मौखिक अभिव्यक्ति का अर्थ, महत्व, रूप एवं विशेषताएं

मनुष्य जब अपने विचारों को दूसरे के समक्ष रखने के लिए भाषा का बोलकर प्रयोग करता है तो उसे मौखिक अभिव्यक्ति कहा जाता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने दैनिक कार्य-व्यापार में अनेक व्यक्तियों के संपर्क में आता है और भाषा के माध्यम से अपने विचार प्रकट करता है। विचारों के संप्रेषण के लिए मौखिक अभिव्यक्ति का सहारा लिया जाता है। अशिक्षित व्यक्तियों के पास तो अपने विचारों के आदान-प्रदान का साधन केवल मौखिक अभिव्यक्ति ही है। व्यक्तियों श्रवण एवं मौखिक कौशलों का विकास को अधिक संख्या में एक साथ संबोधित करने के लिए मौखिक अभिव्यक्ति का उपयोग किया जाता है।

मौखिक अभिव्यक्ति का महत्व (Importance of verbal expression)

  1. भाषा से पहला परिचय “बोली” गई ध्वनियों से ही होता है जिन्हें बच्चा पहले-पहल सुनता है। 
  2. मौखिक भाषा का प्रयोग बालक को भाषा के ध्वन्यात्मक रूप को समझने, प्रयोग करने में सहायक होता है। “सुनना” कौशल के विकास इसी के कारण संभव है। 
  3. मौखिक अभिव्यक्ति दैनिक जीवन के कार्य व्यापार का आधाार है। अपनी बात को सहज और स्वाभाविक रूप से कहने के लिए परिवार एवं समाज के बीच मौखिक भाषा का ही प्रयोग होता है। 
  4. मौखिक भाषा भावों की अभिव्यक्ति में सहायक होती है। इसी के द्वारा रूचि-अरूचि, आकर्षक-उदासीनता, प्रसन्नता आदि भाव भी अभिव्यक्त होते हैं। 
  5. मौखिक भाषा व्यक्ति के संतुलित व्यक्तित्व का परिचय देती है। उनकी अभिव्यक्ति में स्थिरता, स्पष्टता, आत्मविश्वास जैसे गुण सहज ही दिखाई देते हैं।
  6. सामाजिक जीवन में, व्यक्तिगत जीवन में सामंजस्य में मौखिक अभिव्यक्ति विशेष भूमिका निभाती है।
  7.  प्राथमिक स्तर पर भाषा अधिगम में “मौखिक भाषा” एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। शिक्षक की शिक्षण शैली शिक्षाथ्र्ाी के मौखिक कौशल का भरपूर प्रयोग करती है। 
  8. शिक्षण पद्धति को आकर्षक, रूचिकर व मनोरंजक रूप प्रदान करने में शिक्षक की भावपूर्ण अभिव्यक्ति (कहानी, कविता, कथन, वार्तालाप आदि) अभिव्यक्ति पर आधारित होती है। 
  9. बालकाल में सुनाई जाने वाली नानी-दादी की कहानियाँ, कविताएँ, गीत बच्चे का साहित्य से परिचय बोलकर ही कराते हैं। 
  10. मौखिक भाषा अनुभवों/ज्ञान के हस्तांतरण का महत्त्वपूर्ण माध्यम है। लोक साहित्य का आधार मौखिक ही होता था। 
  11. मौखिक कौशल का विकास व्यक्ति को वाक्कला में निपुण करता है। 
  12. मौखिक कौशल आत्मविश्वास से बढ़ता है और इस कौशल के विकास से आत्मविश्वास बढ़ता है।

मौखिक अभिव्यक्ति के रूप (Form of verbal expression)

