प्राकृतिक चिकित्सा के 10 सिद्धांत

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मनुष्य प्रकृति का एक हिस्सा है। उसका शरीर इन्हीं प्रकृति तत्व से बना है। प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत नितान्त मौलिक है इनके अनुसार प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने से रोग पैदा होते है तथा प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए पुन: निरोग हो सकते है। मनुष्य शरीर में स्वाभाविक रूप एक ऐसी प्रकृति प्रदत्त पायी जाती है जो सदैव भीतरी और बाहरी हानिकारक प्रभावों से मानव की रक्षा करती है जिसको नियमियता कहा जाता है और साधारण लोग जिसे जीवनी शक्ति के नाम से पुकारते है वही शक्ति सब प्रकार के रोगों के कारणों को स्वयंमेव दूर करती है। वह निरन्तर शरीर का पुननिर्माण करती रहती है और जो टूट फूट हो जाती है। उसकी मरमत का भी ध्यान रखती है साथ ही शरीर भीतर से अस्वाभाविक तत्व पैदा हो जाते है या बाहर से पहुँच जाते है उन्हें निकालने का भी प्रयत्न करती रहती है। 

रोग मनुष्य के लिए अस्वाभाविक अवस्था है जब वह प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन या विरूद्ध मार्ग पर चलने लगता है तो उसके शरीर में विजातीय द्रव्य की मात्रा बढ़ने लगती है जिसके परिणाम स्वरूप शरीर में तरह-तरह के विष उत्पन्न होने लगते है और वातावरण में पाए जाने वाले हानिकारक कीटाणुओं का भी उस पर आक्रमण होने लगता है इससे शरीर का पोषण और सफाई करने वाले यन्त्र निर्बल पड़ने लगते है। उनके कायोर्ं में त्रुटि होने लगती है और मनुष्य रोगी हो जाता है। 

शरीर के भीतर रोग निरोधक शक्ति भरी पड़ी है जिसके द्वारा शरीर में उत्पन्न हुए अथवा बाहर से प्रवेश पाकर पहुँचे हुए रोग कीटाणुओं का विनाश निरन्तर होता है। उदाहरण-यदि आँख में कोई विष कीटाणु जा पहुँचे तो निरन्तर आँसू निकलता है। इन आँसुओं में लाइसोजीम नामक पदार्थ रहता है जिसकी निरोध शक्ति अद्भुत है।

प्राकृतिक चिकित्सा की मान्यता है कि रोग एक है और उसका इलाज भी एक है अत: कोई भी आसाह्य से असाह्य रोग हो इस चिकित्सा से उसका उचित समय से निराकरण किया जा सकता है। रोगी के ठीक हो जाने पर पुन: उसके रोगी होने की सम्भावना क्षीण हो जाती है। प्राकृतिक चिकित्सा से रोग जड़ से दूर होते है। स्वास्थ्य के सम्बन्धित नियमों का पालन तथा किसी भी काम में अति न करना प्राकृतिक चिकित्सा का मुख्य सिद्धांत है। प्रकृति के नियमों को तोड़ने से बीमारियाँ पैदा होती है। जबकि प्रकृति के नियमों का पालन करने से हमारे स्वास्थ्य की रक्षा होती है। 

प्रकृति के नियमों के पालन के लिए आवश्यक होता है कि हमें प्राकृतिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण सिद्धान्तो के बारे में जानकारी हो जो  है- 

प्राकृतिक चिकित्सा के 10 सिद्धांत

प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिद्धांत है जीवनशैली मनुष्य रोगी न बने इसके लिए प्राकृतिक चिकित्सा के दस आधार भूत सिद्धांत है-

1. सभी रोग एक हैं, और उनका कारण भी एक ही है, और उनका उपचार भी एक ही है

सभी रोग, उनके कारण उनकी चिकित्सा भी एक है चोट और वातावरणजन्य परिस्थितियों को छोड़कर सभी रोगों का मूल कारण एक ही है और उसका उपचार भी एक है शरीर में विजातीय पदार्थों की संग्रह हो ताना जिससे रोग उत्पन्न होते है। उनका निष्कासन ही चिकित्सा है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का मौलिक सिद्धांत वह है। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार सभी रोग एक ही है। रोग को अलग-अलग नामों से जाना जाता है जिस प्रकार चांदी से बने आभूषणों के अलग अलग नाम हैं जैसे- कंगन, पायल, अंगूठी आदि उसी प्रकार एक ही विजातीय द्रव्य के अलग अलग स्थान पर एकत्र होने के कारण रोग के अनेकों नाम हैं। 

