बाल श्रम क्या है

अनुक्रम

इसमें के बारे में अध्ययन करेंगे।


संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार- 18 वर्ष से कम आयु का श्रमिक बालश्रमिक है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) के अनुसार 15 वर्ष या उससे कम आयु का श्रमिक बाल श्रमिक है। अमेरिका कानून के अंतर्गत 1966 में निर्धारित किया गया है, कि 12 वर्ष या कम आयु तथा इंग्लैंड व अन्य यूरोपीय देशों में 13 वर्ष या कम आयु के श्रमिकों को बाल-श्रमिक माना जायेगा।  भारत में केन्द्रीय बाल-श्रमिक (नियमन एवं नियंत्रण) अधिनियमानुसार 1986 कोई भी ऐसा श्रमिक जो 14 वर्ष की आयु पूर्ण नहीं किया है, वह बाल श्रमिक माना जायेगा। 

बाल-श्रम का उद्भव तब हुआ जब पूंजीपति वर्ग द्वारा मुनाफा बढ़ाने के उद्देश्य से मजदूरों के बच्चों का सामाजिक एवं अमानवीय शोषण किया गया। इसी स्वार्थ के लिए सामंतकाल में बाल-श्रम सामाजिक बुराई के रूप में नहीं देखा गया 1953 इग्लैंड में चर्टिस्ट आंदोलन में सर्वप्रथम बाल-श्रम की अमानवीय प्रक्रिया की ओर विश्व का ध्यान आकृष्ट हुआ, उसी समय विक्टर क्यूंगों आस्कर, बाझुण्ड आदि साहित्यकारों ने अपनी साहित्य के माध्यम से उस विकराल समस्या को गंभीरता प्रदान किया। मानव से अधिक कार्य लेकर कम मजदूरी देना प्रकृति पूंजीवादी प्रकृति की है। 

बाल श्रम

बाल श्रमिकों की प्रवृत्ति

बाल श्रमिकों का इस्तेमाल इन प्रवृत्तियों को चार भागों में विभाजित किया गया है।

1. नवपुरातनवादी सिद्धांत- 

इस सिद्वान्त के अंतर्गत बच्चों को उपभोग/निवेष की सामाग्री मानकर उनके श्रम का उपयोग आय बढ़ाने हेतु किया जाता है। यहां बच्चों को पढ़ाने का खर्च बचाकर श्रम करने पर जोर दिया जाता है। अत: ज्यादा बच्चों व बाल श्रम का अभिन्न संबंध हैं इस सिद्वान्त को मानने वालों में प्रमुख टी.अख्तर, हयूज एच जी लिविस एम.टीफेन एवं डी.सी.काण्डवेज आदि प्रमुख हैं।

2. समाजीकरण का सिद्धांत - 

इसके तहत् बाल श्रम का इस्तेमाल पारिवारिक प्रक्रिया के अंतर्गत किया जाता है। इससे कृषि, घरेलू उद्योगों इत्यादि आते है। इस सिद्धांत के प्रर्वतक है; जी.गेजर्स स्टेन्डिग जी मेयर आदि।

3. श्रम बाजार के विखण्डन का सिद्धांत - 

अविकसित देशों में पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में श्रम बाजार को दो हिस्सों में बांटा है। बड़ा किसान एवं छोटा किसान बाजार की व्यवस्था मालिक श्रमिक संबंधों का आधार है। इस सिद्धांत के नियमक है, सी.केर.डी.एम. गार्डन तथा एडवडर््स आदि।

4. मार्क्सवादी सिद्वान्त - 

मार्क्स ने कहा था कि बाल श्रम पूंजीवादी व्यवस्था का अभिन्न अंग है। नई तकनीक सस्ते एवं अकुशल मजदूरों की मांग करती है। और बेरोजगारी के कारण बच्चे भी औद्योगिक श्रमिकों के संचित दल का हिस्सा बन जाती हैं।
इन सिद्धांतों के अनुसार बालश्रमिकों की परिस्थितियों का चलचित्र सामने आ जाता है। भारत में बाल श्रम कि प्रथा देश में औद्योगिक क्रांति के समय से शुरू हुई। तब से सस्ते श्रम के लिए उद्योग कि मांग इतनी तेजी से बढी तथा जनता कि गरीबी इतनी अधिक हो गई की बाल श्रम के शोषण की सीमा पहले से और अधिक होने लगी जिसके फलस्वरूप संगठित उद्योग एवं औद्योगिक संस्थाओं में बडी संख्या में बच्चों को काम दिये जाने लगा। 

उद्योग में रोजगार की दशाओं में उचित नियंत्रण और बच्चों की सुरक्षा के लिए शुरू में कानूनी कार्यवाही की कमी होने के कारण कम आयु के बच्चों से लम्बे समय तक कारखाना श्रमिकों कि तरह रोजमर्रा के खास कार्यों के लिए कुछ आने प्रतिदिन की मजदूरी पर काम लेता रहा है। यद्यपि विभिन्न उद्योगों में काम करने वाले बच्चों की संख्या के सही एवं पर्याप्त आंकडे नहीं मिलता, फिर भी इसमें कोई शक नहीं है, कि भारत में बच्चों का बहुत बडी संख्या में काम पर लगाया गया है। कुछ उद्योगों में आयु सीमा आदि के संबंध में विभिन्न कानूनी प्रतिबंध होने के बावजूद भी बाल रोजगार प्राय: चालू रहा है।

शाही आयोग ने 1931 मे 5 वर्ष के उम्र के बच्चों को 18 घण्टे प्रतिदिन काम करते हुए पाया, श्रम जांच समिति 1946 ने इस संबंध में लिखा था कि भारत में श्रम संबंधी दशाओं का एक बड़ा दोष यह है, कि कुछ उद्योगों में बच्चों को गैर-कानूनी रूप से काम पर लगाया जाता है। रिपोर्ट में यह कहा गया हैं कि निरीक्षण स्टाप कि कमी के कारण कानून की जरूरी व्यवस्थाओं को लागू करना कठिन है। बाल-श्रमिक एवं श्रमिक के बीच आयु भी एक मुख्य सीमा की तरह निर्धारित की गई है। 

बाल श्रम के संदर्भ में बालश्रमिक को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है, कि 15 वर्ष की आयु सीमा से कम आयु वाले व्यक्ति जो की कम से कम आयु निर्धारित की गई है, बच्चे जो खेलने-कुदने और शिक्षित होने की उम्र में इसके अलावा पारिवारिक परिस्थितियों के कारण कम से कम वेतन में अधिक से अधिक कार्य करते है बालश्रमिक कहलाते है।

Comments