खिलाफत आंदोलन की शुरुआत कब हुई?

अनुक्रम
भारत में खिलाफत आंदोलन भारतीय मुसलमानों की उस भावना से जुड़कर पैदा हुआ जिसके तहत वे तुर्की में खलीफा की सत्ता को बचाना चाहते थे। इस्लामिक परंपरा में खलीफ़ा को प्रोफेट मुहम्मद का उत्तराधिकारी माना जाता था। वह इस्लाम के अनुयायियों का कमांडर तथा पवित्र स्थानों का संरक्षक और रक्षक माना जाता था। 

19वीं शताब्दी में ओटोमन साम्राज्य एकमात्र इस्लामिक साम्राज्य था और इस प्रकार तुर्की के सुल्तान को भारतीय मुसलमानों द्वारा अत्यंत आदर के साथ खलीफ़ा के रूप में माना जाता था। जब प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार हुई और यह निश्चित हो गया कि विजेता मित्र राष्ट्र उसपर कठोर प्रतिबंध लगाएंगे तो भारत में मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन की शुरुआत की‘ ताकि ब्रिटिश सरकार पर यह दबाव बनाया जा सके कि वह ओटोमन साम्राज्य औरखलीफा की सत्ता के प्रति नरम रुख अपनाये और उनकी क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखे। 

खिलाफत आंदोलन की वैचारिक उत्पत्ति की व्याख्या दो प्रकार से की गयी है। एक तरफअध्येताओं ने इसमें संपूर्ण विश्व की अखिल इस्लामी भावनाओं। आंदोलनों और उनके गैर-भारतीय तथा बाह्य चरित्र को स्थित किया है। दूसरी तरफ कुछ इतिहासकारों ने इसकी आगत प्रकृति तथा अखिल इस्लामिक प्रतीकों के प्रयोग द्वारा एक अखिल भारतीय मुस्लिम पहचान को निर्मित करने के इसके प्रयासों तथा भारतीय राष्ट्रवाद से इसके जुड़ावपर जोर दिया है। वास्तव में ये दोनों धाराएँ परस्पर विरोधी नहीं थे।

खिलाफत को भारतीय मुस्लिम नेतृत्व द्वारा एक ऐसे प्रयास के रूप में देखा जा सकता हैजिसके तहत उन्होंने अपनी अखिल इस्लामिक तथा भारतीय राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों को साथलाने की कोशिश की। यही वह संश्लेषण था जिसने 1919 और इसके पश्चात व्यापक जनलामबंदी को सक्षम बनाया।

भारतीय मुसलमानों की एकता की इस तलाश ने खलीफ़ा की सत्ता और तुर्की के सुल्तानमें एक धार्मिक केंद्र को पाया। 19वीं शताब्दी से भारतीय सुन्नी मुसलमानों में तुर्की केसुल्तान की एक खलीफ़ा के रूप में व्यापक स्वीकृति थी जो उनके अनुसार मुसलमानों केपवित्र स्थानों की रक्षा कर सकता था। इस प्रकार भारतीय मुसलमानों के बीच तब-तबअखिल इस्लामिक भावनाओं की लहर उठी जब-जब तुर्की युद्ध में शामिल रहा। उदाहरणके लिए 1877-78 के दौरान रूसो-तुर्की युद्ध तथा 1897 में ग्रीको-टर्कीश युद्ध।

1911-13 के दौरान बाल्कन युद्धों की श्रृंखला ने मुस्लिम नेताओं के मन में यह भय पैदाकर दिया कि क्रिश्चियन शक्तियाँ ओटोमन साम्राज्य और खलीफ़ा को कुचलने की कोशिशकर रही हैं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और पश्चात् ये भावनाएं फिर सामने आर्इं। तुर्कीजर्मनी और ऑस्ट्रिया के साथ धुरी शक्तियों का एक भाग था जो ब्रिटिश और उसकेसहयोगियों के विरुद्ध लड़ा। युद्ध में अपनी विजय के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने खलीफ़ाको तुर्की की सत्ता से हटा दिया। उस समय यह चर्चा भी थी कि तुर्की पर कठोर शांतिसंधि आरोपित की जाएगी जो उसे उसके अधिकार क्षेत्रों और प्रभाव से विरहित कर देगी।

