सुमित्रानंदन पंत की रचनाएँ

अनुक्रम

इसमें के बारे में अध्ययन करेंगे।


सुमित्रानंदन पंत जी ने हिन्दी की अनेक विधाओं में अपनी रचनाएँ लिखी। परन्तु उनकी ख्याति सबसे अधिक काव्य के क्षेत्र में ही मानी जाती है। सुमित्रानंदन पंत ने अपने काव्य जीवन का आरम्भ ‘वीणा’ नामक काव्य संग्रह से किया।, ‘ग्रंथि’(1920), ‘वीणा’ (1927), ‘पल्लव’ (1928) और ‘गुंजन’ (1932) उनक छायावादी कविता की रचनाएँ है। ‘युगान्त’ (1936), ‘युगवाणी’ (1939) और ‘ग्राम्या’ (1940) में उनके प्रगतिवादी विचार देखने में आते हैं। ‘स्वर्ण किरण’ (1947), ‘स्वर्णधूलि’ (1947), ‘उत्त्ारा’ (1949), ‘युगपथ’ (1948), ‘अतिमा’ (1955) आदि कविताओं में कवि सुमित्रानंदन पंत अरविन्द दर्शन से प्रभावित दिखाई देते हैं। ‘कला और बूढ़ा चाँद’ (1959) में कवि समन्वयवादी हो गये। काव्यगत रचनाओं के अलावा पंत ने कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, आत्मकथा तथा आलोचनात्मक रचनाएँ भी लिखी। 

सुमित्रानंदन पंत की रचनाएँ

वीणा

‘वीणा’ काव्य संग्रह का प्रकाशन 1927 ई. में हुआ। 1918 से 1920 तक की अधिकांश रचनाएँ इस संग्रह में छपी है। इसमें तिरसठ गीत रचनाएँ संकलित है। इस संग्रह का मूल व्यक्तित्व गीतात्मकता है। इसमें कवि की प्रारम्भिक कविताएँ संकलित है। इस संग्रह की प्रमुख कविताओं में ‘प्रथम रश्मि’, ‘जागरण’, है। इस काव्य संग्रह की शुरुआती कविताओं में बार-बार माँ सम्बोधन आया है। इसमें एक प्रार्थना भाव भी दिखाई देता है। ‘जागरण’ कविता तत्कालीन राजनीतिक वातावरण के परिप्रेक्ष्य में लिखी गई है। इसमें स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जागरण आवश्यक बताया गया है।

ग्रन्थि

‘ग्रन्थि’ काव्य संग्रह का प्रकाशन 1929 ई. में हुआ। जबकि इसकी रचना 1920 ई. के जनवरी माह में हुई। यह कवि सुमित्रानंदन पंत जी आत्मकथात्मक कविता है, जिसमें कवि ने अपनी प्रियतमा के अद्भुत सौन्दर्य का चित्र अंकित किया है। प्रेम के संयोग और वियोग पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति इस रचना में हुई है। इस काव्य में तीन खण्ड है। प्रथम खण्ड में एक युवक की नाव ताल में डूब जाती है। वह उसकी अतल गहराई में चेतना शून्य हो जाता है। जब उसकी चेतना लौटती है, तो उसे मालूम होता है कि उसका सिर एक एक युवती के गोद में है। यहाँ से प्रेम कथा प्रारम्भ होती है। दूसरा खण्ड ‘एक प्रात:’ है, जिसमें प्रेम का संचरण प्रेमी-प्रेमिका में होता है और प्रेम परवान चढ़ता है। तीसरा खण्ड ‘प्रेम वंचित’ है। जिसमें शुरू से ही दृश्य बदला हुआ दिखाई देता है। प्रिया का विवाह किसी अन्य व्यक्ति से हो जाता है और प्रेमी का विशाद रूप यहाँ दिखाई देता है। इस काव्य में कहीं-कहीं पंत की रोमानी झलक भी दिखाई देती है। इस काव्य की कथा को सुमित्रानंदन पंत के वास्तविक जीवन से भी जोड़ा जाता है। जिस कारण से पंत ने आजीवन विवाह नहीं किया क्योंकि प्रेम के वासंती रंगों में जब करुणा प्रवेश कर जाती है। उस समय की रोमानी अनुभूति बिना वैयक्तिक अनुभव के सम्भव नहीं है। यह कविता मानवीय संवेदना के परिप्रेक्ष्य में लिखी गयी है।

