राष्ट्रीयता के विविध तत्व

राष्ट्र उस राज्य को कहते हैं, जिसके निवासियों में परस्पर एक होने की अनुभूति हो, जिनमें राष्ट्रीयता की भावना विद्यमान हों। राज्य ऐसा भी हो सकता है, जिसमें अनेक प्रकार के लोगों का निवास हो। 1914-18 के महायुद्ध से पूर्व आस्ट्रिया-हंगरी के राज्य में आस्ट्रियन, हंगेरियन, चेक, स्लोवक, स्लाव आदि अनेक जातियों व जन-समूहों का निवास था। उसे हम राष्ट्र (नेशन) नहीं कह सकते थे, यद्यपि वह राज्य था। जब तक आयरलैंड ग्रेट ब्रिटेन का एक अंग था, ब्रिटिश पार्लियामेंट ही आयरलैंड का भी शासन करती थी। ग्रेट ब्रिटेन राज्य था, पर राष्ट्र नहीं, क्योंकि आयरिश लोग ब्रिटेन के अन्य निवासियों के साथ एकता की भावना नहीं रखते थे। अठारहवीं सदी के अन्त तक यूरोप के बहुसंख्यक राज्यों का निर्माण राष्ट्रीयता के सिद्धान्त के अनुसार नहीं हुआ था। 

फ़्रान्स की राज्य क्रान्ति (1789 ई.) ने जहाँ लोकतन्त्र शासन की प्रवृत्ति को जन्म दिया, वहाँ राष्ट्रीयता के सिद्धान्त का भी प्रबल रूप से प्रतिपादन किया। 1918 तक भी यूरोप के बहुत-से राज्य अनेक जातियों व विविध प्रकार के लोगों से निर्मित थे। पोलैण्ड, चेकोस्लाविया आदि राष्ट्रीयता के सिद्धान्त पर आश्रित राज्य उस समय यूरोप के नक्शे पर विद्यमान नहीं थे।

राष्ट्रीयता की भावना-मनुष्यों में शुरू से यह प्रवृत्ति रही है कि जिन लोगों की नस्ल, भाषा, धर्म, रीति-रिवाज और ऐतिहासिक परम्परा एक हों, वे परस्पर मिलकर एक संगठन में संगठित रहें। इतिहास के प्रारंभ काल में इस प्रकार के एक सदृश लोगों के समूहों को जाति, जन या कबीला (Tribe) कहा जाता था। जब एक जाति या जन ने किसी एक निश्चित भूखण्ड पर बसकर अपना पृथक राज्य बना लिया, तो वह राज्य जनपद या राष्ट्र कहलाया। भारत के प्राचीन ग्रन्थों में इन राज्यों के लिये जनपद और राष्ट्र-दोनों शब्दों का प्रयोग किया गया है।

फ़्रान्स की राज्यक्रान्ति ने जिन नई शक्तियों व प्रवृत्तियों को जन्म दिया, राष्ट्रीयता की भावना उनमें प्रमुख थी। जो लोग धर्म, भाषा नस्ल, रीति-रिवाज और ऐतिहासिक परम्परा की दृष्टि से एक हैं, उनका अपना पृथक राज्य होना चाहिये और इस राज्य में किसी स्वेच्छाचारी राजा का शासन न होकर सर्वसाधारण जनता को लोकमत के अनुसार शासन होना चाहिये, यह सिद्धांत फ़्रान्स की राज्यक्रान्ति की मुख्य देन है। इसी कारण जब लुई सोलहवां पेरिस से भाग निकला, तो एक फ़्रान्सीसी ने कहा था- यदि राजा भाग गया तो कोई बात नहीं, फ्रेंच राष्ट्र तो विद्यमान है। फ़्रान्स की राज्यक्रान्ति से शुरू होकर राष्ट्रीयता की भावना निरन्तर प्रबल होती गई और धीरे-धीरे यूरोप के प्राय: सभी राज्यों का निर्माण राष्ट्रीयता के सिद्धान्त के अनुसार हो गया। न केवल यूरोप में, अपितु अफ्रीका, एशिया आदि अन्य भूखण्डों में भी यह भावना निरन्तर प्रबल होने लगी और अब वह समय दूर नहीं है जबकि संसार के सभी राज्य राष्ट्र के रूप में परिवर्तित हो जाएँगे। 