मौखिक अभिव्यक्ति के अनेक रूप हैं इनमें से कुछ हैं:
  1. औपचारिक : आदान-प्रदान, प्रार्थनापत्र, स्वागत समारोह, विवाहादि का नियंत्रण भाषणादि औपचारिक अभिव्यक्ति के रूप हैं। ऐसे अवसर पर संप्रेषण शिष्टता, विनम्रता, आग्रह, आदि से युक्त होता है। 
  2. अनौपचारिक : आपसी बातचीत, बैठने का ढंग, सहज वातावरण अनौपचारिक भाषा रूप की पहचान है। औपचारिक व्यवहार का न होना मर्यादा भंग होना नहीं होता है। आपसी मान-मर्यादा का ध्यान सदैव रखा जाना चाहिए। 
  3. वर्णन, विवरण: घटना, कहानी का वर्णन, देखी हुई चीजों का विवरण अभिव्यक्ति का गुण है। मौखिक विवरण/वर्णन करने की क्षमता “अवलोकन”, स्मरण, क्रमबोध भाषा ज्ञान पर निर्भर करती है। 
  4. चित्रण: व्यक्ति, स्थान की शब्दों में रेखाएँ खींचना चित्रण कहलाता है। अभिव्यक्ति का यह रूप कल्पना, चिंतन से प्रेरित होता है। जीवनी, आत्मकथा इसी वर्ग में आते हैं। 
  5. इतिवृत्त: मौखिक अभिव्यक्ति का यह रूप तथ्यात्मक परिस्थिति का सटीक वर्णन कहलाता है। समाचार इसी वर्ग में आते हैं। 
  6. भाषण/वार्ता/चर्चा: दिए गए विषय पर सोचना, विचारों को क्रमबद्ध करना, तर्क का औचित्य निश्चित करना, अपनी बात आत्मविश्वास पूर्वक उचित शब्दो में कहना इन अभिव्यक्ति रूपों के गुण होते हैं।

मौखिक अभिव्यक्ति की विशेषताएं (Features of verbal expression)

अभिव्यक्ति कौशल की कुछ प्रमुख विशेषताएं हैं : ध्वन्यात्मक भाषिक कौशलों “सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना” में सुनना और बोलना ध्वन्यात्मक कौशल हैं और ये कौशल-पढ़ना लिखना कौशल के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण आधार हैं। शुद्धता उच्चारण की शुद्धता मौखिक अभिव्यक्ति का प्रमुख गुण है। 

स्वाभाविकता एवं स्पष्टता (Naturalness and clarity)

मौखिक अभिव्यक्ति कौशल का दूसरा प्रमुख गुण है इसकी स्वाभाविकता एवं स्पष्टता, अर्थात् बालक की बोलचाल एवं अभिव्यक्ति में बनावटीपन न दिखाई दे और उसमें अस्पष्टता न हो। मौखिक अभिव्यक्ति की सार्थकता उसकी सहजता, स्वाभाविकता एवं स्पष्टता में है। यदि अभिव्यक्ति में ये गुण नहीं होंगे तो हम अपनी बात भली-भाँति संप्रेषित नहीं कर पाएँगे।

विचार क्रमबद्धता (Thought sequence)

अपने विचारों-भावों को भली-भाँति दूसरों तक पहुँचाने के लिए भावों एवं विचारों में क्रमबद्धता होनी चाहिए। विचारों की अव्यवस्थित अभिव्यक्ति के कारण प्रस्तुति का सूत्र भी बिखर जाता है और प्रभाव भी कम पड़ता है। अत: आवश्यक है कि हम मौखिक अभिव्यक्ति में विचारों की क्रमबद्ध प्रस्तुति के लिए बच्चों को पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित करें।

सशक्तता (Strength)

अभिव्यक्ति कौशल का एक महत्त्वपूर्ण गुण सशक्तता है। सशक्त अभिव्यक्ति का श्रोताओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सशक्तता के अभाव में कथन का अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता और उसकी संप्रेषणता में भी कमी आ जाती है।

प्रवाह (Flow)

किसी विचार या भाव को अटक-अटक कर या रूक-रूक कर प्रस्तुत करने में संदेश संवाद-विहीन हो जाता है और श्रोता वक्ता की बात को समझ नहीं पाते हैं, अत: अभिव्यक्ति में भाषा तथा भावों का प्रवाह अपेक्षित है। प्रवाह से सारा कथ्य एक इकाई के रूप में संघटित हो जाता है जिससे श्रोता उसे सरलता से ग्रहण कर लेता है।