पल्लव

‘पल्लव’ (1926) काव्य संग्रह कवि की प्रौढ़ काव्य रचना माना गया है। इस काव्य में कवि ने नवीन प्रतिमानों को स्थापित कर अपनी रचना दृष्टि को स्पष्ट किया है। ‘पल्लव’ की अधिकांश रचनाएँ प्राकृतिक सौन्दर्य पर ही रची गई हैं। ‘उच्छ्वास’ ‘आँसू’, ‘मधुकरी’, ‘मौन निमंत्रण’, ‘छाया’, ‘बादल’, ‘परिवर्तन’ आदि लम्बी कविता ‘पल्लव’ काव्य संग्रह में संगृहीत है। ‘उच्छ्वास’ कविता प्रकृति का अवसाद एवं करुणा की गहराई को व्यक्त करने वाली कविता है। पंत जी का अतृप्त प्रेम आगे बढ़कर ग्रंथि बन जाता है। उच्छ्वास की सरलता में कवि अपने सौन्दर्य बोध को उजागर करते हुए यौवन की सीमाओं में आकर संचारियों के माध्यम से फूट पड़ा है। इसमें एक सात्विक कंपन को कवि ने मूर्त रूप दिया है। ‘मौन निमंत्रण’ कविता में कवि आकर्शण-विकर्शण के कारणों की खोज प्रकृति में करता है। ‘बादल’ कविता में बादल स्वयं अपनी आत्मकथा कहता हुआ प्रतीत होता है। ‘परिवर्तन’ कविता पल्लव संग्रह की लम्बी कविता है। इसका रचना 1924 ई. में हुई है। 

इस काल के पूर्व कवि प्रथम विश्व युद्ध की विभिशिका देख चुके थे। इस समय की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों में जो परिवर्तन हुआ, उससे कवि अछूते नहीं रह सके। इसी का प्रभाव इस कविता में दृष्टिगोचर होता है। प्रकृति में परिवर्तन के साथ ही विकास गति सम्भव है। कवि प्रकृति के प्रत्येक क्रिया-कलापों को समेटने का प्रयास ‘परिवर्तन’ कविता में करते हैं, जिस कारण यह कविता लम्बी हो गई।

‘ज्योत्स्ना’ प्रतीकात्मक काव्य नाटिका है। इसकी सम्पूर्ण कथा पाँच अंकों में विभाजित है। कवि सुमित्रानंदन पंत इस नाटिका के द्वारा समाज को व्यवस्थित करने एवं विश्व बन्धुत्व का संदेश देना चाहते हैं। इस काव्य में तत्कालीन भारत का स्वतंत्रता आन्दोलन, वर्ग भेद, किसान आन्दोलन, मजदूरी की स्थिति, साहित्य कला आदि की चर्चा की गई।

गुंजन

‘गुंजन’ मानव-प्रेम की रचना है। यह कवि की आन्तरिक अनुभूतियों को व्यक्त करता है। जीवन के सुख-दुख, आशावाद, मानवतावाद, प्रेम, सौन्दर्य, प्रकृति-सौन्दर्य से सम्बन्धित रचनाएँ इस संकलन में संकलित है। प्रियतमा के प्रति स्वच्छंद प्रेम की अभिव्यक्ति ‘भावी पत्नी के प्रति’ और ‘प्राण तुम लघु गीत’ कविताओं में सुन्दर ढंग से हुई है। प्रकृति सौन्दर्य के मनोरम चित्र ‘लाई हूँ फूलों का हार’, ‘विहग के प्रति’, ‘एक तारा’, ‘चाँदनी’, ‘अप्सरा’ और ‘नौका विहार’ कविताओं में विद्यमान है। इस संग्रह में ‘एक तारा’, ‘चाँदनी’, ‘नौका विहार’ तीनों कविताओं में एक समानता है। इनमें प्रकृति का उदीप्त रूप दिखाई देता है। अन्त में यह सदाषयता की ओर मुड़ जाती है। ‘मेरा प्रतिफल सुन्दर हो’, ‘नवल मेरे जीवन की डाल’, ‘तेरा कैसा गान’, ‘मधुवन’ कविताओं में कवि के अन्तर्मन के उद्गार बड़े ही सहज ढंग से व्यक्त हुए हैं।

