बोनस भुगतान अधिनियम 1965 क्या है?

बोनस भुगतान अधिनियम 1965 क्या है (What is Payment of Bonus Act 1965) ? 

बोनस भुगतान अधिनियम 1965 का मुख्य उद्देश्य कुछ उद्योगों व संस्थानों में काम करने वाले व्यक्तियों के लिए बोनस के भुगतान की व्यवस्था कराना तथा उससे सम्बन्धित अन्य मामलों को सुलझाना है। यह अधिनियम पूरे देश में फैले हुए उन सब कारखानों और संस्थानों पर लागू होता है जिनमें लेखा-वर्ष की अवधि में किसी भी दिन 20 या उससे अधिक कर्मचारी काम करते है। अधिनियम, शिक्षार्थियों को छोड़कर काम पर लगे उन सभी कर्मचारियों पर लागू होता है जिनका मासिक वेतन या मजदूरी 1,600 रुपये तक है किन्तु 1985 में यह सीमा 1,600 रु0 से बढ़ाकर 2,500 रु0 प्रतिमाह कर दी गई थी। जिन संस्थानों तथा व्यक्तियों पर यह अधिनियम लागू नहीं होता, वे हैं भारतीय जीवन 160 बीमा निगम, नाविक गोदी कर्मचारी, केन्द्र व राज्य सरकारों तथा स्थानीय प्राधिकरणों के औद्योगिक संस्थान, भारतीय रेड क्रास सोसाइटी, समाज कल्याण संस्थायें (यदि ये लाभ हेतु स्थापित किए गए हैं), विश्वविद्यालय, शिक्षा संस्थायें, अस्पताल, इमारती कार्यो में ठेके के श्रमिक, भारतीय रिजर्व बैंक, औद्योगिक वित्त निगम तथा अन्य वित्तीय संस्थायें, भारतीय यूनिट ट्रस्ट, अन्तर्देषीय जल यातायात संस्थान जो अन्य किसी देश से गुजरने वाले मार्गो पर कार्य करते है।, सरकारी क्षेत्र के किसी भी संस्थान के कर्मचारी किन्तु सरकारी क्षेत्र के उन उद्यमों को छोड़कर जो विभाग द्वारा नहीं चलाये जाते तथा निजी क्षेत्र के संस्थानों से 20 प्रतिशत की सीमा तक स्पर्धा करते है। 

इसके अतिरिक्त, अधिनियम ऐसे कर्मचारियों पर भी लागू नहीं होगा जिन्होनें लाभ अथवा उत्पादन बोनस की अदायगी के लिए 29 मई 1965 से पूर्व अपने मालिकों से समझौता कर लिया है। अधिनियम में उल्लिखित बोनस सूत्र 1964 के उस विशेष दिन से लागू होगा जिस दिन से संस्था के हिसाब का वर्ष आरम्भ होता है। अधिनियम की मुख्य धारायें जिन बातों से सम्बन्धित हैं, वे हैं -

  1. बोनस के लिए पात्रता,
  2. न्यूनतम तथा अधिकतम बोनस की अदायगी, 
  3. बोनस के भुगतान के लिए समय की सीमा, 
  4. बोनस से कटौती, 
  5. कुल लाभों की तथा बोनस के रूप में वितरण योग्य उपलब्ध देशी की गणना आदि। 

जहाँ तक बोनस के लिये पात्रता का सम्बन्ध है, अधिनियम की परिधि में आने वाले किसी भी संस्थान का ऐसा कोई भी कर्मचारी, अधिनियम की धाराओं के अनुसार अपने मालिक से बोनस पाने का अधिकारी होता है जिसने किसी भी लेखा वर्ष में कम से कम 30 दिन काम किया हो। यदि किसी कर्मचारी को संस्थान में जालसाजों, हिंसक व्यवहार, चोरी, दुर्विनियोग या तोड़-फोड़ करने के कारण नौकरी से पृथक कर दिया गया हो तो उसे बोनस प्राप्ति के अयोग्य माना जायेगा। जबरी छुट्टी के दिनों, मजदूरी सहित छुट्टियों, मातृत्व कालीन छुट्टियों अथवा स्थायी व्यावसायिक चोट के कारण अनुपस्थिति के दिनों को कर्मचारी के काम करने के दिनों के रूप में ही माना जायेगा। 

