ज्योतिबा फुले के विचार

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ज्योतिबा फुले
ज्योतिबा फुले

ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के सातारा जिले में माली जाति के एक परिवार में हुआ था। वे एक महान विचारक, कार्यकर्ता, समाज सुधारक, लेखक, दार्शिनक, संपादक और क्रांतिकारी थे। उन्होंने जीवन भर निम्न जाति, महिलाओं और दलितों के उद्धार के लिए कार्य किया। इस कार्य में उनकी धर्मपत्नी सावित्रीबाई फुले ने भी पूरा योगदान दिया। समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक और क्रांतिकारी ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म 11 अप्रैल, 1827 को पुणे में हुआ था और निधन 28 नवंबर, 1890 को हुआ था। वैसे उनका असल नाम ज्योतिराव गोविंदराव फुले था लेकिन ज्योतिबा फुले के नाम से मशहूर हुए। उनका परिवार सतारा से पुणे आ गया था और माली का काम करने लग था। माली का काम करने की वजह से उनके परिवार को 'फुले' के नाम से जाना जाता था।

ज्योतिबा फुले के राजनीतिक विचार

सत्यशोधक समाज में राजनैतिक विषयों की चर्चा करने की मनाही थी, इसलिए यह धारणा गलत होगी कि महात्मा ज्योतिबा फुले राजनैतिक विचारों से दूर थे या उनके राजनैतिक विचार ही नहीं थे। उनके जमाने में राजनैतिक विषयों की चर्चा करने का मतलब अंग्रेजों को तत्काल भगा देने की चर्चा करना था। महात्मा ज्योतिबा फुले और उनके अनुयायी नहीं चाहते थे कि अंग्रेज तुरन्त यहाँ से चले जाए क्योंकि यदि ऐसा हुआ, तो वे देश की राजनैतिक सत्ता फिर से मुठ्ठीभर ब्राह्मणों के हाथों में जाने और पेशवाशाही के पुनरागमन का खतरा महसूस करते थे। इसलिए उनका राजनीति से अलिप्त रहना, एक माने में राजनीति ही थी, चाहे तो हम उसे नकारात्मक राजनीति कह सकते हैं।

ज्योतिबा फुले ने अंग्रेज पूर्व राज- कारोबार के परिणाम देखे थे। पेशवा हो या मुगल- लूटपाट, मारकाट, डाकेजनी दोनों के काल में आम था। दोनों प्रजा पालक नहीं थे। पेशवाओं तथा उनके शिंदे, होलकर जैसे शूद्र माने गये सरदारों तक ने धर्म के नाम पर सामान्य जनता को भरसक लूटा था। अंग्रेजों की शासन पद्धति ने मोटे तौर पर होने वाली यह खुले आम लूट रोकी जरूर, पर यह बात अलग है कि भीतर से वे शोषण का एक भयंकर कुचक्र चला रहे थे।

निम्न और असुरक्षित वर्गों को अंग्रेज राज में जरूर कुछ राहत मिली। कानून सबके लिए समान था, इसलिए ऊँच-नीच, अमीर-गरीब इत्यादि भेद तत्वत: कम हो गये। धर्म के नाम पर या सत्ता के बल पर अब किसी की मनमानी चल नहीं सकती थी। ज्योतिबा फुले यह महसूस ही नहीं, विश्वास करते थे कि अंग्रेजी राज सभी जुल्मों से निम्न वर्गो को मुक्ति देने वाला राज है। इस राज के कारण पहले के राज में (पुरोहित शाही में) विद्वेष के कारण धर्म सम्बन्धी, नीति सम्बन्धी, राज्य सम्बन्धी या अन्य कई कारणों से प्रजा पर जो जुल्म होते थे, उनसे उसे हमेशा के लिए मुक्ति मिल गयी। ज्योतिबा फुले ने इसीलिए अछूतों को यह सलाह दी थी किसी भी कीमत पर अंग्रेजों को त्यागो मत। उनके हमारे ऊपर महान उपकार हैं। ये ‘महान उपकार’ याने अंग्रेजों की निष्पक्षता।

तत्कालीन स्थिति को देखते हुए ज्योतिबा फुले का यह सोचना गलत नहीं लगता। तत्कालीन परिस्थितियों का ज्योतिबा फुले ने स्वयं अपनी पुस्तक ‘गुलामगीरी’ की प्रस्तावना में शूद्रों-अतिशूद्रों की खराब स्थिति के बारे में बताया है-

शूद्रों को घूमना हो तो भी बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। शूद्रों में से कई लोगों को (जातियों को) रास्ते पर थूकने की भी मनाही थी। इसलिए उन शूद्रों को ब्राह्यणों की बस्तियों से गुजरना पड़ा तो अपने साथ थूकने के लिए मिट्टी के किसी एक बर्तन को रखना पड़ता था। समझ लो, उसकी थूक जमीन पर पड़ गई और उसको ब्राह्यण-पंडे ने देख लिया तो उस शूद्र के दिन भर गए। अब उसकी खैर नहीं। उसमें भी एकदम सुबह के समय तो बहुत भारी दिक्कतें खड़ी हो जाती थी, क्योंकि उस समय सभी चीजों की छाया काफी लंबी होती है। ऐसे समय शूद्र को ब्राह्यण पर अपनी छाया न पड़े, इस डर से कंपित होकर उसको पल-दो पल अपना समय फिजूल बरबाद करके रास्ते से एक ओर होकर वही बैठ जाना पड़ता था। बड़ी कठिनाईयाँ बर्दाश्त करनी पड़ती थी।

इस तरह ये लोग (शूद्रादि-अतिशूद्र जातियाँ) अनगिनत मुसीबतों को सहते-सहते मटियामेट हो गए। लेकिन अब हमें वे लोग इस नरक से भी बदतर जीवन से कब मुक्ति देते हैं, इसी का इंतजार है। जैसे किसी व्यक्ति ने बहुत दिनों तक जेल के अंदर अपनी जिन्दगी गुजार दी हो, वह कैदी अपने साथी-मित्रों से, बीवी-बच्चों से, भाई-बहन से मिलने के लिए या स्वतंत्र रूप से आजाद पंछी की तरह घूमने के लिए बड़ी उत्सुकता से जेल से मुक्त होनें के दिन का इंतजार करता है, उसी तरह का इंतजार, बेसब्री इन लोगों को भी होना स्वाभाविक ही है। ऐसे समय बड़ी खुशकिस्मत कहिए कि ईश्वर को उन पर दया आई, इस देश में अंग्रेजों की सत्ता कायम हुई और उनके द्वारा ये लोग ब्राह्यणशाही की शारीरिक गुलामी से मुक्त हुए। इसलिये ये लोग अंग्रेजी राजसत्ता का शुक्रिया अदा करते हैं। ये लोग अंग्रेजों के इन उपकारों को कभी भूलेंगे नहीं। उन्होंने इन्हें आज सैकड़ों साल से चली आ रही ब्राह्यणशाही की गुलामी की फौलादी जंजीरों को तोड़ करके मुक्ति की राह दिखाई है।

ज्योतिबा फुले ने कहा कि इस देश में अंग्रेज सरकार आने की वजह से शूद्रादि-अतिशूद्रों की जिन्दगी में एक नई रोशनी आई। ये लोग ब्राह्यणों की गुलामी से मुक्त हुए, यह कहने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं है। फिर भी हमको यह कहने में बड़ा दर्द होता है कि अभी भी हमारी यह दयालु सरकार के, शूद्रादि-अतिशूद्रों को शिक्षित बनाने की दिशा में, गैर जिम्मेदारीपूर्ण रवैया अख्तियार करने की वजह से ये लोग अनपढ़ के अनपढ़ ही रहे। कुछ लोग शिक्षित, पढ़े-लिखे बन जाने पर भी ब्राह्यणों के नकली-पाखंडी (धर्म) ग्रंथों के, शास्त्र पुराणों के अंध भक्त बनकर मन से, दिलो-दिमाग से गुलाम ही रहे। इसलिए उन्हें सरकार के पास जाकर कुछ फरियाद करने, न्याय माँगने का कुछ आधार ही नहीं रहा है। ब्राह्यण - पंडा पुरोहित लोग अंग्रेज सरकार और अन्य सभी जाति के लोगों के पारिवारिक और सरकारी कामों में कितनी लूट-खसोट हैं, गुलछर्रे उड़ाते है, इस बात की ओर हमारी अंगे्रज सरकार का अभी तक कोई ध्यान ही नहीं गया है। इसलिए हम चाहते हैं कि अंग्रेज सरकार को सभी जनों के प्रति समानता का भाव रखना चाहिए और उन तमाम बातों की ओर ध्यान देना चाहिए जिससे शूद्रादि- अतिशूद्र समाज के लोग ब्राह्मणों की मानसिक गुलामी से मुक्त हो सकें।

इस प्रकार हम उपर्युक्त विवेचन से देखते है कि ज्योतिबा फुले की नजर में राजनीतिक गुलामी से ज्यादा महत्वपूर्ण मानसिक गुलामी थी। उनकी नजर में मानसिक और सामाजिक गुलामी से मुक्ति पहले जरूरी थी राजनीतिक गुलामी की अपेक्षा।

प्रत्यक्षत: ज्योतिबा फुले किसी राजनीतिक आन्दोलन के साथ नहीं जुड़े, इसका यही कारण था। वे जानते थे कि राजद्रोह अगर गरीबों, शूद्रों, अतिशूद्रों के लिए हानिकारक है तो उन्हें उस राह पर न उतारने में ही भलाई है। तब ज्योतिबा फुले के सामने तत्कालीन देश और कोंकण के विभाग थे। वे उनकी परिस्थितियों के आधार पर पूरे राष्ट्र के बारे में सोचा करते थे, जो वस्तुत: गहन था। एक राष्ट्रीयत्व की जो भावना आज सर्वसामान्य जनता में है, तब नहीं थी। लोग अधिकांशत: अपनी जाति, अपना गाँव, अपने प्रान्त के बारे में ही अधिक सोचते थे। हिन्दुस्तान एक ‘राष्ट्र’ बने ऐसी आकांक्षा तब इने-गिने लोगों में ही थी। यह राष्ट्र के बारे में ज्योतिबा फुले के विचारों से भी स्पष्ट होता है।

राष्ट्र के अस्तित्व पर ज्योतिबा फुले का विचार

राष्ट्र के अस्तित्व तथा पहचान का प्रश्न फुले ने उन्नीसवीं शताब्दी में प्रारम्भ से ही अभिजनों के नेतृत्व में चल रहे राष्ट्रवादी अभियोजना का विरोध करते समय उठाया था। उनका तर्क था कि एक ऐसा समाज जो उनका तर्क था कि एक ऐसा समाज जो जातियों में बुरी तरह से बंटा हुआ हो, राष्ट्र बन नहीं सकता। जो लोग इस राष्ट्र के प्रतिनिधित्व का दावा कर रहे हैं, वास्तव में वे इसको तोड़ने वाले लोग हैं। वे इसके संस्तरणात्मक आधार को भूलकर अपने आप की शक्ति के आधार पर इसका निर्माण करने का प्रयास कर रहें हैं।

ज्योतिबा फुले ने अपनी मरणोपरांत प्रकाशित ‘सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक’ में राष्ट्र बनने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा है कि:-

आर्यो के स्वार्थ पर आधारित झूठे धर्म के कारण चालाक आर्यभट्ट- ब्राह्मणों ने अज्ञानी शूद्रों को नीचा समझा; अज्ञानी शूद्रों ने अज्ञानी महारों को नीचा समझा; और अज्ञानी महारों ने मांगों को अपने से नीचा समझा....... चूंकि उन सभी में विवाह और सामाजिक संबंध निषेध थे इसलिए स्वाभविक रूप से उनके विभिन्न रीति-रिवाज, खान-पान और रस्में आपस में मेल नही खातें थे।

हिस्सों में बंटे हुए लोगों को एक साथ जोड़कर एक एकीकृत ‘राष्ट्र’ कैसे बनाया जा सकता है?

इसलिये ज्योतिबा फुले कभी भी ‘सार्वजनिक सभा’ या ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ जैसी संस्थाओं के साथ जुड़े नहीं। वे मानते थे कि इन दोनों संस्थाओं में अन्तत: उच्चवर्गीय लोगों का ही प्रभुत्व था। वे भले ही यह कहते हों कि सरकारी जगहें सभी जाति धर्मों के लोगों के लिए खुली रखी जाएं, लेकिन अन्त में ये जगहें मिलेंगी विकसित ब्राह्यण वर्ग को ही। स्पर्धा में उनके सामने किसान, शूद्र, अति शूद्र टिक नहीं पाएंगे। इसलिए ज्योतिबा फुले की दृष्टि में शूद्रों की स्वतंत्रता और अस्मिता का प्रश्न सबसे बड़ा प्रश्न था।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि ज्योतिबा फुले यह मानते थे कि जहाँ ऐसे नितान्त विरोधी मतों के, आचार विचारों के लोग रहते हैं उस राष्ट्र को ‘एक राष्ट्र’ बनाना कहाँ तक सम्भव है। उनके अनुसार राष्ट्र निर्माण तभी हो सकता है जब सभी लोग समान समझे जाए, सभी को समान अधिकार प्राप्त हो और सभी में स्नेह तथा हार्दिकता हो। महात्मा ज्योतिबा फुले के राजनैतिक विचारों से उनके धार्मिक विचारों का साक्षात् संबंध है। इसका एक कारण यह है कि वे राजनैतिक क्षेत्र में भी श्री पेन से ही प्रभावित हुए दिखाई देते हैं। इसके साथ ज्योतिबा फुले जिन ईसाई मिश्नरियों के सम्पर्क में आये, वे अमरीकन और स्कॉटिश थे। स्कॉटिश मिशन में प्रशिक्षित होने वाले मिश्नरी मुख्य रूप से अमरीका के लिए तैयार किये जाते थे, इसलिए उन्हें अमरीका के इतिहास और राजनैतिक स्थिति की अच्छी जानकारी हुआ करती थी।

सामान्यत: पूरे पश्चिमी जगत और उसमें विद्यमान विचार-प्रणाली का ज्ञान महात्मा ज्योतिबा फुले को अमरीकी और स्कॉटिश मिश्नरियों के माध्यम से मिला करता था, इसलिए तो उस समय की उदीयमान तिकड़ी बेंथम-मिल-स्पेन्सर की उन पर छाप नहीं पड़ी। वे अंग्रेजों के उदारमतवाद और उपयुक्ततावाद से अभिभूत नहीं हुए। सर्वश्री पेन, फ्रैंकलिन, वाशिंग्टन, लाफायतें ये अमरीकी-फ्रांसीसी लोग ही उनके आदर्श रहे। मानव-अधिकार, राज्य संस्था तथा स्वतंत्रता से संबंधित उनकी परिकल्पनाएँ अमरीकी साँचे से ही ढली हुई थीं।

अंग्रेजी राज के प्रति उदारता के कारण ज्योतिबा फुले पर कई तरह के आरोप भी लगते हैं। जिनको सही नहीं ठहराया जा सकता।

जोतीराव द्वारा अंग्रेजी शासन की स्तुति-प्रशंसा का अभिप्राय यह नहीं निकालना चाहिए कि उनमें देशभक्ति की भावना का नितांत अभाव था तथा वे समकालीन विदेशी शासन के प्रत्येक निर्णय को सिर झुकाकर उचित ठहराते थे। वे तो सर्वसामान्य जनता पर ढाए गए अत्याचारों तथा शोषण, चाहे स्वदेशी पेशवाओं के शासन काल में किया गया हो, चाहे विदेशी अंग्रेज सरकार के द्वारा ढाया गया हो। वे तो सदैव उत्पीड़ित वर्ग का साथ देते थे। जब कोल्हापुर राज्य के तत्कालीन शासक राजाराम की सन् 1870 में मृत्यु हो गई। उसी समय अंग्रेजी शासन की आंतरिक कूटनीति देशी राज्यों को हड़पने की बनती जा रही थी। 

अत: अंग्रेजों ने राजगद्दी के वास्तविक उत्तराधिकारी को अयोग्य घोषित करना चाहा। अंग्रेज शासकों के इस “ाडयंत्र का लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक तथा गोपाल गणेश आगरकर ने भण्डाफोड़ करना चाहा। दोनों देश-भक्तों ने अपने समाचार-पत्रों - ‘केसरी’ तथा ‘मराठा’ में संपादकीय लिखकर अंग्रेजी शासन की बहुत तीखी आलोचनाएं की। जिसके परिणाम स्वरूप सारे महाराष्ट्र में अंग्रेजों के अन्यायपूर्ण शासन के विरूद्ध आक्रोश फैल गया। राजद्रोह के आरोप में दोनों संपादकों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें तीन महीने का कारावास दे दिया गया।

ज्योतिबा फुले इनकी सहायता के लिए सबसे पहले आगे आये। इस मामले में तिलक-आगरकर की जमानत के लिए जोतीराव की सलाह के अनुसार श्री रामसेठ उरवणे ने दस हजार रूपये मुंबई भिजवाये।

जब 1882 में तीन महीनों की सजा भुगतकर जब दोनों कारागार से मुक्त हो रहे थे तब जोतीराव ही पहले प्रमुख व्यक्ति थे जो जेल के द्वार पर पहुँचे। उन्होंने उनका कुशल-क्षेम पूछा और हार्दिक स्वागत किया जबकि उस समय कई अन्य व्यक्ति वहाँ पहुँचकर उनका स्वागत करने में इसलिए झिझकते थे कि कहीं तत्कालीन अंग्रेज सरकार उन्हें भी राजद्रोहियों में सम्मिलित न समझ बैठे? जोतीराव ने न केवल इतना ही साहस दिखाया वरन् एक जनसभा भी आयोजित की, उसमें अपने ओजस्वी भाषण से अंग्रेज सरकार के अन्याय पूर्ण रवैये की आलोचना की। दोनों देशभक्तों द्वारा किए गए निभ्र्ाीक एवं न्याय संगत विचाराभिव्यक्ति की प्रशंसा की तथा उनका हार्दिक स्वागत किया। अत: ज्योतिबा फुले पर देशभक्ति की भावना का अभाव होने का आरोप लगाना सही नहीं है।

स्वयं ज्योतिबा फुले ने देशभक्ति पर विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि उच्च वर्ग का देशाभिमान उनकी दृष्टि में ‘अपवित्र देशाभिमान’ था, क्योंकि अगर वे इस देश के सच्चे अभिमानी होते तो उनके पूर्वज अपने ग्रन्थों में अपने ही देश बांधवों को, शूद्रों को, पशु से भी नीच सिद्ध करने वाला लेखन नहीं करते। ज्योतिबा फुले का मंतव्य स्पष्ट है। जो देश की सारी जनता पर समान स्नेह करता है, उन्हें समान मानता है, वह सच्चा देशभक्त है। अत: देश की सेवा का अर्थ है, देश की सर्वसामान्य जनता की सेवा।

1857 के विद्रोह की असफलता पर ज्योतिबा फुले ने कहा था कि यह विद्रोह उत्तर भारत में जिस तीव्रता से फैला उसका उतना असर दक्षिण में नहीं फैला, क्योंकि आम जनता पहले ही विभाजित थी। अस्पृश्यता, ऊँच-नीच की भावना, सेना में शूद्रों को भरती न किए जाने की साजिश, अशिक्षा, हिन्दू धर्म में व्याप्त अनेक कुरीतियां इसका प्रमुख कारण थीं। डॉ0 पी0 वरदराजलु नायडू के इस कथन से भी हम ज्योतिबा फुले के इन विचारों को समझ सकते हैं। इसीलिए उन्होंने न ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध किया, न विरोध करने वाले प्रयत्नों की प्रशंसा की। इतना ही नही, 1857 की क्रान्ति और क्रान्तिकारियों का उल्लेख वे कुछ उपहास से ही किया करते थे। उनकी यह स्पष्ट मान्यता थी कि ब्रिटिश राज में निर्भयतापूर्वक अपने विचारों को व्यक्त करना या लिखना सम्भव है, पुरोहित राज में यह सम्भव ही नहीं था। इसलिए जब तक यह राज है तब तक उन्नति की राह जितनी बने, उतनी नाप लेनी चाहिए।