युगवाणी

‘युगवाणी’ का प्रकाशन 1939 ई. में हुआ। ‘युगवाणी’ पंत का गद्यात्मक काव्य है। ‘युगवाणी’ में प्रगतिवादी रूप ही अधिक जागरूक है। इसमें युग की समस्याओं को वाणी देने का प्रयास किया गया है। इस काव्य में कवि समाज के निचले तबके के लोगों के दु:ख दर्द को महसूस करते हुए चीटीं जैसी सूक्ष्म प्राणी को काव्य का विषय बनाया। ‘युगवाणी’ में दलित शोशित नारी, धन पति, श्रमजीवी आदि से सम्बन्धित कविताएँ है। ‘युगवाणी’ ने कवि मानव जीवन के सत्य को व्यापक रूप में प्रस्तुत किया है। कवि पंत ‘घनानंद’ कविता के अन्तर्गत खेतों में काम करने वाले मजदूरों को जगाने का प्रयत्न करते हैं, क्योंकि वे धरती के सच्चे अधिकारी है। इस कविता में सुमित्रानंदन पंत का प्रकृति प्रेम भी उभर कर आया है। ‘दो लड़के’ कविता में दलित शोशित वर्ग के बच्चों के शारीरिक एवं सामाजिक स्थिति का यथार्थ एवं कटु वर्णन किया है।

युगान्त

‘युगान्त’ काव्य संग्रह का प्रकाशन 1936 ई. में हुआ। ‘युगान्त’ द्वारा पंत जी ने छायावाद युग के अंत की घोषणा कर दी। ‘युगान्त’ सुमित्रानंदन पंत का दूसरा चरण है। जहाँ से कवि की वैचारिकता का विकास हुआ है। यह काव्य यथार्थवादी होते हुए लोककल्याण की ओर प्रेरित करने वाली है। इस काव्य संग्रह में कवि मानव कल्याण के लिए प्रकृति को साधन माना है। कवि का मानना है कि संसार में परिवर्तन हो रहा है। पुरानी मान्यताएँ, रूढ़ियाँ, परम्परायें, संस्कृति सब टूट रहे हैं। वे प्राचीन परम्पराओं का विरोध तो करते हैं, किन्तु उनका संघर्ष बाह्य नहीं है। वे अपने नैतिक आदर्शों को साथ लेते हुए चलते हैं। इस कारण उनका विरोध केवल बौद्धिक है। सुमित्रानंदन पंत जी गांधी के सत्य और अहिंसा से प्रेरित भी दिखाई देते हैं। इस संग्रह की प्रमुख कविताएँ हैं- ‘गा, कोकिल, बरसा पावक कण’, ‘बापू के प्रति’, ‘ज्योत्स्ना’, ‘ताज’। प्रमुख कविताएँ है। ‘बापू के प्रति’ कविता में सत्य अहिंसा के आदर्श को सम्पूर्ण जीवन का आदर्श बताया गया है। ‘ताज’ कविता में कवि ने सौन्दर्य और प्रेम का वर्णन न कर मृत आदर्शों का ताज कहकर उसकी भत्र्सना की है।