रोग का एक मात्र कारण विजातीय द्रव्य है। जिसे टॉक्सिक मैटर कहते हैं, शरीर एक मशीन के समान कार्य करता है जिसके कारण हमारे शरीर में विजातीय द्रव्य एकत्र होते रहते हैं और उत्सर्जन तंत्र के माध्यम से बाहर निकाला जाता है। जैसे पसीने के रूप में, मल मूत्र के रूप में और जब यही मल जब शरीर से सुचारु रूप से नहीं निकलता तो शरीर के विभिन्न स्थानों पर जमा होने लगता है, और वही सड़ने लगता है जिसके कारण रोग होते हैं। जैसे आंतों की सफाई न होने पर कब्ज होती है जिसके कारण बवासीर और फिसर जैसे रोग होते हैं अंन्त में इनका व्यापक रूप हमारा रक्त भी दूषित कर देता है जिससे चर्मरोग होता है।

 हृदय पर ज्यादा दबाव पड़ने से हृदय रोग भी हो जाता है। श्वसन का कार्य बढ़ जाने से श्वास संबन्धी रोग उत्पन्न होते हैं। इन सबकी जड़ केवल विजातीय द्रव्य ही होते हैं। इसीलिये जब सारे रोग एक है और उनका कारण भी एक हैं तो उसका उपचार भी एक ही होगा और वह है शरीर से विजातीय द्रव्यों का निष्कासन जिससे शरीर शुद्ध हो और रोग समाप्त हो सकें। विजातीय द्रव्य के समाप्त होने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिवान हो जाता है। इसीलिये प्राकृतिक चिकित्सा में शरीर की शुद्धि को महत्वपूर्ण स्थान दिया है और विभिन्न माध्यमों से शरीर से विजातीय द्रव्यों को बाहर निकाल कर इसका उपचार किया जाता है। 

इससे स्पष्ट होता है कि सभी रोग एक हैं। क्योंकि वे एक ही प्रकार के कारण से उत्पन्न होते होते हे इसलिये उनका उपचार भी एक मात्र है शरीर से विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालना।

2. तीव्र रोग शत्रु नहीं मित्र होते हैं

तीव्र रोग चकि शरीर के एक उपचारात्मक प्रयास है अत: हमारे शत्रु नहीं है। जीर्ण रोग तीव्र रोगों को दबाने से और गलत उपचार से पैदा होते है। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगों को दो श्रेणी में बांटा गया है। 1. तीव्र रोग, 2. जीर्ण रोग। 

1. जीर्ण रोग वह होते हैं जो शरीर में दबे रहते हैं और लंबे समय के बाद प्रकट होते हैं जिनके शरीर में रहते हुये हमारा शरीर काम तो करता है लेकिन अंदर से क्षतिग्रस्त होता रहता है और लंबे समय तक शरीर में बने रहते हैं क्योंकि इनकी जड़ें शरीर में जम चुकी होती हैं इसके विपरीत तीव्र रोग वह होते हैं जिनकी अवस्था में शरीर कार्य करने में सक्षम नहीं हो पाता है और यह शरीर में तीव्र गति से आते है और वैसे ही तीव्र गति से चले भी जाते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में तीव्र रोगों को मित्र कहा गया है जिस प्रकार सामने से वार करने वाले से खतरनाक छिपकर वार करने वाला होता है। उसी प्रकार तीव्र रोग सामने से वार करता है इससे व्यक्ति को संभलने का अवसर मिल जाता है।

2. तीव्र रोग के कारण शरीर से विजातीय द्रव्यों का निष्कासन भी हो जाता है जैसे- उल्टी, दस्त हाने से पेट और ऑंतों की सफाई हो जाती है। जुकाम व बुखार में यही विजातीय द्रव्य पसीने के रूप में बाहर निकलते हैं और जीवनीशक्ति का पुन: विकास होने लगता है। तीव्र रोग हमारे अंदर के विष को बाहर निकालने का कार्य करते हैं किन्तु हम घबराकर औषधियों के माध्यम से उनके कार्य में रूकावट डाल देते हैं जिससे तीव्र रोग कुछ समय बाद जीर्ण रोग का रूप ले लेते हैं। 

