जॉन लॉक का सामाजिक समझौता सिद्धांत

जॉन लॉक का सामाजिक समझौता सिद्धांत (John Locke's Social Agreement Theory)

लॉज के राजनीतिक चिन्तन का सर्वाधिक प्रमुख भाग सामाजिक समझौता सिद्धान्त है जिसके द्वारा लॉक ने इंगलैण्ड में हुई 1688 की गौरवपूर्ण क्रान्ति के औचित्य को ठीक ठहराया है। सामाजिक समझौता सिद्धान्त सबसे पहले हॉब्स ने प्रतिपादित किया, परन्तु लॉक ने उसे उदारवादी आधार प्रदान करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। लॉक भी हॉब्स के इस विचार से सहमत था कि राज्य की उत्पत्ति समझौते का परिणाम है, दैवी इच्छा की नहीं। लॉक के इस सिद्धान्त का विवरण उसकी प्रमुख पुस्तक ‘शासन पर दो निबन्ध’ में मिलता है। लॉक ने इसमें लिखा है कि “परमात्मा ने मनुष्य को एक ऐसा प्राणी बनाया कि उसके अपने निर्णय में ही मनुष्य को अकेला रखना उचित नहीं था। अत: उसने इसे सामाजिक बनाने के लिए आवश्यकता, स्वेच्छा और सुविधा के मजबूत बन्धनों में आबद्ध कर दिया तथा समाज में रहने और उसका उपभोग करने के लिए इसे भाषा प्रदान की।”

जॉन लॉक के अनुसार मनुष्य एक सामाजिक, शान्तिप्रिय प्राणी है। प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य समान और स्वतन्त्रता का जीवन व्यतीत करता था। मनुष्य स्वभाव से स्वाथ्र्ाी नहीं था और एक शान्त और सम्पन्न जीवन जीना चाहता था। अत: प्राकृतिक अवस्था शान्ति, सम्पन्नता, सहयोग, समानता तथा स्वतन्त्रता की अवस्था थी। प्राकृतिक अवस्था में पूर्ण रूप से भ्रातृत्व और न्याय की भावना का साम्राज्य था। प्राकृतिक अवस्था को शासित करने के लिए प्राकृतिक कानून था। प्राकृतिक कानून पर शान्ति एवं व्यवस्था आधारित होती थी जिसे मनुष्य अपने विवेक द्वारा समझने में समर्थ था। प्राकृतिक अवस्था में प्रत्येक मनुष्य को ऐसे अधिकार प्राप्त थे जिसे कोई वंचित नहीं कर सकता था। लॉक ने इन तीनों अधिकारों को मानवीय विवेक का परिणाम कहा है। ये तीन अधिकार - जीवन, स्वतन्त्रता तथा सम्पत्ति के अधिकार हैं। लॉक ने कहा कि प्राकृतिक अवस्था की कुछ कमियाँ थीं, इसलिए उन कमियों को दूर करने के लिए समझौता किया गया।
  1. प्राकृतिक अवस्था में नियम स्पष्टता का अभाव था। उसमें कोई ऐसी निश्चित, प्रकट एवं सर्वसम्मत विधि नहीं थी, जिसके द्वारा उचित-अनुचित का निर्णय हो सके। इस अवस्था में लिखित कानून के अभाव में सदैव कानून की गलत व्याख्या की जाती थी। प्राकृतिक कानून का शक्तिशाली व्यक्ति अपने विवेक के आधार पर स्वार्थ-सिद्धि के लिए प्रयोग करते थे।
  2. इस अवस्था में निष्पक्ष एवं स्वतन्त्र न्यायधीशों का अभाव था। इस अवस्था में न्याय का स्वरूप पक्षपातपूर्ण था। पक्षपातपूर्ण ढंग से न्याय किया जाता था। कोई तीसरा पक्ष निष्पक्ष नहीं था। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं न्यायधीश था।
  3. इस अवस्था में न्याययुक्त निर्णय लागू करने के लिए कार्यपालिका का अभाव था। इसलिए निर्णयों का उपयुक्त क्रियान्वयन नहीं हो पाता था। अत: प्राकृतिक अवस्था में पाई जाने वाली असुविधाओं और कठिनाइयों से बचने के लिए मनुष्यों ने एक समझौता किया।
लॉक के अनुसार समझौते का स्वरूप सामाजिक है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति ने सम्पूर्ण समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सर्वसम्मति से यह समझौता किया। लॉक का सामाजिक समझौता दो बार हुआ है। पहले समझौते द्वारा मनुष्य ने राजनीतिक व नागरिक समाज की स्थापना की। इससे मानव ने अपनी प्राकृतिक अवस्था का अन्त किया। इस प्रकार मनुष्य ने इस समझौते द्वारा जीवन, स्वतन्त्रता तथा सम्पत्ति के अपने प्राकृतिक अधिकारों तथा कानून को मानव ने सदैव के लिए सुरक्षित कर दिया। दूसरे समझौते द्वारा जनसहमति से शासन को नियुक्त किया जाता है। शासक, नागरिक समाज के अभिकर्ता के रूप में जीवन स्वतन्त्रता तथा सम्पत्ति के प्राकृतिक अधिकारों के अन्तर्गत ही कानून की व्याख्या एवं उसे लागू करता है। शासक, नागरिक समाज के एक ट्रस्टी के रूप में अपने कर्त्तव्यों का पालन करता है। लॉक कहता है कि सामाजिक समझौते की प्रक्रिया के अन्त में राजनीतिक समाज है, जिसका निर्माण इस प्रकार हुआ है- “प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक के साथ संगठन तथा समुदाय के निर्माण हेतु सहझौता करता है। जिस उद्देश्य के लिए समझौता किया जाता है वह सामान्यत: सम्पत्ति की सुरक्षा है जिसका अर्थ जीवन, स्वाधीनता तथा सम्पत्ति की आन्तरिक तथा बाहरी खतरों से सुरक्षा है।