राष्ट्रीयता के सिद्धान्त के अनुसार निर्मित हुए राज्य को ही राष्ट्र कहते हैं। राष्ट्रीयता मानवजाति की मूलभूत भावनाओं में से एक है। इतिहास के प्रारम्भ में जन, जाति या कबीले के रूप में जो समूह संगठित थे, उनकी तह में यही भावना विद्यमान थी। अनेक सदियों तक मध्यकाल में यह भावना दबी रही। अर्वाचीन काल में इस भावना ने एक बार फिर जोर पकड़ाऋ और अब जो फ़्रान्स, इंग्लैण्ड, भारत, इण्डोनेशिया, बर्मा, पोलैण्ड आदि विविध राज्यों के लोग अपनी पृथक सत्ता, राष्ट्रीय स्वतन्त्रता और सामूहिक उन्नति के लिये तत्पर हैं, उसका कारण यह भावना ही है।

मनुष्य जाति के किसी अंग में जो परस्पर एकानुभूति होती है, उसे ही राष्ट्रीयता कहा जाता है। यह एकानुभूति धर्म, नस्ल, भाषा, व्यवहार, रीति-रिवाज आदि की एकता व समानता के कारण उत्पन्न होती है। जिस राज्य के निवासी यह एकानुभूति रखते हैं, उसे राष्ट्र कहते हैं।

राष्ट्रीयता के विविध तत्व

नस्ल, भाषा, धर्म आदि जिन तत्वों के कारण मनुष्यों में एकानुभूति उत्पन्न होती है, उन पर अधिक विस्तार से विचार करना उपयोगी है-

(1) नस्ल की एकता-जिन लोगों की नस्ल एक हो, यह स्वाभाविक है कि उनमें अपने को एक समझने की भी प्रवृत्ति हो। इतिहास के प्रारंभ काल में जिन विविध जनों ने अपने पृथक जनपदों व राष्ट्रों का निर्माण किया था, वे नस्ल की दृष्टि से एक थे।

आजकल विविध राज्यों में जिन लोगों का निवास है, उन्हें नस्ल की दृष्टि से किसी एक विशुद्ध नस्ल का कह सकना सुगम नहीं है। वे प्राय: विविध नस्लों के सम्मिश्रण हैं, तथापि उनमें यह अनुभूति अवश्य विद्यमान है कि नस्ल या जाति की दृष्टि से एक हैं। राजनीतिशास्त्र की दृष्टि से नस्ल की एकता की अनुभूति होना ही पर्याप्त है। जर्मन, फ्रेंच, इंग्लिश आदि लोग अपने को जातीय दृष्टि से एक समझते हैं। यदि इंग्लैण्ड के निवासियों पर ही विचार किया जाये, तो वे भी केल्ट, ब्रिटिश, एंगल, नार्मन आदि विविध जातियों के सम्मिश्रण हैं। फिर भी उनमें यह भावना विद्यमान है कि हम सब इंग्लिश हैं। यही बात फ्रेंच, इटालियन, जर्मन आदि लोगों के विषय में भी कही जा सकती है।

(2) भाषा की एकता-राष्ट्रीयता के विकास के लिये भाषा एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तत्व है। भाषा ही एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य व मानव-समुदाय अपने भावों को दूसरों के सम्मुख प्रकट करता है। जिस प्रकार पहाड़, नदी व समुद्र मनुष्यों को आपस में मिलने-जुलने में रुकावट पैदा करते हैं, वैसे ही भाषा की भिन्नता मनुष्यों में पारस्परिक संबंध स्थापित करने में बाधक होती है। मानव-समाज भी एक जीवित-जागृत शरीर के समान है, उसका भी अपना एक व्यक्तित्व होता है। इस व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करने का सर्वोत्तम साधन भाषा ही है। मनुष्यों के विभिन्न समुदायों के अपने-अपने आदर्श, अपनी-अपनी भावनायें और अपने-अपने विचार होते हैं। इनकी अभिव्यक्ति के लिये भाषा ही का प्रयोग होता है। संगीत, काव्य और साहित्य द्वारा जहाँ किसी विशिष्ट मानव समुदाय की अपनी विशेषतायें अभिव्यक्त होती हैं, वहाँ यह तो स्पष्ट ही है कि भाषा के बिना संगीत, काव्य और साहित्य का विकास संभव नहीं है। भाषा एक ऐसा साधन है, जिससे मनुष्य एक-दूसरे के समीप आ जाते हैं, उसमें घनिष्ठता स्थापित हो जाती है। यही कारण है कि एक भाषा बोलनेवाले लोग परस्पर एकानुभूति रखने लगते हैं। राष्ट्रीयता की भावना के लिये भाषा का तत्व परम आवश्यक है।

