अगस्त काम्टे के तीन स्तरों का नियम

विकास के ये नियम सम्पूर्ण समाज से जुड़े हुए हैं। जब धार्मिक अवस्था में समाज होता है तब राजा-महाराजा सेना और पुरोहितों का प्रभाव अधिक होता है। अर्थात् मस्तिष्क के विकास का जो स्तर होगा, उसी के अनुरूप सामाजिक व्यवस्था भी होगी। जब मस्तिष्क तात्विक अवस्था में आता है तब उनकी सोच बदल जाती है और वह किसी भी तरह के प्रभुत्व को नकारने लगता है। जब मनुष्य का विकास वैज्ञानिक अवस्था में पहुँचता है, तब वह प्रत्येक वस्तु को तर्क की कसौटी पर कसता है। वह ईश्वर के अस्तित्व को भी चुनौती देता है।

अगस्त काम्टे के तीन स्तरों का नियम 

सामाजिक विचारधारा के क्षेत्र में अगस्त काम्टे का तीन स्तरों का नियम एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। सन् 1822 में ही इन्होंने इस नियम को प्रतिपादित किया था कि मानव के बौद्धिक विकास का अध्ययन करने पर यह स्पष्टत: पता चलता है कि इस क्रम-विकास के तीन स्पष्ट स्तर रहे हैं। अगस्त काम्टे के ये 3 स्तर के नियम निम्न हैं-
  1. धार्मिक स्तर (Theological Stage);
  2. तात्त्विक स्तर (Metaphysical Stage);
  3. वैज्ञानिक या प्रत्याक्षात्मक (Scientific or Positive Stage)।
अगस्त काम्टे ने लिखा है, सभी समाजों में और सभी युगों में मानव के बौद्धिक विकास का अध्ययन करने से उस महान् आधारभूत नियम का पता चलता है जिसके अधीन मनुष्य की बुद्धि आवश्यक रूप से होती है और जिसका एक ठोस प्रमाण हमारे संगठन के तथ्यों तथा हमारे ऐतिहासिक अनुभवों दोनों में विद्यमान है। 

यह नियम इस प्रकार है: हमारी प्रत्येक प्रमुख अवधारणा, हमारे ज्ञान की प्रत्येक शाखा, एक के बाद एक तीन विभिन्न सैद्धान्तिक दशाओं से होकर गुजरती है-धार्मिक अथवा काल्पनिक अवस्था, तात्त्विक अथवा अमूर्त अवस्था और वैज्ञानिक अथवा प्रत्यक्ष अवस्था।

धार्मिक अवस्था में सृष्टि की आवश्यक प्रकृति की खोष करने में या प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने के सर्वप्रमुख तथा अन्तिम कारणों (उत्पत्ति तथा उद्देश्य) को जानने के प्रयत्न में मनुष्य का मस्तिष्क यह मान लेता है कि समस्त घटनाएँ अलौकिक प्राणियों की तात्कालिक क्रियाओं का परिणाम हैं। फ्ताित्त्वक अवस्था में, जो कि प्रथम अवस्था का एक संशोधन मात्र है, मनुष्य का मस्तिष्क यह मान लेता है कि अलौकिक प्राणी नहीं बल्कि अमूर्त शक्तियाँ, जो कि सभी जीवों में अन्तर्निहित होती हैं, समस्त घटनाओं को उत्पन्न करती है।

अन्तिम अथवा प्रत्यक्ष अवस्था में मनुष्य का मस्तिष्क निरपेक्ष धारणाओं, विश्व और उत्पत्ति और लक्ष्य तथा घटनाओं के कारणों की व्यर्थ खोष को त्याग देता है और उनके नियमों के, अर्थात् उनके अनुक्रम तथा समरूपता के विचार सम्बन्धों के अध्ययन में लग जाता है। सम्मिलित रूप से तर्वफ तथा निरीक्षण इस ज्ञान का साधन है। ‘तथ्यों की व्याख्या’-इस कथन में जो कुछ आज हम समझते हैं वह केवल सामान्य तथ्यों के बीच सम्बन्ध की स्थापना मात्र है, इन सामान्य तथ्यों की संख्या विज्ञान की प्रगति के साथ-साथ निरन्तर घटती चली जाती है। 

‘तीन स्तरों के नियम’ की व्याख्या अगस्त काम्टे के उपर्युक्त कथन से ही पर्याप्त स्पष्ट है, फिर भी उनके द्वारा उल्लेखित मानव-ज्ञान के या मानव के बौद्धिक विकास के तीन स्तरों को और भी स्पष्ट रूप से इस प्रकार समझाया जा सकता है-