ग्राम्या

‘ग्राम्या’ काव्य संग्रह का प्रकाशन 1940 ई. में किया गया। इसमें सुमित्रानंदन पंत जी ने ग्रामीण जीवन के परिदृष्य को समेटने का प्रयास किया है। इस समय तक छायावाद का कल्पना लोक यथार्थ की भूमि पर आ चुका था। इस कारण इस काव्य संग्रह में गाँवों का संघर्ष पूर्ण जीवन का यथार्थ एवं सजीव चित्रण हुआ है। इसमें ‘ग्राम्य देवता’, ‘भारत माता’, ‘ग्राम्य श्री’, ‘दिवास्वप्न’, ‘संध्या के बाद’, ‘ग्राम युवती’, ‘ग्राम वधू’, ‘संक्रान्ति का नहान’, ‘ग्राम संस्कृति’, ‘वे आँखें’ आदि कविताएँ संग्रहित है। ‘ग्राम्या’ संग्रह की प्रत्येक कविता अपने आप में विशिष्ट है। इसमें गाँव के हरे-भरे वातावरण, संघर्शपूर्ण जीवन, युवती का सौन्दर्य, गाँव के बुढ़े एवं निर्धनता ग्रस्त हड्डी के ढ़ाँचे आदि का चित्रण किया गया है। ‘ये आँखें’ शीर्शक कविता में कवि ने किसान के दारून दैन्य, विशद, आंतक और क्षोभ से भरी आँखों का जिक्र किया है। इस कविता के माध्यम से किसान जीवन को काव्यात्मक शैली में उद्धृत किया गया है। ‘संध्या के बाद’ कविता में कवि गाँव की धरती पर साँझ के उतरते ही, जो जिन्दगी शुरू होती है उसका चित्रण किया है। 

‘ग्राम्य देवता’ लम्बी कविता है। जिसमें उनकी ग्राम देवता की वंदना की गई है। इसमें कवि सुमित्रानंदन पंत ने आज के ग्रामीण संस्कृति की क्या दुदर्षा हो रही है इसके बारे में बताते हैं। रूढ़ियों में फँसा ग्रामीण व्यक्ति महुआ, ताड़ी, गाजा पीकर मस्त है। कविता के अन्त में ग्राम्य देवता का आàान किया गया है। कवि का कहना है कि गाँव को नई जिन्दगी दिये बिना, स्वतन्त्रता की बात नहीं की जा सकती। ‘ग्राम्य वधू’ कविता में कवि सुमित्रानंदन पंत ने नारी जीवन पर यथार्थ दृश्टि डालने का प्रयास करते हैं। इसमें ससुराल जाती हुई युवती का करुण दृष्ट का वर्णन है, जो विदा होते हुए अपनी माँ, मौसी, फूआ, बहन से लिपट कर रोती है। इसके रूदन को देखकर स्टेशन पर भीड़ लग जाती है। सुमित्रानंदन पंत जी नारी को प्रेम, ममता की मूर्ति मानते हैं। ‘ग्राम युवती’ में कवि युवती के अनलंकृत और निश्छल व्यवहार की प्रशंसा करते हैं। वह युवती प्राकृतिक साधनों से अपना श्रृंगार करती है। ग्राम युवती को धरती की बेटी के रूप में कवि ने चित्रित किया है। इस प्रकार इस काव्य संग्रह में अज्ञानता व दैन्य-दरिद्रता के भयानक दृश्य हमारे सामने उपस्थित हो जाते हैं।

स्वर्णधूलि

‘स्वर्णधूलि’ काव्य संग्रह का प्रकाषन 1947 ई. में हुआ। ‘स्वर्ण आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। इस काव्य संग्रह में ‘कुण्ठित’, ‘आजाद’, ‘सावन’, ‘देवकाव्य’, ‘अग्निदेव’, ‘अन्तरगमन’, ‘इन्द्र’, ‘वरूण’, ‘सामंजस्य’, ‘मृत्युंजय’ आदि कविताएँ है। इस कविता द्वारा कवि मनुष्य की कुण्ठा को आध्यात्मिक चेतना द्वारा समन करते हैं।