इन परिस्थितियों में भारतीय मुसलमानों के मध्य एक विस्तृत आंदोलन विकसित हुआजिसने मांग रखी कि खलीफा का अधिकार मुस्लिम पवित्र स्थलों पर रहने दिया जाए औरउसे उतना पर्याप्त क्षेत्र मुहैया कराया जाए जिससे कि वह पवित्र स्थलों की सुरक्षा हेतुसक्षम रह सके। यह आंदोलन खिलाफत आंदोलन के नाम से जाना गया और यह तेजी सेअभिजात्य वर्ग के साथ-साथ शहरी लोकप्रिय वर्गों तथा उलेमा अथवा मुस्लिम धार्मिक अध्येताओं के बीच फैला। ब्रिटिश सरकार को शत्रु घोषित कर दिया गया, खिलाफत का कोष पैसे और गहनों से भर गया। खिलाफत की जनसभाओं में हजारों लोग शामिल हुए और सीमावर्ती क्षेत्रों से हजारों लोग शत्रु की जमीन (दार-अल-हर्ब) से इस्लाम की जमीन(दार-अल-इस्लाम) में चले गए।

इस आंदोलन ने अपने नेतृत्व को दो धाराओं से प्राप्त किया, ये दोनों औपनिवेशिक शासनके दौरान जागृति हेतु मुसलमानों के लिए शैक्षिक सुधारों में शामिल थीं। एक था अलीगढ़ आधारित पश्चिमी रंग-ढंग का बुद्धिजीवी वर्ग जिसने अंग्रेजी शिक्षा की वकालत की तथासरकारी सेवाओं में रोजगार के लिए दबाव बनाया। दूसरा था उलेमाओं का वर्ग उन्होंनेमदरसों पर आधारित पारंपरिक इस्लामिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश कीतथा अंग्रेजी शिक्षा एवं पाश्चात्य आचार-व्यवहार का विरोध किया। दो प्रकार के नेतृत्व की उपस्थिति ने आंदोलन में विविधता निर्मित की जहाँ पाश्चात्य शिक्षित नेतृत्व ने संयम परज़ोर दिया, वहीं उलेमाओं ने आंदोलन को कट्टरपंथी स्वरूप दिया। तथापि, ये दोनों धाराएँउस समय ब्रिटिश विरोधी और अखिल इस्लामिक कार्यों पर अपने रुख में समान थी।

आंदोलन को ठीक प्रकार से आयोजित करने के लिए नेतृत्व ने दो अखिल भारतीय निकायों का गठन किया - ऑल इंडिया खिलाफत कमेटी और जमीयत अल-उलेमा-ए-हिंद। पूर्ववर्ती मुस्लिम राजनीतिक संगठन जैसे-मुस्लिम लीग पूरी तरह से 1920 के दशक केमध्य तक इन दो संस्थाओं द्वारा आच्छादित कर लिए गए। 1919 में खिलाफत की मांग केलिए मुस्लिम जनसमुदाय को लामबंद करने की प्रक्रिया सफलतापूर्वक शुरू हुई। तथापियह स्पष्ट था कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तकगैर-मुस्लिम भारतीयों को एक विस्तृत साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष हेतु लामबंद न किया जाए। उस समय एक राष्ट्रवादी संगठन के रूप में कांग्रेस तथा सर्वाधिक स्वीकृत नेता केरूप में महात्मा गांधी सबसे उचित विकल्प थे। गांधी खिलाफत आंदोलन के नेतृत्व के लिएतैयार थे परन्तु कांग्रेस अब भी एक अखिल भारतीय आंदोलन के लिए तैयार नहीं थी। तथापि अन्य कई परिस्थितियों ने कई साम्राज्यवाद विरोधी संगठनों का एक साथ एक मंचपर आना संभव बनाया।

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