1. धार्मिक स्तर

इस स्तर में समस्त चीजों को ईश्वर के प्रतिरूप के रूप में या किन्हीं अलौकिक प्राणियों की तात्कालिक क्रियाओं के परिणाम के रूप में देखा, माना या समझा जाता है। धारणा यह होती है कि समस्त चीजों का कार्य-रूप अलौकिक शक्तियाँ (देव-देवी या आत्मा) हैं तथा समस्त वस्तुओं में वही शक्ति व्याप्त है। पेड़-पौधे, जल-प्रवाह, चर-अचर आदि सभी में वही शक्ति क्रियाशील है। प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने में, इस स्तर पर मानव को केवल एक ही कारण दिखाई देता है और वह कारण है देवी-देवता या ऐसी ही अन्य अलौकिक शक्ति। 

यह विचार ठीक है या गलत, यह दूसरी बात है, परन्तु इस स्तर पर इसी रूप में अपने आसपास के विषय में मनुष्य सोचता है और मानव तथा पशु में इसी चिन्तन करने की शक्ति के आधार पर एक महान् अन्तर हो जाता है। अगस्त काम्टे के अनुसार इस स्तर के भी तीन उप-स्तर हैं- 
  1. जीवित-सत्तावाद (Fetichism);
  2. बहु-देवत्ववाद (Polytheism);
  3. अद्वैतवाद (Monotheism)।
1. प्रथम उप-स्तर पर प्रत्येक चीज में एक जीवित सत्ता का अनुभव किया जाता है और उसी के अनुसार अनेक जादू-टोनों पर विश्वास किया जाता है।

2. द्वितीय उप-स्तर पर मनुष्यों का मस्तिष्क अधिक सुसंगठित होता है, इस कारण अनेक देवता व जादू-टोनों आदि से मानव परेशान हो जाता है और उन्हें सम्मिलित रूप से देखने की भावना उत्पन्न होती है, जिसके पफलस्वरूप जीवन के विभिन्न पहलुओं से सम्बन्धित एक-एक देवी-देवता का जन्म होता है। यही बहु-देवत्ववाद का स्तर है क्योंकि इसमें अनेक देवताओं पर विश्वास किया जाता है जो कि जीवन के विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

3. परन्तु इन अनेक देवी-देवताओं के कारण भी मानसिक उलझनें बनी रहती हैं। इसी कारण मनुष्य अपने समस्त चिन्तन को या श्रद्धा, विश्वास को अनेक देवी-देवताओं में न बाँटकर किसी एक ईश्वर पर अपनी समस्त श्रद्धा, विश्वास आदि को न्यौछावर करने के लिए उन्मुख होता है। यही अद्वैतवाद की स्थिति है जबकि यह विश्वास किया जाता है कि प्रत्येक घटना या वस्तु का कारण किसी एक देवता का कार्य है। 

दूसरे शब्दों में, अद्वैतवाद में यह विश्वास स्पष्ट होता है कि ईश्वर केवल एक है और समस्त वस्तु या घटना उसी एक ईश्वर की सृष्टि है। जैसे-जैसे मानव का दृष्टिकोण व्यापक और चिन्तन-शक्ति गहन और गम्भीर होती है, वैसे-ही-वैसे अद्वैतवाद की अवधारणा भी अधिक स्पष्ट और दृढ़ होती है। धार्मिक स्तर का अद्वैतवाद चरम स्तर है।

2. तात्त्विक स्तर

इस स्तर पर ईश्वर की वैयक्तिक शक्ति को धारणा का लोप होता है। ईश्वर का चिन्तन व्यक्ति के रूप में न होकर एक अमूर्त शक्ति के रूप में होता है। जो कुछ भी संसार में हो रहा है वह एक व्यक्ति के रूप में ईश्वर के कारण नहीं वरन् एक अदृश्य या निराकार व्यक्ति के कारण है या हो रहा है। इस शक्ति का अस्तित्व है, परन्तु इसका सम्बन्ध किसी व्यक्ति-विशेष या किसी शरीर-विशेष से नहीं है।

उस अमूर्त, निराकार शक्ति के आधार पर जो वुफछ भी हो रहा है वह शाश्वत है और स्वयं पूर्ण है। इस स्तर की कोई विशिष्ट विशेषता उल्लेखनीय नहीं है क्योंकि यह स्तर धार्मिक और प्रत्यक्षात्मक स्तर के बीच का स्तर है।

3. वैज्ञानिक या प्रत्यक्षात्मक स्तर

तात्त्विक विचार शाश्वत या स्वयं पूर्ण हो सकता है, पर वास्तविक तर्कों तथा तथ्यों पर आधारित नहीं हो सकता। जब व्यक्ति ताित्त्वक विचारों को छोड़कर निरीक्षण और तर्वफ के आधार पर इस संसार की घटनाओं को समझने और परिभाषित करने में लगता है तब भी वैज्ञानिक या प्रत्यक्षात्मक स्तर में उसका प्रवेश होता है। अगस्त काम्टे का कथन है कि तर्वफ और निरीक्षण सम्मिलित रूप में वास्तविक ज्ञान का आधार हैं। 

