बाजरा फसल के रोग और उनकी रोकथाम

बाजरे की फसल में गुंदिया या चेपा, अरगट व जोगिया (हरित बाली) इत्यादि रोग तथा दीमक व सफेद लट का प्रकोप एक आम बात है। अत: बाजरे में कीट व बीमारियों की रोकथाम के लिए भूमि व बीज उपचार काफी लाभदायक पाया गया।

बाजरे की फसल
बाजरे की फसल

बाजरा फसल के रोग एवं रोकथाम (Diseases and prevention of millet crop)

बाजरा फसल के रोग एवं रोकथाम इस प्रकार है -

हरित बाली रोग या जोगिया (Green ear disease or Jogia)  - 

इस रोग के मुख्य लक्षण पुष्पक्रम पर दिखाई देते हैं। रोग से प्रभावित पौधों की वृद्धि रूक जाती है, पत्तियाँ पीली पड़ जाती है, पत्तियों के नीचे भूरी सफेद फफूंद उभर आती है तथा सिट्टे निकलते समय दाने के स्थान पर हरे रंग के धागे जैसे रेशे उभर आते हैं और सम्पूर्ण बाली छोटी हरी पत्तियों जैसी संरचनाओं का गुच्छा दिखाई देती है। अत: इस लक्षण के कारण इस रोग को ‘हरी बाली’ के नाम से जानते हैं।

रोकथाम (Prevention)

  1. इस रोग से बचाने हेतु बीज को 6 ग्राम एप्रोन एस.डी. 35 प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
  2. खडी फसल में इस रोग के लक्षण दिखाई देने खेतों में बुवाई के 21 दिन बाद दो किलोग्राम मैंकोजेब फफूंदनाषी दवा का छिडकाव करें।
  3. चरी बाजरे की फसल में से रोगग्रस्त पौधों को निकाल कर नष्ट करें।
  4. रोगरोधी किस्में आर.एच.बी. 30, डब्ल्यु सी.सी. 75, राज. 171 आदि बोयें।
  5. फसल चक्र भी इस रोग की रोकथाम में सहायक है।

गूंदिया या चेपा रोग (अरगट) (Gonorrhea or chepa disease (ergot))

इस रोग के लक्षण बालियों पर पुष्पन के समय दिखाई देते हैं। सिटटों पर फूल आने के दौरान अगर हल्की वर्षा एवं बादल हो तो सिट्टों पर गोंद उभर आता है। सबसे पहली बाली की संक्रमित स्पाईकाओं से छोटी-छोटी बूंदों के रूप में शहद जैसे रंग का द्रव पदार्थ सिट्टों से रिसने लगता है, जो बाद में भूरे रंग के चिपचिपे द्रव के रूप में पूरे सिट्टे के उपर फैल जाता है। रोग से ग्रसित सिटे में दानों के स्थान पर छोटी-छोटी बैंगनी गहरे भूरे रंग की अनियमित संरचनाएं बन जाती है जिन्हें अरगट कहते हैं। रोगी बालियों पर रस निकलने के 10-15 दिनों बाद दानों के बीच में स्क्लेरोसियम फफूंद के स्पोर तुसों के बीच से निकलते हैं, इस प्रकार पूरे सिट्टे पर काला मुंह सा नजर आने लगता है।

रोकथाम (Prevention)

  1. अरगट रोग के नियंत्रण के लिए बीजों को 20 प्रतिषत नमक के घोल (1 किलोग्राम नमक/5 लीटर पानी) में 5 मिनट डुबोकर, निथारकर धोकर सुखा लें। उपरोक्त उपचार के बाद प्रति किलोग्राम बीज को 3 ग्राम थाइरम से उपचािरत करें 
  2. खडी फसल को अरगट रोग से बचाने हेतु लक्षण दिखाई देते ही या सिट्टे निकलते समय दो किलोग्राम मैंकोजेब फफूंदनाषी दवा का 3 दिन के अन्तर पर 2-3 छिडकाव करें।
  3. अरगट रोग ब्लिस्टर बीटल या चेपर बीटल द्वारा भी फैलता है, अत: सिट्टे आते समय इनकी रोकथाम हेतु कार्बोरिल डस्ट 5 प्रतिषत 25 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से भूरकाव करें।
  4. रोगग्रस्त पौधों को उखाडकर नष्ट करें तथा जिस खेत में रोग लग गया हो उसमें अगले वर्ष बाजरे की फसल नहीं बोनी चाहिए।
  5. गर्मियों में गहरी जुताई करने से फफूंद के स्पोर नष्ट हो जाते हैं।