पर ऐसे भी अनेक राष्ट्र हैं, जिनमें एक से अधिक भाषाएं बोलने वाले जनसमूह निवास करते हैं। स्विट्जरलैण्ड में तीन भाषायें बोली जाती हैं-फ्रेंच, जर्मन और इटालियन। पर भाषा का भेद होते हुए भी स्विस लोग राष्ट्रीयता की अनुभूति रखते हैं। कनाडा में दो भाषायें हैं, फ्रेंच और अंग्रेजी। यह होते हुए भी कनाडियन लोग एक राष्ट्र है। भारत में बहुत-सी भिन्न-भिन्न भाषायें हैं। पर फिर भी यहाँ के निवासी अपने को एक राष्ट्र का निवासी समझते हैं। राष्ट्रीयता की भावना भारत के सब निवासियों में विद्यमान है। पाकिस्तान में पंजाबी, उर्दू, सिन्धी, बंगला आदि अनेक भाषायें हैं, पर फिर भी उसके निवासियों में राष्ट्रीय एकता की भावना विद्यमान है।

पर यह मानना होगा कि भाषा की भिन्नता के कारण राष्ट्रीय एकता कुछ-न-कुछ निर्बल अवश्य हो जाती है। भारत में ही महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आन्ध्र, पंजाब आदि के निवासियों में जो प्रान्तीय भावना कभी-कभी प्रबल हो उठती है, उसका एक मुख्य कारण भाषा की भिन्नता ही है। इसीलिये एक राष्ट्रभाषा के विकास की आवश्यकता भारत में अनुभव की जा रही है। हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा स्वीकार कर लिया गया है और जब इस विशाल राज्य के विविध प्रदेशों में हिन्दी का भलीभाँति प्रचार हो जायेगा, तो राष्ट्रीयता की भावना अधिक सुदृढ़ हो सकेगी। 

(3) धर्म की एकता-मनुष्यों को एक-दूसरे के समीप लाने के लिये धर्म का भी बड़ा महत्त्व है। जिससे मनुष्यों का अभ्युदय हो और वे इहलोक तथा परलोक में सुख प्राप्त करें, उसे धर्म कहा जाता है। यद्यपि सब धर्मों के मूलभूत तत्व एक हैं, पर उनका बाह्य कलेवर भिन्न-भिन्न है। इस्लाम, ईसाई मत, बौद्ध धर्म, हिन्दू धर्म आदि सब धर्मों व सम्प्रदायों के नैतिक सिद्धान्तों व सदाचार के नियमों में विशेष भेद नहीं है, पर उनके पूजा-पाठ, विधि-विधान व विश्वासों में बहुत अन्तर है। जो लोग एक ढंग से ईश्वर की पूजा करें, एक प्रकार के विधि-विधानों का अनुष्ठान करें, एक प्रकार के सामाजिक व्यवहार का अनुसरण करें, उनमें यदि एकानुभूति का भी विकास हो, तो यह सर्वथा स्वाभाविक ही है।

अर्वाचीन काल में धर्म के भेद के कारण राष्ट्रीयता में भी भेद उत्पन्न हुआ है। 1731 तक बेल्जियम और हालैण्ड एक राज्य थे। पर बेल्जियम के निवासी रोमन केथोलिक धर्म के अनुयायी थे और हॉलैण्ड के निवासी प्रोटेस्टेन्ट थे। 1831 में इस राज्य का एकता नष्ट हुई और प्रधानतया धर्म के आधार पर दो पृथक राज्यों का निर्माण किया गया। जब आयरलैण्ड ग्रेट ब्रिटेन का एक अंग था, तो आयरिश लोग अपने पृथक राज्य के लिये उत्सुक थे। आयरिश लोग जो अंग्रेजों के साथ मिलकर एक नहीं हो सके, उसका एक बड़ा कारण यह भी था कि आयरिश लोग रोमन केथोलिक थे और अंग्रेज प्रोटेस्टेट। जब आयरलैण्ड स्वतन्त्र हुआ, तो उसी के एक प्रदेश अल्स्टर के निवासी आयरिश लोगों के साथ मिलकर रहने के लिए उद्यत नहीं हुए। परिणाम यह हुआ कि अल्स्टर को आयरलैंड में सम्मिलित नहीं किया गया। भारत और पाकिस्तान के रूप में भारतवर्ष जो दो पृथक राज्यों में विभक्त हुआ है, उसका प्रधान कारण धर्म-भेद ही हैं। 