उदाहरण के लिये सामान्य सर्दी जुकाम जो कि मौसम बदलने के कारण हमारे शरीर की प्रतिक्रिया होती है जिसके कारण मल बाहर निकलना चाहता है लेकिन हम औषधियों को खाकर इसे रोक देते हैं और कुछ समय बाद यही अस्थमा, बोंकाईटिस, सायनस जैसी जीर्ण बीमारियों के रूप में सामने आते हैं। 

तीव्र रोग हमें हमारी भूल का स्मरण कराते हैं। गलत आहार के कारण उल्टी और दस्त ठण्डी चीजों के अधिक सेवन के कारण सर्दी जुकाम आदि इसके उदाहरण हैं। इसलिये ही इन्हें मित्र कहा गया है क्योंकि सच्चा मित्र ही हमें हमारी भूलों की पहचान करा सकता है। जिससे वह भूल दुहराई न जा सके।

3. रोग का कारण कीटाणु नहीं 

रोग का मुख्य कारण कीटाणु नहीं है। जीवाणु शरीर में जीवनी शक्ति के हास होने के कारण एवं विजातीय पदार्थों के संग्रह के पश्चात् तब आक्रमण कर पाते है जब शरीर में उनके रहने और पनपने लायक अनुकूल वातावरण तैयार हो जाता है अत: मूलकारण विजातीय पदार्थ है जीवाणु नहीं है जीवाणु तो दूसरा कारण है। उपर्युक्त सिद्धांत से स्पष्ट हो जाता है कि रोग का एक मात्र कारण विजातीय द्रव्य हैं तो कीटाणु रोग का कारण कैसे हो सकते हैं। स्वस्थ शरीर में कीटाणुओं का अस्तित्व नहीं रहता लेकिन इसके विपरीत रोगियों में विभिन्न प्रकार के कीटाणु प्रवेश करते रहते हैं और रोगी को जर्जर करते रहते हैं। ऐसा क्यों होता है, यह एक प्राकृतिक नियम है कि सृष्टि में जितने पदार्थ हैं इनके सूक्ष्म परमाणु अनवरत रूप से गतिशील रहते हैं। 

जिन वस्तुओं के परमाणु एक सी गति रखते हैं उनमें परस्पर आकर्षण होता है। और विरूद्ध गति के परमाणु एक दूसरे से भागते हैं। अत: इस सिद्धांत के अनुसार कीटाणुओं का अस्तित्व उन्ही शरीरों में होता है जिनमें पहले से ही विजातीय द्रव्य विद्यमान हो अथवा जो रोग ग्रस्त है या जीवनी शक्ति कमजोर हो क्योंकि विजातीय द्रव्य के कारण जीवनी शक्ति का ह्रास होता है उस अवस्था में कीटाणुओं का प्रवेश शरीर में होता है।

जिस प्रकार गुड़ के पास ही मक्खियां आती है। ठीक उसी प्रकार गंदगी में ही मच्छर आते हैं क्योंकि कीटाणुओं भी जीवित रहने के लिये उनका आहर चाहिये जो कि स्वस्थ व्यक्ति में उन्हें नहीं मिलता और वे जीवित नहीं रह पाते। इसके विपरीत रोगी के शरीर में उनका चौगुना विकास होता है। यही कारण है कि किसी भी प्रकार के कीटाणुओं के संक्रमण में 100 प्रतिशत लोग प्रभावित नहीं होते वही उसकी चपेट में आ जाते हैं। जिनका रहन सहन सही नहीं है जीवनी शक्ति प्रबल होती है उनमें कीटाणु जीवित नहीं रह पाते इसीलिये वह स्वस्थ रहते हैं। इससे स्पष्ट है कि रोग के प्रभाव का प्रथम कारण एक मात्र विजातीय द्रव्य ही होते हैं कीटाणु नहीं।