बाजरे का कंडवा (स्मट) रोग (Smut disease of millet)

यह एक मृदोढ़ रोग है जिसका प्रारंभ भूमि में पड़ी हुई कंड गैंदों से उत्पन्न होता है। रोग के लक्षण सिट्टों के दानों में कहीं-कहीं बिखरे हुए काले रंग के दिखाई देते हैं, परन्तु अधिकांष दाने रोगी होने से बच जाते हैं, कभी-कभी सिट्टों में केवल एक दाना ही रोगी होता है। रोगी दाने का व्यास सामान्य दाने से दो गुना होता है। रोगी सिट्टों से कंड भूमि में गिर जाते हैं और इनके चिपके स्पोर अकुंरण के समय स्वस्थ पौधों तक पहुँचकर रोग फैलाते हैं।

रोकथाम (Prevention)

  1. रोगी सिट्टों को उखाडकर नष्ट करें तथा स्वस्थ प्रमाणित बीजो का ही प्रयोग करें।
  2. ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई, खेत की सफाई, फसलचक्र इत्यादि कृषण क्रियाएं अपनाएं।
  3. रोग के लक्षण दिखाई देते ही सर्वांगी कवकनाषी दवा-विटावेक्स या प्लान्टवेक्स इत्यादि के 0.25 प्रतिषत घोल (2.5 किलोग्राम दवा प्रति हैक्टर) के दो छिडकाव, पहला अधिकांष सिट्टों के निकलने पर तथा दुसरा 10 दिन बाद करना चाहिए।
  4. रोगरोधी किस्म आर.सी.बी. 2 बोनी चाहिए।

बाजरे के प्रमुख कीट एवं उनकी रोकथाम (Major pests of millet and their prevention)

सफेद लट - यह एक भूमिगत कीट है जिसकी लटें पौधों की जड़ें खाकर फसल को हानि पहुँचाती है। 

दीमक - यह भी एक भूमि में पाया जाने वाला सर्वभक्षी कीट है, जो पौधों की जड़ें खाकर फसल को हानि पहुँचाते हैं।

भूमिगत कीटों की रोकथाम (Prevention of underground pests)

  1. जहाँ सफेद लट का विशेष प्रकोप हो वहाँ इसकी रोकथाम हेतु एक किलोग्राम बीज में 3 किलोग्राम कार्बोफ्यूरॉन 3 प्रतिषत या क्यूनालफॉस 5 प्रतिषत कण मिलाकार बोयें तथा बुवाई से पूर्व भूमि को फोरेट 10-जी 25 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से उपचारित करें।
  2. दीमक की रोकथाम हेतु बीजों को इमिडाक्लोप्रिड 3 मिली. प्रति किलोग्राम बीजदर से उपचारित करें या मिथाईल पेराथियॉन डस्ट 2 प्रतिषत या क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिषत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से भूमि में बुवाई से पूर्व मिलावें।
  3. दीमक का प्रकोप कम करने के लिये खेत से सूखे डंठल आदि इकट्ठे कर हटा देना, कच्चा खाद प्रयोग नहीं करना आदि काफी सहायक होते हैं।
  4. खड़ी फसल में सफेद लट व दीमक का प्रकोप होने पर 4 लीटर क्लोरपायरीफॉस अथवा 2.5 लीटर फिप्रोनिल प्रति हैक्टर काफी सहायक होते हैं।
  5. चेफर बीटल, ब्लिस्टर बीटल एवं ईयर हैड बग कीटों का प्रकोप दिखाई देते ही क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिषत या एमपी डस्ट 2 प्रतिषत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हैक्टर की दर से भूरकाव करें।

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