स्वर्णकिरण

‘स्वर्णकिरण’ काव्य संग्रह का प्रकाशन 1947 ई. में हुआ। यह कविता सम्मोहन युक्त है। इस कविता में स्वर्ण के प्रति कवि की आसक्ति देखी जा सकती है। इस काव्य संग्रह का शीर्षक स्वर्णिम पराग, स्वर्ण निर्झर, स्वर्णिम पुलिन तथा स्वर्ण पंख आदि है। कवि इस नवीन काव्य चरण में आध्यात्मिक सौन्दर्य को प्राथमिकता देते हैं। इस काव्य संग्रह में कवि अतिभौतिकता का विरोध व उससे ऊपर उठने की प्रेरणा देते हैं। वे मनुष्य को आध्यात्मिक लोक में विचरण करते हुए बाह्य जगत की विभिशिका को छोड़ कर आन्तरिक चेतना द्वारा जीवन को संचालित करने का उपदेश देते हैं।

उत्तरा

‘उत्तरा’ काव्य संग्रह तक आते-आते कवि पंत का आध्यात्मिक झुकाव के प्रति लगाव कम हो जाता है और उनमें जीवन संस्पर्ष प्रतीत होने लगता है। उत्तरा’ काव्य संग्रह की कविताओं का शीर्षक नवमानव प्रगति, युग विशाद, युग संघर्श, युग छाया, युगमन, भू-यौवन, भू-जीवन, निर्माण कला आदि है। इनके कविता शीर्षक से ही उनकी यथार्थता का बोध हो जाता है। कवि जानते हैं कि देष में जो जातिवाद व अंधविश्वास के कारण चारों ओर घृणा और द्वेश की आँधियाँ उठ रहीं है। समाज में व्याप्त विषमता, जातिवाद व अज्ञानता का अंधकार छाया हुआ है। ऐसे वातावरण में नवीन आलोक का आàान करते हुए इस काव्य संग्रह द्वारा कवि मानवीय जीवन को सुखद बनाने के लिए नवीन कल्पनाएँ की गयी है।

रजत शिखर

‘रजत शिखर’ काव्य संग्रह में मानव जीवन के सुखद क्षणों का उल्लेख किया गया है। इसमें कवि अपने विचारों एवं अनुभव की गहराई को व्यक्त करने का प्रयत्न करते हैं। इस काव्य संग्रह में ‘फूलों का देष’, ‘उत्त्ारषती’, ‘शुभ्र पुरुष’, ‘विश्रूत वासना’, ‘षरद चेतना’ आदि प्रमुख कविताएँ है।

कला और बूढ़ा चाँद

‘कला और बूढ़ा चाँद’ काव्य संग्रह का प्रकाशन 1959 ई. में हुआ। यह काव्य संग्रह कवि के काव्य यात्रा के चतुर्थ एवं अंतिम चरण के आरम्भ की है। इसमें कवि प्रतीकों एवं बिम्बों की नयी भूमियों की तलाष करता हुआ, नवीन शब्दावली का प्रयोग करने की चेष्टा करते हैं। इस काव्य संग्रह में कवि ने प्रेम को गुलाब से, हिमालय में रिक्त मौन, शंखध्वनि को अमृत के रूप में देखते हैं। इस काव्य संग्रह को पढ़ने में आधुनिक पाठक को कम कठिनाई होती है, क्योंकि इसमें आधुनिकता पूर्ण मुहावरों का प्रयोग किया गया है। ‘धेनुए’ कविता में आध्यात्मिक वक्तव्यों का सहारा न लेकर यथार्थ को उधृत करने का प्रयास किया गया है। इस संग्रह की अंतिम कविता ‘सिन्धुमन्थन’ है। ‘कला और बूढ़ा चाँद’ काव्य संग्रह में कवि की आध्यात्मिकता की सहज अनुभूति प्रगट होती है।