4. प्रकृति स्वयं चिकित्सक है

प्रकृति स्वयं सबसे बड़ी चिकित्सा है शरीर में स्वयं रोगों से बचने व अस्वस्थ हो जाने पर पुन: स्वस्थ प्राप्त करने की क्षमता विद्यमान है। प्रकृति जीव का संचालन करती है जो प्रत्येक जीवन के पार्श्व में रहकर उसके जन्म, मरण, स्वास्थ्य एवं रोग आदि का ध्यान रखती है, उस महान शक्ति को जीवनी शक्ति, प्राण आदि कहते हैं। शरीर की समस्त क्रियायें इसी के माध्यम से संपन्न होती हैं। हमारा खाना पीना, बोलना चालना, उठना बैठना सब इसी पर निर्भर है। मां अपने बच्चे के लिये इन सब बातों का जैसे ध्यान रखती है वैसे ही प्रकृति भी हमारा ख्याल रखती है, और जब तक बच्चा मां के पास रहता है वह अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है। जिस प्रकार खाना खिलाते समय यदि खाना अटक जाये तो मां बच्चे को पीठ पर जोर से मारती है पानी पिलाती है। ठीक इसी प्रकार से प्रकृति भी हर तरह से ध्यान रखती है। जब खाना गलती से श्वास नली में चला जाता है तो प्रकृति के समान ही तुरंत खांसी उत्पन्न कर उसे बाहर निकाल देती है।

इसी प्रकार जब कोई भी जहरीली चीज मुंह में चली जाती है तो तुरंत उल्टी होने लगती है और जहर बाहर निकल जाता है। घाव हो जाने पर उसे कौन भरता है, हड्डी टूट जाने पर उसे कौन जोड़ता है। चिकित्सक केवल सहारा देता है, लेकिन हड्डी को जोड़ नहीं सकता। यह कार्य केवल और केवल प्रकृति रूप में मां ही कर सकती है। संसार में प्रकृति से बड़ा चिकित्सक कोई नहीं है, प्रकृति ही सभी साध्य व असाध्य रोगों का उपचार करती है। प्राकृतिक चिकित्सा तो प्रकृति के कार्य में सहायक के रूप में कार्यकरता है।

5. चिकित्सा रोग की नहीं संपूर्ण शरीर की होती है

प्राकृतिक चिकित्सा में चिकित्सा रोग की नहीं बल्कि रोगी की होती है। अन्य चिकित्सा पद्धतियों में केवल रोग निवारण पर बल दिया जाता है परन्तु प्राकृतिक चिकित्सा केवल रोग का ही नहीं अपितु संपूर्ण शरीर की चिकित्सा करती है जिससे रोग स्वत: मिट जाता है क्योंकि रोग का मूल कारण तो शरीर में एकत्र विष है। जैसे सिरदर्द होने पर अधिकांश लोग दवाओं का प्रयोग करते हैं जिससे कुछ समय के लिये दर्द समाप्त हो जाता है लेकिन बार बार होता रहता है क्योंकि उसकी जड़ तो कहीं और ही होती है। प्राकृतिक चिकित्सा में पेट तथा आंतों को साफ करके सिरदर्द को पूर्ण रूप से समाप्त किया जाता है।

इसके साथ ही शरीर के शुद्धि करण से सिरदर्द और अन्यरोग स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में किसी अंग विशेष को रोगी नहीं माना जाता है बल्कि किसी भी रोग में संपूर्ण शरीर ही रोगी हो जाता है जैसे एक साधारण लगने वाली कब्ज के कारण व्यक्ति का संपूर्ण शरीर ही रोगी हो जाता है। कब्ज के कारण अपच अजीर्ण गैस, ऐसीडिटी, बवासीर, फिसर, त्वचा रोग, अस्थमा, हृदय रोग आदि होते है। सभी रोग का कारण आंतों में रूका हुआ मल है जो विष का रूप धारण कर संपूर्ण शरीर में फैल जाता है। सिर की ओर जाने पर सिर दर्द, बेचैनी, घबराहट आदि होती है इसलिये केवल पेट की चिकित्सा और शरीर की सफाई से ये सारे रोग एक के बाद एक करके समाप्त हो जाते हैं इसलिये केवल चिकित्सा न करके संपूर्ण शरीर की चिकित्सा की जाती है।

