मरुस्थल किसे कहते हैं ? मरुस्थल कितने प्रकार के होते हैं ?

मरुस्थल के प्रकार

जब हम मरुस्थल या रेगिस्तान की बात करते है, तो आपके दिमाग में तत्काल क्या आता है? मुझे यकीन है कि रेगिस्तान शब्द चिलचिलाती धूप के साथ रेत के विशाल विस्तार का चित्र बनाता है। परन्तु सभी मरुस्थल के लिए यह विवरण उपर्युक्त नहीं है। इसलिए मानव-पर्यावरण संबंध के बारे में चर्चा करने से पहले, हमें मरुस्थल की परिभाषा या अर्थ के बारे में स्पष्टता होनी चाहिए। मरुस्थल की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। यह अमातौर स्वीकार किया जाता है कि मरुस्थल एक जीवोम है जिसमें वाष्पीकरण की मात्रा वर्षा से अधिक होती है। वाष्पीकरण की दर तापमान के साथ बदलती है। इसलिए केवल वर्षा के आधार पर मरुस्थल को परिभाषित करना आसान नहीं है। लेकिन मरुस्थल उस क्षेत्र में विकसित हो सकता है जहां पर वार्षिक वर्षा 250 mm से कम होती हैं। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि शुष्कता (या नमी का अभाव) सभी मरूस्थलों की सामान्य विशेषता है, जबकि तापमान गर्म मरुस्थल से शीत मरुस्थल तक भिन्न होता है। 

तापमान और वर्षा की मात्रा तथा वितरण के आधार पर मरुस्थल को गर्म एवं शुष्क मरुस्थल, अर्ध मरुस्थल, तटीय मरुस्थल और शीत मरुस्थल में वर्गीकृत किया जा सकता है। यह इकाई केवल गर्म एवं शुष्क मरुस्थल और अर्ध मरुस्थल पर केन्द्रित होगी। इस प्रकार, जबकि रेत प्रायः मरुस्थल में पाई जाती है, सभी मरुस्थलीय भूदृश्य में रेत की प्रमुखता नहीं होती है। ऐसे मरुस्थल जिनमे रेत बहुतायत में होती है, पूरी तहर से जमीन को ढकते है और टीलों के निर्माण की ओर अग्रसर होते और जो समुद्री सतह लहर जैसी रीज से मिलते है, उन्हें अर्ग कहा जाता है, जिसका अर्थ रेतीला मरुस्थल होता है। 

अन्य मरुस्थलों में वायु सारे रेत को उड़ा सकती है। आपस में जुड़े कोणीय चट्टान के टुकड़े बच जाता है। इस तरह के पथरीले मरुस्थल को रेग कहा जाता है। कुछ मरुस्थलों में भूदृश्य पर बोल्डर की प्रमुखता होती है और यह आधार शैल को उजागर करता है। ऐसे मरुस्थलों को हमाडा नाम दिया जाता है। 

विश्व के लगभग एक-तिहाई क्षेत्र पर मरुस्थलों का विस्तार है, जहाँ जलाभाव के कारण जैव जीवन नगण्य है। न्यूनतम वर्षा वाले क्षेत्र वनस्पति विहीन होकर मरुस्थल बन जाते हैं। अनेक भौतिक और मानवीय कारणों से आबाद क्षेत्र भी मरुस्थल का रूप लेता जा रहा हैं, जिससे मरुस्थल क्षेत्रफल में विस्तार हो रहा है। इस दैवीय विपत्ति के कारण भविष्य में जीवों के लिए आवासीय क्षेत्र कम होता जा रहा है। 

मरुस्थलों के उत्पत्ति

कुछ क्षेत्रों में मरुस्थलों की उत्पत्ति के लिए विभिन्न कारक जिम्मेदार होते है। सहारा और अरब मरुस्थलों जैसे बड़े गर्म मरुस्थल दोनो गोलाद्र्धों में उपोष्णकटिबंधीय उच्च दाब पेटी के पास व्यापारिक पवन क्षेत्र में स्थित है। ये हेडली सेल के अवरोही किनारे पर स्थित स्थान होते है जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करता है। यह वायु का संचलन हो जो भूमध्य रेखा/विषुवत रेखा के पास उपर उठती हुई पृथ्वी के सतह से 10 से 15 कि.मी. की ऊँचाई पर धु्रवों की ओर बहती है, उपोष्णकटिबंधीय पेटी में नीचे उतरती है और सतह के पास विषुवतीय पेटी की ओर लौटती है। वायु जैसे ही नीचे उतरती है, एडियाबेटीक रूप से गर्म हो जाती है, संघनन तथा वर्षण में बाधा उत्पन्न करती है।

