सूचना प्रौद्योगिकी क्या है?

अनुक्रम
सूचना प्रौद्योगिकी, जिसे इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी (Information technology) और संक्षेप में आई.टी. (IT) कहा जाता है, सूचना प्रौद्योगिकी (Information technology) ज्ञान और तकनीक का एक संगम है। 

यूनेस्को द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी की परिभाषा - सूचना प्रौद्योगिकी (Information technology) के अंतर्गत वैज्ञानिक, तकनीकी और इंजीनियरिंग विषयों के आलवा सूचनाओं के आदान-प्रदान एवं प्रसंस्करण (Processing) में काम आने वाली प्रबंध तकनीक, उनका अनुप्रयोग, कम्प्यूटर एवं मनुष्यों तथा मशीनों से उनका संबंध और इससे सम्बद्ध सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक मुद्दे शामिल हैं। सूचना प्रौद्योगिकी एक बड़ा अवधारणा है जो तीन प्रमुख तत्वों पर निर्भर है- हार्डवेयर, साफ्टवेयर और इंटरनेट। इसमें कंम्प्यूटर तथा दूरसंचार की कई तकनीको को मिलाकर संचार कार्यों का तुरंत  निपटान किया जाता है। ई-मेल, ई-गवर्नेंस, ई-कॉमर्स, ई-बाजार, ई-एजुकेशन, ई-सिग्नेचर, इंटरनेट, इन्ट्रानेट, फैक्स, पेजर, मोबाइल, जीपीएस, जीआईएस इत्यादि सूचना प्रौद्योगिकी के विभिन्न आयाम या माध्यम हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ हर रोज नए-नए आविष्कार हो रहे हैं। हर दिन नई-नई तकनीक विकसित हो रही है। सूचना प्रौद्योगिकी के बढ़ते प्रभाव स्वरूप ई-मेल, E-mail, e-business, e-banking, e-governance, e-chat, e-cash, e-commerce, e-fax, e-procurement, e-consultants, e-cloth, जैसे नए-नए आविष्कार सामने आ रहे हैं। ई-शॉपिंग के जरिए आदमी घर बैठे मनचाही वस्तु एवं चीजें खरीद सकता है। इलेक्ट्रॉनिक वाणिज्य या ई-कॉमर्स के द्वारा हम कोई भी वस्तु एवं चीजें घर बैठे ऑनलाइन खरीद सकते हैं। इंटरनेट के द्वारा आदमी घर बैठे बैंकिंग सुविधा का लाभ उठा रहा है। ई-प्रशासन से लोगों को कई नागरी सुविधाओं की जानकारी आसानी से मिल रही है।

सूचना प्रौद्योगिकी दो शब्दों से मिलकर बना है सूचना व प्रौद्योगिकी। सूचना का तात्पर्य है तथ्य, ज्ञान व जानकारी और प्रौद्योगिकी का आशय है, ‘वह तकनीक जो सूचना को व्यवस्थित कर सम्प्रेशण योग्य बनाती है।’ अत: सूचना प्रौद्योगिकी वह प्रौद्योगिकी है जिसके द्वारा हम सूचना की विभिन्न प्रक्रियाओं में वर्तमान तकनीकी का प्रयोग कर सूचना के उपयोग और आवश्यकता को बढ़ा सकते हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी के द्वारा कोई संदेश, तस्वीर या विचार एक स्थान से विश्व के किसी दूसरे स्थान पर कम से कम समय में भेजे जा सकते हैं। इस तकनीक के आधुनिकरण ने सम्पूर्ण विश्व को एक छोटे से कमरे में बदल दिया है। एक कमरे में बैठकर मात्र एक बटन दबाने से सम्पूर्ण विश्व की जानकारी कुछ ही क्षणों में हमारे सामने होती है किसी घटना की खबर फैलने की गति और प्रकाश की गति में अब कोई अन्तर नहीं रह गया है। कल तक जहाँ प्रत्येक सूचना इन्टरनेट पर अंग्रेजी में होती थी, वहीं आज हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी मिलने लगी है। समाचार, प्रौद्योगिकी, मनोरंजन, शिक्षा, ज्योतिष, औषधि आदि जैसे कई क्षेत्रों में इन्टरनेट पर हिन्दी में जानकारी उपलब्ध है। सूचना प्रौद्योगिकी में कम्प्यूटर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपयोग है। कम्प्यूटर एक तीव्र गणना करने की युक्ति है।