अत: इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ज्योतिबा फुले पर अंग्रेजी राज का समर्थक होने का आरोप सही नहीं है। वैसे भी ज्योतिबा फुले अमरीकी राज्य-प्रणाली की जानकारी प्राप्त कर लेने के कारण अंग्रेजी राज्य प्रणाली की अपेक्षा अमरीकी प्रणाली को ही श्रेष्ठ मानते थे और उनकी राय थी कि भविष्यकालीन भारतीय राष्ट्र इसी राज्य-प्रणाली को स्वीकार करे। यही नही, वे चाहते थे कि अंग्रेज भी अमरीकियों का अनुसरण करें। उनकी इच्छा थी, ‘गर्वनर जनरल साहब अमरीकी गणतंत्र के तात महाप्रतापी वाशिंग्टन का अनुकरण करें।’ इंग्लैण्ड और अमरीका दोनों राष्ट्र गणतंत्र ही थे, फिर भी महात्मा ज्योतिबा फुले उनके बीच के संवैधानिक और शासन-व्यवहारात्मक अन्तर को जानते थे और उसे उन्होंने अपनी आर्ष प्रणाली से प्रस्तुत भी किया है। वे कहते हैं कि इंग्लैण्ड में प्रत्यक्ष रूप से कृति करने की अपेक्षा सैद्धान्तिक या तात्विक चर्चा पर बल दिया जाता है जबकि अमरीकी लोग प्रत्यक्ष रूप से कृति करने पर बल देते हैं।

राजनिष्ठ होने के बावजूद ज्योतिबा फुले राजतंत्र के समर्थक नहीं थे। उन्होंने बार-बार प्रजातन्त्र की प्रशंसा की है।

महात्मा ज्योतिबा फुले ने अपनी पुस्तक ‘किसान का कोड़ा’ (शेतकयाचा असूड) में विश्व की गणतन्त्र राज्य प्रणाली का संक्षिप्त इतिहास ही दिया है। उससे स्पष्ट होता है कि महात्मा ज्योतिबा फुले मूलत: जनसत्तावादी विचार-प्रणाली के समर्थक थे और इसमें कोई सन्देह नहीं है कि यह विचार-प्रणाली उन्हें अमरीकी और स्कॉटिश मिश्नरियों के माध्यम से प्राप्त हुई थी। वे जनतंत्रीय राज्य प्रणाली के यूनानी उद्गम से लेकर अंग्रेजों की जनतंत्रीय प्रणाली तक का इतिहास देते हैं। बीच की अवधि में रोमन जनतंत्र का जायजा लेते समय वे सीजर द्वारा लाये गये संकट का भी उल्लेख करते हैं। अंग्रेजों के जनतंत्र के बारे में लिखते समय वे सूचित करते हैं कि उसमें बचे हुए राजाशाही तथा सामंतशाही के अवशेषों के कारण वह खालिस जनतंत्र न होकर हल्का या मिलावटी है। जनतंत्रीय प्रणाली के विकास के मूल में महात्मा ज्योतिबा फुले एक प्रकार का ईश्वरी सूत्र पाते हैं।

उनका विश्वास है कि जनतंत्र की स्थापना में यह दैवी सूत्र परिपूरक है और इसलिए ईश्वर ही इस परिपूर्ति के मार्ग में बाधा डालने वाली शक्तियों को हटाता है, फिर वे बाधा डालने वाले व्यक्ति हो या व्यक्तियों के समूह। इस ईश्वरी सूत्र के कारण ही रोम की जनसत्ता में रूकावट डालने की इच्छा रखने वाले सीजर का उसी के मित्र ब्रूटस ने विनाश किया। वे मानते हैं कि हिन्दुस्तान के शूद्रों को ब्राह्यणों से मुक्त करने का ईश्वरदत्त कर्तव्य मुसलमानों ने नहीं किया, इसलिए ईश्वर ने ही पहले से निम्नावस्था में जीने वाले अंग्रेजों को समझदार बनाकर भारत में भेजा। यहीं नहीं, तो ‘मुगलों की तरह अंग्रेज इस देश के लोगों पर जुल्म करेंगे तो शिक्षा से समझदार बने हुए शूद्रातिशूद्र, पहले शूद्र जाति में जनमें वीर शिवाजी की तरह, अपना शूद्रादि अति शूद्रों का जनराज्य स्थापित करके अमरीकी लोगों की तरह स्वयं अपने राज्य का शासन करेंगे।’

‘तृतीय रत्न’ में किया गया यह उल्लेख अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इससे महात्मा ज्योतिबा फुले के राजनैतिक विचारों का सम्यक ज्ञान होता है। महात्मा ज्योतिबा फुले के विचारानुसार अमरीकी प्रणाली का जनतंत्र आदर्श है और हिन्दुस्तान में, आवश्यक हो तो सशस्त्र क्रान्ति के मार्ग से, इसी प्रकार का राज्य स्थापित करने को वे तैयार थे। ‘तृतीय रत्न’ नाटक अठ्ठारह सौ सत्तावन के विद्रोह से पहले लिखा गया था। इससे हम समझ सकते हैं कि महात्मा ज्योतिबा फुले के राजनैतिक विचारों की दिशा कौन सी थी।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि सर्वसामान्य मानव अधिकार ज्योतिबा फुले के राजनैतिक विचारों की बुनियादी संकल्पना है और हमने देखा है कि मानव अधिकारों से संबन्धित उनके विचार मुख्य रूप से अमरीकी प्रभाव से आये हुए हैं।

ज्योतिबा फुले के धार्मिक विचार

फुले की धर्म सम्बंधी परिकल्पना उनके अन्य समकालीनों से अलग और पर्याप्त मात्रा में लचीली थी। वे कहा करते थे कि अन्य क्षेत्रों की तरह धर्म के बारे में भी बुद्धि की कसौटी का प्रयोग करके मनुष्य को निर्णय करने चाहिए और ऐसी कोई भी बात नहीं करनी चाहिए जिसे उसका विवेक अनुमति न दे।

ईश्वर के बारे में विचार -

जोतीराव नास्तिक नहीं थे। वे ईश्वर के अस्तित्व को मानते थे। वास्तव में जोतीराव प्रखर बुद्धिवादी थे और बुद्धि की सहायता से ईश्वर का अस्तित्व प्रमाणित नहीं किया जा सकता। फिर भी जोतीराव के साहित्य में ईश्वर का उल्लेख बार-बार मिलता है। उसे वे कभी देवदेवता कभी कर्ता तो कभी परमेश्वर कहते हैं लेकिन वे ईश्वर का उल्लेख प्राय: निर्माणकर्त्ता (निर्मिक) शब्द से करते हैं। उन्होंने विश्व में ईश्वर के लिए प्रचलित ‘अल्ला’, ‘गॉड’, ‘ब्रह्म’ आदि शब्दों में से किसी शब्द को नहीं अपनाया क्योंकि उनकी राय थी कि इन शब्दों के मूल में आराधना, भक्ति या पूजा करने के भिन्न-भिन्न विशिष्ट कर्मकांड हैं और ये कर्मकांड व्यर्थ और मनुष्य-मनुष्य के बीच सामाजिक फूट डालने वाले हैं।

फुले आस्तिक थे और ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास भी करते थे। लेकिन उनकी ईश्वर विषयक कल्पना पूर्णत: निर्गुण, निराकार थी। ठीक कबीर जैसी। वे एकेश्वरवादी थे। वे मानते थे कि अनन्त सूर्यमण्डल और ग्रहोपग्रहों सहित समस्त प्राणि मात्र का निर्माण करने वाली कोई एक शक्ति है। उन्होंने ईश्वर को एक नया नाम दिया था- ‘निर्मिक’। यह निर्मिक दयाधन है। उसने किसी मनुष्य को ऊँच या किसी को नीच नहीं बनाया। उसकी खोज करना व्यर्थ है, क्योंकि वह अनन्त है और हमारा जीवन अत्यन्त अल्प तथा क्षणभंगुर है। भले ही उस ‘निर्मिक’ ने मनुष्य को सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बनाया हो, किन्तु अपनी श्रेष्ठ बुद्धि के बल पर भी मनुष्य उस ‘निर्मिक’ की अपरंपार शक्ति को समझ नहीं सकता।

एकेश्वरवाद का समर्थन -

एक ही निर्माणकर्त्ता द्वारा निर्माण किये हुए समस्त मानवों के लिए सार्वजनिक सत्यधर्म के सिवाय अन्य कोई चारा नहीं है क्योंकि वही मानव का एकमात्र स्वाभाविक तथा प्राकृतिक धर्म है- इस सूत्र को स्वीकार करने पर स्वाभाविक रूप से इस निर्माणकर्त्ता के स्वरूप और उसके अपने द्वारा निर्मित मानव से संबंधों के बारे में चर्चा करने की जरूरत होती है। जोतीराव का संकल्पित निर्माणकर्त्ता चैतन्यवादियों के ईश्वर की अपेक्षा केवल नाम भिन्नता के कारण ही नहीं, तो सब दृष्टियों से निराला, अलग है। सामाजिक जीवन और ईश्वर की परिकल्पना के बीच वाले संबंध द्वंद्वात्मक होते हैं। समाज स्थल तथा काल के अनुरूप ईश्वर की परिकल्पना में आज बदलाव होता आया है और आज भी उस प्रक्रिया को रोकने की कोई भी आवश्यकता नहीं है, बल्कि वह प्रक्रिया कहीं न कहीं रूक जाने के कारण आज सामाजिक आदर्शों और ईश्वर सम्बंधी परिकल्पना में विसंगतियॉं उत्पन्न हुई हैं और जब तक उन्हें दूर नहीं किया जाता, तब तक सामाजिक परिवर्तन का रथ आगे बढ़ ही नहीं सकता। जोतीराव का यह विचार स्पष्ट करता है कि वे एकेश्वरवाद का कट्टरता से समर्थन करते हैं।

फुले की राय में विश्व-व्यापार का असीम फैलाव, उसका विश्वव्यापी विस्तार होने पर भी, उसकी कार्यवाही में पाई जाने वाली नियमबद्धता, अविच्छिन्नता, सुयोजन और संतुलन को देखते हुए इस सबका यदृच्छया होते रहना असंभव लगता है। इसका अर्थ है कि उसका कोई न कोई अगाध क्षमता वाला सूत्र-संचालक होना ही चाहिए। इसी प्रयोजनवादी दृष्टिकोण से जोतीराव ने निर्माणकर्त्ता के स्वत: सिद्ध अस्तित्व को 50 नरके हरि-संपादक, महात्मा फुले : साहित्य और विचार, जोतीराव की धर्म संबंधी परिकल्पना, लेखक- भोले भास्कर लक्ष्मण, महात्मा फुले चरित्र साधने प्रकाशन समिती स्वीकार किया है। उनकी राय में चराचर सृष्टि में निर्माणकर्त्ता की प्रेरणा-शक्ति तथा नियमन की निरंतर प्रतीति होती रहती है। प्रत्यक्ष परिणामों के आधार पर जोतीराव ने अपनी धारणाओं को प्रस्तुत करते हुए कहा है कि सृष्टि का निर्माणकर्त्ता, अभिभावक और नियंता केवल एक ही है और सारे मनुष्य उसकी संतानें हैं, साथ ही, निर्माणकर्त्ता दयालु, न्यायी, उद्धाकर्त्ता और क्षमाशील हैं। जोतीराव निर्माणकर्त्ता के लिए कोई भी कर्मकांड आवश्यक नहीं समझते।

असंख्य बार ईश्वर का नाम लेना ईश्वर की भक्ति नहीं है। ऑंख बन्द करना, नाक पकड़ना, अगरबत्ती जलाना, माहौल निर्मित करना और मन्त्रों का जाप करना भक्ति नहीं है। कोई व्यक्ति भगवान की भक्ति करके अपने बुर्जुग पिता-माता का ध्यान नहीं रख सकता। जो लोग भाग या नशे का सेवन करते हैं और आलसी जीवन जीते हुये दूसरे के भोजन पर निर्भर हैं वैसे लोग अनैतिक होते हैें। व्यक्ति को ईश्वर से डरना चाहिये। उनका सदा स्मरण करना चाहिये तथा अपने कर्मों को इमानदारी से करना चाहिये। यही ईश्वर की सच्ची भक्ति है। अच्छा आचरण ही ईश्वर को ध्यान रखने का सबसे बड़ा साधन है। जप तप में विश्वास करना गलत है। इस प्रकार जोतीराव ने निर्माणकर्त्ता के लिए कोई भी कर्मकाण्ड आवश्यक नहीं माना।

ईश्वर के संदर्भ में जोतीराव ने मूर्ति पूजा, अवतार कल्पना, जपजाप्य, अनुष्ठान, नैवेद्य आदि को संपूर्णत: अस्वीकार किया, मनुष्य और ईश्वर के बीच वाले बिचौलिये को हटा दिया, धर्म के आधार पर लूट-खसोट करने वाले सभी उदारपोषी दांभिकों का पर्दाफाश किया। यह कहकर कि जिन्हें बहुजन-समाज देवता मानकर पूजा करता था, वे मूलत: बलि के राज्य के कार्यक्षम व्यक्ति थे और जो कोई बलि के राज्य को मिटाने वाले थे, वे अवतारी पुरूष न होकर दुष्ट आक्रमणकारी थे, जोतीराव उन दोनों का मानुषीकरण करते हैं। जोतीराव ने उन्हें मत्र्य मानव समझकर ही उनका गौरव अथवा निंदा की है।

बुद्धि प्रमाणवाद पर बल -

ज्योतिबा फुले बुद्धिवादी थे। धर्मों का अधिकांश व्यवहार भावनाओं के बल पर चलता है। जोतिबा ने अपने विवेचन में भावनाओं के बजाय तर्क और बुद्धि पर अधिक बल दिया। ईश्वर के प्रति पूज्यभाव और कृतज्ञता-बुद्धि अवश्य चाहिए। लेकिन भाईचारे के साथ हम सभी से बर्ताव कर सकें तो उस पूज्यभाव और कृतज्ञता के अलावा ईश्वर तथा धर्मपालन के लिए और कुछ करने की आवश्यकता नहीं। धर्मपालन और ईश्वर स्मरण दोनों व्यक्ति के अपने निजी कर्म हैं। उनके पालन के लिए किन्हीं बाह्य कर्मकांडों की भावनाओं के प्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं।

इहवादी जीवन मार्ग -

फुले के मनुष्य केन्द्री धर्म-विचारों के उद्देश्य सर्वथा इहवादी थे। उनका केन्द्रवर्ती उद्देश्य था मनुष्य जाति का ऐहिक सुख-संवर्धन और जीवन-साफल्य। यद्यपि फुले के लेखन में निर्माणकर्त्ता का उल्लेख बार-बार तथा विभिन्न संदर्भों में आया है, तथापि उनका रूख विशेष रूप से अलौकिक की अपेक्षा लौकिक विश्व और निर्गुण, निराकार ईश्वर की अपेक्षा हाड़-मॉंस के बने मनुष्य की ही ओर था।

जोतिबा का सत्यधर्म नास्तिक मत नहीं। आस्तिक इहवादी धर्ममत है। निर्माणकर्त्ता ईश्वर को मानने वाला, लेकिन तत्सम्बन्धी सभी कर्मकाण्ड स्पष्टत: नकारने वाला। वह एक ऐसा जीवनमार्ग है जो सभी मनुष्य जाति का भला चाहता है। उस ‘निर्र्मक’ ने हर व्यक्ति को कुछ मानवी अधिकार देकर पैदा किया है। इन मानवी अधिकारों का उपयोग करने में ही व्यक्ति का सुख समाया हुआ होता है। अत: हर व्यक्ति इन मानवी अधिकारों का निर्वेध उपभोग कर सके, इस तरह का बर्ताव करना याने सत्यधर्म के अनुसार बर्ताव करना। जोतिबा के सामने भविष्य के मानव का सुखी, समाधानी और समतापूर्ण जीवन है। वे परलोक का विचार नहीं करते, क्योंकि उनकी दृष्टि में परलोक है ही नहीं। मनुष्य सुख की प्राप्ति के लिए, यही उस ‘निर्मिक’ ने चाहा है, धन धान्य, कंदमूल, फल-फूल, पेड-पौधे सबका निर्माण सुख कें साधनों के रूप में उसने किया है। इस सुख प्राप्ति में कहीं पर भी शोषण की, स्वार्थ की या अन्याय की गंजुाइश नहीं। सामाजिक न्याय और समतापूर्ण नीति इस सुख प्राप्ति की दो महत्वपूर्ण कसौटियाँ हैं। एक और बहुत महत्वपूर्ण बात की ओर जोतिबा ने संकेत किया है। मनुष्य यह जान ले कि इस परम कृपालु ‘निर्मिक’ ने सभी स्त्री-पुरूषों को भाई-बहनों की तरह निर्माण किया। भ्रातृ भाव की वह परम पवित्र वृत्ति रही नहीं इसलिए इस जगत में सत्य का हृास होता गया और दुख की मात्रा बढ़ी।

न स्वर्ग न नरक-

न स्वर्ग नाम की कोई वस्तु है और न ही नर्क नाम की। कोई मनुष्य आज तक स्वर्ग देखकर न वापस लौटा, न नर्क देखकर। ऐसा फुले मानते है। फुले के द्वारा ‘सार्वजनिक सत्य धर्म’ पुस्तक में स्वर्ग के विषय में जानकारी प्रश्नोत्तर रूप में निम्न प्रकार दी गई है-

मनाजी बोलूजी: दुनिया के सभी अज्ञानी लोग यह कहते हैं और मानते हैं कि स्वर्ग नाम की कोई चीज है, और उस स्वर्ग में पुण्यवान लोगों को सदैव सुख मिलता है। वैसे ही अधार्मिकों को उनके कर्म के अनुसार नरक में सदैव के लिए तरह-तरह की विपदाएँ सहन करनी पड़ती है, इसके बारे में आपका क्या कहना है? जोतीराव फुले: बहुत प्राचीन काल में जब कहीं भी किसी को यह मालूम नहीं था कि सुधार किस पदार्थ का नाम है, तो कुछ होशियार लोगों ने स्वर्ग का बखेड़ा खड़ा कर दिया जिस तरह से मालियों द्वारा खेतों में, बागों में हाँडी को सिंदूर लगाकर पुतले की तरह बिजूखा या इसी प्रकार की कोई वस्तु जानवरों-पंछियों को डराने के लिए इस्तेमाल की जाती है उन्होंने स्वर्ग को ऐसे ही एक हौआ के रूप में रखा था। बाद में आगे-पीछे कई क्षेत्रों में काल के अनुसार सुधार हुआ है। लेकिन स्वर्ग के बारे में किसी ने कोई सोच-विचार नहीं किया है और न उसका पता लगाने की कोशिश की है।

मनाजी: इससे आप क्या यही कहना चाहते है न कि स्वर्ग नाम की कोई चीज ही नहीं है? जोतीराव: इसमें भी कोई संदेह है? वैसे ही सभी धर्मग्रन्थों में यह लिखा गया है कि स्वर्ग है। लेकिन इस धरती पर रहने वाले किसी भी व्यक्ति ने अभी तक यह नहीं बताया कि मैंने स्वर्ग को स्वयं देखा है। काल्पनिक पुराणों के शब्दों पर ध्यान देकर पौराणिक कथाओं पर विश्वास रखने के बजाय कोई आदमी स्वर्ग देखने के लिए गया हो और फिर वह लौटकर आ गया हो, ऐसा कोई उदाहरण हमारे पास नहीं है। इस तरह स्वर्ग से लौटकर आया हुआ कोई आदमी इस धरती के धरातल पर नहीं मिल सकेगा तो उसे वास्तविक या यथार्थ नहीं माना जा सकता।57 इस प्रकार फुले ने स्वर्ग, नरक जैसे आडम्बरों की निरर्थक बताया और यथार्थ जीवन जीने की सलाह दी।

धर्मग्रन्थ प्रमाणित नहीं -

जोतीराव ने अपनी पुस्तक ‘सार्वजनिक सत्य धर्म’ में कहा है कि ‘‘सभी धार्मिक पुस्तकें मनुष्यों द्वारा लिखी गयी है इसलिये वे आदि से अन्त तक सत्य नहीं हो सकती। कुछ पूर्वागहग्रस्त लोगों द्वारा इन पुस्तकों में परिवर्तन किया गया है। ताकि वे तत्कालीन परिस्थितियों और अवसरों को पूर्ण कर सके। इसीलिए धर्म सभी के लिए हमेशा एक समान मददगार नहीं बन सका और वे इस तरह के सम्प्रदाय का विकास किये जिससे वैमनस्य और शत्रुता को उत्पन्न होने का अवसर मिल सके।’’