जब हम किसी घटना की व्याख्या करते हैं तो कुछ सामान्य तथ्यों और उस घटना-विशेष के बीच सम्बन्ध ढूँढ़ने का प्रयत्न करते हैं। यह अन्वेषण निरीक्षण के द्वारा ही यथार्थ हो सकता है।

निरीक्षण ही प्रमाण है क्योंकि वह वास्तविक है, न कि काल्पनिक। अगस्त काम्टे के अनुसार, विश्व के विभिन्न तथ्यों, घटनाओं आदि को समझने का वास्तविक तथा निर्भर-योग्य साधन निरीक्षण और वर्गीकरण ही है। प्रत्यक्षात्मक स्तर पर मनुष्य इसीलिए न तो काल्पनिक किला बनाता है और न ही ताित्त्वक दृष्टि में संसार के विभिन्न तत्त्वों, को देखने का प्रयास करता है। इस स्तर पर ज्ञान का संग्रह ही एकमात्र साध्य या अन्तिम उद्देश्य है।

मानव-ज्ञान अथवा चिन्तन के उक्त तीन चरणों की विवेचना करते हुए अगस्त काम्टे इस सत्य को भूल नहीं जाते हैं कि इन तीनों स्तरों का पृथव्फ-पृथव्फ अस्तित्व नहीं हो सकता है। दूसरे शब्दों में, ये तीनों स्तर एक-दूसरे से पूर्णतया परे हैं अथवा एक स्तर के बाद ही दूसरे स्तर का अविर्भाव होता है, यह सोचना उचित न होगा। हो सकता है कि वे एक ही समाज में या एक ही मस्तिष्क में साथ-साथ पाये जाते हों। धार्मिक विषयों में हम धार्मिक स्तर पर हों, जीवन के आदर्शों के सम्बन्ध में ताित्त्वक स्तर पर और जीवित रहने के साधनों के सम्बन्ध में वैज्ञानिक स्तर पर। इन तीनों स्तरों का अनोखा समन्वय भारतीय समाज में मिलता है। 

उदारहणार्थ, हिन्दू-विवाह आज भी धार्मिक स्तर पर है और हिन्दू लोग विवाह को एक धार्मिक संस्कार के रूप में मानते हैं। गाँधीजी की सत्याग्रह, अहिंसा अथवा ‘अल्लाह-ईश्वर एक ही नाम’ की वाणी प्राथमिक रूप में दार्शनिक है जबकि भारतीय पंचवष्र्ाीय योजनाएँ प्रत्यक्ष स्तर की परिचायक हैं। अत: मानव-चिन्तन अथवा ज्ञान के तीनों स्तर पूर्णतया पृथव्फ नहीं हैं। अगस्त काम्टे की इस विचारधारा को एक अन्य उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया जाता है। जैसे एक वैज्ञानिक है जो कि अन्य सभी विषयों में विज्ञान पर या वैज्ञानिक पद्धति पर विश्वास करता है, परन्तु यदि उसके इकलौते बेटे की मृत्यु हो जाती है तो हो सकता है कि वह वैज्ञानिक ढंग से अपने-आपको सान्त्वना न दे सके। ऐसे अवसरों पर उसके लिए तात्त्विक विचारों का सहारा लेना अधिक उचित होगा और वह यह सोचकर कि ‘संसार में मिलन और विरह, सुख-दु:ख दोनों को ही सहना पड़ता है’ या धार्मिक आधार पर यह निष्कर्ष निकालकर कि ‘ईश्वर जो कुछ भी करता है हमारी भलाई के लिए ही करता है’ अपने को धीरज दे सकता है या देता है। 

अत: स्पष्ट है कि मानव-ज्ञान या चिन्तन की उपर्युक्त तीनों अवस्थाएँ एक ही समाज में या एक ही मस्तिष्क में साथ-साथ पाई जा सकती है। अगस्त काम्टे ने इस सत्य को कदापि न भूलने पर अत्यधिक बल दिया है क्योंकि उनका कथन है कि इस सत्य को भूल जाने पर ही इस तीन स्तर के महान् नियम के सम्बन्ध में कोई आपत्ति या इसकी कोई आलोचना सम्भव हो सकती है, अन्यथा कदापि नहीं। 

सन् 1839 में इस नियम के सम्बन्ध में अगस्त काम्टे ने लिखा था, प्रत्येक प्रकार से इस पर विचार-विमर्श तथा हर तरह से इसकी परीक्षा करते हुए सत्रह वर्ष का निरन्तर गहन चिन्तन मुझे पहले से ही इस महान् विषय के सम्बन्ध में, बिना किसी वैज्ञानिक हिचक के, वह घोषणा करने का अधिकार देता है कि हम सदैव ही इस ऐतिहासिक धारणा को परिपुष्ट और स्थिर पाएंगे प्राकृतिक दर्शनशास्त्र के अन्य विभागों में वास्तव में मान्य किसी भी सामान्य तथ्य की भाँति मुझे तो अब यह धारणा भी पूर्णतया प्रमाणित ही प्रतीत होती है।

Bandey

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