अवसरानुकूलता (Adaptability)

वाणी का प्रयोग विभिन्न अवसरों के अनुकूल ही करना चाहिए। अवसरानुकूल प्रकरण का चुनाव किया जाए। औपचारिक-अनौपचारिक, हर्ष-विषाद, आदेश-अनुरोध आदि अवसरों पर अभिव्यक्ति का रूप भिन्न-भिन्न होता है। अवसरानुकूल भाषा सामाजिक व्यवहार की एक अत्यावश्यक अपेक्षा है। शिक्षार्थियों को श्रोताओं की आयु, सामाजिक स्तर, स्थिति के स्वरूप आदि को ध्यान में रखकर ही मौखिक अभिव्यक्ति के प्रति सचेत करना चाहिए।

प्रभावोत्पादकता (Efficacy)

मौखिक अभिव्यक्ति का प्रमुख उद्देश्य है, वक्ता द्वारा श्रोता या श्रोताओं तक अपने संदेश या सूचनाओं को प्रभावी ढंग से पहुँचाना या संप्रेषित करना। इस प्रभाव को उत्पन्न करने के लिए शुद्धता, अवसरानुकूलता, गतिशीलता, क्रमिकता आदि सभी का योगदान होता है। अत: प्रभावोत्पादकता एक ऐसा गुण है जिसमें मौखिक अभिव्यक्ति से सम्बन्धित सभी गुण विद्यमान रहते हैं।

मौखिक अभिव्यक्ति के विकास की विधियाँ (Methods of development of oral expression)

शैक्षिक स्तरों पर मौखिक अभिव्यक्ति को किस प्रकार से विकसित किया जा सकता है।
  1. सस्वरवाचन: शिक्षक सस्वरवाचन का “सुनना” कौशल के विकास के लिए प्रयोग करता है। मौखिक कौशल के विकास के लिए भी सस्वर वाचन-विधि विशिष्ट है। 
  2. प्रश्नोत्तर विधि: प्रश्नोत्तर विधि सुनना एवं बोलना दोनों को पूरा अवसर देती है। ये प्रश्न सुनाए गए, पढ़ाए गए विषय के अतिरिक्त शिक्षार्थियों के अनुभव से/जानकारी से जुड़े हुए भी हो सकते हैं। 
  3. चित्र वर्णन विधि: चित्र दिखाकर चित्र का वर्णन करना सिखाना, कहानी कहना, सिखाना आदि चित्र वर्णन विधि है।
  4. कहानी, कविता सुनाना व सुनना: इसमें कहानी सुनाता है और उन्हें सुनाने के लिए कहता है। इससे क्रमबोध, स्मरण क्षमता का विकास होता है। कविता/गीत गायन/ पाठ अभिनय से स्मरण योग्यता व आत्मविश्वास भी बढ़ाता है।
  5. अन्त्याक्षरी पद्धति: यह कवितादि याद कर, स्मरण को प्रयोग में ला सकने की क्षमता का परिचायक है।
  6. भाषण : भाषण मौखिक अभिव्यक्ति को विकसित करने का एक अत्यंत उपयुक्त साधन है। अपनी रूचि और ज्ञान के आधार पर उपयुक्त शीर्षक देकर भाषण करने के अवसर प्रदान किए जा सकते हैं। भाषण देने की कला के समुचित विकास के लिए उन्हें प्रमुख विचारों को यथाक्रम संजोने की विधि, श्रोताओं के अनुसार विषय सामग्री, उचित हाव-भाव प्रदर्शन, वाणी में आवश्यकतानुसार उतार-चढ़ाव, उपलब्ध समय का उचित ध्यान रखने जैसी भाषण-कला सम्बन्धी अपेक्षाओं से अवगत कराना चाहिए।
  7. वाद-विवाद : मौखिक अभिव्यक्ति को विकसित करते समय तर्कशक्ति, प्रत्युत्पन्न-मति, हास्य-व्यंग्य युक्त तथा अपने विचारों को प्रभावी ढंग से संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने जैसे गुणों का विकास होता है। बालक-बालिकाएँ तो स्वयं ही ऐसे अवसर पर बोलने के लिए लालायित रहते हैं। 
  8. परिसंवाद तथा विचार-विमर्श : सामूहिक विचार-विमर्श अथवा परिसंवाद आयोजित करके भी शिक्षार्थियों की मौखिक अभिव्यक्ति का विकास कर सकते हैं। 
  9. अभिनय : मौखिक अभिव्यक्ति कौशल विकास के लिए भावानुकूल वाणी, उचित हाव-भाव, आंगिक अभिनय एवं वाणी में प्रभावोत्पादकता उत्पन्न करने के लिए  “रंगमंचीय अभिनय” का आयोजन किया जा सकता है। 
  10. काव्य पाठ : कविता कंठस्थ करने और उसे सुनाने में गर्व एवं प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। वे कंठस्थ की गई कविताओं को सुनाते समय हाव-भाव का प्रदर्शन भी करते हैं। उचित हाव-भाव के साथ कविताएँ सुनाने की यह प्रवृत्ति उनकी मौखिक अभिव्यक्ति को विकसित करने का सबल माध्यम हो सकती है। अत: 
  11. इलैक्ट्रॉनिक साधनों पर बोलने का अभ्यास : शिक्षा के प्रभावी माध्यम के रूप में श्रव्य, दृश्य साधनों का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। आज दूरस्थ शिक्षा ज्ञानार्जन हेतु प्रभावी विकल्प के रूप में उभर कर आई है। मौखिक अभिव्यक्ति के सबल विकास के लिए उन्हें टेपरिकार्डर, वीडियो टेप तथा ध्वनि विस्तारक जैसे इलैक्ट्रॉनिक यंत्रों पर प्रभावी ढंग से बोलने के लिए उत्प्रेरित करें। 