इस समझौते के अनुसार मनुष्य अपने सारे अधिकार नहीं छोड़ता लेकिन प्राकृतिक केवल अपनी असुविधाओं को दूर करने के लिए प्राकृतिक कानून की व्याख्या और क्रियान्वयन के अधिकार को छोड़ता है। लेकिन यह अधिकार किसी एक व्यक्ति या समूह को न मिलकर सारे समुदाय को मिलता है। यह समझौता निरंकुश राज्य की उत्पत्ति नहीं करता। इससे राजनीतिक समाज को केवल वे ही अधिकार मिले हैं जो व्यक्ति ने उसे स्वेच्छा से दिए हैं। वह व्यक्ति के उन अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता जो उसे नहीं दिए गए हैं। लॉक के इस समझौते के अनुसार दो समझौते हुए। पहला समझौता जनता के बीच तथा दूसरा जनता व शासक के बीच हुआ। सम्प्रभु पहले में शामिल नहीं था। इसलिए वह व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। राजनीतिक समाज की स्थापना हेतु किया गया दूसरा समझौता सीमित व उत्तरदायी सरकार की स्थापना करता है। इस समझौते की प्रमुख विशेषताएँ हैं :-
  1. लॉक के अनुसार दो बार समझौता हुआ। प्रथम समझौते द्वारा नागरिक समाज की स्थापना होती है तथा दूसरे समझौते द्वारा राजनीतिक समाज की स्थापना होती है।
  2. यह समझौता सभी व्यक्तियों की स्वीकृति पर आधारित होता है। सहमति मौन भी हो सकती है, परन्तु सहमति अति आवश्यक है क्योंकि राज्य का स्रोत जन-इच्छा है।
  3. यह समझौता अखंड्य ;प्ततमअवबंइसमद्ध है। एक बार समझौता हो जाने पर इसे भंग नहीं किया जा सकता। इसको तोड़ने का मतलब है - प्राकृतिक अवस्था में वापिस लौटना।
  4. इस समझौते के अनुसार प्रत्येक पीढ़ी इसको मानने को बाध्य है। भावी पीढ़ी समझौते पर मौन स्वीकृति देती है। यदि वे अपनी जन्मभूमि त्यागते हैं तो वे उत्तराधिकार के लाभों से वंचित रह जाते हैं।
  5. इस समझौते द्वारा व्यक्ति अपने कुछ प्राकृतिक अधिकारों का परित्याग करता है, सभी प्राकृतिक अधिकारों का नही। वह अपना अधिकार समस्त जनसमूह को सौंपता है। यह समझौता जीवन स्वतन्त्रता तथा सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए किया जाता है। अत: यह सीमित समझौता है।
  6. इस समझौते से नागरिक समुदाय का जन्म होता है, सरकार का नहीं। सरकार का निर्माण तो एक ट्रस्ट द्वारा होता है। इसलिए सरकार तो बदली जा सकती है, लेकिन इस समझौते को भंग नहीं किया जा सकता।
  7. लॉक के अनुसार प्रकृति के कानून की व्याख्या करने तथा उसे लागू करने वाला शासक स्वयं भी उससे बाधित है। जिन शर्तों के आधार पर शासक को नियुक्त किया जाता है, शासक को उसका पालन करना है। अत: शासक सर्वोच्च सत्ता सम्पन्न नहीं है।
  8. लॉक के सामाजिक समझौते के अन्तर्गत शासक को जीवन, स्वतन्त्रता तथा सम्पत्ति के प्राकृतिक अधिकारों का सम्मान करना पड़ता है। अत: प्राकृतिक अवस्था के अन्त होने के बाद भी सामाजिक समझौते में मनुष्य के प्राकृतिक अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
  9. नागरिक समाज सामाजिक समझौते द्वारा शासन के दो अंगों विधानसभा तथा कार्यपालिका की स्थापना करता है। विधानसभा का कार्य कानून निर्माण करना है, जिनके आधार पर न्यायधीश निष्पक्ष न्यायिक निर्णय करते हैं। कार्यपालिका विधानसभा के कानूनों और न्यायधीशों के न्यायिक निर्णयों को लागू करती है। अत: सामाजिक समझौता सिद्धान्त सीमित रूप से शक्ति पृथक्करण सिद्धान्त को स्वीकार करता है।
  10. लॉक ने व्यक्तिवादी राज्य-व्यवस्था की स्थापना की है और उसे व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा करने वाला साधन कहा है।
  11. यह समझौता प्राकृतिक कानून का अन्त नहीं करता। इससे प्राकृतिक कानून के महत्त्व में वृद्धि होती है। लॉक ने कहा है- “प्राकृतिक कानून के दायित्वों का समाज में अन्त नहीं होता।”
  12. यह समझौता हॉब्स के समझौते की तरह दासता का बन्धन नहीं है। अपितु स्वतन्त्रता का एक अधिकार पत्र है। इससे व्यक्ति कुछ खाते नहीं हैं। उन्हें अधिकारों को लागू करने में जो कठिनाइयाँ आती हैं, उनका अन्त करने को प्रयत्न समझौते द्वारा किया जाता है।