पर अर्वाचीन काल के अनेक सभ्य व उन्नत राज्यों में राष्ट्रीय एकता की अनुभूति के लिये धर्म का भेद बाधक नहीं रहा है। युगोस्लाविया में मुख्यतया सर्ब और क्री लोगों का निवास है। सर्ब ग्रीक केथोलिक सम्प्रदाय के अनुयायी हैं और क्रेट रोमन केथोलिक चर्च के। पर उन दोनों में नस्ल, भाषा और रीति-रिवाजों की एकता के कारण राष्ट्रीय एकता की अनुभूति है और इसीलिये उन्होंने साम्प्रदायिक व धार्मिक भेद को महत्त्व नहीं दिया। चीन में बौद्ध लोगों के साथ-साथ ईसाई भी अच्छी बड़ी संख्या में हैं। पर भाषा, संस्कृति और नस्ल की एकता के कारण चीनी ईसाई अपने को बौद्ध चीनियों से पृथक नहीं समझते। ईजिप्ट में ईसाइयों की संख्या दस फीसदी के लगभग है, पर वे वहाँ के 90 फीसदी मुसलमानों से अपने को पृथक समझने की आवश्यकता नहीं मानते।

(4) भौगोलिक एकता-जो लोग किसी एक ही प्रदेश में एक साथ रहते हैं, धीरे-धीरे उनमें परस्पर संबध बढ़ता जाता है और वे अपने को एक समझने लगते हैं। राष्ट्रीय एकता की अनुभूति के लिये भौगोलिक एकता आवश्यक होती है। एक स्थान पर देर तक बसे रहने के कारण भिन्न नस्ल व भिन्न धर्म के लोग भी उस स्थान के अन्य निवासियों के साथ एकानुभूति रखने लगते हैं। भारत के पारसी इसके उदाहरण हैं। उनकी नस्ल (जाति) व धर्म बम्बई प्रदेश के अन्य लोगों से भिन्न हैं। पर भौगोलिक एकता के कारण अब वे बम्बई के हिन्दुओं के सदृश ही भारतीय हो गये हैं। संयुक्त-राज्य अमेरिका में इंगलिश लोगों के अतिरिक्त जर्मन, ग्रीक, इटालियन, फ्रेंच व जापानी लोग भी पर्याप्त संख्या में बसे हुए हैं। पर अमेरिका में रहने से भौगोलिक एकता के कारण वे सब अमेरिकन हो गये हैं। यही बात कनाडा में बसे हुए फ्रेंचऔर इंग्लिश लोगों के संबंध में भी कही जा सकती हैं।

(5) संस्कृति और ऐतिहासिक परम्परा की एकता-जिस जनसमुदाय की संस्कृति, रीति-रिवाज व ऐतिहासिक परम्परा एक होती है, वह भी राष्ट्रीय एकता अनुभव करता है। सम्भवत:, इस युग में इस तत्व का राष्ट्रीय एकता के लिये महत्त्व बहुत अधिक है। काव्य, कला, साहित्य, संगीत, भाषा, धर्म-ये सब संस्कृति के विकस में सहायक होते हैं। ज्यों-ज्यों मनुष्य सभ्यता की ओर कदम बढ़ाता जाता है, वह केवल अपनी भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिये ही उद्योग नहीं करता। स्थूल शरीर की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त वह मन ओर आत्मा की आवश्यकताओं को भी पूर्ण करना चाहता है। इनकी पूर्ति काव्य, कला, संगीत आदि द्वारा होती है और इन सबसे मिलकर मनुष्य के जीवन में उस प्रकार का विकास होता है, जिसे हम संस्कृति कहते हैं। 