6. प्राकृतिक चिकित्सा में निदान की विशेष आवश्यकता नहीं 

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत के अनुसार सभी रोग एक है और उनके कारण भी एक ही हैं ऐसी अवस्था में रोग निदान की विशेष आवश्यकता नही रह जाती है। वर्तमान समय में रोग के निदान के लिये बड़ी बड़ी मशीनें व उपकरण प्रयोग में लाये जाते हैं जिनके माध्यम से शरीर में रोग का पता लगाया जाता है जिनके विपरीत प्रभाव रोगी पर देखने को मिलता है। एक्सरे मशीन से आंखों की रोशनी प्रभावित होती है। गर्भाशय शिशु पर विपरीत प्रभाव पड़ता है यहां तक की बच्चा अपंग पैदा हो सकता है। इस प्रकार की मशीनों के अत्यधिक प्रयोग से रोग निवारण नहीं रोग को बढ़ाया जा रहा है बल्कि शरीर और दूषित होता है इसके अतिरिक्त रोगी पर अत्यधिक आर्थिक दबाव पड़ती है जिससे मानसिक रूप से क्षुब्ध हो जाता है लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा में किसी भी उपकरण की सहायता के बिना आकृति निदान की व्यवस्था है रोगी की आकृति को देखकर सिर्फ यह पता लगाना है कि शरीर के किस भाग पर विजातीय द्रव्य की अधिकता है। चहेरे को देखकर, गर्दन को देखकर और पेट को देखकर ही रोगों का निदान किया जाता है जो एक बहुत ही सरल और सहज प्रकिय्रा है। रोगी को किसी प्रकार की परेशानी नही होती और आर्थिक दबाव बिल्कुल नहीं होता है।

7. जीर्ण रोगी के आरोग्य में समय लग सकता है 

जीर्ण रोगी का अर्थ है जिसमें रोग लंबे समय से बैठा है। उसे समाप्त करने में समय लगता है। जीर्ण रोग न तो बहुत जल्दी आते है और न ही पलक झपकते ठीक हो सकते हैं। जीर्ण रोग उस पेड़ के समान होते हैं जो कई वर्षों से अपनी जड़े जमाये हुये हैं इसलिये उसकी जड़े जमीन में बहुत अंदर तक चली जाती है। पेड़ को तने से बहुत जल्दी काटा जा सकता है। इसी प्रकार जीर्ण रोग भी शरीर में बहुत जड़ें बना लेते हैं और उन्हें जड़ से मिटाने में थोड़ा समय लगता है।

वर्तमान समय की चिकित्सा पद्धतियां रोग के लक्षणों को मिटाती है जो कुछ समय के लिये होता है और बार बार उभर कर सामने आती रहती है। क्योंकि जल्दी आराम पाने के चक्कर में वे औषधियों के माध्यम से रोग रूपी पेड़ के तने को काटते हैं जिसके कुछ समय बाद फिर अंकुर आकर वही पेड़ बन जाता है लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा रोग को जड़ से मिटाने का प्रयास करती है और साथ ही जीवनी शक्ति का विकास करती है जो कि औषधियों के सेवन से नष्ट होती है।

यह मनुष्य का दुर्भाग्य ही है कि वह प्रकृति से दूर होता जा रहा है और कृत्रिम दुनिया में जी रहा है। आज की औषधियां इसी का उदाहरण है जिन्हें खा कर मनुष्य सोचता है कि वह स्वास्थ्य को प्राप्त कर रहा है। परन्तु सत्य यह है कि वह खुशी से जहर खा रहा है जो धीरे धीरे उसे अंदर से खाये जा रहा है जिसका पता उसे कुछ समय बीत जाने के बाद लगता है। जब वह एक रोग को दूर करने के लिये ली गई औषधियों के कारण दूसरे रोग को आमंत्रित कर देता है।