जहाँ फुले ने एक तरफ इन धर्मग्रन्थों की आलोचना की वही उन्होंने कहा- धर्मग्रन्थों में लिखी सभी बाते थोथी नहीं हैं। समय के अनुसार उनमें कुछ बातें सत्य अवश्य हैं, जो बातें सभी के लिए अच्छी है। उनको स्वीकार किया जाए और जो कालवाह्य हैं, उन्हें छोड़ दिया जाए। असल में ईश्वर एक ही है और विश्व के सभी स्त्री-पुरूष उसकी संताने हैं। इसलिए धर्म के नाम पर मनुष्य-मनुष्य के बीच देश, वंश पंथ, स्तर, लिंग आदि के आधार पर विभेद करना ईश्वरी योजना के विरूद्ध है। इस प्रकार हम देखते है कि फुले ने बहुत ही व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाया धर्मग्रन्थों के बारे में।

कर्मवादी दृष्टिकोण -

जोतीराव के अनुसार भाग्य जैसी कोई चीज नहीं हैं। जब मनुष्य शिक्षा, व्यवसाय, युद्ध में नाकामयाब होता है तो वह दुर्भाग्य को कोसता है जो कि तर्कसंगत और सत्य नहीं है। क्योंकि उनके कर्त्तव्यों में कमी होती है चॅूकि वे उसे पूर्ण नहीं करते। कुछ भी भाग्य द्वारा हासिल नहीं होता है। सभी चीजों के पीछे कारण होता है। भाग्य नहीं। अत: फुले ने लोगों को भाग्य के भरोसे न बैठे रहकर अपने क र्त्तव्यों को ईमानदारी से करने की नसीहत दी।

सार्वजनिक सत्यधर्म की संकल्पना -

जोतीराव ने एक किताब लिखा था जिसका नाम ‘सार्वजनिक सत्य धर्म’ है। जो उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई। यह किताब धर्म से सम्बन्धित है। यह किताब 1 अप्रैल 1889 को लिखी गई। जिसे जोतीराव ने लोगोंं की भलाई और सुख के लिये लिखा।

ज्योतिबा फुले ने सिर्फ किसी विशिष्ट समाज या लोगों का विचार नहीं किया। उन्होंने सम्पूर्ण विश्व के मानव प्राणियों का विचार किया है। विश्व के मानवप्राणी सुखी कैसे होंगे? यह उनका विषय था। विश्व के मानवप्राणियों को सुखी रहने के लिए उनका आचरण महत्वपूर्ण है और यह आचरण सत्य पर आधारित होना चाहिए। इसको फुले ने ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ पुस्तक में प्रश्नोत्तर रूप में प्रतिपादित करते हुए कहते है:-

यशवंत जोतीराव फुले: मानव प्राणी सारी दुनिया में कैसे सुखी होगा? जोतीराव गोविंदराव फुले: सत्य आचरण के बगैर मानव प्राणी दुनिया में सुखी नहीं होगा। इसके लिए कुछ सबूत दे रहा हूँ: सत्य सभी का है आदि घर। 

सभी धर्मो का है पीहर ।।धृ0।।
दुनिया में सुख है सारा। खास सत्य का है वह छोकरा ।।1।।
सत्य सुख का है आधार। बाकी सारा है अधंकार।।
दुनिया में है सत्य का बल। निकालता झगडालू का जल ।।2।।
सत्य है जिसका मूल। खींचता धूर्तो की खाल।।
सामथ्र्य सत्य का देखकर। बहुरूपी जलता मन में खाक होकर ।।3।।
सही सुख कहाँ अभिनेता को। त्यागना चाहे ईसा को।।
जोती प्राथ्र्ाी सभी जनों को। व्यर्थ दंभ न दिखाओ लोगों कों ।।4।।

सत्य का आचरण किए बिना मानवप्राणी विश्व में सुखी नहीं होगा, इस विषय का प्रमाण ज्योतिबा फुले ने दिया है। सत्य को ज्योतिबा फुले ने विशेष महत्व दिया तथा सत्यवर्तन करने का आग्रह किया है। सत्य ही महत्वपूर्ण है। सत्य ही सभी धर्मो का मायका है। सत्य ही सुख का आधार है, बाकी सब अधंकार है। सत्य का आचरण करने से कोई भी मनुष्य दुखी नहीं होगा, यह ज्योतिबा फुले ने स्पष्ट किया। ज्योतिबा फुले के मत में कई बार सत्य मामूली लगता होगा, फिर भी उसके अनुसार आचरण करना जरूरी है।

मनुष्य को सत्य का आचरण करना चाहिए ऐसा आग्रह फुले ने किया है। सत्यपूर्ण आचरण करने से विश्व के सभी मानव प्राणी सुखी होगे, इस प्रकार का आशावाद उन्होंने व्यक्त किया है। इसके साथ ही सत्य आचरण कौन सा है? सत्य आचरण करने वाला किसे कहें? ऐसे प्रश्नों के माध्यम से सत्य आचारण के 33 नियम उन्होंने ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ पुस्तक में दिए हैं। जो इस प्रकार है- गणपतराव दर्याजी थोरात: हमे किसको सत्य आचरण करने वाला कहना चाहिए? जोतीराव फुले: सत्य आचरण करने वाले के संबंध में कुछ नियम दे रहा हूँ, वे निम्न प्रकार है:
  1. हम सभी के निर्माणकर्त्ता ने सभी जीव प्राणियों को पैदा किया है। लेकिन उनमें नर और नारी दोनों जन्म से ही स्वतंत्र है। वे दोनों सभी अधिकारों का उपभोग करने के योग्य बनाए गए हैं, यह जो लोग स्वीकार करते है, उन्हीं को सत्य आचरण करने वाला कहना चाहिए।
  2. नारी हो या पुरूष, वह अपने निर्माणकर्त्ता के इस विशाल आकाश में स्थित अनंत सूर्यमण्डलों को और उनके ग्रहों-उपग्रहों को या किसी विचित्र तारे को या किसी धातु-पत्थर की मूर्ति को निर्माता के अलावा न पूजता हो तो, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  3. हम सभी के निर्माणकर्र्त्ता द्वारा उत्पन्न किए हुए सभी चीजों का पूरी तरह से सभी प्राणियों को उपभोग करने की अनुमति न देते हुए निर्माता के नाम से बेमतलब अर्पण करके उसका खोखला नाम स्मरण जो लोग नहीं करते, उनको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  4. जो हम सभी के निर्माणकर्त्ता द्वारा पैदा किए हुए सभी प्राणियों को सभी चीजों का मनचाहे उपभोग करके उनको निर्माता का आभार मानकर उसका गौरव करने देता है, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  5. विश्वकर्त्ता द्वारा निर्मित सभी प्राणियों के लिए जो किसी भी प्रकार की बेमतलब की परेशानी नहीं पैदा करता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  6. हम सभी के निर्माता ने सभी नारी-पुरूषों को सभी मानवी अधिकारों का मुख्य हकदार बनाया है। उनमें किसी व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों का समूह किसी व्यक्ति पर जोर-जबर्दस्ती नहीं कर सकता और उस तरह जोर-जबर्दस्ती न करने वाले व्यक्ति को ही सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  7. हम सभी के निर्माता ने सभी मानव नारी-पुरूषों को धार्मिक तथा राजनीतिक स्वतंत्रता दी है, उससे किसी दूसरे व्यक्ति को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाई जा सकती, यह मानकर जो कोई अपनी तरह दूसरे व्यक्ति के हकों को जानकर दूसरों को सताता नहीं, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  8. हम सभी के निर्माता ने प्राणियों को पैदा किया है। उनमें हर एक नारी मात्र एक पुरूष से अपना व्याह करके बाकी पुरूषों को भाई माने, ऐसे ही हर एक पुरूष एक नारी को अपनी बीवी बनाकर बाकी नारियों को अपनी बहने माने। इस तरह जो नारी या पुरूष एक-दूूसरे के साथ बड़ी खुशी से भाई बहन की तरह आचरण करता है, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  9. हम सभी के निर्माता ने सभी नारियों को या पुरुषों को सभी मानवी अधिकारों के बारे में जो चाहे वे विचार या अपने मनचाहे मतों को अभिव्यक्त करने के लिए, लिखने के लिए और प्रसिद्ध करने के लिए स्वतंत्रता दी है। लेकिन इन विचारों से और इन मतों से किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की हानि नहीं होनी चाहिए, इसकी खबर जो रखता है, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  10. हम सभी के निर्माता की व्यवस्था से जो सभी नारी-पुरूष दूसरों के धर्म के बारे में मतभिन्नता की वजह से या राजनीतिक कारणों से उनको किसी भी तरह नींच नहीं मानते और न उनका शोषण करते है, उनको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  11. हम सभी के निर्माता ने सभी नारी-पुरूषों को धर्म के संबंध में स्थानिक या क्षेत्रीय अधिकारों के पद उनकी योग्यता के अनुसार और सामथ्र्य के अनुसार मिलना चाहिए, इसके लिए उनको समर्थ बनाया है, ऐसी बातों को जो लोग स्वीकार करते हैं, उनको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  12. हम सभी के निर्माता के नियमों के अनुसार सभी मानव नारी-पुरूषों में धर्म, स्थानीय और क्षेत्रीयता संबंधी हर मनुष्य की स्वतंत्रता, संपत्ति, संरक्षण और उसके जुल्म से बचाव करने के बारे में जो लोग कठिनाइयाँ पैदा नहीं करते, उनको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  13. नारी या पुरूष जो लोग अपने माता-पिता से बुढ़ापे में सलाह-मंत्रणा करते हैं और अन्य बुर्जुगों को सम्मान देते हैं या जो माता-पिता से सलाह-मंत्रणा करके अन्य बुर्जगों को सम्मान देने वालों को बड़ा आदर देते हैं, उनको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  14. नारी या पुरूष, जो हकीम की आज्ञा के बिना अफीम, भॉग, मद्य आदि नशीले पदार्थो का सेवन करके हर तरह से अन्याय करने में नहीं लगा होता या नशीले पदार्थ सेवन करने वाले को आसरा नहीं देता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  15. खटमल, जूँ, पिस्सू आदि जन्तु, बिच्छू, साँप, बॉघ, सिंह, लकड़बग्घे आदि जानवरों और उसी तरह लोभी मानव, दूसरे मानव प्राणी की हत्या करने वाले या आत्महत्या करने वालों को छोड़कर जो नारी या पुरूष दूसरे मानव प्राणियों की हत्या नहीं करता या हत्या करने वाले की सहायता नहीं करता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  16. नारी या पुरूष, जो अपने फायदे के लिए दूसरे का नुकसान करने के लिए झूठ नहीं बोलता या झूठ बोलने वाले की मदद नहीं करता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  17. नारी या पुरूष, जो व्यभिचार नहीं करता या व्यभिचार करने वालों का सम्मान नहीं करता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  18. नारी या पुरूष, जो किसी भी प्रकार की चोरी नहीं करता या चोरों की मदद नहीं करता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  19. नारी या पुरूष, जो घृणा से दूसरों के मकान को या उनके सामान को जलाता नहीं या आग लगाने वालों से कोई संबंध नहीं रखता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  20. नारी या पुरूष, जो स्वयं के स्वार्थ के लिए न्याय से राज करने वाली रियासतों पर या राज्य पर या सारी प्रजा द्वारा मुखिया बनाए हुए प्रतिनिधि के विरोध में विद्रोह करके लाखों परिवारों को बर्बाद नहीं करता या विद्रोह करने वालों को पनाह नहीं देता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  21. नारी या पुरूष जो ‘सारी दुनिया के कल्याण के लिए यह धर्म पुस्तक बनाई गई है’ कहकर बड़ी बकवास करता है, किन्तु उस धर्म पुस्तक को अपनी बगल में दबाकर दूसरे लोगों को दिखाता तक नहीं, ऐसे दुष्ट बड़ाईखोरों से जो दूर रहते है और उन पर भरोसा नहीं करते, उनको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  22. नारी या पुरूष, जो अपने परिवारों के साथ, अपने भाई-बहनों को, अपने रिश्तेदारों को और अपने दोस्तों को बड़े घमंड से खानदानी श्रेष्ठ मानकर स्वयं को पवित्र नहीं मानता और सभी मानव प्राणियों को खानदानी नफरत के जरिये अपवित्र मानकर उनको नीच नहीं मानता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  23. नारी या पुरूष, जो प्राचीनकाल में घृणा से लिखे गए ग्रंन्थों की शिक्षा के आधार पर कुछ मानव समाजों को खानदारी गुलाम नहीं मानता या उनको दास मानने वालों की परवाह नहीं करता, उसको सत्यवर्तन करने वाला जानना चाहिए।
  24. नारी या पुरूष, जो अपने लोगों की प्रभुता कायम रखने के लिए स्कूल में पढ़ाते समय अन्य लोगों के बच्चों से परायेपन का व्यवहार नहीं करता या स्कूल में पढ़ाते समय परायेपन का व्यवहार करने वालों का निषेध करता है, उसको सत्यवर्तन करने वाला जानना चाहिए।
  25. नारी या पुरूष, जो न्यायमूर्ति के पद पर विराज मान होने के बाद अन्यायी लोगों का, उनको जुर्म के अनुसार सजा देने में कोई कसर बाकी नहीं रखता या अन्याय करने वालों का निषेध करता है, उसको सत्यवर्तन करने वाला जानना चाहिए।
  26. नारी या पुरूष जो खेती का काम करके या अन्य प्रकार की कारीगरी करके पेट पालने वालों को श्रेष्ठ मानता है और किसानों की सहायता करने वालों का आदर-सत्कार करता है, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  27. नारी या पुरूष, जो चमार के घर का ही क्यों न हो, बेगारी का काम करके अपना पेट पालने वालों को नीच नहीं मानता बल्कि उस काम मे मदद करने वालों की प्रशंसा करता है, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  28. नारी या पुरूष, जो स्वयं कोई व्यवसाय किए बगैर ही बेमतलब धार्मिकता का दिखावा करता है और अज्ञानी लोगों को नवग्रहों का डर बताकर उनको लूट करके नहीं खाता या उसके बारे में किताबों की रचना करके अपना पेट नहीं पालता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  29. नारी या पुरूष, जो श्रद्धावान मूर्ख को फुसलाकर खाने के लिए ब्रह्मर्षि का स्वॉग रचाकर उनको राख-धूप नहीं देता या वैसे काम के लिए किसी भी प्रकार की मदद नहीं करता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  30. नारी या पुरूष, जो काल्पनिक भगवान की शांति करने के बहाने आसन लगाकर अज्ञानी जनों को लूटकर खाने के लिए जपजाप करके अपना पेट नहीं भरता या उसके लिए किसी भी प्रकार की सहायता नहीं करता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  31. नारी या पुरूष, जो अपना पेट पालने के लिए अज्ञानी जनों में कलह पैदा नहीं करता या उसके लिए मदद करने वालों की छाया को छूना भी पंसद नहीं करता, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
  32. नारी या पुरूष जो हम सभी के निर्माता द्वारा पैदा किए हुए प्राणियों में से मानव नर-नारियों में किसी भी प्रकार की पसंदगी नापसंदगी रखे बगैर उनका खाना-पीना और पहनना आदि के बारे में किसी भी प्रकार का विधि निषेध किए बगैर ही उनके साथ पवित्र मन से आचरण करता है, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए। 
  33. नारी या पुरूष, जो सभी मानव नर-नरियों में किसी के प्रति पसंदगी-नापसंदगी रखे बगैर उनमें से महारोगी को, अपाहिज को और बेसहारा बच्चों को अपनी क्षमता के अनुसार मदद करता है या मदद करने वाले को सम्मान देता है, उसको सत्य आचरण करने वाला जानना चाहिए।
इस प्रकार हम देखते है कि सत्यवर्तन के संबंध में उपरोक्त 33 नियमों का यथार्थ ढंग से विचार करने पर ज्योतिबा फुले की सत्यधर्म की संकल्पना स्पष्ट होती है।

सत्य आचरण के ये 33 नियम अर्थात फुले के सार्वजनिक सत्यधर्म की जो अवधारणा है, उसकी आधारशिला है। इस सत्यधर्म की संकल्पना में 33 नियमानुसार मानव द्वारा सत्य आचरण करने से ही विश्व के सभी प्राणी सुखी होंगे। सभी मानवों द्वारा अर्थात नर-नारियों का दर्जा समान है, इसे पहचानना और दूसरों के समान अधिकारों में रूकावट नहीं आए, इस प्रकार स्वयं का सुख साधने का प्रयास करना अर्थात सत्यधर्म का पालन करना हैं। ऐसे न्यायपूर्ण आचरण में ही सत्यधर्म का लगभग पूरा सार व्यक्त होता है। इन तैंतीस सूत्रों में सार्वजनिक सत्यधर्म के तत्व समाविष्ट हैं। इनसे ज्ञान हो जाएगा कि अन्य धर्मो के प्रति आदरभाव और सहिष्णुता सार्वजनिक सत्यधर्म की विशेषता है। जोतीराव मानते हैं कि हर व्यक्ति को अपना धर्म चुनने का अधिकार होना चाहिए। इसलिए एक ही परिवार के सदस्यों का अलग अलग धर्म हो सकता है। जोतीराव का ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ असल में विश्व धर्म है।

उसमें सांप्रदायिकता का कोई स्थान नहीं है। यह धर्म किसी भी एक समूह की बपौती नहीं है। कुछ लोगों को विशेषाधिकार और अन्यों का शोषण यह विषमता इस धर्म को मंजूर नहीं है। इस धर्म में किसी भी प्रकार के दुराग्रह, अदावत, झूठी अहंता या हीनभाव, बर्चस्व या गुलामी के लिए कोई स्थान नहीं है। यह धर्म मनुष्य-मनुष्य के बीच लिंग, जाति, धर्म, वर्ण आदि के आधार पर पक्षपात करने का निषेध करता है और श्रम प्रतिष्ठा को अनन्य साधारण महत्व देता है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि ज्योतिबा फुले की यह संकल्पना मानवतावादी और समतामूलक समाज-व्यवस्था की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है।

ज्योतिबा फुले के कृषि सम्बन्धी विचार

ज्योतिबा फुले शूद्र और साधारण किसान के बेटे थे। बचपन में पिता के साथ खेती बाड़ी करने में हाथ बंटाते थे। विद्याथ्र्ाी जीवन में जब एक ऊँची जाति के विद्यालय लिपिक ने उसके पिता को डरा, धमकाकर बालक फुले को इसलिए विद्यालय से निकलवा दिया कि उसके विद्याध्ययन से घोर अनिष्ट हो जाएगा और कलियुग आ जाएगा तो बालक फुले फिर खेतों में काम करने आ गया। तब से ही फुले को मालूम था कि किसान की जिंदगी कितनी तकलीफदेह है और मेहनत से भरी है। सुबह से शाम तक काम करो तब रोटी मिलती है। वह अशिक्षा, धार्मिक रूढ़ियों और कट्टरता, अस्पृश्यता और ऊँच-नीच का बोझ अलग झेलता है तथा समाज में अपमानित होता रहता है।

ज्योतिबा फुले ने किसानों की दुर्दशा की जो विवेचना की है और कृषि सुधार के जो उपाय सुझाये है वे आज भी अत्यंत उपयोगी पाये जाते हैं। आज भी लगता है कि उनकी इस सारी विवेचना मे वांछित सामाजिक तथा आर्थिक समानता स्थापित हो सकेगी।

जोतीराव ने पिछड़े वर्ग के सामाजिक उत्थान तथा उनकी शैक्षणिक प्रगति के लिए जितना कार्य किया था उतना ही नितांत गरीब तथा साधन-हीन किसानों के आर्थिक उद्धार के लिए भी करना चाहा। इसके लिए वे निरंतर प्रयत्नशील रहे, उनका मन समस्याओं के समाधान की खोज निकालने में निरन्तर डूबा रहा। परिणामत: इन्होंने सन् 1883 में ‘‘शेतकरयाचा असूड’’ (हिन्दी में किसान का कोड़ा’’) शीर्षक से एक महत्वपूर्ण ग्रंथ की रचना की। इसमें कृषकों की सर्वागीण उन्नति के लिए अनेक बहुमूल्य सुझाव प्रस्तुत किए। जोतीराव ने इस ग्रन्थ का प्रारंभिक ‘उपोद्घात’ एक अत्यंत मार्मिक सूक्ति से आरम्भ किया है:- ‘‘विद्या के अभाव में मति गई, मति के बिना नीति गई, नीत के बिना गति और गति के बिना वित्त-वित्त के अभाव में शूद्रों की अधोगति हो गई, इतने सारे अनर्थ एक अकेली अविद्या के कारण हो गए।’’ जोतीराव ने किसान की दरिद्रता के मुख्यत: तीन कारण बताये हैं- कृषि पर जनसंख्या का बढ़ता दबाव, पड़े पुरोहित वर्ग, महाजन और शासक तथा उसकी नौकरशाही द्वारा किसानों का शोषण और कृषि उत्पादन-प्रणाली का पिछड़ापन और दु:स्थिति।