चीन, भारत, फ़्रान्स, रूस आदि सब देशों की संस्कृति भिन्न-भिन्न हैं। जिन लोगों की संस्कृति एक होती है, वे परस्पर मिलने में, साथ रहने में एक प्रकार का आÈाद अनुभव करते हैं। इस कारण उनमें जो एकानुभूति उत्पन्न होती है, वह राष्ट्रीयता का परम सहायक तत्व है। अमेरिका में रहने वाले विभिन्न जातियों के लोग एक संस्कृति को अपना चुके हैं। चीन के लोगों के अनेक धर्म हैं, पर उनकी संस्कृति एक है। यही बात रूस, भारत आदि के संबंध में भी कही जा सकती है।

(6) राजनीतिक आकांक्षा की एकता-जिन लोगों की नस्ल, भाषा, धर्म, आदि एक हों, उनकी यह स्वाभाविक राजनीतिक आकांक्षा होती है कि वे अपना एक पृथक राज्य बनाएँ। राष्ट्रीय भावना अपना मूर्तरूप ‘राज्य’ द्वारा ही प्राप्त करती है। 1914-18 के महायुद्ध से पूर्व पोल लोग जर्मनी, आस्ट्रिया और रूस-इन तीन राज्यों के अधीन थे। तीन विभिन्न शासनों के अधीन रहते हुए भी पोल लोगों में यह राजनीतिक आकांक्षा विद्यमान थी कि वे विदेशी आधि पत्य से मुक्त होकर अपना पृथक व स्वतन्त्र राज्य बनाएँ। 1914-18 के महायुद्ध के बाद उनकी यह आकांक्षा पूर्ण हुई। इसी प्रकार दक्षिण-पूर्वी यूरोप के जो स्लाव लोग अनेक राज्यों में बिखरे हुए थे, वे युगोस्लाविया के रूप में अपनी राजनीतिक आकांक्षा को पूर्ण करने में समर्थ हुए। भारत के मुसलमानों ने भी पाकिस्तान के निर्माण द्वारा अपनी राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति की। इजराइल के रूप में यहूदी लोगों की राजनीतिक आकांक्षा ने मूर्तरूप धारण किया। राष्ट्रीयता एक भावना है, वह मनुष्यों के मानसिक चिन्तन व अनुभूति का परिणाम है। इसके विपरीत राज्य एक मूर्त सत्ता है। जब राज्य का निर्माण राष्ट्रीय भावना के अनुसार होता है, जब मनुष्यों की मानसिक एकानुभूति राज्य में प्रतिबिम्बित होती है, तब हम उसे ‘राष्ट्र’ कहते हैं।

(7) राज्य और समाज - राज्य के स्वरूप को भलीभांति समझने के लिये यह भी उपयोगी होगा कि राज्य और समाज (Society) के भेद को जान लिया जाए। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, समाज में रहना उसकी प्रकृति (स्वभाव) है। अपनी इस प्रकृति को मनुष्य अनेकविध समुदाय बनाकर प्रगट करता है और अपने साथी अन्य मनुष्यों के साथ अनेकविध संबंध स्थापित करता है। ये संबंध मनुष्य की क्रियाओं को अनेक प्रकार से नियन्त्रित व मर्यादित करते हैं। दूसरे मनुष्यों के साथ संबंध स्थापित कर लेने के कारण मनुष्य जो चाहे नहीं कर सकता। वह न पूर्णतया स्वच्छन्द हो सकता है, न उच्छृंखल। संगठन का अंग होने के कारण मनुष्यों को एक निश्चित व्यवस्था का अनुसरण करना होता है, एक निश्चित मर्यादा में रहना पड़ता है। दूसरों के साथ संबंध होने के कारण ही मनुष्यों को यह सोचना पड़ता है कि उनके कौन-से व्यवहार अनुचित हैं और कौन-से समुचित हैं, किस प्रकार का आचरण उपयुक्त है, दूसरों के साथ बरतते हुए उन्हें किन बातों को ध्यान में रखना है। मनुष्यों के जीवन में एक-दूसरे के साथ संबंधों का जो जाल-सा बिछा हुआ है, उसी को ‘समाज’ कहा जाता है। इस प्रकार समाज एक अत्यन्त व्यापक संज्ञा है, जिसमें सब प्रकार के मानव-संबंधों का समावेश रहता है। राज्य समाज की तुलना में बहुत संकुचित व संकीर्ण है। राज्य द्वारा मानव-संबंधों के एक विशिष्ट प्रकार का बोध होता है, जबकि समाज में सब प्रकार के मानव-संबंध समाविष्ट रहते हैं। राज्य और समाज के भेद की हम इस प्रकार अधिक स्पष्ट कर सकते हैं-