यह सूचनाओं के संग्रह, आदान-प्रदान, प्रबंधन का एक उपयुक्त साधन है, कम्प्यूटर किसी अन्य प्रणाली की अपेक्षा कार्य करने मं े अधिक परिशुद्ध है। कम्प्यूटर के प्रयोग द्वारा हुई प्रौद्योगिकी क्रांति ने एक नये अंतरिक्ष की परिकल्पना को साकार कर दिया, जिसे साइबर स्पेस का नाम दिया गया है जो कि वस्तुतः कम्प्यूटर प्रणाली का एक नेटवर्क है। जिसके माध्यम से विश्व के विभिन्न देशों के कम्प्यूटर करोड़ों लोगों के विचार व एकत्र की गई सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं ।

सूचना प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत ‘कम्प्यूटर एवं दूर संचार के माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक आधारित संयोजन द्वारा वार्षिक, चित्रात्मक, पाठ्यात्मक तथा संख्यात्मक सूचना का अधिग्रहण, संसाधन, संग्रहण और प्रसारण आदि प्रक्रियाएं सम्मिलित होती हैं । 

सूचना प्रौद्योगिकी की परिभाषा

लाँग्ले (1989) द्वारा प्रस्तुत सूचना प्रौद्योगिकी की इस परिभाषा में दो मुख्य बिन्दु निम्नवत् हैं-
  1. नवीन सूचना प्रौद्योगिकी में सूचना का निरूपण, अभिलेख और संसाधन जैसी प्रक्रियाएं होती है न कि केवल उसका संप्रेषण। ये सभी संचार प्रक्रिया के घटक हैं जो पृथक (वैष्लेशिक तथा प्रयोगात्मक दोनों) रूप में होते है परन्तु मानव संचार के संदर्भ में अंतर्गुफित होते है।
  2. आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी मे सूचना को कई प्रकार से निरूपित किया जाता है इसे न केवल पाठ्यात्मक, संज्ञानात्मक, प्रमेयात्मक तथा संख्यात्मक दृष्यात्मक और श्रव्य रूप में भी निरूपित किया जाता है।
यूनेस्को ने सूचना प्रौद्योगिकी की परिभाषित में सूचना के संचालन तथा संसाधन के लिए वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकीय तथा अभियांत्रिकीय विधाओं तथा प्रबंधन तकनीकी का प्रयोग अनुप्रयोग, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक मामलों में मानव एवं मशीन के बीच अंतर किया है ।

स्टोक्स (1985:114-15) के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी ‘‘एक नवीन प्रौद्योगिकी है, जा े कि विभिन्न प्रकार की सूचनाओं के मानक संग्रहण, चुनाव रूपान्तरण तथा उसके वितरण के व्यवहारिक रूप से सम्बन्धित है’’।

जॉंरकोल्जी (1989:6) ने सूचना प्रौद्योगिकी को चार प्रकार के विभिन्न दृश्टिकोणों से परिभाषित किया है, जैसे- समाज, अर्थशास्त्र, तकनीक और व्यक्ति। उसके अनुसार अवधारणा व विस्तार सूचना प्रौद्योगिकी के सामान्य तत्व हैं। ग्रीस्को (2000:2) का मानना है कि ‘‘सूचना प्रौद्योगिकी वैज्ञानिक तकनीकी अभियांत्रिकी अनुशासन और सम्बद्ध तकनीकियों की सूचनाओं के आदान-प्रदान प्रक्रियाओं तथा मनुष्य व मशीनों के साथ-साथ उसके सम्बन्धों तथा उनमें सामाजिक आर्थिक व सांस्कृतिक मामलों से जुडी हुई होती है’’।

रौले (1993:60) के अनुसार- ‘‘सूचना तकनीकी का अर्थ सूचना के एकत्रीकरण, संग्रहण, संचालन, प्रसारण तथा उपयोग से है इसका आशय हार्डवेयर अथवा सॉफ्टवेयर से नहीं है बल्कि इस तकनीक के द्वारा मानव की महत्वपूर्ण आवश्यकता एवं विभिन्न सूचनाओं की पूर्ति से है।’’