उपरोक्त ग्रन्थ में जोतीराव ने गरीब किसानों की आर्थिक दुर्दशा का ऐतिहासिक सर्वेक्षण किया, इसके कारणों को बहुत गहराई तथा बड़े मनोयोग से विश्लेषित किया। उनकी मान्यता में पेशवा-राज्य में ब्राह्मण वर्ग ने निर्धन किसानों का बहुत शोषण किया, उनकी अशिक्षा, अज्ञान तथा गरीबी का बहुत अनुचित लाभ उठाया। परन्तु ज्योंही पेशवाओं का शासन समाप्त हुआ त्योहीं महाराष्ट्र के अधिकांश सैनिक युद्ध-क्षेत्र से अपने-अपने गाँवों को लौट पड़े। अर्थोपार्जन के लिए खेती करने के अतिरिक्त अन्य कोई साधन उनके पास नहीं थे। परिणामत: अत्यंत निर्धन खेतीहर किसानों का शोषण अधिक होने लगा।

अंग्रेजों के शासन काल में बहुत बड़े-बड़े वन विभाग निर्मित किए गए जिसमें अनेक गाँवों के चरागाहों की भूमि अधिग्रहीत हो गई। इसका दुष्परिणाम गरीब किसानों की पशु-पालन की व्यवस्था पर पड़ा। पशुओं के लिए चारा जुटाना ही उनके लिए एक विकट समस्या बन गई। अंग्रेजों द्वारा विदेशी वस्तुओं के आयात पर बल देने के परिणामस्वरूप स्थानीय उद्योग ठप्प होने लगे। यहाँ के श्रमिकों को भयंकर बेरोजगारी का सामना करने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय ही नही सूझता था। ब्राह्मण पुरोहित वर्ग ने समुद्र यात्रा को निषिद्ध ठहराकर हिन्दू धर्मानुयायियों को बहुत हानि पहुँचाई। प्रस्तुत विधान से उसने पिछड़े वर्ग के लोगों को अपना दास या गुलाम बनाये रखना चाहा, जिससे वे उनके लिए खेती करने, वस्त्र तैयार करने, मकान बनाने आदि अनेक छोटे-बड़े कार्यो में उपयोगी सिद्ध हो सके। इस व्यवस्था का दुष्परिणाम यह हुआ कि भारतीय लोग यूरोप की वैज्ञानिक, आर्थिक तथा सामाजिक प्रगति के ज्ञान से सर्वथा वंचित रह गए।

किसानों की सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक स्थिति का फुले ने विस्तृत विश्लेषण किया। ‘किसान का कोड़ा’ ग्रन्थ की प्रस्तावना में फुले ने स्पष्ट रूप से कहा कि, ‘‘दुनिया के तमाम देशों का इतिहास देखा जाए तो हिन्दुस्तान की अशिक्षित, अनपढ़, भोले-भाले शूद्र किसानों की स्थिति अन्य किसानों से बदत्तर है। पशु से भी बुरी उनकी स्थिति है। फुले ने स्पष्ट किया कि, भारतीय किसानों में 3 प्रकार के भेद हैं। कुनबी, माली और धनगर ये किसानों के तीन प्रकार हैं। प्रारम्भ में जो लोग केवल कृषि से जीवन निर्वाह करते थे, वे कुलवाड़ी या कुनबी हुए। जो लोग अपनी कृषि का काम करके बागवानी करने लगे वे माली और जो लोग ये दोनों प्रकार के काम करते हुए भेड़-बकरियों के झुंड पालने लगे वे धनगर या गड़रिया हो गए। इस तरह अलग अलग काम के आधार पर भेद निर्माण हुए होंगे, किन्तु अब उन्हें तीन अलग-अलग जाति माना जाता है। इनमें आज आपस में बेटी व्यवहार नहीं होता। लेकिन पहले रोटी-व्यवहार आदि होता था। इससे यह सिद्ध होता है कि ये (कुनबी, माली और धनगर) पहले एक ही शूद्र किसान जाति के होने चाहिए।

इस प्रकार फुले ने ऐसा निष्कर्ष निकाला कि यहाँ के ज्यादातर किसान शूद्र जाति के हैं। फुले के अनुसार बड़े और समर्थ किसान तो अपनी मजबूत आर्थिक स्थिति और रुतवे के बल पर अन्याय से मुकाबला करने की कोई न कोई राह निकाल लेते थे, लेकिन छोटे-छोटे किसानों और खेती पर मजदूरी करने वाले स्त्री-पुरूषों का कोई पक्षधर नहीं था।75 धर्म के नाम पर भट्ट-ब्राह्मणों का वर्ग, शासन-व्यवस्था के नाम पर शासन में विभिन्न अधिकार के पदों पर बैठा हुआ उन्हीं की जाति का एक वर्ग और उच्च वर्णियों में ही समाविष्ट होने वाला सेठ-साहूकारों का वर्ग, ये तीनों मिलकर उसे लूटते थे। वह इनसे उबरे भी तो कैसे? जोतिबा की दृष्टि में एक ही मार्ग था- शिक्षा प्राप्त करना। किसानों की (शूद्रों की) दुर्गति का मुख्य कारण अशिक्षा ही था। जोतिबा कहा करते थे- ‘विद्या बिना मति गई मति बिना नीति गई नीति बिना गति गई गति बिना वित्त गया वित्त बिना शूद्र टूटे इतने अनर्थ एक अविद्या ने किये।’

इस अविद्या के कारण वह यह समझ नहीं सका कि जन्म से लेकर मृत्यु तक हर सुख-दु:ख के प्रसंगों को एक धार्मिक कर्म का रूप देकर उसे ब्राह्मण किस तरह लूटते हैं? तीज-त्यौहार उसकी भलाई के लिए हों या न हों, दक्षिणा लेने वालों के लिए सदा ही लाभदायक थे। जप-तप, पूजा-कीर्तन, यात्रा प्रवास, लेना-बेचना इनमें से किसी भी काम के लिए वह स्वतंत्र नहीं था। शुभ-अशुभ, लाभ-हानि, शकुन-अपशकुुन का चक्र उसके पीछे लगा रहता। वह समर्थ हो या न हो उसे ‘देना’ है और पुरोहितों को ‘पाना’ है।

ज्योतिबा फुले ऐसे समाज चिन्तक हैं जिन्होंने प्रथमत: किसानों के प्रश्न जान लिए। केवल जाना ही नहीं बल्कि उन प्रश्नों के बारे में सहानुभूतिपूर्ण मानवतावादी दृष्टिकोण भी प्रदर्शित किया और भारत के किसानों की सच्ची कहानी सुनाने का साहस किया। जब 2 मार्च, 1888 को राजपुत्र ड्यूक ऑफ कॅनाट का पूना में अभिनंदन किया गया।

इग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया के पुत्र ड्यूक ऑफ कॅनाट उन दिनों सेनापति थे। जब वे इंग्लैंण्ड लौटने लगे, तब पुणे के लोगों ने उनके सम्मान में एक बड़ा विदाई-समारोह आयोजित किया। पुणे के श्री हरि रावजी चिपलूणकर ने उनकी मेजबानी की थी। समारोह में सम्मिलित होने के लिए नगर के गणमान्य लोग आये थे, जिनमें देशी नरेश, जागीरदार, बड़े-बड़े अधिकारी और धनिमानी लोग थे। उन लोगों ने तरह-तरह के आभूषण पहने थे। वह तड़क-भड़क और शान देखते ही बनती थी। इतने में वहाँ एक गँवार दिखाई देने वाला किसान आया। फटी पुरानी धोती और देहाती काट का कुर्ता पहनकर उसने सिर पर मैला-सा मुॅंडासा बाधा था और कंधे पर एक पुराना कंबल डाल लिया था। वह गँवार किसान और कोई नहीं, जोतीराव ही थे। सिपाहियों ने उनको द्वार पर रोका, तो उन्होंने अपना आमंत्रण पत्र दिखाया तब मजबूर होकर सिपाहियों ने उन्हें अन्दर जाने दिया। अन्दर आमंत्रितों के लिए शानदार कुर्सियाँ लगी हुई थी लेकिन जोतीराव कुर्सी पर नहीं बैठे। उन्होंने जमीन पर अपना कंबल बिछाया और वे उसी पर बैठ गये। जब जोतीराव का नाम पुकारा गया, तब वे मंच पर गये और उन्होंने धारा प्रवाह अंग्रेजी में जोरदार भाषण दिया।

उस समय उन्होंने अपने भाषण में ड्यूक ऑफ कॅनाट को बताया कि, ‘‘समारोह में पधारे लोगों के मूल्यवान कपड़ों और चमकीले हीरों की ओर देखकर तुम्हें पता चलेगा कि भारत बहुत सुखी और सन्तोषी देश है। लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। स्वर्णालंकारों से मढ़े हुए और मंहगे कपड़े धारण किए हुए अमीर लोग इस देश की जनता के सच्चे प्रतिनिधि नहीं है। देश के किसानों के वे प्रतिनिधि नहीं है।

आगे जोतीराव ने कहा कि सच्चा भारत गॉंवों में दिखाई देता है। गॉंवो में लोग निर्धन, भूखे, कंगाल और बेघर हैं। बहुसंख्य ग्रामीण जनता को पूरे तन ढ़कने तक को कपड़े नहीं मिलते और उनका पहनावा मेरे जैसा ही लेकिन गन्दा होता है। यदि राजपुत्र को सच्चा भारत देखना हो तथा महारानी को सच्ची खबर बतानी हो, तो उन्हें आस-पास के कुछ गॉंवों में जाकर अशिक्षित जनता की दयनीय स्थिति और दरिद्रता प्रत्यक्षरूप से देखनी चाहिए। महार-मांग की कुछ बस्तियों में भी जाकर देखना चाहिए और ये बस्तियॉं कूड़ेदान से भी खराब हैं। अछूतों की बस्तियॉं मनुष्यों के रहने लायक है या नहीं इस बात को भी देख लेना चाहिए। वास्तव में भारत ऐसा है। ड्यूक ऑफ कॅनाट आपको अपनी माताजी महारानी विक्टोरिया को जाकर यह बताना चाहिए कि यहॉं की जनता दरिद्रता में पिस रही है और उनको शिक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है। हमारी यह बात उन तक अवश्य पहुंचायी जाये।

इस प्रकार ज्योतिबा ने किसानों की दु:स्थिति प्रत्यक्ष रूप से राजपुत्र को बतायी। किसान और गरीब जनता के लिए उनके मन में बेचैनी थी। किसानों का दुख राजपुत्र के सामने रखने की हिम्मत उन्होंने दिखायी थी। क्योंकि किसानों का जीवन उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से देखा था। वे स्वयं भी एक किसान परिवार के ही तो थे।

कृषि सुधार सम्बन्धी सुझाव -

जोतीराव ने कृषि सुधारों की आवश्यकता पर बल देकर किसानों की स्थिति सुधारने की पहल की।

जोतीराव ने किसानों की दीन अवस्था का हृदय द्रावक वर्णन किया है वहाँ उनके जीवन को सुधारने और उन्नति के पथ पर अग्रसर करने के लिए अनेक मूल्यवान सुझाव भी प्रस्तुत किये हैं।

इनका सर्वप्रथम और प्रमुख सुझाव यह है कि भारतीय किसानों को यूरोपियन किसानों के समान ही कृषि-सम्बन्धी ज्ञान प्रदान किया जाना चाहिए। यहाँ के किसानों का तब अत्यधिक लाभ होगा जब वे कृषि के विकास के लिए यूरोपियन कृषि-प्रणाली का अध्ययन करेंगे।

असिंचित, वर्षा पर निर्भर खेती करने वाले किसानों का भाग्य प्रकृति की सनक पर अवलंबित होता है, इसलिए उनके खेतों को पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने की आवश्यकता का महत्व जोतीराव ने जाना था। इसके उपाय स्वरूप उन्होंने सुझाव दिया कि भूमि पर गिरने वाली पानी की हर बूँद को रोक रखने के लिए सरकार को चाहिए कि वह स्थान-स्थान पर ताल-तलैया, बाँध बनाने का कार्यक्रम बनाए और उसे कार्यान्वित करें। इससे यह साबित होता है कि फुले के विचार कितने आधुनिक थे। हमारी सरकारें आज जल संग्रह की बात कर रही है।

भारतीय किसानों के पास मशीनों का सर्वथा अभाव है, अत: पशु धन ही उनका सबसे अधिक सहायक साधन है। इसके संरक्षण तथा किसानों के गाय, बैलों का वध प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक हुआ तो विदेशों से मांस तथा भेड़-बकरियों का आयात किया जाना चाहिए परन्तु यहाँ के पशु धन के विनाश को हर हालत में रोका जाना चाहिए। पशुओं की वृद्धि से खाद का उत्पादन बढ़ जाता है। प्रत्येक किसान के लिए अन्नोत्पादन की दृष्टि से खाद की ही प्राथमिकता होती है। इसकी संपूर्ति के लिए पशुओं से अधिक अन्य कौन सा साधन सहायक हो सकता है? भारतीय पशुओं की नस्ल सुधारने की दिशा में भी विशेष प्रयत्न किये जाने चाहिए। इसके लिए विदेशों से अच्छी नस्ल के पशुओं का आयात किया जाए तथा इनकी सहायता से नई और उन्नत नस्लों को पैदा कर लेना आवश्यक है। विशेषत: गाय-बैलों की नई उन्नत नस्लों के साथ-साथ भेड़-बकरियों को भी नई नस्लें पैदा कर लेनी चाहिए, इससे न केवल उनके उत्पादन में सहायता मिलेगी वरन् अनेक श्रमिक लोग रोजगार पा अंगे्रज सरकार ने पेशवाओं की ब्राह्यणों को दक्षिणा देने की प्रथा पूर्ववत चालू रखी, इसलिए जोतीराव संतप्त होकर बोले, ‘‘डरपोक अंग्रेज सरकार आज भी इस प्रथा को चालू रखकर मेहनती, शूद्राति-शूद्र किसानों की पसीने की कमाई लगान रूप में वसूल कर उसमें से प्रति वर्ष हजारों रूपये खर्च करती है। सरकार नित नये कर किसानों पर लादकर उनका धन बड़ी चतुराई से बटोरने की नीति अपनाती है जिससे किसान ऋणग्रस्त हो जाते हैं। किसानों को ऋणमुक्त किया जाए, उन्हें कम ब्याज-दर से ऋण दिये जाएँ।

जंगली जानवरों के बारे में उन्होंने लिखा है- ‘‘जंगली जानवर किसानों की फसलें खराब करते हैं। सरकार उनकी रोकथाम करने का अधिकार न तो किसानों को देती है और न ही यह काम खुद करती है। इसलिए यदि जंगली जानवर फसल की खराबी करे तो संबंधित अधिकारियों के वेतन से कटौती करके किसानों की क्षतिपूर्ति की जाए।’’

वर्षा, बाढ़ तथा पर्यावरण की रक्षा के लिए वृक्षों के अत्यधिक महत्व का प्रतिपादन जोतीराव ने किया था। इनके विचारों में कृषि-उत्पादन को ध्यान में रखकर ही गोबर तथा वृक्षों की लकड़ी का उपयोग किया जाना चाहिए। इमारतों, कारखानों आदि के निर्माण में लकड़ी का उपयोग करने के लिए वृक्षों की जो अंधा-धुंध कटाई की जाती है उसे प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। अन्यथा वृक्षों के समूल विनाश से कृषि विकास तथा पर्यावरण की रक्षा में कभी भी सहायता नहीं मिलेगी। हमारा सारा समाज आज पर्यावरण की चिन्ता कर रहा है। वृक्षों की, जंगलों की कटाई कैसे रोकें? आज हमारे सामने खड़े इस प्रश्न पर जोतिबा ने बड़ी गहराई से सोचा था। ‘किसान का कोड़ा’ पुस्तक का आखिरी अंश इसी पर है।

जोतीराव ने किसानों में कृषि संबंधी ज्ञान की वृद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं। इनके मत में प्रतिवर्ष कृषि मेलों का आयोजन किया जाना चाहिए, इनमें कुशल किसानों को पुरस्कृत किया जाए। हल चलाने की प्रतियोगिता आयोजित करके उत्तम स्थान पाने वाले किसानों को पुरस्कृत किया जाए। लगातार तीन वर्षो तक खेती के उत्पादन में निरन्तर वृद्धि दर्शाने वाले कृषकों को सम्मानार्थ श्रेष्ठता की पदविया वितरित की जाएं। सरकार को चाहिए कि वह गरीब किसानों के होनहार बच्चों को नई कृषि-व्यवस्थाओं का अध्ययन करने के लिए विदेशों को भेजने का प्रबंध करे। इसका लाभ यह होगा कि विदेशों में हुए कृषि संबंधी विकास विस्तार की उन्हें जानकारी मिलेगी और अन्नोत्पादन की नई-नई तकनीक से वे परिचित हो जाएंगे।

फुले ने यह भी कहा है कि ‘पाटीलकी’ (पटेल या चौधरी का पद) वंश परम्परा से न देकर परीक्षा देने वाले किसान पुत्रों को दी जाए। इस पद का पैतृक रूप समाप्त कर ये पद सभी जातियों/जनजातियों के लिए उपलब्ध कराये जाएँ।

इसके साथ फुले ने कहा कि हमारी सरकार जल-अनुमानकों से राज्य के सभी खेतों का निरीक्षण करवाए और जहाँ-जहाँ मोट चलाने लायक पानी का अनुमान होगा, उन सभी जगहों को चिन्हित कर संबंधित गांवों के मानचित्र (नक्शे) बनाए। सरकारी सहायता के बिना जल-अनुमानक की मदद से कुएं खोदने वाले शूद्र किसानों को पुरस्कार देने की परंपरा बनाई जाए। किसानों को पहले की तरह नदी-नालों और तालाबों में जमा हुआ गाद नि:शुल्क ले जाने दिया जाए। जिन-जिन गांवों की चरागाहें सरकार ने अपने ‘फॉरेस्ट’ में शामिल कर ली होंगी, वे संबंधित गाँवों को लौटा दी जाएँ। सरकारी वन सीमा के अन्दर की लकड़ी जलाने की अनुमति दी जाए लेकिन बेचने के लिए इमारती लकड़ी काटने पर प्रतिबंध लगाया जाए।

जोतीराव किसानों के हिमायती बनकर शोषक वर्ग के विरूद्ध आग उगलते रहे लेकिन साथ ही वे किसानों की मूर्खता का व्यंगात्मक भाषा में धिक्कार भी करते रहे। किसानों को एक से अधिक स्त्रियों के साथ ब्याह नहीं करना चाहिए, इस बात को बताते हुए उन्होंने कहा है- ‘‘फिर भी वे एक के पीछे एक, दो, चार स्त्रियों के साथ विवाह करते हैं। इस अत्याचारी न्याय को क्या कहा जाए? मेरी राय में उन्हें और एक पाँचवी स्त्री से भी विवाह करना चाहिए ताकि उनके मरने पर चार स्त्रियाँ उनकी अथ्र्ाी उठाएँ और पाँचवी हंडी उठाकर समाज को उस चिता से मुक्त करे।

इस प्रकार जोतीराव ने कृषकों के उत्थान के लिए जहाँ सरकार के अनेक उत्तरदायित्वों का विस्तार से उल्लेख किया है वहाँ किसानों को भी उनके कर्तव्यों के पालन की प्रेरणा और शिक्षा दी है। उन्होंने किसानों से अनुरोध किया है कि वे चोरी, छीना-झपटी आदि करके सामाजिक अपराधों को करने में प्रवृत न हो, दुव्र्यसनों से बचें तथा यथासंभव सदाचारी जीवन बिताएं, एक से अधिक विवाह न करें, एक पत्नी व्रत का पालन करें, अपने बच्चों की बहुत छोटी उम्र में ही शादी न करें। उनकी इन सलाहों का निष्कर्ष था कि यदि कृषक-वर्ग अपने व्यक्तिगत दुर्गणों तथा कुरीतियों को त्याग देगा तो उसका उद्धार भी उतनी तीव्रगति से सम्भव हो जाएगा।