हॉब्स से तुलना (Compare with Hobbes)

हॉब्स और लॉक दोनों समझौतावादी विचारक हैं। (i) दोनों के अनुसार एक ही समझौता होता है। (ii) दोनों ने यह माना कि सरकार समझौता प्रक्रिया में शामिल नहीं होती। (iii) दोनों ने राज्य की उत्पत्ति के दैवीय अधिकार का विरोध किया है। (iv) दोनों के अनुसार समझौता व्यक्तियों में होता है। (v) दोनों सामाजिक समझौते में विश्वास करते हैं, सरकारे समझौते के सिद्धान्त में नहीं। उपर्युक्त बातों में समान होते होन पर भी दोनों के सिद्धान्त में कुछ अन्तर मौलिक हैं :-
  1. हॉब्स का समझौता कठोर आवश्यकता का प्रतिफल है, परन्तु लॉक का समझौता विवेक का परिणाम है।
  2. हॉब्स का समझौता सामान्य स्वभाव का है, लॉक का सीमित और विशिष्ट स्वभाव का है।
  3. हॉब्स के समझौते के अनुसार व्यक्ति अपना अधिकार किसी विशेष व्यक्ति या व्यक्ति समूह को सौंपते हैं, लॉक के अनुसार व्यक्ति समुदाय को अपना अधिकार देते हैं।
  4. हॉब्स के अनुसार व्यक्ति अपने सारे अधिकार राज्य को सौंपता है, परन्तु लॉक के अनुसार व्यक्ति अपने सीमित अधिकार राज्य को देता है।
  5. हॉब्स के समझौते के परिणामस्वरूप एक निरंकुश, सर्वशक्तिशाली, असीम एवं अमर्यादित सम्प्रभु का जन्म होता है, परन्तु लॉक के अनुसार एक सीमित, मर्यादित एवं उदार राज्य का जन्म होता है।
  6. हॉब्स का समझौता एक दार्शनिक विचार है, लॉक का ऐतिहासिक तथ्य भी।
  7. हॉब्स का सामाजिक समझौता प्राकृतिक अवस्था व प्राकृतिक कानून दोनों को समाप्त कर देता है, परन्तु लॉक का समझौता प्राकृतिक अवस्था का तो अन्त करता है, प्राकृतिक कानून का नहीं। लॉक के अनुसार मनुष्य प्राकृतिक अवस्था के समान राज्य में भी प्राकृतिक कानून का पालन करने को बाध्य है।
  8. हॉब्स का शासक कानून बनाता है, परन्तु लॉक का शासन कानून नहीं बनाता, सिर्फ कानून का पता लगाता है। हॉब्स के अनुसार राज्य के बाद कानून का जन्म होता है। लॉक के अनुसार कानून के बाद राज्य का जन्म होता है।
  9. लॉक का समझौता स्वतन्त्रता का प्रपत्र है, जबकि हॉब्स का समझौता दासता का पट्टा है।
  10. हॉब्स का समझौता प्राकृतिक अवस्था की अराजकता को दूर करने के लिए हुआ था, जबकि लॉक का समझौता प्राकृतिक अवस्था की तीनों कमियों को दूर करने के लिए हुआ था।
  11. हॉब्स के अनुसार एक समझौता हुआ जबकि लॉक के अनुसार दो प्रकार के समझौते हुए।