वेबस्टर न्यू इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार- ‘‘सूचना तकनीकी विभिन्न तकनीकियों का संयुक्त पद है जिसमें विभिन्न तकनीकों द्वारा सूचना के संचालन एवं स्थानान्तरण का कार्य किया जाता है। माध्यम के रूप में कम्प्यूटर, दूरसंचार तथा माइक्रो-इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं।’’

हेरॉल्डस लाइब्रेरियन्स ग्लौसरी के अनुसार- ‘‘सूचना तकनीकी सूचना स्रोतों का विकास है, जिसे कम्प्यूटर एवं संचार माध्यमों द्वारा नियन्त्रित किया जाता है।’’ स्पष्ट है कि सूचना प्रौद्योगिकी का क्षेत्र व्यापक है। यह एक ऐसी तकनीक है जिसने असम्भव को सम्भव बना दिया है। यह अपने में मात्र पक्षात्मक ही नहीं, अपितु संख्यात्मक, दृष्यात्मक एंव संगणनात्मक प्रस्तुतीकरण को समेटे हुए है। इस तरह सूचना प्रौद्योगिकी, सूचना विज्ञान व तकनीक का समन्वित रूप है, जो सभी प्रकार की सूचनाओं को सग्रहित करने और उन्हें पुन: प्राप्त करने के रूप में कम्प्यूटर व दूरसंचार से सम्बन्धित है।

सूचना प्रौद्योगिकी वर्तमान समय की जरूरत है। इसके बिना हम सही प्रकार से सूचना का संग्रह तथा उसकी पुनपर््राप्ति नहीं कर सकते। ग्रन्थालयों द्वारा इसका उपयोग आधुनिक रूप से सूचना के संग्रहण तथा उपयोगकर्ताओं को आधुनिक व उच्च तकनीकी सेवाएं प्रदान करने के लिए किया जा रहा है। इस प्रौद्योगिकी के द्वारा कम समय में वांछित सूचना उपलब्ध करायी जा रही है जिससे उपयोगकर्ताओं के समय की निरन्तर बचत हो रही है।

सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार में कम्प्यूटर और इंटरनेट के माध्यम का महत्वपूर्ण  योगदान है जिसके द्वारा लोगो को सूचनाओं के सग्रह, सम्प्रेशण, दूरसंचार, इलेक्ट्रॉनिक्स प्रकाशन, सूक्ष्म प्रतिलिपिकरण आदि की सुविधाएँ प्राप्त है। नेटवर्क के माध्यम से विशिष्ट जानकारी प्राप्त करना और दूरदराज बैठे लोगों से सीधा संवाद व सम्बन्ध बनाए रखने का सरल उपाय है।

सूचना प्रौद्योगिकी में हुए नवीनतम परिवर्तनों के फलस्वरूप ग्रन्थालयों के मूलभूत परम्परागत कार्यों एवं सेवाओं में अत्याधिक परिवर्तन आया है। सूचना प्रौद्योगिकी ने पुस्तक क्रय की प्रक्रिया को आसान बना दिया है, जिसके द्वारा अधिग्रहण के कार्यों को अधिक तीव्रता से किया जा सकता है। इसके माध्यम से पत्र-पत्रिकाओं के अधिग्रहण पर भी नियंत्रण किया जा सकता है। इसके द्वारा नवीनतम सामयिकी प्रकाशनों के चयन, क्रय, आदेशन भुगतान आदि कार्यो की सहायता मिलती है विगत वर्शों में ग्रन्थालयों में कितनी पत्रिकाएँ आती है तथा कुल कितने खण्ड प्रकाशित हो चुके हैं आदि की जानकारी रखना बहुत कठिन था। परन्तु आज ग्रन्थालय कुछ ही क्षणों में डाटा को कम्प्यूटर के माध्यम से उपलब्ध करा देते हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम

1. रेडियो - 

भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत सन् 1923 में तत्कालीन बंबई में रेडियो क्लब की स्थापना के साथ हुई। ऑल इंडिया रेडियो की स्थापना 1936 में हुई। यह अब विश्व का सबसे बड़ा रेडियो नेटवर्क बन चुका है और इसमें लोकप्रिय एआईआर एफएम भी शामिल है। नब्बे के दशक तक, जब तक हमारी अर्थव्यवस्था खुली नहीं थी, किसी निजी कंपनी को रेडियो के क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति नहीं थी और भारतीय श्रोताओं की सांस्कृतिक रूप से विविध और व्यापक पसंद के कार्यक्रमों को परोसने का संपूर्ण उत्तरदायित्व आकाशवाणी पर ही था। भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के बाद 1993 में एफएम (फ्रीक्वेंसी माडुलेटेड- ध्वनि तरंगों की आवृित्त्ायो ं का आरोह-अवरोह) रेडियो स्टेशनों के निजीकरण की अनुमति देने के बाद भारतीय रेडियो क्षेत्र को एक नया जीवन मिला है और अब वह नये जोशो-ख़ रोश से श्रोताओं को श्रव्य मनोरंजन उपलब्ध करा रहा है। भारत में संप्रेषण के माध्यम के रूप में रेडियो वास्तव में परिपक्व हो गया है और हर संभव तरीके से प्रगति कर रहा है। प्रौद्योगिकी में सुधार, प्रतिस्पर्धा और रेडियो के प्रसारण क्षेत्र में विस्तार- ये वे कारण हैं जिन्हें इस जीवंत उद्योग के विकास का श्रेय जाता है।

रेडियो मनोरंजन और शिक्षा हेतु उपयोगी माध्यम है, इसलिए रेडियो फैमिली मीडिया बन गया है। ज्ञान, मनोरंजन और शिक्षा यह रेडियो कार्यक्रमों के तीन मुख्य सूत्र है। इसी त्रिसूत्र में रेडियो की सामाजिक जिम्मेदारी सामने आती है। स्वतंत्रता के बाद देखा जाए तो भारत के सर्वांगीण विकास एवं सामाजिक परिवर्तन में रेडियो ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शहरों की अपेक्षा गाँवों में रेडियो अधिक लोकप्रिय है। साक्षरों की कौन बात कर े आज निरक्षर, निर्धन और नेत्रहीनों के लिए भी आकाशवाणी उपयोगी सिद्ध हो रही है। आकाशवाणी लोकतंत्र का सक्षम और विश्व में विचारों के संप्रेषण का एक श्रेष्ठ माध्यम है ।

2. टेलीविजन (दूरदर्शन) -

टेलीविजन मनोरंजन एवं सूचना प्राप्ति का सबसे आकर्षक और प्रभावी जनसंचार माध्यम है। भारत में दूरदर्शन का पहला प्रसारण 15 सितंबर, 1959 में दिल्ली से शुरू किया गया। सामाजिक विकास एवं देश की अर्थव्यवस्थाओं को सक्षम बनाने की दिशा में दूरदर्शन अग्रणी भूमिका निभा रहा है। वर्तमान में देश में 300 टेलीविजन चैनलों से कार्यक्रमों का प्रसारण होता है। सजं ीव भानावत के अनुसार, ‘‘1975 में भारत में उपग्रह द्वारा शिक्षा प्रदान करने के लिए उपयोग किया गया। इससे सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सप्रीमेंट का नाम दिया गया। इस तकनीक से सुदूर इलाकों के ग्रामीण क्षेत्रों में भी पहुँचना संभव हो सका। यह आज के संचार माध्यमों में सबसे बड़ा एवं महत्त्वपूर्ण माध्यम है। 

पिछले एक दशक से दूरदर्शन ने जिस तरह भारतीय जनजीवन तथा समाज पर अपनी छाप छोड़ी है उस तरह से किसी अन्य संचार माध्यम ने अपना प्रभाव नहीं डाला है। इस परिदृश्य में यह दूरदर्शन की सबसे बड़ी भूमिका है। दूरदर्शन द्वारा भारतीय जनमानस को प्रभावित करना आज आने वाली पूरी एक पीढ़ी की बदलाव की तस्वीर है। डॉ. कृष्ण कुमार इस संदर्भ में लिखते हैं कि दूरदर्शन का यह प्रभाव भारतीय समाज के नये सरकारों को भी परिलक्षित करता है। हम भारतीय समाज पर दूरदर्शन का मानसिक और सामाजिक दबाव महसूस करने लगे हैं। दूरदर्शन ने समाजिक विकास में लगभग क्रांति ला दी है। भारत जैसे कृषि प्रधान और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए देश के लिए एक नियमबद्ध जनसंचार मीडिया की आवश्यकता थी और दूरदर्शन ने बखूबी इसे पूरा किया। आज दूरदर्शन काफी लोकप्रिय है। कुल मिलाकर दूरदर्शन का समाज पर अच्छा और बुरा दोनों प्रभाव पड़ रहा है।

