अधिगम का अर्थ, परिभाषा, स्वरूप, आयाम, विधियाँ

अधिगम का अर्थ (adhigam ka arth)अधिगम, अनुभवों, अभ्यास एवं प्रयासों के द्वारा व्यवहार में परिवर्तन की प्रक्रिया है। जैसे कि एक मानव शिशु जन्म लेते ही माँ का दूध पीना सीख लेता है। इन क्षमताओं को सहज व्यवहार कहा जाता है। जैसे- जैसे एक व्यक्ति बड़ा होता जाता अधिगम की समझ है वैसे-वैसे उसे जीवन की विविध परिस्थितियों के साथ कुछ समायोजन करना पड़ता है। इसलिए, उसे विभिन्न आदतों, ज्ञान, अभिवृत्ति, तथा कौशलों आदि को अर्जित करना पड़ता है। इन सभी चीजों की प्राप्ति को अधिगम कहते हैं। इसका आशय है कि: 
  1. अधिगम जन्मजात नहीं होती है बल्कि यह आनुवंशिक संसाधनों का उपयोग कर दक्षता अर्जित करने की एक प्रक्रिया है। 
  2. व्यवहार में अस्थायी परिवर्तन अधिगम नहीं है। 
  3. अधिगम में, व्यवहार में आए सकारात्मक परिवर्तन ही सिर्फ नहीं शामिल होते हैं बल्कि व्यवहार में आए नकारात्मक परिवर्तन भी शामिल होते हैं। दूसरे शब्दों में, अधिगम व्यवहार में परिवर्तन लाता है लेकिन इसका आशय यह कदापि नहीं है कि यह परिवर्तन हमेशा सकारात्मक ही होगा। 

अधिगम की परिभाषा 

अधिगम की परिभाषा (adhigam ki paribhasha) विभिन्न मनोवैज्ञानिकों एवं शिक्षाशास्त्रियों द्वारा दी गई अधिगम की कुछ परिभाषा हैं: 
  1. हरलॉक (1942): अधिगम विकास है जो अभ्यास एवं प्रयास के द्वारा आती है। अधिगम के द्वारा बालक अपने आनुवांशिक संसाधनों का प्रयोग करने में सक्षम हो जाते हैं। 
  2. हिलगार्डर्,, एटकिंसंसंसन एवं एटकिंसंसंसन (1979): अधिगम को पूर्व अनुभवों के परिणाम स्वरुप व्यवहार में आए अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन के रुप में परिभाषित किया जाता है। 
  3. मर्फी (1968): अधिगम में वातावरणीय आवश्यकताओं की पूर्ति करनेवाले सभी व्यवहारगत परिवर्तन शामिल होते हैं। 
  4. वुडवर्थर्(1945): एक क्रिया को अधिगम को जा सकता है यदि वह व्यक्ति का विकास(अच्छा या बुरा) करता है और,उसके व्यवहार एवं अनुभवों को पूर्व की तुलना में परिवर्तित करता है। 

अधिगम का स्वरूप

अधिगम का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। यह हमारे व्यवहार एवं व्यक्तित्व को एक दिशा प्रदान करता है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अनुभव व्यक्ति के व्यवहार को प्रारंभ से ही आकार देने में महत्वपूर्ण एवं प्रभावकारी भूमिका निभाते हैं । जब एक बालक एक गर्म पैन को छूता है और जलता है तो वह तुरंत अपने हाथ को वहाँ से हटा लेता है और यह सीखता है कि ऐसे बर्तनों को सावधानी से छूना चाहिए । वह यह निष्कर्ष निकालता है कि यदि कोई व्यक्ति एक गर्म बर्तन छूता है तो वह जलता है। अपने जीवन में होनेवाले दिन-प्रतिदिन होनेवाले ऐसे ही अन्य कई अनुभवों से वह कई निष्कर्ष निकालता है और अपने व्यवहार में संशोधन करता है। अनुभवों के द्वारा व्यवहार में आए ये परिवर्तन सामान्यत:अधिगम के रुप में जाने जाते हैं और अनुभवों को प्राप्त करने, उनसे निष्कर्ष निकालने और व्यवहार में परिवर्तन की यह प्रक्रिया जन्म से लेकर मृत्यु तक चलती है। 

अधिगम के आयाम (Learning dimensions)

अधिगम के आयाम (adhigam ke aayam) फल अधिगम के लिए अधिगम के पाँच आयाम आवश्यक हैं। अधिगम के पाँच आयाम हैं: 
  1. अभिवृत्ति एवं प्रत्यक्षीकरण - अभिवृत्ति एवं प्रत्यक्षीकरण कक्षाकक्षएवं अधिगम के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति एवं प्रत्यक्षीकरण का विकास करने में शिक्षार्थियों की सहायता करना प्रभावी शिक्षण का एक मुख्य तत्व है क्योंकि ये शिक्षार्थियों के सीखने की योग्यता को प्रभावित करते हैं।
  2. ज्ञान की प्राप्ति एवं उसका एकीकरण - ज्ञान की प्राप्ति एवं एकीकरण पूर्व ज्ञान को एकीकृत करते हुए नया ज्ञान प्रदान करना अधिगम को प्रभावित करता है।
  3. ज्ञान का विस्तार एवं सुधार - ज्ञान का विस्तार एवं सुधार अधिगम ज्ञान की प्राप्ति एवं उसके एकीकरण के साथ बंद नहीं हो जाता है। 
  4. ज्ञान का सार्थक प्रयोग तथा - ज्ञान का सार्थक प्रयोग सर्वाधिक प्रभावी अधिगम तब सम्पन्न होता है जब हम अपने ज्ञान का प्रयोग अर्थपूर्ण कायोर्ं के संपादन में करते हैं। इसलिए यह सुनिश्चित करना कि शिक्षार्थियों के पास ज्ञान के सार्थक प्रयोग के पर्याप्त अवसर हैं शिक्षण गतिविधि के नियोजन का एक महत्वपूर्ण तत्व हैं
  5.  मस्तिष्क की आदतें- मस्तिष्क की आदतें एक मस्तिष्क की सशक्त आदतों, जो कि उन्हें आलोचनात्मक चिंतन करने, सृजनात्मक रुप से कार्य करने में सक्षम बनाती है तथा उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है, का विकास कर प्रभावी बन सकती है।  