फुले द्वारा दिया गया कृषि विकास का यह सुझाव काफी आधुनिक है। उनका जोर बायोटैक्नोलॉजी तथा वाटरशेड मैनेजमेंट जैसे कार्यक्रमों के लिए था। खेतों पर सीधे पानी पहुँचाने के लिए उन्होंने बाँध, नहर और छोटे बाँधों के निर्माण का सुझाव दिया था। उनका कहना था फौजियों और पुलिस वालों को इसके लिए श्रम प्रदान करना चाहिए। वन विभाग द्वारा जिन जमीनों को छीन लिया गया है, उसे वापस कर देना चाहिए। भेड़-बकरियों की नस्लों में सुधार होना चाहिए। जैविक खाद का उत्पादन बढ़ना चाहिए, साथ ही ऊन तथा अन्य कार्यो का प्रदर्शन किया जाना चाहिए। आदर्श किसान को पुरस्कृत किया जाना चाहिए। पारम्परिक क्षमता में वृद्धि की जानी चाहिए। काले और गोरे सरकारी कर्मचारियों के वेतन में कमी की जानी चाहिए जिसमें छोटे वेतनधारी भी सम्मिलित हों।

इन सभी बातों को देखने पर प्रतीत होता है कि महात्मा फुले के कृषि-संबंधी विचार संपूर्ण समाज तथा राष्ट्र के अभ्युदय के विचार हैं, मानवजाति के सर्वांगीण विकास के विचार हैं, आर्थिक तथा सांस्कृतिक संपन्नता तथा शुद्ध एकता के विचार हैं। उनके विचारों का निचोड़ यही है कि भूमि तथा भूमिपुत्र के विकास के बिना यह कृषि प्रधान देश अपना विकास नहीं कर सकता, इसलिए किसानों का विकास करना परमावश्यक है। यह निचोड़ नि:संदेह रूप से आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सौ-सवा सौ वर्ष पहले था।

ज्योतिबा फुले के शिक्षा सम्बन्धी विचार

आधुनिक दृष्टि से जिसे हम शिक्षा कहते हैं, वह शिक्षा जोतीराव के जन्म से पूर्व अस्तित्व में ही नहीं थी। जहाँ उच्चवण्र्ाीयों की अधिक बस्ती होती थी, वहाँ कुछ शास्त्री निजी पाठशालाएँ चलाते थे। इन पाठशालाओं में संस्कृत, व्याकरण, विधि, चिकित्साशास्त्र, ज्योतिष, वेद, अलंकार और धर्मशास्त्र जैसे विषय पढ़ाये जाते थे। लोगों में यह धारणा बनी हुई थी कि समाज के निम्न जाति के लोगों को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार ही नहीं है। इसलिए उन्हें शिक्षा प्रदान करने के लिए उच्चवण्र्ाीयों ने कभी विचार तक नहीं किया। कुछ कस्बों में बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने वाली पाठशालाएँ थी। वहाँ अध्यापक द्वारा व्यापारियों और धनवानों के बच्चों को शिक्षा दी जाती थी। क्र्लकी, साहूकारी अथवा व्यापार करने के लिए कुछ पढ़ना-लिखना आना चाहिए, इतने सीमित उद्देश्य से, ये पाठशालाएँ चलाई जाती थीं। ज्योतिबा फुले भी इस अन्धकारपूर्ण युग से गुजरे थे और कई कटु अनुभव उनको हुए थे।

ज्योतिबा स्पष्टतया जानते थे कि यहाँ के जटिल सामाजिक जीवन में सदियों की दासता और व्यापक गरीबी, धार्मिक कट्टरता, जाति-पाति संप्रदायवाद और छुआछूत की भावना ने दलितों और मेहनतकश जातियों में शिक्षानुराग की मूल कल्पना को ही मृतप्राय बना डाला है। न उनमें कोई चेतना है, न उनमें उत्साह।

जोतिबा की पैनी नजर यह भाँप गयी थी। युगों से पिछड़े हुए अछूतों तथा स्त्रियों को ऊपर उठाना है, तो शिक्षा के अलावा दूसरा रास्ता नहीं। शिक्षा के सहारे ही वे यह जान लेंगे कि वे आज जहाँ हैं, वहाँ क्यों हैं?

फुले ने शिक्षा का महत्व समझ लिया था। केवल अविद्या के कारण शूद्र अतिशूद्र तथा नारी गुलामी का जीवन जी रही है ऐसा उनका स्पष्ट मत था। उनका निम्नलिखित वचन उनके शिक्षा सम्बन्धी दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है-

फुले ने ‘किसान का कोड़ा’ पुस्तक के प्रारम्भ में शिक्षा के महत्व के बारे में तथा उसकी कमी के कारण शूद्रों को जो नुकसान उठाना पड़ा एवं अशिक्षा जनित अज्ञान के कारण उनकी जो अधोगति हुई है उसका वर्णन इस पुस्तक में किया गया है, जो इस प्रकार है:-

‘‘विद्या बिना मति गई, मति गई तो नीति गई,
नीति गई तब गति ना रही, गति ना रही तो वित्त गया
वित्त बिना शूद्र धँसे-धँसाये
इतने अनर्थ अकेली अविघा ने ढ़ाये।’’

विद्या के न होने से बुद्धि नहीं; बुद्धि न होने से नैतिकता न रही; नैतिकता के न होने से गतिमानता न आई; गतिमानता के न होने से धन-दौलत न मिली, धन-दौलत न होने से शूद्रों का विनाश हुआ। इतना अनर्थ एक अविद्या से हुआ।

अंग्रेज भारत में साम्राज्यवाद की पकड़ मजबूत बनाने के लिए शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए कृत संकल्प थे, लेकिन उनकी अधिक चिंता अपने राजकाज चलाने में अंग्रेजी पढ़े-लिखे सहायक नौकरशाहों, लिपिकों के समुचित प्रशिक्षण की थी। यूरोपीय देशों में जो औद्योगिक तकनीकी क्रान्ति आई थी, जो विचार-स्वातंत्र्य की लहर उठी थी उसे भी नजर अंदाज नहीं कर सकते थे।

हिन्दुस्तान के शिक्षा संबंधी सवालों की छानबीन करके उसमें सुधार के सुझाव देने के लिए सरकार ने 1882 में विलियम हंटर नामक व्यक्ति की अध्यक्षता में ‘हंटर कमीशन’ नामक एक आयोग बनाया। यह आयोग सार्वजनिक क्षेत्रों के प्रमुख व्यक्तियों से मिलने, उनसे पूछताछ और चर्चा करने के लिए सारे देश में घूम रहा था। इस आयोग की सहायता के लिए ब्रिटिश भारत के सभी प्रान्तों में एक समिती स्थापित की गई। अपने प्रान्त की शिक्षा-सम्बंधी परिस्थिति की जानकारी इस आयोग को प्रस्तुत करना इन प्रान्तीय समितीयों का काम था।

इसके अनुसार आयोग ने प्रत्येक प्रान्त के शिक्षा-संबंधी सवालों की जानकारी लेकर शिक्षाविदों से विचार-विमर्श किया। कुछ लोगों ने लिखित रूप में अपने विचार आयोग के पास भेजे। जोतीराव इन्हीं लोगों में से एक थे।

‘किसान का कोड़ा’, ‘गुलामगिरी’, ग्रन्थों में ज्योतिबा फुले के शैक्षणिक विचार मिलते हैं। ‘हन्टर शिक्षा आयोग’ को पेश किए निवेदन में ज्योतिबा फुले के शिक्षा से सम्बन्धित सभी विचारों का समावेश हुआ है।

महात्मा फुले ने 19 अक्टूबर 1882 को प्रस्तुत किये अपने निवेदन में अपना वर्णन करते हुए यह कहा है कि मैं एक व्यापारी, किसान और नगरपिता हूँ। उनके द्वारा स्थापित विद्यालयों का और अपने शैक्षिक कार्य का भी उन्होंने इस निवेदन में उल्लेख किया है। शिक्षक के रूप में इतने वर्षो तक किये कार्य के साथ ही शिक्षा क्षेत्र में अपने अनुभव के बारे में भी उन्होंने इसमें जानकारी दी है। ‘गुलामगिरी’ नामक अपने ग्रन्थ के कुछ परिच्छेद देकर उन्होंने निवेदन का आरम्भ किया है।

प्रस्तुत प्रतिवेदन के आरम्भ में जोतीराव ने स्त्रियों तथा शूद्रों की शिक्षा के लिए स्कूलों के नितांत अभाव की चर्चा की है। इस अभाव की पूर्ति के लिए स्वयं तथा उनकी पत्नी द्वारा आरम्भ किए गए कार्यो एवं उनसे प्राप्त अनुभवों का इसमें विवरण दिया गया है।

उस समय शिक्षा-क्षेत्र में अंग्रेजों का आयात किया हुआ ‘फिल्टर डाउन’ सिद्धान्त प्रचलित था। इस सिद्धान्त के अन्तर्गत माना जाता था कि सरकार नगरों में रहने वालें ऊँचें वर्गो को अंग्रेजी के माध्यम से ऊँची शिक्षा दे और गॉव खेड़ों में रहने वालें बहुजन समाज को उसकी मातृभाषा में शिक्षा देने का दायित्व ऊँचे वर्गो को सौंप दिया जाए लेकिन जाति भेदों के कारण यह सिद्धान्त विफल हो गया। जोतीराव ने इस सिद्धान्त का कड़ा विरोध किया, उसकी विफलता बताई और खतरों की भी चर्चा की। उन्होनें आयोग से निडरता से कहा- ‘‘आप शिक्षा का प्रारम्भ नीचे से ऊपर करे, ऊपर से नीचे नही।’’

जोतिबा का कहना था कि उच्च वर्ग अपनी शिक्षा की व्यवस्था खुद कर लेगा। सरकार को उसकी ओर अधिक ध्यान देने की जरूरत नहीं। इसकी जगह अगर वह प्राथमिक शिक्षा की ओर ज्यादा ध्यान देती है, तो अन्य वर्गो से उन्हें असंख्य प्रामाणिक और भले लोग कामकाज चलाने के लिए मिल जाएंगे।

प्राथमिक शिक्षा -

फुलें ने प्राथमिक शिक्षा को विशेष महत्व दिया था।
जोतिबा ने स्पष्टतया यह कहा कि जनता को दी जाने वाली प्राथमिक शिक्षा की हालत बहुत ही खराब है। सरकार की शिक्षा विषयक नीति ही मूलत: अव्यावहारिक और अदूरदश्र्ाी होने के कारण यह हुआ है। प्राथमिक स्कूल है लेकिन उनकी तादात पूरी नहीं है।

जोतीराव ने आगे कहा है कि मुम्बई क्षेत्र में प्राथमिक शिक्षा की काफी उपेक्षा हुई है। प्राथमिक विद्यालयों को उचित साधन महैया कराये नही जाते। सरकार शिक्षा के लिए विशेष ‘कर’ वसूल करती है और वे रूपये जिस कार्य के लिए लिये जाते है, उस कार्य पर खर्च नहीं किये जाते। इस बात पर बड़ा दु:ख होता है। ऐसा कहा जाता है कि इस प्रान्त के अनेक गॉवों के लगभग 10 लाख बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा की कोई सुविधा उपलब्ध कराई नहीं गई है।

शिक्षा का अभाव ही उनकी दरिद्रता, स्वावलंबन का अभाव और शिक्षित तथा बुद्धिमान लोगों पर निर्भर रहने की उनकी आदत का कारण है। किसान और दूसरे गरीब लोग प्राथमिक शिक्षा से कोई लाभ उठा नहीं पाते। उनमें से कुछ गिने-चुने लोगों के बच्चें ही प्राथमिक और मध्यमिक विद्यालयों में दिखाई पड़ते है, परन्तु वे विद्यालयों में अधिक समय तक नहीं रह पाते क्योंकि उनके माता-पिता अपनी दरिद्रता के कारण उन्हें जानवरों की रखवाली और खेती के काम मे लगा देते है।

वे विद्यालय में आकर नियमित रूप से पढ़े, इसलिए सरकार ने उनके लिए कोई छात्रवृत्ति या इनाम की व्यवस्था नही की है। इस बारे में शिकायत करते हुए जोतीराव कहते है, ‘‘मेरी ऐसी राय है कि लोगों को प्राथमिक शिक्षा कुछ हद तक अनिवार्य ही की जाए। कम से कम 12 वर्ष की उम्र तक तो अनिवार्य करनी ही चाहिए। मराठी और अंग्रेजी में रूचि न होने के कारण मुसलमान भी इससे दूर ही रहे है। उनकी भाषा पढ़ाने वालें विद्यालयों की संख्या ऊँगलियों पर गिनी जा सकती है।

जोतीराव ने शिकायत की है कि पाठशालाओं में अतिशूद्र जातियों के छात्रों के साथ भेदभाव किया जाता है और उन्हें ऊँची जातियों के छात्रों के पास बैठने नही दिया जाता। वे यह भी बताते है कि सरकार ने उनके लिए अलग पाठशालाएँ खोली तो है, लेकिन ऐसी पाठशालाएँ सिर्फ बड़े नगरों में है। उन्होनें सुझााव दिया है कि जिन गॉवों में अतिशूद्रों की संख्या बड़ी होगी, वहॉ उनके लिए अलग पाठशालाएँ खोली जाएँ।

फुले के अनुसार सरकारी विद्यालयों में जो प्राथमिक शिक्षा दी जाती है, उसे मजबूत और संतोषप्रद नींव पर खड़ा करना चाहिए। विद्यार्थियों को वह शिक्षा भविष्य में उचित और व्यवहारोंपयोगी साबित होनी चाहिए। पाठ्यक्रम और शिक्षा-प्रणाली में पूरी तरह सुधार किया जाना चाहिए। शिक्षकों की नौकरी के नियम और शर्ते अधिक सुविधाजनक होनी चाहिए। उनके वेतन और स्तर में बढ़ोत्तरी की जानी चाहिए। अध्यापनशास्त्र की परीक्षा दिये हुए शिक्षकों को ही विशेषत: नियुक्ति की जानी चाहिए।

शिक्षकों की नियुक्ति तथा वेतन -

फुलें के अनुसार प्राथमिक विद्यालय में फिलहाल जिन शिक्षकों की नियुक्ति की गई है, वे अधिकतर ब्राह्मण है। उनमें से कुछ सामान्य शिक्षक विद्यालय से उत्तीर्ण हुए है। बचे हुए अधिकतर शिक्षक अप्रशिक्षित है। उनका वेतन नगण्य है। उनका मासिक वेतन शायद ही कभी दस रूपयें से अधिक होता है। इसलिए उनका कार्य भी उसी के अनुसार अपर्याप्त और असंतोषजनक होता है। मेरी तो यह राय बनी है कि प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षक सम्भवत: अध्यापन की परीक्षा उत्तीर्ण हुए हो।

अच्छे तथा योग्य लोग पढ़ाई के क्षेत्र में रहे इसलिए शिक्षकों का वेतन बढ़ाना जरूरी है। वह किसी भी हालत में 12 रूपया से कम न हो। बड़े गाँवों में वह 15 से बीस तक हो। जिन स्कूलों के छात्र अधिक संख्या में उत्तीर्ण होगे, उन स्कूलों के अध्यापकों को वेतन के अलावा खास भत्ता दिया जाए।

इस प्रकार हम देखते है कि फुलें का दृष्टिकोण बहुत व्यवहारिक है। अच्छे शिक्षक को तैयार करने के लिए उसकी व्यक्तिगत और व्यवहारिक समस्याओं की तरफ भी ध्यान देना अत्यन्त जरूरी है जिससे वो अपनी पूरी क्षमता का उपयोग कर सके।

पाठ्यक्रम में सुधार -

जोतीराव ने अपने प्रतिवेदन में पाठ्यक्रम में परिवर्तन लाने के भी सुझाव दिए थे। उनके विचारों में प्राथमिक स्कूल के पाठ्यक्रम में निम्नांकित विषय सम्मिलित किए जाने चाहिए- ‘मोडी’ व बाल-बोध (देवनागरी) में लेखन -वाचन, गणित, इतिहास-भूगोल, व्याकरण का प्राथमिक ज्ञान, कृषि का प्राथमिक ज्ञान, नीति और स्वास्थ्य से संबद्ध सरल पाठ। बड़े शहरों की तुलना में ग्रामीण स्कूलों का पाठ्यक्रम कुछ कम होना चाहिए किन्तु व्यवहारों-पयोगिता की द ृष्टि से उसमें कोई कमी नहीं होनी चाहिए। विद्यार्थियों को कृषि-संबंधी पाठों के साथ-साथ उसका प्रत्यक्ष व्यवहारिक प्रशिक्षण देने से सम्पूर्ण देश का बहुत लाभ होगा।134 प्राथमिक और ऐंग्लोवर्नाक्युलर विद्यालयों में जो किताबें है, उनका सुधार और पुनर्रचना की जानी चाहिए क्योंकि वे व्यवहारोंपयोगी नहीं है। उनसे उनकी प्रगति को गति नहीं मिल पाएगी। तकनीकी, नैतिक, स्वास्थ्य-सम्बन्धी, खेती-सम्बन्धी और कुछ उपयोगी कला के विषयों की भी इसमें बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी हो, ऐसी योजना बनानी चाहिए।

प्राथमिक शालाओं की निरीक्षण योजना में सुधार -

इन स्कूलों की निरीक्षण व्यवस्था सदोष है। साल में एकाध बार ही स्कूल की जाँच की जाती है। उससे कोई लाभ नहीं। कम से कम हर तीन माह के बाद स्कूलों की जॉच की जाय। बिना पूर्वसूचना दिए अगर इन्स्पेक्टर जाँच के लिए जाते है, तो और भी ठीक होगा।

प्राथमिक शिक्षा पर खर्च होने वाली निधि पर शिक्षा विभाग के निदेशक का सामान्य तौर पर नियंत्रण हो। जिला या स्थानीय बोर्ड में शिक्षित और बुद्धिमान लोगों की यदि नियुक्ति की जाए, तो कलेक्टर के मार्गदर्शन के तहत उनकी शिक्षा की निधि उनके हवालें की जाए। अधिकतर अज्ञानी और अशिक्षित लोग जिला बोर्ड में नियुक्त किये जाते है। वे पाटिल, इनामदार, सरदार या दूसरें इस प्रकार के गाँव के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से होते है। वे उस निधि पर योग्य रूप से नियन्त्रण नहीं रख पाएँगे।
ज्योतिबा फुलें ने प्राथमिक स्कूलों की संख्या-वृद्धि के लिए भी सुझाव दिये थे जो इस प्रकार है-
  1. उन सभी स्कूलों को उदारमन से अनुदान प्रदान किया जाए, जिनमें प्रमाण-पतित शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी अथवा इस प्रकार के शिक्षक जिनमें पहले से ही विद्यमान हों।
  2. स्थानीय करो से उपलब्ध धन-राशि में से आधी रकम केवल प्राथमिक शिक्षा पर ही खर्च होनी चाहिए।
  3. नगर पालिकाओं की सीमा में स्थित सभी स्कूलों को निजी खर्च से चलाए जाने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। इसके लिए सरकार द्वारा विधिवत एक कानून भी पास करना उचित होगा।
  4. प्रांतीय अथवा केन्द्रीय कोष से पूरा अनुदान प्राप्त करने की युक्ति निकालनी होगी।
  5. बड़े शहरो की नगरपालिकाओं को चाहिए वे अपनी सीमा में स्थित सभी स्कूलों का पूरा व्यय स्वयं वहन करें।
इस प्रकार हम देखते है कि प्राथमिक शिक्षा पर फुले द्वारा दिये विचार आज भी महत्वपूर्ण बने हुए है। चाहे वो पाठ्यक्रम मे सुधार की बात हो या निरीक्षण योजना।

देशी पाठशालाओं की स्थिति पर विचार -

जोतीराव ने अपने निवेदन में प्राथमिक पाठशालाओं की स्थापना उनके विकास-विस्तार तथा व्यवस्थित संचालन के लिए उपर्युक्त सुझावों को प्रस्तुत करने के उपरान्त देशी पाठशालाओं की परिस्थितियों पर भी गहराई से विचार किया। उस समय देशी पाठशालाएं परम्परागत प्राचीन ग्रामीण शिक्षा-प्रणाली पर चल रही थी। उसमें विद्यार्थियों को साधारण गणित, मोड़ीलिपि में लेखन-वाचन तथा धार्मिक ग्रंथों के श्लोक-उद्धरणों को रटनें मात्र का अभ्यास कराया जाता था। इन पाठशालाओं के शिक्षकों को शिक्षण-शास्त्र की तनिक भी जानकारी नहीं होती थी। अत: वे शिक्षा-पद्धति में सुधार लाने के लिए सामान्यत: अयोग्य सिद्ध होते थे। अत: फुले का मानना था कि ऐसे लोगों से शिक्षा पद्धति में परिवर्तन लाने की आशा करना व्यर्थ होगा। पेट पालने का आखिरी रास्ता मानकर वे इस पेशे में आते है। जब तक विद्यमान शिक्षकों के स्थान पर प्रशिक्षण महाविद्यालयों से प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्त नही किये जाते तब तक इन स्कूलों से कोई ठोस लाभ नहीं होगा। जहाँ ऐसे सुयोग्य शिक्षक हैं, उन्ही स्कूलों को अनुदान दिया जाय।