प्राकृतिक चिकित्सा में जीर्ण रोगी के स्वास्थ्य लाभ में समय लगने का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि व्यक्ति हर जगह से थक हार कर इसकी ओर मुड़ता है और फिर अपने साथ जगह जगह से एकत्र किया हुआ औशधीय विष लेकर आता है जो प्राकृतिक चिकित्सक के कार्य को और भी बढ़ा देता है। जिससे रोगी के आरोग्य लाभ में समय लग सकता है। इस लिये रोगी को धैर्यपूर्वक प्राकृतिक चिकित्सा करवानी चाहिये जिससे पूर्ण लाभ मिल सके।

8. प्राकृतिक चिकित्सा में दबे रोग उभरते हैं

प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा रोग भी उभर कर ढीक हो जाते है। वर्तमान औषधीय चिकित्सा में जहां उभरे रोग दब जाते हैं, उसके विपरीत प्राकृतिक चिकित्सा में दबे रोग उभरते हैं जिसके कारण कई रोगी अविश्वास करने लगते है कि उनकी बीमारियां बढ़ गई हैं। जबकि बीमारियां बढ़ती नहीं हैं बल्कि अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष में आ जाती हैं जिससे उनका उपचार किया जा सकता है। 

प्राकृतिक चिकित्सा में संपूर्ण शरीर का उपचार किया जाता है जिससे संपूर्ण शरीर के विजातीय द्रव्य बाहर निकलते हैं जिससे शरीर में दबे अन्य रोग भी बाहर निकलते हैं जो उचित उपचार से जल्दी ही चले जाते हैं। उभार को चिकित्सकीय भाषा में रोग का तीव्र रोग की अपकर्शावस्था पुराने रोग का प्रत्यावर्तन रोग उपशन, संकट आदि कई नामों से पुकारते हैं इसका सामान्य अर्थ है कि एक रोग का तीव्र अवस्था में अलग-अलग स्थानों में विष का बाहर निकलना जो उपद्रव कहलाते हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा में इसे सकारात्मक रूप में लिया जाता है, क्योंकि इसका अर्थ है हमारी जीवनी शक्ति अपना कार्य रही है। जिस प्रकार एक सामान्य ज्वर की चिकित्सा के समय तीव्र सिरदर्द व पेट दर्द एवं दस्त भी हो सकते हैं। क्योंकि सिरदर्द होने पर हम दवा से दबा देते हैं। इसी प्रकार पेटदर्द होने पर भी हम इसे दवा से दबा देते हैं, और दस्त को रोक देते हैं जिससे मल शरीर में ही अलग-अलग स्थानों पर जमा हो जाता है और प्राकृतिक उपचार के समय यह बाहर निकलने का प्रयास करता है जिससे सभी रोग उभर आते हैं।

एक प्राकृतिक चिकित्सक का कर्तव्य है कि इन उभारों की अनदेखी न करें और तत्काल उनकी चिकित्सा करें। जिससे रोगी की जीवनी शक्ति का अधिक क्षय न हो। रोगी को इससे घबराने की आवश्यकता नही है। रोगी को यह सोचना चाहिये कि उनका रोग जड़ से ही समाप्त हो रहा है जिससे उसके दुबारा हाने की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।

9. प्राकृतिक चिकित्सा में मन, शरीर तथा आत्मा तीनों की चिकित्सा की जाती है 

प्राकृतिक चिकित्सा में शारीरिक मानसिक, आध्यात्मिक तीनों पक्षों की चिकित्सा एक साथ की जाती है। शरीर, मन और आत्मा तीनों के सामंजस्य का नाम ही पूर्ण स्वास्थ्य है क्योंकि शरीर के साथ मन जब तक स्वस्थ नहीं है तब तक व्यक्ति को पूर्ण स्वस्थ नहीं कहा जा सकता है। और शरीर, मन तभी स्वस्थ रह सकते हैं जब आत्मा स्वस्थ हो, केवल शरीर को ही स्वस्थ रखना मनुष्य का कर्तव्य नहीं है क्योंकि मन और आत्मा शरीर के अभिन्न अंग है। बिना मन के खुश हुये हमारी इंद्रियां कैसे खुश रह सकती है। यदि मन स्वस्थ नहीं हैं तो विशाल काय शरीर भी कुछ समय में समाप्त हो जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में इन तीनों की स्वास्थ्योन्नति पर बराबर ध्यान रखा जाता है।

