एरिक्सन के मनोसामाजिक विकास की अवस्थाएं

विकास की प्रत्येक अवस्था में व्यक्ति संघर्षों का सामना करता है जो परिवर्तन को स्वीकार करके और अनुकूलन द्वारा दूर किये जा सकते हैं । एरिक्सन ने व्यक्तित्व के तीन कारकों, शरीर , अहम और समाज या संस्कृति के प्रभाव को पहचाना । उसके अनुसार व्यक्तित्व विकास इन तीनों कारकों के प्रभाव स्वरूप होता है । इस प्रकार यह सिद्धान्त सामाजिक, मानव शास्त्रीय ओैर जैविक कारकों का व्यक्तित्व में एकीकरण पर बल देता है ।’’

एरिक्सन के मनोसामाजिक विकास की अवस्थाएं (Erikson's stages of psychosocial development)

एरिक्सन की मनोसामाजिक सिद्धान्त की अवस्थाओं का वर्णन निम्नानुसार है :- 

1. विश्वास बनाम अविश्वास (Trust vs mistrust) :- यह अवस्था जन्म से लगभग 18 महिने तक की मानी जाती है । एक शिशु का प्रथम कार्य स्वयं में और अपने वातावरण में विश्वास का विकास है । इस आयु में बालक अपनी आवश्यकताओं के लिए पूर्ण रूप से दूसरों पर निर्भर होता है ।’’

यदि उसकी आवश्यकता सही रूप से पूरी नहीं होती है तो वह अपने संसार (आसपास) पर विश्वास खो देता है । अत: अविश्वास की बजाए विश्वास का अधिक अनुपात विकसित करने की आवश्यकता है । यदि विश्वास से विश्वास अधिक होगा तो बालक बड़ा होकर आत्मविश्वास की कमी के साथ कुण्ठाग्रस्त और विमुख हो सकता है ।’’

2. आत्मनिर्भरता बनाम शंका व लज्जा (Autonomy vs doubt and Guilt) :- यह काल 18 महीने से लेकर 3 वर्ष तक का होता है । इस काल में बालक दूसरों की मदद नहीं लेना चाहता और आत्मनिर्भरता का भाव विकसित करता है । वह अपने तरीके से अपने कार्य करना पसंद करता है । माता-पिता को बालक में आत्मनिर्भरता का स्वस्थ भाव विकसित करने के लिए दृढ़ता और लचीलेपन का संतुलन रखना आवश्यक है । वातावरण की परिस्थितियों के अनुसार माता-पिता को बालक की स्वतंत्रता की सीमाएं निर्धारित कर देनी चाहिए ।’’

यदि बालक को वातावरण को खोजने की वांछित स्वतंत्रता नहीं दी जायेगी तो बालक में अपनी कार्य करने की योग्यता के प्रति शंका उत्पन्न हो जाती है और वह संकोच बन जाता है । लज्जा इसी का अन्य भाव है । अत: माता पिता को एक प्रोत्साहित करने वाला वातावरण तैयार करना चाहिए जिससे बालकों में अपने स्वाभिमान को बिना खोये आत्मनियन्त्रण का भाव विकसित हो सके । यदि माता पिता अधिक कठोर या गलतियों और घटनाओं के आलोचक होंगे तो बालक नियन्त्रण भाव देगा और शंका भाव को अर्जित कर लेगा ।’’

3. पहल बनाम अपराध बोध (Initiative vs Guilt) :- यह काल लगभग 3 वर्ष से 5 वर्ष तक होता है । इस अवस्था में बालक शारीरिक, सामाजिक, बैाद्धिक और संवेगात्मक सभी पक्षों में तीव्र गति से विकास करता है । घर से बाहर भी वह अपने आत्मनिर्भर व्यवहार को दर्शाता है जो एक पहल का रूप ले लेती है और उसमें सही और गलत का भाव विकसित होना शुरू हो जाता है और वह अपने कपड़े पहनने से लेकर पालतू जानवरों का ध्यान रखने जैसे कार्य करने की पहल करता है । यदि माता पिता प्रोत्साहित न करके उसे रोकते, डांटते है तो उसमें अपराध बोध आ जाता है । उसकी पहल की आत्मप्रेरित करके प्रौढ़ कार्यों हेतु तैयार किया जा सकता है ।’’

4. उद्यमिता बनाम हीनभावना (Industry vs inferiority) :- यह अवस्था 6 वर्ष से शुरू होकर 12 वर्ष तक होती है । बालक अपनी ऊर्जा को स्वयं सुधार करने और वस्तुओं और व्यक्तियों को विजय करने में लगाता है । बालक ज्ञान और कार्यों के वृहद संसार में प्रवेश चाहता है ।’’ यानी उसकी ‘‘उद्योग उम्र’’ की शुरूआत हो जाती है ।’’

बालक इस अवस्था में सीखने और योजना बनाने के लिए जल्दी तैयार हो जाता है । माता-पिता और अध्यापक यदि बालक को क्रिया करने के लिए हतोत्साहित करते हैं तो वे उसमें हीन भावना उत्पन्न कर सकते हैं । दूसरी और बालक में उद्यमिता विकसित होती है तो वह इस संसार में अपने आपको समायोजित कर सकता है । बालक जो करता है उस पर साधिकारिता चाहता है । यदि बालक अभी बच्चा बना रहता है तो यह उसे हीन भावना ग्रन्थि (Inferiority complex) विकास की तरफ ले जाती है ।’’