इस प्रकार से जोतीराव ने पाठशालाओं को वास्तविक सुधार योग्य तथा सुशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति पर ही मुख्य रूप से निर्भर माना है।

उच्च शिक्षा-

उच्च शिक्षा के बारे में जोतिबा का कहना था कि सरकार खुले हाथ से उच्च शिक्षा के लिए खर्च करती है, लेकिन इससे बहुजन समाज की शिक्षा व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो रही है। मैं यह नहीं चाहता कि जिन लोगों को यह मदद मिल रही है, उन्हें वह न मिले। लेकिन दुर्लक्षित होने वाले एक पूरे वर्ग की ओर अगर सरकार ध्यान दे तो ठीक होगा। अभी इस देश की शिक्षा बाल्यावस्था में है। अगर उच्च शिक्षा के लिए किया जाने वाला अनुदान रोका गया तो शिक्षा प्रसार की दृष्टि से वह घातक सिद्ध होगा।

जोतीराव के विचारों में मध्यम तथा कनिष्ठवर्ग के लोगों में शिक्षा की उल्लेखनीय प्रगति अब तक भी नही हो सकी है। ऐसी अवस्था में इस वर्ग को अनुदान से वंचित रखना बहुत विपत्तिजनक होगा। यदि इन लोगों के लिए अनुदान बंद कर दिया जाएगा तो उन्हें अयोग्य तथा संकीर्ण दृष्टि के व्यक्तियों द्वारा संचालित स्कूलों मे प्रवेश लेने के लिए विवश होना पड़ेगा। फलत: शैक्षणिक कार्य की हानि हुए बिना नहीं रहेगी। जोतीराव का सुनिश्चित मत था कि किसी भी स्तर की शिक्षण-व्यवस्था को निजी प्रबंधकों को सौपना अभीष्ट नहीं होगा। आगे आने वाले बहुत समय तक सभी स्तरों पर दी जा रही शिक्षा और उसकी प्रबन्ध-व्यवस्था को चाहे वह औद्योगिकी हो, चाहे प्रशासनिक, सरकारी नियन्त्रण में रखना ही उचित होगा। प्राथमिक तथा उच्च दोनों स्तरों की शिक्षा के संवर्द्धन में अपेक्षित आस्था और कृपा-दृष्टि केवल सरकार ही दिखा सकती है।

मुम्बई विश्वविद्यालय का गौरव करके जोतीराव ने कहा कि ‘‘मुम्बई विश्वविद्यालय निजी तौर पर शिक्षा लेने वाले विद्यार्थियों को परीक्षा में बैठने की अनुमति देता है और यह लोगों के लिए एक वरदान ही है। उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में भी विश्वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा, लोगों को इसी प्रकार का वरदान प्राप्त होगा, ऐसी आशा है। बी0ए0, एम0ए0 की उपाधि के लिए निजी तौर पर की गई पढ़ाई को विश्वविद्यालय यदि मान्यता देता है, तो कई युवा विद्याथ्र्ाी निजी तौर पर पढ़ाई करने का प्रयास करेंगे। उनके द्वारा ऐसा करने से शिक्षा का प्रसार तेजी से होगा।’’

एक प्रकार से देखे तो फुले का यह विचार आज की दूरस्थ शिक्षा की तरह है। इससे यह पता चलता है कि उनके शिक्षा सम्बन्धी विचार कितने महत्वपूर्ण हैं और वह अपने समय से कितना आगे थे।

छात्रवृत्ति देने की सरकार की पद्धति के सम्बन्ध में जोतीराव ने कहा कि ‘‘छात्रवृत्ति कुछ इस प्रकार दी जाए कि जिस वर्ग में शिक्षा की प्रगति नहीं हुई है, उस वर्ग के बच्चों को कुछ छात्रवृत्तियॉ मिले छात्रवृत्ति के लिए होड़ लगातार छात्रवृत्ति देने की पद्धति योग्य होने पर भी इससे निम्न वर्ग में शिक्षा प्रसार के लिए सहायता न होगी’’।

फुले का मानना था कि सरकारी महाविद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा का स्वरूप सर्वसाधारण जीवन की जरूरतें पूरी कर सके ऐसा नहीं है। उसमें भी व्यावहारिकता की कमी है। वह छात्रों को स्वतंत्र जीवन जीना सिखा नहीं पाती। जोतीराव की धारणा में उच्च शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से की जानी चाहिए कि उसकी प्राप्ति सहज और सर्वजन सुलभ हो।

इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम देखते है कि फुले ने हन्टर आयोग के सम्मुख जो सुझाव दिये थे वह बहुत महत्वपूर्ण थे। जिनका सारांश निम्न प्रकार है:-
  1. बम्बई विश्वविद्यालय ने परीक्षार्थियों को घर पर पढ़ाई कर प्रवेश परीक्षा में सम्मिलित होने की अनुमति दी है। सभी विश्वविद्यालयों को अपनी उच्चतर परीक्षाओं में यह प्रथा अपनानी चाहिए। इससे युवक-युवतियां घर पढ़ाई करके स्नातक बन सकेगे। इससे व्यापक शिक्षा प्रचार-प्रसार होगा।
  2. सरकारी पाठशालाओं में सरकारी छात्रतृत्तियों की जो प्रणाली है उसे बदला जाए क्योंकि इससे कमजोर वर्ग के छात्रों की उपेक्षा होती है। जिस वर्ग में पहले से ही विद्या का चलन है, शिक्षा और जागृति आई हुई है उसे ही और प्रोत्साहन देने से उपेक्षित वर्गो का तिरस्कार होगा, इसे रोका जाए।
  3. व्यवहारिक रूप से जिन वर्गो को छात्रतृत्तियां नहीं मिल रही उन्हें अधिक प्रोत्साहित किया जाए।
  4. तकनीकी और व्यवहारोपयोगी शिक्षा को पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाए।
  5. रोजगारपरक शिक्षा पर ध्यान दिया जाए क्योंकि केवल बाबू वर्ग पैदा करने वाली शिक्षा काफी नहीं। शिक्षितों की संख्या जब सौ गुनी हो जाएगी तब दफ्तरी रोजगार कहाँ से उपलब्ध होगे, इसलिए शिक्षा व्यवसायोन्मुखी होनी चाहिए।
  6. जाति निष्ठ विद्यालयों को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए, इससे अन्य वर्गो को उपेक्षा झेलनी पड़ती है।
  7. स्त्री-शिक्षा और विशेषतया वंचित वर्गो की महिलाओं के लिए शिक्षा का विशेष प्रबंध किया जाए।
  8. प्राथमिक शिक्षा को बंबई प्रेसीडेंसी और अन्य जगहो पर अनिवार्य किया जाए।
  9. हर जाति और वर्ग के शिक्षक नियुक्त किए जाएं ताकि एक ही वर्ग की प्रधानता न हो और समाज में तालमेल की कमी न आने पाए।
  10. शिक्षकों का वेतनमान सुधारा जाए क्योंकि शिक्षक ही बच्चें का चरित्र निर्माता होता है और यही आज के बच्चे भविष्य के निर्माता होते है।
  11. विदेशी मिशनरी शिक्षा के क्षेत्र में जो कार्य कर रहे है, उसका स्वागत; लेकिन यह शिक्षा धर्म परिवर्तन के लिए एक हथियार नहीं बनाई जानी चाहिए।
उपरोक्त शिक्षा सम्बन्धी विचारो का अध्ययन करने के पश्चात यह पता चलता है कि फुले एक महान शिक्षाशास्त्री भी थे। उनके द्वारा 19 वीं सदी में प्रस्तुत किए गए शिक्षा संबंधी विचार आज 21वीं सदी में भी अनुकरणीय हैं और हमारे भारतीय समाज के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। भारतीय समाज के सर्वांगीण विकास के लिए उन्होंने इस दृष्टिकोण से विचार प्र्रस्तुत किए। फुले के यह विचार देश की गरीब जनता के कल्याण की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है।

फुले के अनुसार शिक्षा सीधे विकास व समृद्धि से जुड़ी है। भारत के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने भी बाद में इसी तथ्य को उजागर किया।

सामाजिक न्याय के सन्दर्भ में ज्योतिबा फुले के विचार

चूँकि हमारे शोध का विषय सामाजिक न्याय के सन्दर्भ में फुले के विचार है। अत: इस भाग के अन्तर्गत हम फुले के सामाजिक न्याय के सन्दर्भ में विचारों का विस्तृत विवेचन करने का प्रयास करेंगे। फुले के सामाजिक न्याय के सन्दर्भ में विचारों को उनके द्वारा शुरू किए गए आन्दोलनों, कार्यों तथा उनके द्वारा विभिन्न विषयों पर लिखी गई किताबों और निबन्धों से समझा जा सकता है।

ज्योतिबा फुले के जीवन में एक अपमानजनक घटना घटी। एक ब्राह्मण मित्र का निमंत्रण मिलने पर फुले उसकी बारात में सम्मिलित हुए। वे सबके साथ-साथ चल रहे थे। साथ में ब्राह्मण स्त्रियाँ, पुरूष और बच्चे भी थे। ब्राह्मणत्व के अभिमान में डूबे हुए कुछ कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने पहचान लिया कि एक निम्नवर्गीय माली जाति का युवक भी उनके साथ-साथ चल रहा है। उनमें से एक क्रुद्ध ब्राह्मण जोतीराव से बोला, ‘‘अरे शूद्र, तू जात-पाँत के सारे बंधन तोड़कर हमारे साथ चल रहा है। हमारा अपमान कर रहा है। चल हट, सबके पीछे चल। इधर ये लोग बड़े उज्जड़ और बेशर्म हो गये हैं।’’ इस अपमान से जोतीराव का खून खौल गया। वे क्रोधवेग में बारात छोड़कर चल दिये। घर पहुँचकर उन्होंने पिता को सारी घटना विस्तार से सुनाई और वे फफक-फफक कर रोने लगे। पिता ब्राह्मणी सत्ता के संस्कारों में पले थे और पुरानी परंपराओं को मानते थे। वे बड़े संयम से बेटे को समझाने लगे- ‘‘हम शूद्र जाति के हैं। ब्राह्मणों की बराबरी कैसे कर सकते हैं? उन्होंने तुझे दण्ड न देकर केवल वहाँ से भगा दिया, उनकी यही क्या कुछ कम उपकार है? पेश्वाओं के शासन में इस प्रकार के अपराध के लिए हाथी के पैर के नीचे कुचल देने की सजा दी जाती थी।’’

जोतीराव ने पिताजी का वह हितोपदेश चुपचाप सुन तो लिया पर सारी रात उन्हें नींद नहीं आई। बिस्तर पर करवटें बदलते रहे। विवेक की ज्योति के आलोक में उन्हें परिस्थितियों का सत्य स्वरूप दिखाई दिया और उन्होंने मन ही मन सामाजिक एवं मानसिक गुलामी की श्रृंखलाएँ तोड़ने की प्रतिज्ञा कर ली। उनके अनुसार राजकीय गुलामी से सामाजिक गुलामी अधिक भयावह है। जातिवादी संगठन, एकता और सुसंस्कृत जीवन का शत्रु है। जोतीराव ने ज्ञान के द्वार निम्नवर्गों तथा स्त्रियों के लिए खोलकर सामाजिक समता और सामाजिक न्याय के लिए लड़ाई लड़ने का निश्चय कर लिया।

नारी समानता -

ज्योतिबा फुले को जो सामाजिक विषमता तथा अन्याय का आभास हुआ था, वह केवल ब्राह्मणों तथा शूद्रादि शूद्रो के सम्बंधों तक ही सीमित नहीं था। स्त्री-पुरूषों के बीच विद्यमान सामाजिक विषमता और उसके कारण पुरूषों का स्त्रियों के साथ किया जाने वाला अन्यायपूर्ण आचरण उनकी नजर से नहीं छूटा था और उसे उन्होंने अपने साहित्य तथा कार्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। उनकी राय में स्त्री भी मानव अधिकारों के लिए पुरूष के बराबर पात्र है, लेकिन पुरूष-प्रधान संस्कृति के बन्धनों के कारण वह अपने अधिकारों से वंचित हो जाती है, यह भी एक प्रकार का सामाजिक अन्याय ही है। उन्होंने कहा है- ‘‘लोभी पुरूषों ने इसी उद्देश्य से स्त्रियों की शिक्षा पर रोक लगाई कि उन्हें मानव अधिकारों का ज्ञान न हो।’’

ज्योतिबा फुले का स्पष्ट मत था कि नारी की गुलामी का मुख्य कारण अज्ञानता है। जिसके कारण वे अपने मानवीय अधिकारों के विषय में जागरूक नहीं हुई। वे कहते हैं कि, ‘‘सभी नारियों को अपने मानवीय अधिकार समझ में न आए, इस उद्देश्य से स्वाथ्र्ाी पुरूषों ने बड़ी चालाकी से नारी को पढ़ने-लिखने से वंचित कर दिया। इसीलिए सभी नारियों को ऐसे जुल्म सहने पड़े। लोभी और स्वाथ्र्ाी पुरूषों ने बड़ी छल कपट करके यह तय कर दिया कि, किसी भी काम में नारी की स्वीकृति लेनी आवश्यक नहीं है। उन्होंने हर क्षेत्र में अपने वर्चस्व को बढ़ाया।

ज्योतिबा फुले ने नारी की गुलामी का सही कारण पहचान लिया था और वह था नारी को शिक्षा का अधिकार न मिलना। इसलिए फुले ने सबसे पहले कन्याशाला खोलने का निर्णय किया।

स्त्री-शिक्षा -

फुले ने अपने शिक्षण काल से ही स्त्री-शिक्षा की कमी अनुभव कर ली थी। उन्हें ज्ञात था कि महाराज शिवाजी को योद्धा और आधुनिक भारत में एक महान साम्राज्य (मराठा शक्ति) का निर्माता बनाने में उनकी मां का ही हाथ था। उन्होंने समझ लिया था कि भावी पीढ़ियों के निर्माण में माता (स्त्रियों) की शिक्षा बहुत आवश्यक है।153 इसलिए फुले ने सबसे पहले कन्याशाला खोलने का निर्णय लिया। उनकी राय थी कि जब तक महिलाएँ शिक्षित नहीं हो जाती, तब तक समाज सच्चे अर्थों में शिक्षित नहीं हो सकता। एक शिक्षित माता जो सुसंस्कार कर सकती है, उन्हें हजार अध्यापक या गुरू नहीं कर सकते। इसलिए जब तक देश का आधा हिस्सा (नारी समाज) शिक्षित नहीं हो जाता, तब तक हमारा देश कैसे प्रगति कर सकता है।

स्वयं ज्योतिबा को एक विदेशी मिशनरी महिला कुमारी फर्रार से ही दलित स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त हुई थी।

जोतीराव की कन्याशाला प्रारम्भ होने से पहले लगभग 20-25 वर्षों से महाराष्ट्र में ईसाई पादरियों का शिक्षा-प्रसार का कार्य जारी था। उनसे कई मामलों में मतभिन्नता होने पर भी जोतीराव ने सोचा कि पहले उनकी सुसंगत तथा क्रमबद्ध कार्य-प्रणाली का निरीक्षण किया जाए और उसके बाद ही कन्याशाला शुरू की जाए। ठीक उसी समय उनके परम मित्र श्री सदाशिव राव गोवंडे का पुणे के सरकारी कार्यालय से पुणे से लगभग 100 किलोमीटर दूर अहमदनगर में स्थानांतरण हुआ जब श्री गोवंडे कार्यग्रहण करने अहमदनगर गये, तब जोतीराव भी उनके साथ गये। उस समय अहमदनगर ईसाई पादरियों के शिक्षा कार्य का एक बड़ा तथा महत्वपूर्ण केन्द्र बना हुआ था। जोतीराव और श्री गोवंडे अहमदनगर में चलाई जा रही मिशनरियों की कन्याशाला देखने गये जिसका संचालन मिस फर्रार कर रही थीं।

कुमारी फर्रार ने गोवंदे ओर ज्योति को भारत में स्त्री-शिक्षा की दुर्दशा के विषय में बताया कि यहाँ के लोग स्त्रियों के मानसिक विकास में बिल्कुल रूचि नहीं रखते। वे दोनों उनसे बहुत प्रभावित हुए कि एक विदेशी महिला भारत में स्त्री-शिक्षा की दुर्दशा से इतनी चिंतित है। ज्योति को आशा की किरण दिखाई दी। उन्होंने सोचा पूना लौटकर वे भी ऐसे प्रयोग कर सकते हैं और दलित स्त्रियों के लिए पाठशाला खोलकर उसका श्रीगणेश कर देंगे।

जोतीराव ने अपने पूर्व निश्चय के अनुसार अगस्त 1848 में पुणे की बुधवार पेठ में श्री भिंडे के मकान में अपनी कन्याशाला आरम्भ की। ‘‘बॉम्बे गार्डियन’’ नामक समाचार पत्र के दिनांक 28 नवम्बर 1851 में प्रकाशित पत्र से इसकी पुष्टि होती है। इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप से नारी शिक्षा का कार्य आरम्भ कर फुले ने सार्वजनिक क्षेत्र में कदम रखा। उस समय उनकी आयु 21 वर्ष की थी।

फुले ने जिस वर्ष सार्वजनिक क्षेत्र में कदम रखा। वह वर्ष 1848 पूरे विश्व में महान परिवर्तन का वर्ष था। इसी वर्ष कार्ल माक्र्स ने ‘‘कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो’’ का प्रकाशन किया। अमेरिका में नारी मुक्ति का आन्दोलन शुरू हुआ। महिलाओं के अधिकारों का पहला सम्मेलन 1848 में न्यूयार्क के ‘सेनेका फाल्स’ में वेस्लेयान चर्च में हुआ। एक तरफ जब अमेरिका की नारी क्रोस रोड्स पर थी तब हिन्दू नारी बन्धनों में जकड़ी हुई थी।159 इन्हीं बन्धनों को तोड़ने की कोशिश में ज्योतिबा फुले लगे हुए थे।

फुले ने पुणे में पहली कन्याशाला शुरू की थी। यह देख कट्टरपंथियों का खून खौल उठा। महिलाओं को शिक्षा देना उनकी नजर में घोर पाप था। वे कहने लगे, ‘‘महिलाएँ बड़ी दुष्ट, चंचल और अविचारशील होती हैं,

उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। यदि महिला को पढ़ाया जाए, तो वह कुमार्ग पर चलेगी, घर का सुख चैन धूल में मिला देगी,’’ लेकिन जोतीराव अपनी बात पर अटल रहे। यही नहीं, तो आगे चलकर छात्राओं की संख्या बढ़ने पर उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई को अध्यापक बनाया। वे उनको घर पर ही पढ़ाया करते थे। नि:सन्देह आधुनिक भारत के इतिहास में सावित्री पहली भारतीय महिला थीं, जिसने स्त्रियों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कार्य का शुभारंभ किया। वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी। लेकिन स्त्री-शिक्षा का श्रीगणेश कर इस पवित्र संकल्प को आगे बढ़ाने में उन्होंने ही सबसे पहले योगदान दिया था। सावित्री जब विद्यालय जाती तो उस पर मिट्टी, धूल और पत्थर फेंके जाते। रास्ता रोका जाता। कई आक्षेप लगाए जाते। वह भी पति की तरह अपने संकल्प पर अडिग थीं। वह कहतीं, ‘‘ईश्वर उन्हें माफ करना। ये दिग्भ्रमित हैं। मैं तो अपना कर्त्तव्य निबाह रही हूँ। स्त्री-शिक्षा का काम तो साक्षात ईश्वर की सेवा है। यही मानव धर्म है।’’

फुले द्वारा आरम्भ की गई उस कन्याशाला में महार, मांग, चमार इत्यादि अतिशूद्रों की कन्याएँ भी पढ़ती थीं। अत: विद्या और ज्ञान शूद्रों के घरों में जा रहा है, यह कट्टरपंथी ब्राह्मणों की दृष्टि में महापाप था। साथ ही इस पाठशाला में पुरूष शिक्षक थे। अत: उनकी दृष्टि में यह और भी बड़ा अपराध था। अत: ब्राह्मणों ने जोतीराव के पिता गोविंदराव पर उन्हीं के माली समाज का दबाव डाला। उससे संतप्त होकर एक दिन पिताजी ने उनसे साफ-साफ कह दिया कि ‘‘तुम्हें कन्याशाला या घर इन दोनों में से एक को छोड़ना होगा।’’ जोतीराव ने तुरंत अपना निर्णय पिताजी को सुना दिया कि ‘‘मुझे मौत भी आ गई तो चलेगा, पर मैं स्त्री-शिक्षण का काम नहीं छोड़ सकता।’’