जॉन लॉक के सामाजिक समझौते की आलोचना (Criticism of John Locke's Social Agreement)

  1. अस्पष्टता और अनिश्चितता : लॉक के सामाजिक समझौते के बारे में आलोचक कहते हैं कि लॉक ने यह स्पष्ट नहीं किया कि सरकार का निर्माण कब और कैसे हुआ। लॉक के विचारों से यह प्रतीत होता है कि सामाजिक समझौते के द्वारा राज्य का निर्माण हुआ है, परन्तु उसकी व्याख्या से यह स्पष्ट नहीं होता कि सामाजिक समझौते से सरकार की भी स्थापना होती है या नहीं। अत: विचारकों में इस बात पर मतभेद है कि लॉक एक समझौते की बात करता है या दो की।
  2. अनैतिहासिक व काल्पनिक : लॉक ने सामाजिक समझौते द्वारा राज्य व शासन का जो विवरण दिया है, वह काल्पनिक है। उसके विवरण का ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं है। लॉक के मानव स्वभाव का चित्रण एक पक्षीय है। सत्य यह है कि मनुष्य कई सद्गुणों तथा दुर्गुणों का मिश्रण है। परन्तु लॉक केवल सद्गुणों का ही चित्रण करता है। लॉक के इस कथन में ऐतिहासिक प्रमाणों का अभाव है।
  3. लॉक ने राज्य और शासन में अन्तर करते हुए, व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका की स्थापना की है। किन्तु आलोचकों का मानना है कि प्राकृतिक अवस्था में मानव शासन से अपरिचित थे। अत: उनसे राजनीतिक परिपक्वता की उम्मीद नहीं की जा सकती। सामाजिक समझौते में लॉक ने जो मानव की राजनीतिक सूझ-बूझ दिखाई है, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती।
  4. सामाजिक समझौते का एक दोष यह भी है कि यह सिद्धान्त राज्य के पूर्व समझौते की कल्पना करता है परन्तु राज्य की स्थापना के बाद ही समझौते किये जा सकते हैं।
  5. विरोधाभास : लाकॅ का सामाजिक समझातै का सिद्धान्त एक तरफ तो  सवर्स म्मति की बात करता है तो दूसरी आरे बहुमत के शासन का समर्थन करता है। लॉक ने इस स्थिति की कल्पना नहीं की है कि बहुमत भी अत्याचारी हो सकता है और अपनी शक्ति का प्रयोग जनता के अधिकारों के हनन के लिए कर सकता है।
  6. लॉक समझौते का आधार सहमति को मानता है, परन्तु इतिहास में ऐसे कई राज्यों का उल्लेख मिलता है जो बल व शक्ति के आधार पर बने व नष्ट हुए।
  7. लॉक ने बार-बार मूल समझौता शब्द का प्रयोग किया है लेकिन कहीं भी इसका अर्थ स्पष्ट नहीं किया। लॉक इस बात को भी स्पष्ट नहीं कर पाए कि मौलिक समझौते के परिणामस्वरूप वास्तव में जो उत्पन्न होता है, वह स्वयं समाज ही है या केवल सरकार।
इस प्रकार लॉक के सामाजिक समझौते की कई आलोचनाएँ की गर्इं। अनेक विचारकों ने कहा कि लॉक में कुछ भी नया नहीं है। ऐसा कार्य तो पहले भी कई दार्शनिकों द्वारा सम्पन्न हो चुका है। परन्तु लॉक के समझौते की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने इसे सुनिश्चितता प्रदान की, उसका मुख्य लक्ष्य व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा को स्वीकार किया। बाद वाली पीढ़ियों ने उसके इस सिद्धान्त को बहुत पसन्द किया। उनके उदारवादी विचारों ने लॉक को मध्यवर्गीय क्रान्ति का सच्चा प्रवक्ता बना दिया था। उसके इस सिद्धान्त ने परवर्ती राजनीतिक चिन्तकों को प्रभावित किया। इस प्रकार लॉक एक महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावशाली हैं।

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