यह प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता है कि प्राकृतिक चिकित्सक मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य को उससे शारीरिक स्वास्थ्य से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं और आत्मिक स्वास्थ्य या बल को सर्वोपरि मानते हैं, क्योंकि शरीर तभी स्वस्थ होगा जब आत्मा और मन स्वस्थ होता है।

भारतीय दर्शन के अनुसार आध्यात्मिक रूप से मनुष्य ही पूर्ण रूप से स्वस्थ होता है वही, जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। क्योंकि आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही एक स्वस्थ समाज की स्थापना कर सकता है। जहां हिंसा, द्वेष, क्रोध, घृणा आदि विकृत मानसिकता न पनप सके। प्राकृतिक चिकित्सा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही महत्-तत्व चिकित्सा, राम नाम चिकित्सा पर भी बल देती है जिससे मनुष्य आत्म संयम सीख सके और अपनी जीवन शैली को बदलकर संपूर्ण जीवन को उचित दिशा दे सके।

10. प्राकृतिक चिकित्सा में उत्तेजक औषधियों के सेवन का प्रश्न ही नहीं 

प्राकृतिक चिकित्सा में औषधियों का प्रयोग नहीं होता है। प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार आधार ही औषधि है। औषधि उपचार का सिद्धांत है कि रोग बाहरी चीज है जिसका शरीर पर आक्रमण होता है। अत: इसे औषधियों के माध्यम से दूर करना चाहिये। बाहर से आये कीटाणुओं को औषधियों से समाप्त करना चाहिये। जबकि संपूर्ण प्रकार की औषधियां एक प्रकार का विष हैं जिनसे व्यक्ति ठीक कैसे हो सकता है। एक निर्धारित मात्रा से अधिक लेने पर व्यक्ति की मौत हो सकती है लेकिन विष तो विष है आज नही तो कल अपना प्रभाव दिखायेगा ही। क्योंकि एक ही बार में ली गयी नींद की गोलियां व्यक्ति को तुरंत समाप्त कर देती हैं। लेकिन धीरे धीरे ली गयी गोलियां व्यक्ति को पंगु बनाती हैं शरीर को धीरे धीरे खाती हैं आज मिलने वाली दवा पर कुछ समय बाद प्रतिबंध लग जाता है। सभी दवाओं पर सावधानी के निर्देश दिये रहते हैं। 

प्रो0 ए0 क्लार्क के अनुसार ‘‘हमारी सभी आरोग्यकारी औषधियां विष हैं और इसके फलस्वरूप औषधि की हर एक मात्रा रोगी की जीवनी शक्ति का ह्रास करती है।’’

फिर भी मनुष्य उनका उपयोग करता रहता है लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा में किसी प्रकार की औषधियों का प्रयोग नहीं किया जाता है। औषधियों को अत्यधिक हानिकारक माना जाता है जिससे रोग कम होने के बजाय बढ़ता जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा मानती है कि शरीर औषधि से नही बल्कि प्रकृति से निर्मित हुआ है इसलिये पंचतत्वीय शरीर की चिकित्सा के लिये पंच तत्वों का ही प्रयोग किया जाता है क्योंकि प्रकृति से बड़ा चिकित्सक और कोई नहीं है। प्रकृति के सभी सप्राण खाद्य पदार्थ ही औषधि है। शुद्ध वायु, धूप, जल आदि ही औषधि हैं जो रोग को दूर करने की क्षमता रखते हैं। 

अमेरिका के लियेण्डर के अनुसार -’’औषधि विज्ञान को जितनी कीटाणुनाशक दवायें मालूम हैं उनसे कही अधिक सूर्य स्नान कीटाणुनाशक शक्ति को बढ़ाता है।’’ प्राकृतिक चिकित्सा में कृत्रिम औषधियों का प्रयोग वर्जित माना जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में विषैली औषधियों को शरीर के लिये अनावश्यक ही नहीं घातक भी समझा जाता है। प्रकृति चिकित्सक है दवा नहीं। औषधि का काम रोग छुड़ाना नहीं है बल्कि यह वह सामग्री है जो प्रकृति के द्वारा मरम्त के काम में लगाई जाती है। इस लिये प्राकृतिक चिकित्सा में सभी सप्राण खाद्य सामग्री ही औषधि हैं।

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