दूरदर्शन संचार का ऐसा सशक्त साधन है जो लोकजीवन को प्रभावित किए बिना नहीं रह सकता। दूरदर्शन पर इसी तरह की चिंताओं को बहुत सार े लोगों ने विशेषज्ञों तथा समाज तथा समाज चिंतकों ने समय-समय पर प्रकट किया है। विदेशी टेलीविजन भारतीय संस्कृति एवं पारिवारिक मूल्यों पर आक्रमण कर रहा है। इस तरह हम देखते हैं कि सामाजिक बदलाव के मूल्यों की एक नयी परिभाषा दूरदर्शन ने अपने प्रचार-प्रसार के माध्यमों द्वारा विकसित की है ।

3. दूरसंचार (फोन एवं मोबाइल सेवा) - 

वर्ष 1997 में इसके केवल 30 लाख ग्राहक थे जो सितम्बर 2008 के अंत में बढ़कर 31 करोड़ 50 लाख हो गए। आज भारत के पास चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे विशाल वायरलैस ग्राहक आधार है। भारत के मोबाइल बाजार में तेजी के साथ वृद्धि होने के अनेक कारण हो सकते हैं किन्तु निजी क्षेत्र की आपरेटर कम्पनियों के लिए बाजार को खोलने हेतु कानूनी कार्यवाही करना सबसे महत्त्वपण्ूर् ा कारण है। आपरेटरों और उपकरणप्रदाताओं ने भी नई टैरिफ संरचना और आकर्षक मूल्यों पर उपलब्ध हैण्डसेटों के माध्यम से इस क्षेत्र के तीव्र विकास में योगदान दिया ।

भारत का मोबाइल बाजार पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़ रहा है। मार्च 2008 में 10.37 मिलियन नये ग्राहक जुड़े थे जा े किसी भी देश द्वारा मात्र 30 दिन की अवधि में जोड़े गए नए ग्राहकों में सबसे अधिक हैं। सितम्बर 2008 में भारत में 10.07 मिलियन ग्राहकों के जुड़ने से स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र के विकास की गति में कोई कमी नहीं आई है। यद्यपि यह देखने में आया है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्र में भी तेजी के साथ विकास हो रहा है (कुमार, वाई0, 2009)। अगर हम भारत के दूरसंचार क्षेत्र की विकास यात्रा के आंकड़े देखें तो आज भारत का दूरसंचार नेटवर्क लगभग 210 मिलियन टेलीफोनों के साथ विश्व के वृºद्तम नेटवर्कों में से एक है और यह एशिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में दूसरा बड़ा नेटवर्क है जबकि वर्ष 2006-07 में यही संख्या 70 मिलियन थी। हाल ही में जारी आंकड़ों के मुताबिक जिस गति से उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ रही है उस हिसाब से दिसंबर 2011 तक यह आंकड़ा करीब 121 मिलियन तक पहुँच गया। 