तीव्र विरोध के बावजूद फुले अपने रास्ते पर निरंतर आगे बढ़ते गये। 3 जुलाई 1851 को इन्होंने बुधवार पेठ स्थित चिपलूणकर के मकान में दूसरी कन्याशाला, 17 सितम्बर 1851 को रास्ता पेठ में तीसरी कन्याशाला और 15 मार्च 1852 को बेताल पेठ में चौथी कन्याशाला शुरू की।

17 फरवरी, 1852 को भाऊ साहब मांडे ने उनके विद्यालय का सार्वजनिक रूप से निरीक्षण किया और विद्यालय की कार्यपद्धति और स्त्री-शिक्षा प्रयोग की भूरि-भूरि प्रशंसा की। परीक्षक मांडे तो इतने प्रभावित हुए कि अपने भाषण में स्पष्ट कह डाला कि स्त्री-शिक्षा की दिशा में ज्योति का यह अद्भुत और बिल्कुल नवीन प्रयोग है। अगर स्त्रियां सुशिक्षित हो जाएंगी तो इससे देश की प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा। व्यक्तिगत प्रगति के साथ-साथ समाज और जाति को भी पर्याप्त लाभ होगा।

आगे चलकर सन् 1855 में जोतीराव ने पुणे में रात्रि-पाठशाला खोली। इस पाठशाला में दिनभर काम में रत रहने वाले मजदूर, किसान और गृहणियाँ पढ़ने आती थीं। यह भारत की पहली रात्रि-पाठशाला थी।165 स्त्री शिक्षा और निम्न जातियों के हिमायती के रूप में जोतीराव का नाम अब समूचे महाराष्ट्र में गूॅंजने लगा। शिक्षा क्षेत्र में जोतीराव द्वारा किया गया त्याग और उनकी मेहनत का काफी बोलबाला हुआ था। मुम्बई के राज्यपाल ने उनके शैक्षिक कार्य की जानकारी, लंदन स्थित कम्पनी सरकार को पहले ही भेद दी थी। अब उनका यथोचित गौरव होना स्वाभाविक था। अपने 12 जून 1852 के अंक में ‘पूना ऑब्जर्वर’ ने लिखा था कि, ‘‘अपने देशवासियों के उद्धार के लिए जोतीराव द्वारा जो महान् प्रयास किये जा रहे हैं और स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने जो प्रशंसनीय कार्य किया है, इसके बदले में सरकार से उन्हें 200 रूपयों का सम्मानवस्त्र इनाम में मिलने वाला है।’’ तदनुसार ‘पूना महाविद्यालय’ के प्राध्यापक मेजर थॉमस कैंडी ने सरकार की आज्ञा से जोतीराव का गौरव करने के लिए विश्रामबाग बाड़े में 16 नवम्बर 1852 को सरकार और मणमान्य व्यक्तियों की सभा में जोतीराव को वस्त्र अर्पण किया और कहा कि युवा जोतीराव फुले ने अपने देशवासियों में शिक्षा का, विशेष कर स्त्री शिक्षा का प्रसार करके बड़े पैमाने पर प्रगति की है।166 इस प्रकार हम उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कह सकते हैं कि ज्योतिबा फुले ने नारी शिक्षा को केवल कल्पना की बात न मानकर, उन्होंने उसे मूर्तरूप देने हेतु कठोर परिश्रम किया था।

ज्योतिबा फुले केवल स्त्री शिक्षा तक ही सीमित नहीं रहे। नारी मुक्ति की ऐसी कोई लड़ाई नहीं जिसे ज्योतिबा फुले ने अपने समय में लड़ी न हो। बाल विवाह, बहुपत्नीत्व प्रथा, विधवाओं की समस्या, देवदासी तथा सती प्रथा का विरोध, वेश्यागमन जैसी सारी रूढ़ियाँ जो स्त्रियों पर भयंकर अत्याचार करने वाली थीं, ज्योतिबा फुले ने उन सबका स्पष्ट शब्दों में विरोध किया।

बाल विवाह प्रथा का विरोध -

ज्योतिबा फुले ने बाल विवाह का कड़ा विरोध किया तथा बी0एम0 मालाबारी के अंग्रेज सरकार को प्रेषित नोट पर सहमति व्यक्त करते हुए लिखा कि बालविवाह पर मैं बी0एम0 मालाबारी के विचारों से सहमत हूँ। आशा करता हूँ कि इस देश की प्रबुद्ध सरकार देश के अभागे व्यक्तियों के कष्ट कम करने का प्रयास करेगी। बी0एम0 मालाबारी वैदिक शास्त्र के रचयिताओं द्वारा बनाए गए रीति-रिवाजों के तत्कालिक प्रभाव में नहीं हैं इसलिए वे भारत में बाल विवाह पर ऐसी उल्लेखनीय विवेचना कर पाए हैं, जिसके लिए भविष्य में शूद्राति-अतिशूद्र और ब्राह्मण विधवाएँ नि:संदेह उन्हें दुआएँ देंगी।

फुले का मानना था बाल विवाह के बाद दोनों पक्षों में मामूली झड़प होती है, तो बेचारी वधू को जीवन भर उसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं। शादी के बाद अगर लड़के के पिता को लड़की के परिवार के सम्बंध में कोई खोट नजर आए, तो उस निरीह बालिका को जातिबाह्य करार दिया जाता है। अगर लड़की लड़के से उम्र में बड़ी है, तो उसे ठीक से खाना-कपड़ा नहीं दिया जाता, बल्कि उसे अपने सम्पन्न माँ-बाप के साथ रहने की अनुमति नहीं दी जाती। इस प्रकार लड़की का विकास अवरूद्ध हो जाता है। इसके अलावा फुले का मानना था कि लड़का जब बड़ा होकर समझदार हो जाता है, वह अपनी पत्नी को नापसंद करता है और अपनी पंसद का एक और विवाह कर लेता है। एक बार ऐसा कर लेने के बाद वह बेधड़क हो जाता है और वह दो-तीन यहाँ तक कि चार-चार शादियाँ कर लेता है। परिणामस्वरूप उसका परिवार असंतुष्ट, दुब्र्यवहारी और झगड़ालू किस्म का हो जाता है। कुल मिलाकर फुले का यह मानना था कि बाल विवाह प्रथा हमारे पारिवारिक जीवन में कटुता पैदा करती है। इस बुराई को समाप्त करने के लिए ज्योतिबा फुले ने सरकार को लड़के और लड़की की आयु में वृद्धि करने का प्रस्ताव दिया था।

विधवा विवाह को प्रोत्साहन -

धार्मिक कुप्रथाओं, प्राचीन मान्यताओं, सामाजिक विसंगतियों, अनवरत युद्धों, महामारी, अनमेल विवाह, बाल-विवाह आदि कारणों से विधवाओं की समस्या हर युग में विद्यमान रही। ज्योतिबा के पूर्ववर्ती और समकालीन सुधारकों ने विधवा-विवाह की समस्या पर यथेष्ठ ध्यान दिया था। राजाराम मोहनराय के प्रयत्नों से लार्ड विलियम बैंटिक सती-प्रथा पर रोक लगा चुके थे। इस रोक के बाद विधवा समस्या अधिक गंभीर रूप से प्रकट हुई। पति की मृत्यु हो जाने पर स्त्री को जन्म भर घर में बैठना पड़ता था। उसे न तो अच्छे वस्त्र पहनने की आज्ञा थी, न वह श्रृंगार की अधिकारिणी थी। उसे घर में श्वेत वस्त्र धारण करने पड़ते थे। कहीं-कहीं विधवाओं के सिर मुंडवा दिए जाते थे। उनका मुखदर्शन भी गलत माना जाता था। वे घर में कई तरह की शारीरिक मानसिक यातनाएं भोगती थीं।

नारी स्वतंत्रता, नारी-जागृति और नारी शिक्षा जोतीराव के मुख्य लक्ष्य थे। उनकी नजर से विधवा-विवाह की समस्या कैसे छूट पाती? जोतीराव ने सबसे पहले विधवा मुंडन बंद करने का निर्णय किया। उन्होंने बम्बई में नाइयों की एक सभा आयोजित की। उसमें 400-500 नाई उपस्थित हुए थे। एक नाई ने कहा, ‘‘ब्राह्मण 4-5 आनों के लिए हमसे यह कुकर्म करवाते हैं। इस सभा में सर्वसम्मति से संकल्प पारित किया गया कि इसके आगे कोई भी नाई विधवा का मुुंडन नहीं करेगा।

विधवा मुंडन की तरह विधवा विवाह भी एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न था। ज्योतिबा फुले ने इस दिशा में भी पर्याप्त कार्य किए। उन्होंने कहा कि विधवाओं का पुनर्विवाह करवाना एक सामाजिक दायित्व है। यह युग की ज्वलंत समस्या है। समाज के सभी वर्ग इस समस्या के समाधान में मदद करे। विधवाओं का समाज सम्मान करे। उन्हें यथायोग्य अपनाएं, उन्हें प्रश्रय दे। उन्होंने सिद्ध किया कि किसी भी धर्मग्रन्थ में विधवाओं के पुनर्विवाह पर रोक नहीं है।

फुले का मानना था कि आर्य संस्थाएँ मर्दों को विधुर होने पर पुनर्विवाह की अनुमति देती है, परन्तु बहनों को विधवा होने पर पुनर्विवाह का अवसर और अधिकार नहीं देती। फुले ने विधवाओं पर होने वाले इस सामाजिक अत्याचार का विरोध किया। फुले विधवा-विवाह आन्दोलन के सक्रिय समर्थक बन गये। उनकी प्रेरणा से 8 मार्च 1860 को पुणे में शेणवी जाति की एक विधवा और विधुर का विवाह हुआ।

बाल हत्या-प्रतिबंधक गृह की स्थापना -

महात्मा फुले ने विधवाओं के जीवन से जुड़ी हुई दूसरी दारूण समस्या के निराकरण की दिशा में भी एक बड़ा ही क्रांतिकारी कदम उठाया। उन्होंने विधवाओं की अवैध संतान के लिए ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की।

उस समय तरूण विधवाओं के साथ अनैतिक आचरण की घटनायें भी समाज में बहुत होती थीं। लम्पट व चरित्रहीन पुरूष भोली-भाली विधवा स्त्री को बहला फुसलाकर अनैतिकता में धकेल देते थे। उनके अनैतिक आचरण से बच्चे पैदा हो जाते थे। तब ऐसी विधवा स्त्रियाँ चुपचाप प्रसव कराकर बच्चों को कूड़े के ढेर में अथवा नालों में फेक देती थीं। उस समय अनेक विधवा स्त्रियाँ लोक लाज के भय से आत्महत्या कर लेती थी। विधवाओं की इस मजबूरी को समझकर फुले ने अपने घर में ऐसी विधवाओं के बच्चों के लिए ‘बाल हत्या प्रतिबन्धक गृह’ की स्थापना की। फुले ने आम लोगों की सूचनार्थ पर्चे छपवाकर वितरित कराये। इन पर्चों में लिखा था : ‘‘विधवा बहनों, प्रसूति के पूर्व गुप्त रूप से हमारे यहाँ आ जाइए और सुरक्षित रूप में शिशु को जन्म दीजिए। आप अपने बच्चे को चाहे तो हमारे पास छोड़ सकती हैं और चाहे तो साथ में ले जा सकती है।’’ यह संस्था गर्भवती विधवाओं के लिए थी और उन्हें बदनामी, भू्रण हत्या एवं बाल-हत्या के अपराधों से बचाने के लिए निकाली गई थी। इससे एक और लाभ यह हुआ कि अवैध एवं अनाथ बच्चे मिशनरियों के अनाथ-गृहों में जाने बंद हो गये।

देवदासी प्रथा पर प्रहार -

मुम्बई में भगवान की मूर्ति के साथ विवाह कराके लड़कियों को देवदासी बनाने की प्रथा जोरों पर थी। संबंधित लड़कियाँ भगवान की दासियाँ तो क्या बनती, हाँ ऐय्याश, आवारा पुरूषों की भोगदासियाँ अवश्य बन जाती और वेश्या-व्यवसाय में फॅंस जाती थीं। जोतीराव के एक मित्र ने उनसे कहा कि, ‘‘स्वयं माँ-बाप ही भगवान और धर्म के नाम पर अपनी बेटियों को नरक में धकेल देते हैं, क्या इस प्रथा को रोकने के लिए आप कुछ नहीं कर सकते?’’ फुले ने इसका विरोध किया।

फुले मुम्बई के पुलिस आयुक्त से मिलने गये। फुले ने उन्हें समझाया कि कुछ ऐय्याश लोगों को उनकी वासना-पूर्ति के लिए धर्म की आड़ में नई-नई युवतियों का प्रबंध करने की इस प्रथा को रोकना नितांत आवश्यक है। पुलिस आयुक्त ने आदेश देकर इस प्रथा को रूकवाया।

फुले ने इस प्रथा को महिलाओं के साथ घृणित तथा अत्याचार माना और अपने प्रयासों से रूकवाने का प्रयास किया।

बहुपत्नी विवाह का विरोध -

ज्योतिबा फुले ने कई पत्नियों को रखने की प्रथा का भी विरोध किया। फुले के अनुसार ‘‘कुछ लोभी पुरूष अधिक सुख प्राप्त करने और अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु दो-दो, तीन-तीन विवाह करते हैं और अपनी पत्नियों को एक घर में रखते हैं और इसके बारे में पूछे जाने पर हेकड़ पुरूषों के लिखे धर्मग्रन्थों का हवाला देते हैं। इसी प्रकार यदि कुछ स्त्रियाँ अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति करने हेतु दो-दो, तीन-तीन पुरूषों के साथ विवाह करके उन्हें एक ही घर में रखें, तो क्या उन सभी पुरूषों को गवारा होगा? जब स्त्री और पुरूष सभी मानव-अधिकार भोगने के लिए समान रूप से पात्र हैं, तब स्त्रियों के लिए एक नियम और लोभी तथा साहसी पुरूषों के लिए दूसरा नियम होना पक्षपात नहीं तो और क्या है?’’

ज्योतिबा फुले ने इस प्रथा का विरोध किया तथा पिता द्वारा विवाह का प्रस्ताव रखने पर इस पर उन्होंने यह कहकर प्रश्न-चिºन लगा दिया कि ‘‘पहली पत्नी को कोई सन्तान न हो, तो दूसरा विवाह कर लेना कौन सा न्याय है? यदि यही प्रस्ताव पत्नी की ओर से आए तो?’’ज्योतिबा फुले ने इसे नारी के मानव अधिकार का हनन माना तथा इसे बन्द करने की वकालत की।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि स्त्री मुक्ति की ऐसी कोई लड़ाई नहीं है जिसे फुले ने अपने समय में लड़ी न हो। उच्च वर्ग अपनी स्त्रियों के लिए जो सुधार नहीं कर सके वे फुले ने उनके लिये किये। वे भली-भॉंति जानते थे कि परिवार प्रमुख की तानाशाही जब तक नष्ट नहीं होगी तब तक स्त्री की गुलामी भी नष्ट नहीं होगी और सामाजिक विषमता भी नहीं हटेगी। उनकी यह मान्यता थी कि यदि परिवार समानता की भावना पर स्थित रहा तो समाज और राष्ट्र भी समानता की डोर में गूॅंथ जाएंॅंगे।

चातुर्वण्र्य व्यवस्था पर प्रहार -

भारत की समाज व्यवस्था चातुर्वण्र्य व्यवस्था पर आधारित थी। जिसने भारतीय समाज को चार वर्गों में विभाजित कर दिया था, प्रथम वर्ग ब्राह्मण, द्वितीय क्षत्रिय, तृतीय वैश्य और चतुर्थ शूद्र। यह विभाजन भेदभाव और विषमता पर आधारित था। फुले का यह मत था कि ईसा से लगभग 1500 वर्ष पूर्व आर्य लोग ईरान से आये थे। उन्होंने यहाँ के मूल निवासियों पर बर्बर हमले किये उनको युद्ध तथा सामाजिक संघर्षों में हराया। कुछ समय बाद इनका राजा ब्रह्मा हुआ जिसने यह सोचा कि यहाँ के मूल निवासियों पर अपनी सत्ता कायम कैसे की जाये। उसी के नाम के कारण आर्य लोग बाद में ब्राह्मण कहलाए, उन्होंने काल्पनिक धर्मग्रन्थों की रचना की।

ब्रह्मा ने मनु को समाज व्यवस्था और उसके कानून बनाने का आदेश दिया। मनु ने जिस समाज व्यवस्था की रचना की उसमें ब्राह्मणों को शीर्ष स्थान पर रखा गया तथा धर्म ग्रन्थों को पढ़ने का अधिकार भी उसे ही दिया गया। अन्य वर्गों को नीचे रखा गया, जिसमें चौथे वर्ग, शूद्र को सबसे नीचे रखा गया। शूद्र वर्ण में उन लोगों को डाल दिया गया जो इस देश के मूल निवासी थे। उन्हें पराजित करके गुलाम, दास, दस्यु और अछूत करार दिया गया।

पढ़ लिखकर ज्ञान प्राप्त करके शूद्र विद्रोह न कर दें। इसकी रोकथाम के लिए मनुस्मृति के जरिये उन्हें पढ़ाई से वंचित कर दिया गया। इन्हें छोटी-छोटी जातियों में विभक्त कर दिया गया। जिससे ये लोग एक नहीं हो सके। धर्मग्रन्थों में लिख दिया गया कि शूद्र जाति में जो पैदा हुआ है उसको कोई अधिकार नहीं है। इसी तरह स्त्रियों के लिए भी शिक्षा के दरवाजे बंद कर दिये तथा मनुस्मृति में यह लिख दिया गया कि स्त्री स्वतंत्रता की अधिकारिणी नहीं है।

फुले के अनुसार वर्ण व्यवस्था के कारण ही जातिगत विषमता, भेदभाव, अन्धविश्वास, अतार्किक रूढ़ियां और ढोंग, धर्मान्धता बढ़ी। ज्योतिबा फुले का मानना था कि चातुर्वण्र्य व्यवस्था के कारण ही हमारा देश लम्बे समय तक गुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा। ऊॅंच-नीच, भेदभाव के कारण मुसलमानों के आक्रमण के समय हमारे समाज में एकता कायम नहीं हो सकी तथा इस तरह मुस्लिम आक्रमणकारियों ने सहज ही हमारे देश में अपना साम्राज्य कायम कर लिया। उन्होंने भी चातुर्वण्र्य व्यवस्था और जाति प्रथा को बनाये रखा। मुस्लिम शासको ने यह जान लिया था कि यहाँ का उच्च वर्ण प्रसन्न रहेगा तथा उसकी व्यवस्था से छेड़छाड़ नहीं करने पर भारत में हमारे विरूद्ध विद्रोह नहीं होगा। मुसलमानों ने इसी कमजोरी का लाभ उठाकर सैकड़ों वर्ष तक यहॉं के तथाकथित राजाओं और रूढ़िवादियों के साथ-साथ आम जनता को गुलाम बनाए रखा। इसी तरह बाद में अंग्रेजों ने भी सहज ही यहॉं अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया।

19वीं शदी में जब समाज सुधार का सिलसिला आरम्भ हुआ तब फुले ने अपने ज्ञान और अनुभव से यह जाना तथा अपने भाषणों, लेखों से सबको यह बताने का प्रयास किया कि देश में गरीबी, सामाजिक अन्याय और अज्ञानता का कारण जातिगत विषमता और भेदभाव है। फुले ने अपने चिन्तन और कर्म द्वारा ब्राह्मण धर्म को परिष्कृत-परिमार्जित करने की कोशिश की। उसमें छाई जड़ता को दूर करने का प्रयास किया। समयानुकूल नए विचारों को अपनाने हेतु उद्भावों के प्रवेश के लिए पुरोहितों को बार-बार झकझोरा और यह बताने की कोशिश की कि विश्व एक मानव परिवार है। उन्होंने बार-बार स्पष्ट कहा कि धर्म और जाति भेद, ऊॅंच-नीच का भ्रमजाल फैलाकर अन्याय और शोषण की प्रक्रिया चालू रखने के लिए बनाए गए है, जिसे हमें ध्वस्त करना है।

