी भवन 6-महात्मा गांधी मार्ग, हजरतगंज, लखनऊ, प्रथम संस्करण-2005
  6. शर्मा डॉ0 सुनीता, भारतीय संगीत का इतिहास (आध्यात्मिक दर्शन), संजय प्रकाशन, (100/184 ब्लाक-ए Som Bazar) नई दिल्ली-110053 प्रथम संस्करण-1996
  7. सिंह डॉ0 हरदेव, भारतीय इतिहास और साहित्य में सूफी दर्शन, प्रकाशक-उ0प्र0 हिन्दी संस्थान राजर्षि पुरूषोत्तम टण्डन, हिन्दी भवन 6-महात्मा गांधी मार्ग, हजरतगंज, लखनऊ, प्रथम संस्करण-2005

Bandey

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2 Comments

  1. सूफ़ी वाद पर आपका ये आर्टिकल हर इतिहास प्रेमी व्यक्ति के लिए लाभदायक है ,कि कैसे सूफ़ीवाद का उद्भव इस्लाम के अंदर हुआ ,क्या थोड़ी दी विभिन्नता है इस्लाम एकेश्वरवादी दर्शन और सूफियों के एकेश्वरवादी दर्शन में। पढ़कर बहुत ही ज्ञानवर्धन हुआ ।

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  2. सूफ़ी वाद पर आपका ये आर्टिकल हर इतिहास प्रेमी व्यक्ति के लिए लाभदायक है ,कि कैसे सूफ़ीवाद का उद्भव इस्लाम के अंदर हुआ ,क्या थोड़ी दी विभिन्नता है इस्लाम एकेश्वरवादी दर्शन और सूफियों के एकेश्वरवादी दर्शन में। पढ़कर बहुत ही ज्ञानवर्धन हुआ ।

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