4. कम्प्यूटर -

दुनिया का पहला कंप्यूटर सन् 1945 में अमेरिकी रक्षा विभाग के लिए बनाया गया था। आरंभिक काल में कंप्यूटर काफी महँगा होने के कारण केवल बड़ी कंपनियाँ और सरकारी विभाग ही इसे खरीदने की क्षमता रखते थे। अधिकतर इनका इस्तेमाल बडी़ संख्याओं की गणना करने में ही किया जाता था। सन् 1972 में भारत के पास कुल 172 कंप्यूटर थे, अधिकांश कंप्यूटर बैंकों, बीमा क्षेत्र की इकाइयों और राष्ट्रीय स्तर के सरकारी विभागों में लगाए गए ।
कंप्यूटर
कंप्यूटर
 भारत में ‘80 के दशक के उत्तरार्ध में कंप्यूटर क्रांति आरंभ हुई। बड़ी मात्रा में सरकार और बड़ी कंपनियों ने कंप्यूटर खरीदने शुरू कर दिए। सन् 1986 में भारतीय रेल ने कुछ केंद्रों पर कंप्यूटर की मदद से टिकट आरक्षण करना आरंभ कर दिया था। इसके अलावा बैंकों में कंप्यूटर का प्रसार अधिक तेजी से हुआ। नैसकॉम के अनुसार सन् 1980 में भारत में केवल 1000 कंप्यूटर थे, सन् 1985 में यह संख्या बढ़कर 20,000 हो गई। सन् 1920 में यह आँकड़ा 2 लाख को पार कर गया, 1995 में कंप्यूटरों की संख्या बढ़कर 10 लाख हो गई और इसी क्रम में सन् 2000 में यह सख्ं या पाँच गुना हो गई। इसका एक कारण सरकार की नीतियाँ भी रहीं। 80 के दशक की शुरूआत में जब कंप्यूटर पर कई सौ प्रतिशत आयात-कर था, उसे धीरे-धीरे काफी कम कर दिया गया (गुप्ता, एन0, 2010)।

कम्प्यूटर को आधुनिक दूरसंचार प्रणाली की आत्मा कहा जाता है। कंप्यूटर द्वारा दूरसंचार, उपग्रह संचार, रेडियो, टीवी, समाचार पत्र-पत्रिकाएं एवं शिक्षा के क्षेत्र में नयी क्रांति आइर् है। टेलीफोन, मोबाइल, फैक्स प्रणालियो ं में कंप्यूटर का उपयोग आज आम बात हो गई है। कंप्यूटर के कारण समाचार प्रेषण में क्रांति आई है। एक समय था जबकि कबूतर द्वारा संवाद भेजे जाते थे। जो मंथर गति से गंतव्य तक कभी पहुँचते तो कभी बीच में ही खो जाते थे। अब कंप्यूटर के कारण तत्काल समाचारपत्र कार्यालय में पहुँच जाते हैं। वस्तुत: आज कंप्यूटर के सहयोग से मुश्किल से मुश्किल कार्य भी सरल हो गया है तथा इसकी वजह से घंटों के कार्य मिनटों में निबट जाते हैं। ज्ञान समाज के निर्माण में कंप्यूटर इंटरनेट मीडिया ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साइबर सोसायटी के साथ वैश्वीकरण ने समाज को टेक्नोक्रैटिक समाज में परिवर्तित कर दिया है ।

कंप्यूटर, इंटरनेट, मल्टीमीडिया थिंक टैक के रूप में उभरकर सामने आ रहा है। यह मशीन हमारे जीवन का अविभाज्य अंग बन गया है और ई-प्रशासन व्यवस्था में कंप्यूटर बहुआयामी साधन बन चुका है। आज मानव समाज के सभी क्षेत्रों में कंप्यूटर इंटरनेट तकनीक ने अपना प्रभुत्व सिद्ध किया है। संप्रति सर्वत्र कंप्यूटर का वर्चस्व है। उद्योग, शिक्षा, यातायात नियंत्रण, चिकित्सा सुविधा, चुनाव संबंधी भविष्यवाणियां, मौसम संबंधी सूचनाएं और कानून व्यवस्था को अधिक कारगर बनाने में कम्प्यूटर सर्वाधिक सक्षम है। मास मीडिया में अभूतपूर्व क्रांति लाने में इसकी अहम भूमिका है। इसके माध्यम से मानव जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। सामाजिक परिवर्तन में तथा समाज के विकास के लिए यह उपयुक्त संचार माध्यम है।