चितम्बरा

‘चितम्बरा’(1958) में 1937 से 1957 तक की विषेश रूप से लोकप्रिय कविताओं का संग्रह है। इसमें ‘युगवाणी’, ‘ग्राम्या’, ‘स्वर्णकिरण’, ‘युगपथ’, ‘उत्तरा’, ‘रजतषिखर’, ‘शिल्पी’, ‘सौवर्ण’, ‘अतिमा’, ‘वाणी’ की प्रतिनिधि कविताओं को चुना गया है। इसी कृति पर पंत को 1969 ई. को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। गाँधी जी से प्रभावित होकर पंत ने ‘बापू के प्रति’, ‘श्रद्धा के फूल’, ‘महात्मा जी के प्रति’ जैसी रचनाओं का प्रणयन किया। ‘स्वर्णोदय’, ‘युग उपकरण’ जैसी कविताओं में मानवतावाद में आस्था प्रकट हुई है। ‘नव संस्कृति’ कविता में उनका आदर्षवाद झलकता है। दर्शन से संबंधित कविताओं में ‘सामंजस्य’, ‘लोकसत्य’, ‘जागरण’, ‘सौवर्ण’, ‘शांति और क्रान्ति’ तथा ‘आत्मिका’ लोकप्रिय है। देशप्रेम से संबंधित कविताओं में ‘भारतमाता’, ‘15 अगस्त 1947’, ‘भारत गीत’, ‘कवीन्द्र रवीन्द्र के प्रति’ प्रमुख है। प्रकृति से संबंधित कविताओं में ‘संध्या के बाद’, ‘दिवास्वप्न’, ‘हिमाद्रि’, ‘चन्द्रोदय’, ‘सावन’, ‘यह धरती कितना देती है’, ‘कूर्माचल के प्रति’ आदि कविताओं में पुष्ट हुई है। 

ग्राम जीवन के सौन्दर्य का चित्रण ‘ग्रामचित्र‘, ‘ग्राम कवि’, ‘ग्राम युवती’, ‘ग्रामनारी’, ‘वह बुड्ढा’, ‘ग्राम श्री’, ‘सन्ध्या के बाद’ तथा ‘जन्म दिवस’ जैसी रचनाओं में चित्रित है। ‘सृजन शक्तियाँ, ‘तुम ईश्वर’, ‘इन्द्र’, ‘वरुण’, ‘सोमपायी’, ‘मंगल स्तवन’, ‘मृत्युजंय’ और ‘अभिलाषा’ कविताओं में ईश्वर में आस्था, दृढ़ विश्वास का महत्त्व प्रतिपादित किया गया है। इसके इलावा ‘कर्मयोग’, अंतर्गमन’, ‘वे आँखें’ ‘भारतमाता’, ‘मजदूरनी’, ‘फूलों का देष’, ‘ध्वसं “ोश’, ‘नारी’, ‘पतिता’, ‘स्मृति’ आदि महत्त्वपूर्ण कविता इस संग्रह में संकलित है। इस प्रकार ‘चिदम्बरा’ जीवन दर्शन की दृष्टि से एक प्रेरणादायक रचना है।

लोकायतन

‘लोकायतन’ काव्य संग्रह का प्रकाशन 1964 ई. में हुआ। इस काव्य संग्रह के निर्माण में कवि को लगभग चार वर्ष (1959 ई. से 1963 ई.) लगे। यह लोकजीवन का महाकाव्य है। सम्पूर्ण काव्य दो भागों में विभाजित है। बाह्य परिवेष और अन्तष्चैतन्य। ‘लोकायतन’ महाकाव्य के प्रथम खण्ड में 1925 ई. से लेकर 1947-48 ई. तक भारतीय समाज की स्थितियों पर विस्तार से चर्चा की गई है। इस काव्य संग्रह में स्वतंत्रता आन्दोलन- डांडी यात्रा, नमक सत्याग्रह आदि राजनीतिक आन्दोलनों एवं भारतीय राजनीति पर गांधी दर्शन का प्रभाव दिखाई देता है। इसमें तत्कालीन युग की शोशित पीड़ित जनता एवं सामाजिक समस्याओं का भी उल्लेख किया गया है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त स्वतंत्र भारत एवं गांधी मृत्यु तक की राजनीतिक स्थितियाँ इस काव्य के ऐतिहासिक एवं राजनीतिक काव्य के रूप में व्याख्यायित करती है। इन्द्र और अरविन्द दर्शन की सहायता से नवमानवता की कल्पना इसका मुख्य प्रतिपाद्य है। जो छायावादी काव्यान्दोलन को भी एक नवीन दिषा प्रदान करता है। ‘लोकायतन’ महाकाव्य के द्वितीय खण्ड में कवि वंशी हरि और सीरी द्वारा ऐसे कला केन्द्र की कल्पना करते हैं, जहाँ स्वर्ग जैसा सुख शांति और ऐश्वर्य है। यहाँ कवि को अपनी आध्यात्मिक एवं दार्शनिक कल्पना को साकार एवं विस्तृत रूप देने में सफलता मिली। इस काव्य में नवीन मानवतावाद का विवेचन किया गया है। ‘लोकायतन’ काव्य में एक दार्शनिक पुरुष आत्मानंद है। इसमें विदेश के प्राकृतिक दृश्य का वर्णन किया गया है। 