मौखिक अभिव्यक्ति संबंधी त्रुटियां एवं उनका निराकरण (Oral expression errors and address them)

वार्तालाप, भाषण एवं विचार-विमर्श में स्पष्टता, सरलता एवं प्रभावोत्पादकता जैसे गुणों का अभाव ही मौखिक अभिव्यक्ति को दोषपूर्ण बनाता है। इस आधार पर मौखिक अभिव्यक्ति में प्राय: निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं:
अधिक या न्यून गति किसी वाक्य या वाक्य खण्ड को अधिक गति अर्थात् शीघ्रता से या न्यून गति अर्थात् धीरे- धीरे बोलना।

प्रवाह एवं ओजस्विता की कमी (Lack of flow and vigor)

कभी-कभी वीर रस युक्त काव्य पाठ सम्बन्धी मौखिक अभिव्यक्ति प्रवाह एवं ओजस्विता विहीन बन जाता है। वक्ता के स्वर में अपेक्षित ओज और वाणी में प्रवाह न होने के कारण मौखिक अभिव्यक्ति भाव एवं रसहीन हो जाती है। उदाहरणत: वीर रस की कविता का ओजस्विता विहीन होने से पाठ निर्जीव हो जाता है।

आरोह-अवरोह की अनिश्चितता (Uncertainty of ascent )

मौखिक अभिव्यक्ति में भावानुसार स्वर में उचित आरोह-अवरोह का प्रयोग न करना अथवा वाणी के उतार-चढ़ाव में निश्चितता का न होना मौखिक अभिव्यक्ति का बहुत ही गंभीर दोष है। कभी-कभी कविता वाचक अनावश्यक रूप से आरोह-अवरोह का उपयोग करता है, या नहीं करता है अथवा कहीं-कहीं करता है। इससे भावाभिव्यक्ति में बाधा उत्पन्न होती है।

मनोवैज्ञानिक दोष (Psychological defect)

शिक्षार्थियों में अनावश्यक संकोच, भ्रम, झिझक, क्रोध एवं हीनता आदि के भाव उत्पन्न होने के कारण मौखिक अभिव्यक्ति में स्वाभाविक रूप से दोष आ जाते हैं। परिणामत: मौखिक अभिव्यक्ति में हकलाना, तुतलाना, हड़बड़ाना आदि दोष दिखाई देने लगते हैं।

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