5. इंटरनेट -

इंटरनेट को सूचना प्रौद्योगिकी की जीवनरेखा कहा जाता है। इंटरनेट का उद्भव एवं विकास वर्ष 1969 में अमरीका के प्रतिरक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन स्थित एडवांस रिसर्च प्रोजेक्शन एजेंसी की संकल्पना से हुआ। इंटरनेट इंटरनेशनल नेटवर्क का ही संक्षिप्त नाम है। इंटरनेट प्रणाली में कम्प्यूटरों के जाल को एक मुख्य कम्प्यूटर आपस में टेलीफोन लाइन के द्वारा जोड़ता है। कम्प्यूटर तथा टेलीफोन आपस में मोडेम के माध्यम से जुड़े होते हैं। यह मोडेम कम्प्यूटर के डिजिटल सिग्नल को टेलीफोन के मैग्नेटिक सिग्नल में बदलता है। सूचनाओं के इस खजाने पर किसी भी केंद्रीभूत प्रशासन, संस्था या कम्पनी का नियंत्रण नहीं है। आपस में जुड ़े ये कम्प्यूटर विभिन्न प्रकार की सूचनाओं का आदान-प्रदान बड़ी शीघ्रता से कर लेते हैं, इसलिए इंटरनेट को इंफॉर्मेशन सुपर हाईवे भी कहा जाता है (श्रीवास्तव, एन0के0, 2009)।

इंटरनेट


इटंरनेट एक जाल के रूप में जाना जाता है। इसमें असीमित सूचनाओं का भण्डार भरा हुआ है। इंटरनेट नेटवर्कों का नेटवर्क माना जाता है। इसके द्वारा किसी भी देश का व्यक्ति अपनी भाषा में जानकारी प्राप्त कर सकता है। इसकी उत्पित अमेरिका में होने के कारण शुरूआत में इसकी भाषा अंग्रेजी थी, लेकिन इसके लगातार प्रयोग के कारण इसकी प्रसिद्धि भी बढ़ती गयी तथा भाषाओं का क्षेत्र भी बढ़ता गया। आज लगभग 200 (दो सौ) से अधिक भाषाएं इंटरनेट में प्रयोग हो रहीं हैं।

वर्तमान में 160 से भी ज्यादा देश इटं रनेट के सदस्य हो गये हैं और इसके 400 मिलियन से अधिक उपभोक्ता हो गये हैं, यही वजह है कि इंटरनेट को पूरे विश्व का नेटवर्क माना जाता है।

इंटरनेट विश्व भर के अलग-अलग प्लेटफार्मों पर कार्य करने वाली नेटवर्क प्रणालियों को एक मानक प्रोटोकॉल के माध्यम से जोड़ने में सक्षम है। इसका कोई भी केन्द्रीय प्राधिकरण नहीं है। इसकी परिकल्पना विभिन्न नेटवर्कों के बीच परस्पर सहमति के आधार पर की गयी है। यह सहमति भी इस बात पर की गयी है कि सभी प्रयोक्ता संस्थाऐं इस नेटवर्क पर संदेश के आदान प्रदान के लिए प्रेषण भाषा का ही प्रयोग करेंगी। इसके लिए सन् 1969 ई0 में ‘विंटरसर्फ’ नामक सोसायटी का गठन किया गया और उसमें कुछ मेनफ्रेम कम्प्यूटरों को परस्पर जोड़ दिया गया। इंटरनेट सोसायटी एक मात्र स्वैच्छिक संस्थाओं का संगठन है जा े इटंरनेट के मानकों का निर्धारण करती है और उसके माध्यम से ही तकनीकी विकास पर नजर रखी जाती है ।

वर्ष 1980 में इंटरनेट की शुरुआत हुई। भारत सरकार ने 15 अगस्त, 1995 को इस सुविधा को आमजन क¢ लिए उपलब्ध कराया। इसके बाद तो संचार सुविधाओं का तेजी से विकास हुआ। आज भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती आर्थिक शक्ति के रुप में सीना ताने खड़ा है। भारत सरकार ग्रामीण भारत को संचार सुविधाओं से लैस करने की दिशा में निरंतर प्रयास कर रही है। 

इंटरनेट का मुख्य अवयव वेबसाइट ही होता है सूचना के संसार का प्रमुख द्वार वेबसाइट को ही कहा जाता है जिसके अन्दर प्रवेश करते ही हम अपने आपको सूचना के अथाह समुद्र में पाते है। शिवानी (2004) के अनुसार, वेबसाइट किसी भी संस्थान या सेवा का प्रसार, उत्पाद संबंधी सूचना तथा अन्य महत्त्वपूर्ण सूचनाओं का वह स्थल है, जहाँ इंटरनेट के माध्यम से पहुँच सकते हैं।

Comments