नये स्थापित संस्थानों के कर्मचारी भी उस लेखा-वर्ष से बोनस पाने के अधिकारी होंगे जिस वर्ष कि उन्हें लाभ हो अथवा छठे लेखा वर्ष से जबकि वे अपना उत्पादित सामान बेचना आरम्भ करें, इनमें से जो भी पहले हो। जहाँ तक बोनस का न्यूनतम तथा अधिकतम मात्रा का सम्बन्ध है, अधिनियम में 1980 में संशोधन करके इस बात की व्यवस्था कर दी गई है कि प्रत्येक श्रमिक को स्थायी रूप से मजदूरी का 8.33 प्रतिशत या 100 रुपये (60 रु0 उन कर्मचारियों के लिये जिनकी आयु 15 वर्ष से कम है), जो भी अधिक हो न्यूनतम बोनस के रूप में मिलेगा। अधिकतम बोनस श्रमिक के वेतन या मजदूरी का 20 प्रतिशत होगा। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रारम्भ में न्यूनतम बोनस वेतन या मजदूरी के 4 प्रतिशत की दर से देय था परन्तु अनेक संशोधित अधिनियमों के माध्यम से यह सीमा बढ़ाकर 8 1/3 प्रतिशत या 80 रु0, (बाद में ये 80 रु0 बढ़ाकर 100 रु0 किये गये), जो भी अधिक हो, कर दी गई। 8 1/3 प्रतिशत अब न्यूनतम बोनस का स्थायी प्रतिशत बन गया है। 

अधिनियम के अनुसार बोनस पाने के अधिकारी वे कर्मचारी होते हैं जो 2,500 रु0 प्रतिमाह वेतन या मजदूरी प्राप्त करते हैं। किन्तु बोनस भुगतान की गणना उसी प्रकार की जायेगी जैसे उनका वेतन या मजदूरी 1,600 रु0 प्रतिमाह हो। इस उद्देश्य के लिये वेतन या मजदूरी से आशय महँगाई भत्ते सहित उस मूल मजदूरी से है जो कर्मचारियों को देय होती है परन्तु इसमें अन्य भत्ते तथा समयोपरि कार्य का भुगतान सम्मिलित नहीं होता। 

बोनस के भुगतान की समय सीमा के सम्बन्ध में अधिनियम में कहा गया है कि कर्मचारी को बोनस के रूप में देय सभी धनराशियां सामान्यत: लेखा वर्ष की समाप्ति के आठ माह के अन्दर दे दी जायेगी। बोनस के सम्बन्ध में यदि विवाद हो तो बोनस का भुगतान विवाद के निपटारे या पंचाट की घोषणा की तिथि से एक माह के अन्दर कर दिया जायेगा। परन्तु सरकार उचित एवं वैध कारणों के आधार पर मालिक द्वारा बोनस के भुगतान की अवधि को दो वर्ष तक बढ़ा सकती है। 

जहाँ तक बोनस से कटौतियां करने का सम्बन्ध है, मालिक को अधिकार है कि वह किसी कर्मचारी के गलत आचरण के कारण हुई वित्तीय हानि की धनराशि को उसी लेखा वर्ष में कर्मचारी के बोनस में से काट ले। अधिनियम मालिक को यह अनुमति भी प्रदान करता है कि वह पहले ही अदा कर दिये गये रिवाजी या अन्तरिम बोनस का समायोजन अधिनियम के अनुसार दिये जाने वाले बोनस में कर सके। 

कुल लाभ की गणना तथा बोनस के रूप में देय उपलब्ध अधिभार के सम्बन्ध में अधिनियम की धाराओं में उस विधि का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार कुल लाभ की गणना, उपलब्ध अधिभार का निर्धारण तथा ऐसी अधिभार की शुद्ध गणना हेतु पूर्व खर्चो का निर्धारण किया जायेगा। पूर्व खर्चो में मूल्य ह्मस, प्रत्यक्ष कर, विकास निधि, पूंजी पर प्रतिफल और कार्य करने वाले साझेदारों तथा प्रोप्राइटरों का पारिश्रमिक, सम्मिलित है। अधिनियम की इन धाराओं में समय-समय पर संशोधन किया जाता रहा है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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