अधिगम की विधियाँ (Methods of learning)

जन्म के बाद से ही हम कई कौशल जैसे कि खिलौनों तक पहुँचना एवं उन्हें पकड़ना, खड़े होना एवं बिना लड़खड़ाए तथा बिना किसी की सहायता के कदम आगे बढ़ना, बोलना आदि सीखते हैं । कालांतर में हम अधिक जटिल कौशलों को सीखते हैं और विविध प्रकार की समस्याओं का समाधान करने की योग्यता अर्जित करते हैं। इस प्रकार अधिगम के सरल रुप से अधिगम के जटिल रुप यथा, समस्या समाधान, में परिवर्तन धीमी गति से होता है। सभी प्रकार के अधिगम को अर्जित करने के लिए कोई एक रास्ता नहीं है। यहाँ हमने अधिगम की तीन महत्वपूर्ण विधियों का वर्णन किया है। कैसे प्रत्येक विधि कार्य करती है, इसे समझकर आप अपने शिक्षण को अधिक प्रभावी ढंग से विकसित करने के योग्य हो जाएंगे। अधिगम की विधियाँ (adhigam ki vidhiyan) इस प्रकार है -
  1. अवलोकन के द्वारा 
  2. अनुकरण के द्वारा 
  3. प्रयत्न एवं भूल द्वारा 
  4. अंतर्दृष्टि द्वारा 
1. अवलोकन के द्वारा (By observation) - अधिगम सभी प्रकार के अधिगम के लिए अवलोकन एक मौलिक आवश्यकता है। अवलोकन से यहाँ हमारा आशय सिर्फ चीजों को देखने भर से नहीं है। यहाँ अवलोकन से हमारा तात्पर्य उद्दीपकों के प्रत्यक्षण से है। इसलिए , अवलोकन की प्रक्रिया में हम सिर्फ अपने आँखों की ही सहायता नहीं लेते हैं बल्कि हम अपने सारे ज्ञानेंद्रियों को इस प्रक्रिया में शामिल करते हैं। किसी उद्दीपक की उपस्थिति प्रत्यक्षीकृत करने, देखने, सुनने, सुगंध की अनुभूति करने, स्वाद लेने, एवं स्पर्श करने की हमारी योग्यता के द्वारा अभिलेखित की जा सकती है। 

2. अनुकरण के द्वारा (By imitation)-अधिगम सजीव प्राणी अवलोकन द्वारा बहुत अधिक सीख सकते हैं लेकिन उन्हें अपने निष्पादन एवं अधिगम को पूर्ण करने के लिए दूसरों का अनुकरण भी करना चाहिए। अवलोकन की भँति ही अनुकरण भी बालक की एक आंतरिक प्रवृत्ति है। अनुकरण दूसरों की अवलोकित अधिगम की समझ क्रियाओं का पुन: अभ्यास करना है। प्रारंभ में बालक अपनी गति, क्रिया एवं शारीरिक स्थिति अनुकरण के द्वारा सीखता है। बालक में अनुकरण करने की क्षमता बहुत स्पष्ट होती है और आप अवश्य पाएंगे कि उन्हें अनुकरण करने में आनंद की प्राप्ति होती है। जैसे-जैसे वो बड़े होते हैं वो चलचित्रों, तथा दक्ष निष्पादनों का अनुकरण कर अनेक खेल-कूद संबंधी, औद्योगिक एवं व्यावसायिक कौशल सीख लेते हैं। अधिगम में प्रतिरुपरण (मॉडलिंग) का भी महत्वपूर्ण स्थान है।  

3. प्रयत्न एवं भूल द्वारा (By trial and error)-अधिगम अनेक परिस्थितियों में हम प्रयत्न एवं भूल द्वारा सीखते हैं। यहाँ हम किसी कार्य को करने के लिए कई बार प्रयास करते हैं। 

4. अंतर्दृष्टि द्वारा (By insight) - अधिगम मनुष्यों में अधिगम सिर्फ अनुकरण एवं अवलोकन के द्वारा हीं सम्पन्न नहीं होता है बल्कि वे अपने दैनिक जीवन में आनेवाली समस्याओं के समाधान द्वारा भी सीखते हैं। समस्या का समाधान करते समय यदि एक व्यक्ति अचानक ही समाधान पा जाता है तो हम कहते हैं कि वो अंतर्दृष्टि द्वारा सीखा है। वास्तव में व्यक्ति समस्यात्मक स्थिति के विभिन्न पक्षों में संबंध को समझ कर समाधान प्राप्त करता है। अपने दैनिक जीवन में हम अधिगम की विधि को ‘बिंदु को देखकर’ या ‘विचार को प्राप्त कर’ पद का प्रयोग कर अभिव्यक्त करते हैं। अंतर्दृष्टि द्वारा अधिगम का प्रतिपादन गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित किया गया। 

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