5. तदात्मिकता बनाम भ्रान्ति (Identity vs diffusion) :- यह अवस्था 12 वर्ष से 18 वर्ष तक होती है ।’’ तदात्मिकता की संरचना बाल्यावस्था से लगातार सफल अहम (आत्म) संश्लेषण और बार बार संश्लेषण द्वारा होती है ।’’

तदात्मिकता का एकीकरण विशिष्ट आवश्यकताओं, वांछित क्षमताओं, महत्वपूर्ण पहचान, प्रभावी और सफल तथा सतत भूमिका निर्वाह द्वारा होता है । विश्वास, आत्मनिर्भरता, पहल करना और उद्यमिता मिलकर बालक की तदात्मिकता बनाने में योगदान देते हैं । तीव्र कार्यिकी परिवर्तन एक नयी शरीर रचना करती है तथा साथ ही व्यावसायिक और शैक्षिक निर्णय लेने हेतु विभिन्न भूमिकाओं का सामाजिक दबाव भी बालक पर पड़ता है । विभिन्न भूमिकाओं का एकीकरण इस अवस्था का मुख्य कार्य है। यह तदात्मिकता किशोर के लिए नयी आवश्यकताओं, कौशलों तथा लक्ष्यों हेतु उपयुक्त होती है । यदि किशोर अपनी पहचान और भूमिका का एकीकरण नहीं कर पाता तो वह ‘‘पहचान भ्रान्ति’’ का सामना करता है । उसका व्यक्तित्व खंडित हो जाता है । किशोर अपने पुत्र, पुत्री, विद्यार्थी, खिलाड़ी, मित्र आदि की भूमिका को एक अर्थपूर्ण सम्पूर्णता के रूप में एकीकृत कर सकना सीख सके और अपनी मनोसामाजिक पहचान बना सके इसके लिए एकीकरण आवश्यक हे । यदि वह ऐसा करने में असफल हो जाता है तो वह अपने विषय में अनिश्चित ही रहता है ।’’

6. घनिष्ठता बनाम एकाकीपन (Intimacy vs isolation) :- यह अवस्था 18 वर्ष से 35 वर्षों तक होती है ।’’ यदि एक युवा यह सोचकर डरे कि दूसरे के साथ मैं अपनी पहचान नहीं रख सकता तो आगे चलकर वह एकाकीपन की ओर अग्रसर हो जाता है । घनिष्ठता का अर्थ लैंगिक होने से कहीं अधिक है । घनिष्ठता एक ऐसी क्षमता है जो वास्तविक और परिपक्व मनोसामाजिक पक्ष को विकसित करती है जिसमें मित्र बनाना तथा बिना अपनी पहचान गुम किये दूसरों का ध्यान रखना है । इस घनिष्ठता के अभाव में एकाकीपन आने लगता है । घनिष्ठता का मुख्य आधार प्रेम (एक दूसरे के प्रति समर्पण) है । घनिष्ठता का एक पक्ष ‘‘हम’’ की एकात्मकता का भाव होना है । एकाकीपन के केस में सम्बन्ध औपचारिक, उदासीन और खोखले हो जाते हैं।’’

7. सृजनात्मक और उत्पादकता बनाम ठहराव (Creativity vs stagnation) :- इस अवस्था का काल 35 वर्ष से 65 वर्ष या मध्यम प्रौढ़ावस्था का काल होता है ।’’ इस अवस्था में व्यक्ति सृजनशील या उत्पादक तरीके से बच्चों का पालन पोषण करते हुए नयी पीढ़ी को मार्गदर्शन प्रदान करता है । इसमें वह समाज और अपने बच्चों के भविष्य दोनों के विषय में सोचता है, यदि किसी व्यक्ति में उत्पादकता और सृजनात्मक के भाव का अभाव हो तो वह व्यक्ति निष्क्रिय और रुग्ण मानसिकता से ग्रस्त हो जाता है । उत्पादकता के साथ मूल भाव देखभाल करने का है जिसका अर्थ है व्यक्ति आने वाली पीढ़ी के प्रति अपना उत्तरदायित्व समझता है ।’’

8. सम्पूर्णता बनाम हताशा (Integrity vs capespair) :- यह अवस्था पश्च प्रौढ़ावस्था और 65 वर्ष से अधिक आयु की मानी जाती है । इस अवस्था में व्यक्ति अपने अब तक जीवन भर में जो कुछ बनाया है, उसके साथ रहता है ।’’

आदर्श: व्यक्ति सम्पूर्णता को प्राप्त कर लेगा । सम्पूर्णता में जीवन की सीमाओं की स्वीकारता, अपने को पूर्व पीढ़ियों का एक अंश रूप मानना, विभिन्न अवस्थाओं की बुद्धिमता का भाव और सभी पूर्व अवस्थाओं की अन्तिम सम्पूर्णता सम्मिलित होती है ।’’

इसके विपरीत के भाव में व्यक्ति को हताशा होती है जिसमें उसे किये हुए और न किये हुए का पछतावा, मृत्यु की तरफ जाने का भय और स्वयं से घृणा भाव उत्पन्न हो जाता है ।’’

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