(1) समाज व्यापक है और राज्य उसकी तुलना में संकीर्ण। समाज में सब प्रकार के मानव संबंधों (धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक, नैतिक आदि) का समावेश रहता है। इसके विपरीत राज्य में मनुष्यों के केवल राजनीतिक संबंध समाविष्ट होते हैं। समाज और राज्य के प्रयोजनों व उद्देश्यों में भी भेद है। जैसा कि बार्कर ने लिखा है-फ्प्रयोजन की दृष्टि से उनमें भेद है। राज्य की सत्ता एक महान पर केवल एक ही प्रयोजन के लिये है, जबकि समाज की सत्ता अनेक प्रयोजनों के लिये है जिनमें कि कुछ महान प्रयोजन हैं और कुछ साधारण-यद्यपि समष्टि रूप में वे सब अत्यन्त गंभीर व व्यापक होते हैं।

(2) राज्य और समाज के संगठन में भी भेद है। राज्य का संगठन बहुत सुदृढ़ होता है, सबको उसके आदेशों का पालन करना ही होता है, अपने आदेशों का पालन कराने के लिये वह शक्ति का भी प्रयोग कर सकता है। इसके विपरीत समाज का संगठन न सुदृढ़ होता है और न सुस्पष्ट। विभिन्न समुदायों, कम्युनिस्टों आदि की समष्टि से ही समाज का निर्माण होता है। समाज के नियमों व आदेशों का पालन भी मनुष्य स्वेच्छापूर्वक ही करते हैं, किसी शक्ति प्रयोग द्वारा नहीं।

(3) समाज अत्यन्त प्राचीन है। क्योंकि समाज में रहना मनुष्य की प्रकृति है, अत: सामाजिक जीवन व संगठन का तभी सूत्रपात हो गया था, जबकि मानव इस पृथ्वी पर प्रगट हुआ। जबकि राज्य-संस्था का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था, तब भी मनुष्य सामाजिक जीवन व्यतीत करता था। परिवार, कुल, रेवड़ आदि तब उसकी सामाजिकता के विभिन्न रूप थे। राज्य का प्रादुर्भाव बाद में हुआ। राज्य-संस्था भी मनुष्य की सामाजिकता का ही परिणाम है।

(4) राज्य के जो आवश्यक तत्व हैं, वे समाज के नहीं हैं। जनता का तत्व दोनों में समान है। पर सरकार और प्रभुता के तत्व समाज में नहीं पाये जाते। साथ ही, समाज के लिये कोई निश्चित भू-भाग भी अपेक्षित नहींं है। प्रभुत्व शक्ति एक ऐसा तत्व है, जो राज्य की अनुपम विशेषता है। वह समाज में नहीं पाया जाता।

जिन विविध मानव-संबंधों के तारतम्य से समाज का निर्माण होता है, राजनीतिक संबंध भी उनमें अन्तर्गत हैं। राज्य का क्षेत्र इन राजनीतिक संबंधों तक ही सीमित है। पर समाज का क्षेत्र उसकी तुलना में बहुत व्यापक है। समाज के दायरे में मनुष्यों के जीवन के वे सब अंग आ जाते हैं, जिनका संबंध अन्य मनुष्यों के साथ भी हो। समाज और राज्य-दो पृथक सत्ताएँ हैं, पर उनमें घनिष्ठ संबंध भी है। राज्य द्वारा ही वे परिस्थितियाँ उत्पन्न की जाती हैं, जिनके कारण मनुष्य एक-दूसरे के साथ विविध प्रकार के संबंधों का विकास कर सकने में समर्थ होते हैं। समाज में शान्ति, सुव्यवस्था और निश्चिन्तता उत्पन्न करना राज्य का ही कार्य है। पर साथ ही समाज द्वारा यह पृष्ठभूमि निर्मित होती है, जिसके कारण राज्य-संस्था अपना कार्य कर सकती है। कोई भी राजनीतिक संगठन तब तक स्थिर नहीं रह सकता, जब तक कि मनुष्यों में सामाजिकता की सत्ता न हो।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं। मैंने अपनी पुस्तकों के साथ बहुत समय बिताता हूँ। इससे https://www.scotbuzz.org और ब्लॉग की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

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