कवि पंत इस महाकाव्य द्वारा देष में एकता एवं अखण्डता स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं। अणु युद्ध के कारण आधी दुनिया का खात्मा और लोकायतन नामक आध्यात्मिक आश्रम की स्थापना के साथ इस महाकाव्य का अंत होता है। सुमित्रानंदन पंत जी के इस महाकाव्य में जीवन का विस्तृत फलक दिखाई देता है और अंतत: अध्यात्म के माध्यम से जीवन में पूर्णता का आभास मिलता है। सुमित्रानंदन पंत जी का काव्य संग्रह छायावाद की ओर अधिक महिमामंडित और विस्तृत रूप प्रदान करने में सहायक है।

सुमित्रानंदन पंत जी गद्य की संख्या कम ध्यान दिया है। उन्होंने ‘पाँच कहानियाँ’ नामक कहानी संग्रह लिखी। ‘‘पाँच कहानियाँ’ नामक कहानी संग्रह का प्रकाशन 1936 ई. में हुआ है। इस कहानी संग्रह में ‘पान वाला’, ‘उस पार’, ‘दम्पत्ति’, ‘अवगुंठन’ तथा ‘बन्नु’ कहानी संकलित है। ये पांचों कहानियाँ जीवन के यथार्थ एवं मानवीय स्वाभाविकता को प्रकट करती हैं। समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक मान्यताओं को व्यंजित करती हैं। इनमें ‘पान वाला’ कहानी सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

‘हार’ पंत जी का एकमात्र उपन्यास है। कवि पंत ने निबंधों की भी रचना की है, जो ‘गद्य-पद्य’ नामक निबंध संग्रह में संग्रहित है। इसके दो खण्ड है, प्रथम खण्ड में काव्य कृतियों की भूमिकायें संग्रहित है और द्वितीय खंड में भाषण, संस्मरण और वार्तायें संग्रहित है। ‘पल्लव की भूमिका’ और ‘यदि मैं कामायनी लिखता’ निबंध विषेश प्रसिद्ध है। द्वितीय खण्ड में कुछ सांस्कृतिक निबन्ध है। जिनमें ‘भारतीय संस्कृति क्या है’, ‘कला और संस्कृति’, ‘सांस्कृतिक चेतना’, ‘सांस्कृतिक आन्दोलन’ आदि प्रमुख निबंध है।सुमित्रानंदन  पंत जी ने आत्मकथा साहित्य विधा में भी लेखनी चलायी है। ‘साठ वर्ष एक रेखांकन’ नामक एकमात्र आत्मकथा है, जिसका प्रकाशन 1960 ई. में हुआ है। इसमें पंत जी ने अपने जीवन के 60 वर्षों के स्मृति चिàों को रेखांकित करने का प्रयास किया है। ‘आलोचना’ विधा पर भी पंत जी ने अपनी लेखनी चलायी है। उनकी आलोचनात्मक पुस्तक ‘छायावाद पूर्नमूल्यांकन’ है। इसका प्रकाशन 1966 ई. में हुआ। इस पुस्तक में उन्होंने छायावाद युग से लेकर अब तक (1966 ई.) के लेखकों पर छायावादी प्रभाव देखने का प्रयास किया है।

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