कुछ मरुस्थल पहाड़ों के अनुवात दिशा में स्थित है और उनके निर्माण के लिए वृष्टि छाया प्रभाव जिम्मेदार है। उत्तरी अमेरिका में सोनोरन मरुस्थल तटीय श्रेणियों के पूर्व में स्थित है। समुद्र से उठने वाली नमी युक्त हवाओं से पर्वतमाला के पश्चिमी किनारों पर वर्षा होती है जबकि पूर्व में स्थित स्थानों पर उनसे कोई वर्षा नहीं होती है क्योंकि वे

यहां पहुंचने से पहले ही उनकी नमी समाप्त हो जाती है। मरुस्थल महाद्वीपों के आंतरिक भाग में स्थित है। उनका आंतरिक अवस्थिति उन्हें महासागरों से नमी प्राप्त करने से रोकता है। अंतर्देशीय स्थिति के साथ-साथ वृष्टि छाया प्रभाव के कारण गोबी मरुस्थल बना।

ठंडी महासागरीय धाराएँ भी मरुस्थलों के उत्पत्ति में सहायक होती है। ठंडे महासागरीय जल के सम्पर्क में आने वाली हवा नीचे से ठंडी हो जाती है और इससे वर्षा के लिए अवरोध उत्पन्न होता है। अफ्रीका में कालाहारी और दक्षिण अमेरिका में आटाकामा मरुस्थल की उत्पत्ति में क्रमशः बेगुएला और हमबोल्ट धाराओं के प्रभाव सहायक है।

मरुस्थल के प्रकार

मरुस्थल के प्रकार, मरुस्थल कितने प्रकार के होते हैं, मरुस्थल प्रधानत: तीन प्रकार के होते हैं - 
  1. रेतीला मरुस्थल, 
  2. चट्टानी मरुस्थल और 
  3. पथरीला मरुस्थल। 
रेतीला मरुस्थल अपना क्षेत्रफल हवा के सहयोग से बढ़ा रहा है, क्योंकि वनस्पतियों की कमी से वेगवती हवा बालू उड़ाकर उपजाऊ मिट्टी को ढँक देती है, जिससे वह मरुस्थल बन जाता है। थार मरुस्थल का विस्तार पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ओर इसी ढंग से हो रहा हैं भूमि क्षरण से ढालू जमीन चट्टानों और पथरीली बन जाती है। हिमालयीय क्षेत्र और दक्षिण के पठारी भाग में इसी प्रकार के क्षेत्र विकसित हो रहे है। पथरीला मरुस्थल हवा उड़ाव से विकसित होता जा रहा है जहाँ महीन कण की मिट्टी उड़ जाती है और बजड़ी तथा चट्टानें बचीं रहती हैं राजस्थान के अनेक पहाड़ी हिस्सों में ऐसी प्रक्रिया क्रियाशील है। 

इससे अच्छी भूमि को मरुस्थल में बदलने का खतरा बढ़ता जा रहा है, क्योंकि कम वर्षा, वनस्पति आवरण में कमी तथा संरक्षण उपायों के अभाव में मरुस्थलीकरण एक दैवीय विपदा का रूप लेता जा रहा है। 

भारत सरकार की अनेक संस्थायें जैसे- ‘काजरी’ मरुस्थल शोध संस्थान, इस विपदा के निवारण के लिए उपाय ढूँढने का प्रयास कर रहा है। यह सत्य है कि वर्षा को नियंत्रित करना सम्भव नहीं है, लेकिन धरातल को नष्ट होने से बचाने के लिए कृत्रिम प्रयास किये जा रहे है। ऐसे क्षेत्रों में उष्णता झेलने वाली वनस्पतियों का रोपण कर धरातल का आवरण बचाना प्रमुख उपाय हैं झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के पठारी भाग में मृदा की उचित देखरेख के अभाव में पथरीला मरुस्थल तेजी से बढ़ रहा है। 

आदिवासी बहुल इन राज्यों में जनसहयोग के अभाव में कोई कार्य योजना सफल नहीं हो पा रही है। अत: आवश्यक है कि मृदा सुधार कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिये सघन जनजागरण अभियान चलाया जाय।

सन्दर्भ -
  1. Hudson,T. (2011) Living With Earth, An Introduction to Environmental Geology. PHI Learning Private Limited.
  2. Leong,G.C.(1983) Certificate Physical and Human Geography. Oxford University Press.
  3. Moseley, W.G.et. al. (2014) An Introduction to Human-Environment Geographywww.ucmp.berkeley.edu

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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