ब्राह्मणों को दिये जाने वाले दक्षिणा फण्ड पर रोक का प्रयास -

भारत में प्राचीनकाल से विद्वानों, ऋषियों को उनके विशिष्ट गुणों, ज्ञान आदि के कारण दान-दक्षिणा देने की परंपरा चली आ रही है। शिवाजी के शासन काल में ब्राह्मणों को राज्य की तरफ से दक्षिणा देने की परिपाटी चली। लेकिन पेशवाई के दौरान पूना में सार्वजनिक धन एक विशेष जाति, एक विशेष वर्ग को आर्थिक लाभ पहुंचाने का तंत्र बन गया था। फुले और उनके साथियों को ब्राह्मण पेशवाओं द्वारा ब्राह्मणों को राजकोष से पैसा बांटना फिजूलखर्ची, बर्बादी ही नहीं वरन सार्वजनिक धन की खुली लूट महसूस हुई। फुले ने सर्वप्रथम दक्षिणा-कोष के दुरूपयोग के विरूद्ध संगठित आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि यह राजकोष का भारी दुरूपयोग ही नहीं वरन् अनपढ़ ब्राह्मणों और निकम्मे भिक्षुकों को आश्रय देना है जो बिना मेहनत किए सरकारी खजाने पर पल रहे हैं। दक्षिणा पाने वाले ही समाज में अज्ञानता, कुरीतियां, अंधविश्वास और पाखंड फैलाते हैं। यही लोग अस्पृश्यता और ऊॅंच-नीच को बढ़ाते हैं। ज्योतिबा फुले का मानना था कि इसको तत्काल बन्द किया जाना चाहिये।

सत्यशोधक समाज:-

सत्यशोधक समाज के माध्यम से फुले ने अपने चिन्तन को कार्यरूप में परिणित कर आम जीवन में अवतरित किया। फुले ने महाराष्ट्र भर में फैले हुए अपने मुख्य हितैषियों तथा अनुयायियों को एक पत्र भेजकर दिनांक 24 सितम्बर 1873 को पुणे में एक सभा का आयोजन किया। उसमें गिने-चुने 50 से 60 लोग उपस्थित हुए। जोतीराव ने उस सभा में संगठन के उद्देश्यों का विस्तृत विवेचन करते हुए बताया कि धार्मिक तथा सामाजिक गुलामी को जड़ सहित उखाड़कर फेंकना और उपनिवेशवाद को समाप्त करना हमारे संगठन का मुख्य उद्देश्य होगा। पर्याप्त विचार-विमर्श और वाद-विवाद के बाद ‘सत्य शोधक समाज’ के गठन का निर्णय किया गया। इस प्रकार दिनांक 24 सितम्बर 1873 को ‘सत्यशोधक समाज’ स्थापित हुआ। यह सम्पूर्ण महाराष्ट्र में प्रसारित समाज-सुधार का पहला आन्दोलन था।

सत्यशोधक समाज की मान्यताए-

इस समाज की प्रथम बैठक में ही फुले सर्वसम्मति से इसके अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। सत्यशोधक समाज की प्रमुख मान्यताएॅं तथा नियम व सिद्धान्त निर्धारित किए गये थे जो इस प्रकार है:-
  1. ईश्वर एक ही है, वह सर्वव्यापक, निर्गुण, निर्विकार तथा सत्यस्वरूप है। सारे मानव उसकी प्रिय संताने हैं।
  2. प्रत्येक मानव को ईश्वर-भक्ति करने का पूरा-पूरा अधिकार है। जिस प्रकार माता-पिता को संतुष्ट और प्रसन्न करने के लिए किसी मध्यस्थ या दलाल की आवश्यकता नहीं होती, इसी प्रकार सर्वव्यापक भगवान की भक्ति के लिए किसी पुरोहित की आवश्यकता नहीं होती।
  3. कोई भी मनुष्य जाति के आधार पर श्रेष्ठ नहीं होता, गुणों के आधार पर उसकी श्रेष्ठता निर्धारित होनी चाहिए।
  4. भगवान सशरीर अवतार-ग्रहण नहीं करते।
  5. कोई भी धर्म ग्रन्थ सर्वथा शाश्वत प्रमाण नहीं होता और न ही वह ईश्वर-प्रणत ही होता है।
  6. पुनर्जन्म, कर्मकाण्ड, जप, तप आदि के विधि-विधान अज्ञान मूलक है।
सभी जाति और धर्म के अनुयायी समाज के सदस्य बन सकते थे। सत्यशोधक समाज की साप्ताहिक बैठकें बहुधा इतवार को हुआ करती थीं ताकि लोग सरलता से इसकी बैठकों में भाग ले सकें। समाज की बैठकों में नारी-शिक्षा, दलित महिला शिक्षा, स्वदेशी के प्रचार तथा पुरोहितों द्वारा समाज को गुमराह किए जाने पर चर्चा होती थी। समाज ने स्पष्ट घोषणा कर रखी थी कि वह जाति-पांत, अस्पृश्यता, धर्म की संकीर्णता और मनुष्य द्वारा मनुष्य के हर प्रकार के शोषण के विरूद्ध है।

अत: फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज का उद्देश्य था शूद्रों तथा अतिशूद्रों को ब्राह्मणी धर्मग्रन्थों के प्रभाव से मुक्ति दिलाना, जिनके कारण ब्राह्मण लोग उनको दासता की हालत में रखते थे। उनके अपने मानवीय अधिकारों को वापस दिलाना, जिनसे उन्हें वंचित कर दिया गया था और उनको मानसिक तथा धार्मिक गुलामी से मुक्त करवाना।

इस तरह से हम कह सकते हैं कि सत्यशोधक समाज ऐसी संस्था थी, जिसने आधुनिक भारत में एक सामाजिक, सांस्कृतिक आन्दोलन का सूत्रपात किया। इसने अपनी आवाज सामाजिक दासता के विरूद्ध उठाई और सामाजिक न्याय की माँग की।

अछूतों के लिये पानी की व्यवस्था कराना -

ज्योतिबा फुले ने समाज से अस्पृश्यता दूर करने के लिए तथा जातियों के कुचक्र को तोड़ने का हर सम्भव प्रयास किया था। उस समय अछूतों का सामाजिक जातिभेद की मार के कारण, पेयजल को लेकर बुरा हाल था। वे सार्वजनिक कुओं से खुले

तौर पर पानी नहीं भर सकते थे। मानव अधिकारों के ऊॅंचे तत्व का पालन करते हुए जोतीराव ने सन् 1868 में अपने मकान में स्थित पानी का कुआँ अछूतों के लिए खोल दिया। लेकिन पाप-पुण्य और पूर्वकर्मों के काल्पनिक भय से अछूतो को पानी भरने की हिम्मत नहीं हुई। तब जोतीराव उन्हें हाथ पकड़कर कुएँ के पास ले गये, उन्होंने उनसे पानी भरने को कहा और पानी से भरे वर्तन स्वयं उनके सिर पर रखे। इस तरह फुले ने पिछले हजारों वर्षों की मानसिक गुलामी से उनको मुक्त कराया। इस तरह फुले ने अपने इस कार्य के द्वारा भी सामाजिक न्याय की स्थापना का प्रयास किया।

इस प्रकार सारांश रूप में यह कह सकते हैं कि ज्योतिबा फुले के नेतृत्व में सामाजिक न्याय के लिए किए गए संघर्ष में प्रमुख बातें निम्न थीं-
  1. महिलाओं व अन्य वंचित वर्गों में शिक्षा के प्रसार के लिए रचनात्मक प्रयास करना।औपनिवेशिक शासन से महिलाओं एवं शूद्रातिशूद्रों की स्थिति में सुधार तथा उनके शैक्षिक एवं आर्थिक विकास के लिए उपयुक्त वैधानिक प्रावधान एवं प्रशासनिक पहल किए जाने के लिए संगठित रूप से प्रयत्न करना।
  2. हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी संस्करण का विरोध तथा सार्वजनिक सत्य धर्म का प्रसार।
  3. सामाजिक सुधार के लिए रचनात्मक पहल।
  4. दलित व शोषित वर्गों में मानव अधिकारों की प्राप्ति तथा आत्म विकास के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना।
  5. विधवा महिलाओं जिनमें अधिकांशतया ब्राह्मण जाति की थीं के अमानवीय मुंडन की प्रथा की समाप्ति तथा विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए सफल यत्न करना एवं विधवा यदि गर्भवती हो गई हो तो उसके सुरक्षित प्रसव तथा उत्पन्न संतान के पालन-पोषण के लिए आश्रम खोलना।
  6. छुआछूत के निवारण हेतु प्रयत्न जिसमें सार्वजनिक रूप से अछूतों के लिए अपने कुएँ एवं हौज से पानी भरने की न केवल अनुमति प्रदान करना अपितु उसे व्यावहारिक रूप से अंजाम देना।
  7. किसानों व मजदूरों की स्थिति में सुधार के लिए सकारात्मक पहल करना।
  8. सत्यशोधक समाज के माध्यम से शूद्रातिशूद्र वर्णों को संगठित करना ताकि वे अपनी समस्याओं के निवारण के लिए दूसरों पर निर्भर करने की जगह खुद संगठित रूप से पहल कर सकें।?
वस्तुत: सत्यशोधक समाज क्रमिक विकास की जगह क्रांति पर जोर देता था। यह भारतीय समाज में मौलिक बदलाव लाने के उद्देश्य से स्थापित की गई पहली संस्था थी। इसने महिलाओं एवं बहुसंख्यक शूद्रातिशूद्रों की सामाजिक गुलामी के खिलाफ जंग का खुला ऐलान किया और सामाजिक न्याय की पुरजोर वकालत की। भारतीय समाज के शोषित, पीड़ित व दलित वर्गों द्वारा अपनी मुक्ति की लड़ाई सबसे पहले इसके ही नेतृत्व में छेड़ी गई।

19वीं शदी में जब समाज सुधार का सिलसिला आरम्भ हुआ तब फुले ने अपने ज्ञान और अनुभव से यह जाना तथा अपने भाषणों, लेखों से सबकोयह बताने का प्रयास किया कि देश में गरीबी, सामाजिक अन्याय और अज्ञानता का कारण जातिगत विषमता और भेदभाव है। फुले ने अपने चिन्तन और कर्म द्वारा ब्राह्मण धर्म को परिष्कृत-परिमार्जित करने की कोशिश की। उसमें छाई जड़ता को दूर करने का प्रयास किया।

समयानुकूल नए विचारों को अपनाने हेतु उद्भावों के प्रवेश के लिए पुराहितों को बार-बार झकझोरा और यह बताने की कोशिश की कि विश्व एक मानव परिवार है। उन्होंने बार-बार स्पष्ट कहा कि धर्म और जाति, भेदभाव और ऊँच-नीच का भ्रमजाल फैलाकर अन्याय और शोषण की प्रक्रिया चालू रखने के लिए बनाए गए हैं, जिसे हमें ध्वस्त करना है।194 फुले यह मानते थे कि जन्म से सभी मनुष्य समान है और भारत के लिए, विदेशी शासन से स्वतन्त्रता की तुलना में भारत में सामाजिक न्याय की स्थापना ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसीलिए फुले पहले देश में सामाजिक क्रांति चाहते थे।

फुले का सामाजिक न्याय का विचार स्वतंत्रता, समानता, बन्धुता और न्याय इन्हीं तत्वों पर आधारित है। स्वतंत्रता समानता, बन्धुता तथा न्याय यह मानवतावादी तत्व उनके विचारों में दिखाई देते हैं।

फुले यह मानते थे कि मानव जन्म से ही स्वतंत्र है। संसार का कोई भी मानव दूसरे मानव का गुलाम नहीं रह सकता। मानव को गुलाम बनाने की पद्धति अमानवीय है। इस पद्धति को मनुष्य ने ही बनाया है। प्रत्येक व्यक्ति को न्याय से वस्तुओं का उपभोग करने का अधिकार है। अत: कुछ लोगों को गुलाम बनाना, मानव की स्वतन्त्रता के विरूद्ध है। मनुष्य को गुलाम बनाने वाली जो व्यवस्था होगी, वह सभी मानवों की स्वतंत्रता-विरोधी है। चाहे वह अमेरिका की गुलामी प्रथा हो अथवा भारत की जातिभेद व्यवस्था।

इसीलिए फुले ने भारत की जाति व्यवस्था का विरोध किया और इसे सामाजिक न्याय के लिए अवरोध माना। फुले ने केवल पुरूषों की स्वतंत्रता का ही विचार नहीं किया था। उनकी मान्यता थी नारी और पुरूष दोनों ही स्वतंत्र है। पुरूष के समान नारी भी स्वतंत्र है, नारी को भी अपने विचार प्रस्तुत करने तथा अपने अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसीलिए उन्होंने नारी स्वतंत्रता का विचार प्रमुखता से उठाया। उनका मानना था कि वह भी एक मानव है और उसका यह न्यायिक अधिकार है, जो उसे मिलना ही चाहिए। विशेष महत्व की बात यह है कि उन्हेांने नारी को भी मनुष्य और मानव कहकर सम्बोधित किया।

फुले ने मानव स्वतंत्रता का ही विचार प्रस्तुत किया। उन विचारों से सम्बन्धित उनका समानता का विचार है। उनका मानना था कि निर्माता ने सभी मानवों को एक समान बनाया है। किसी को श्रेष्ठ या किसी को कनिष्ठ या छोटा नहीं बनाया। निर्माता ने सभी मानवों को पवित्र बनाया है। सभी की बुद्धि समान नहीं होती, यह सच है, फिर भी ऊँचे वर्ण अथवा जाति के सभी लोग बुद्धिमान और कनिष्ठ वर्ण अथवा जाति के सभी लोग मन्दबुद्धि कभी भी नहीं होते। फुले ने स्पष्ट किया कि बुद्धिमत्ता की विषमता व्यक्तिगत है। अन्त:वर्ण अथवा जाति के आधार पर कुछ लोगों को बुद्धिमान तथा कुछ को मंदबुद्धि मानना गलत है।

इस प्रकार फुले का यह मानना था कि जाति, धर्म वंश और लिंग पर बुद्धिमत्ता निर्भर नहीं करती। इसीलिए उस आधार पर उनमें भेद करना वास्तविकता के विरूद्ध है। जाति, धर्म, वंश अथवा लिंग के आधार पर विषमता मानव निर्मित है। अत: ऐसी सभी विषमताओं का फुले ने डटकर विरोध किया।

स्वतंत्रता और समानता के समान ही फुले की बन्धुता तथा न्याय का तत्व भी केवल अपने देशवासियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह विश्वव्यापी है। सभी भारतवासी एक दूसरे के भाई है। हिन्दू धर्म के सभी श्रेष्ठ व निम्न लोग आपस में भाई हैं। धर्म तथा राज्य के आधार पर मानव-मानव में भेद नहीं करना चाहिए, ऐसा फुले ने स्पष्ट किया।

फुले एक ही परिवार के लोगों को अलग-अलग धर्म स्वीकार करने के लिए कहते हैं। केवल इतना ही नहीं, महिला को पति के धर्म से अलग धर्म स्वीकार करना चाहिए। ऐसे विचार फुले प्रस्तुत करते हैं। अर्थात् एक ही परिवार के लोग विभिन्न धर्म के अनुयायी होते हुए भी एक दूसरे से द्वेष किए बिना समझदारी से आनंद से रहना चाहिए, ऐसा वे कहते हैं। इसके कारण दूसरे धर्म के विषय में तथा उसके मानने वालों के बारे में हमारे मन में बन्धुत्व की भावना पैदा होगी। विश्व बंधुत्व की भावना पैदा होगी, तो विश्व के सभी मानवों की दुश्मनी समाप्त हो जाएगी।

स्वतंत्रता, समानता तथा बन्धुता के आधार पर विश्व में सुख का निर्माण होगा। सभी को सुख से रहने देना चाहिए। ऐसे व्यवहार से सभी को सुख मिलेगा। किसी पर भी अन्याय नहीं होगा। सभी को न्याय मिलेगा। सभी को न्याय से सभी वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए। इससे सभी को न्याय मिलेगा।

इस प्रकार ज्योतिबा फुले का समाजिक न्याय का विचार स्वतंत्रता, समानता, बन्धुता तथा न्याय जैसे तत्वों पर आधारित है। उनका यह विचार मानवतावाद पर टिका है और यह मानवतावाद सामाजिक प्रजातंत्र का पोषक है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि फुले को विश्वास था कि विश्व के रचयिता ईश्वर ने सभी स्त्री-पुरूषों को अपने अधिकारों के उपभोग के लिए स्वतंत्र और सक्षम बनाया है।

ईश्वर ने सभी स्त्री-पुरूषों को मानवाधिकारों के संरक्षण का दायित्व दिया है ताकि वे किसी अन्य व्यक्ति का दमन न करें। सृष्टिकर्ता ने सभी स्त्री-पुरूषों को धार्मिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता दी है। इसलिए किसी को भी अन्य व्यक्तियों की धार्मिक आस्थाओं और राजनीतिक विचारों को हेय दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। फुले के विचार से, सृष्टिकर्त्ता ने सभी मनुष्यों को विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। लेकिन उनके द्वारा व्यक्त विचार अथवा मत किसी अन्य व्यक्ति के लिए अहितकर नहीं होना चाहिए। किसी को भी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। फुले का विश्वास था कि सभी स्त्री-पुरूष ईश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों के उपभोग के पात्र हैं। सभी स्त्री-पुरूष विधि-विधान की दृष्टि से समान है। उपरोक्त आधारभूत सिद्धान्तों के सन्दर्भ में ही फुले के सामाजिक न्याय सम्बंधी विचार है।

सन्दर्भ -
  1. शहा मु0 ब0, उपरोक्त, पृ0- 85-86 
  2. चंचरीक कन्हैयालाल, ‘महात्मा ज्योतिबा फुले’, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, 2000, पृ0- 92 
  3. शहा मु0ब0, उपरोक्त, पृ0- 83 ख् 140 
  4. नरके हरि, उपरोक्त, पृ0- 58 ख् 137 ,
  5. ओमवेट गेल, अम्बेडकर-प्रबुद्ध भारत की ओर, पेंगुइन बुक्स इंडिया, नई दिल्ली, 2005, पृ0 - 94 104 शहा मु0 ब0, उपरोक्त, पृ0- 83 ख् 136 ,
  6. काले मनोहर, उपरोक्त, पृ0- 68-69 107 जगताप मुरलीधर, उपरोक्त, पृ0- 98 ख् 138 ,
  7. काले मनोहर, उपरोक्त, पृ0- 69 ख् 139 ,
  8. नरके हरि, उपरोक्त, पृ0- 59 ख् 142 
  9. महात्मा फुले गौरव ग्रंथ, मा0 फुले का सार्वजनिक सत्यधर्म (लेख), लेखक प्रा0 रेगे, महाराष्ट्र राज्य शिक्षा विभाग, मंत्रालय, 1982, पृ0-552
  10. नरके हरि-संपादक, महात्मा फुले: साहित्य और विचार, जोतीराव की धर्म संबंधी परिकल्पना, लेखक-भोले भास्कर लक्ष्मण, महात्मा फुले चरित्र साधने प्रकाशन समिती महाराष्ट्र शासन, 1993, पृ0-14
  11. चंचरीक कन्हैया लाल, ‘महात्मा ज्योतिबा फुले’, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, 2000, पृ0-110
  12. काले मनोहर, ‘महात्मा जोतीराव फुले’, (व्यक्तित्व और कृतित्व), महात्मा फुले फाउंडेशन, दिल्ली, 1998, पृ0-70
  13. किसान का कोड़ा’-प्रस्तावना, महात्मा जोतिबा फुले रचनावली-1, अनुवाद एवं सम्पादन डॉ0 एल0जी0 मेंश्राम ‘विमलकीर्ति, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1996, पृ0-291
  14. ओमवेट गेल, दलित और प्रजातान्त्रिक क्रान्ति, सेज पब्लिकेशन्स,  2009, पृ0-94
  15. नरके हरि- संपादक, महात्मा फुले : साहित्य और विचार, महात्मा फुले के कृषि संबंधी विचार, लेखक- भोसले डॉ0 द0ता0, महात्मा फुले चरित्र साधने प्रकाशन समिती महाराष्ट्र शासन, 1993, पृ0- 36
  16. कीर धनंजय, महात्मा फुले : शैक्षणिक तत्वज्ञान और कार्य, महात्मा फुले: साहित्य और विचार, सं0- नरके हरि, महात्मा फुले चरित्र साधने प्रकाशन समिती महाराष्ट्र शासन, 1993, पृ0- 90
  17. चरीक कन्हैयालाल, ‘महात्मा ज्योतिबा फुले’, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, 2000, पृ0- 121
  18. कीर धनंजय, महात्मा फुले: शैक्षणिक तत्वज्ञान और कार्य, उपरोक्त, पृ0- 108, 111, 114

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