संयुक्त राष्ट्र महासभा के कार्य एवं शक्तियां

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महासभा छह प्रधान अंगों में से सबसे बड़ी महासभा सर्वाधिक विमर्शात्मक अंग है। यह अन्य सभी अंगों से सम्बद्ध है और यह उनके आंशिक अथवा सभी सदस्यों का निर्वाचन करता है। यह सुरक्षा परिषद के दायरे में आने वाले विवादों को छोड़कर चार्टर के क्षेत्र में आने वाले किसी भी विषय पर चर्चा कर सकता है। निर्वाचन के बाद यह अन्य अंगों और सदस्य सरकारों को यह सुझाव प्रस्तावित कर सकता है। इसमें सभी सदस्य-राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हैं जिनमें से प्रत्येक को एक वोट प्राप्त है। 

चार्टर में वर्णित महत्त्वपूर्ण मामलों पर निर्णय के लिए जैसे कि शांति एवं सुरक्षा, नए सदस्यों की भागीदारी, बजट संबंधी मामलों पर प्रस्तावों के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है। अन्य मामलों पर निर्णय वोटिंग द्वारा साधारण बहुमत से हो सकते हैं।

महासभा के निर्माण के पीछे मूल विचार यह था कि इसका संयुक्त राष्ट्र के एक परिपूर्ण अंग के रूप में विकास किया जाए जिसमें सभी सदस्य राज्यों को बिना किसी आकार, आबादी, सामाजिक-आर्थिक विकास तथा सैनिक एवं वित्तीय शक्ति के एक वोट के अधिकार सहित प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए। इसकी शक्तियों और भूमिकाओं की चर्चा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 10 में की गई है जिसमें कहा गया है कि यह मौजूदा चार्टर के दायरे में आने वाले किसी भी प्रश्न या मामले पर चर्चा कर सकता है। 

संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य राज्यों की सहभागिता से सभी मामलों पर वाद-विवाद के लिए एक मंच की भूमिका निभाने के अलावा महासभा आर्थिक एवं सामाजिक परिषद तथा न्यास परिषद के लिए समग्र रूप से और सुरक्षा परिषद एवं सचिवालय के लिए आंशिक रूप से मातृ-अंग भी है क्योंकि यह महासचिव के साथ-साथ इन निकायों के सदस्यों का निर्वाचन भी करती है। इन अंगों से प्राप्त होने वाली वार्षिक एवं विशेष रिपोर्टों पर विवेचन के कारण इसकी स्थिति को और भी बल मिलता है। 

इसी प्रकार 2005 में प्रस्तुत प्रस्तावों के अनुसार संयुक्त राष्ट्र में सुधारों की पहल से महासभा की स्थिति एक संसदीय मंच में बदल गई है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के कार्य एवं शक्तियां

संयुक्त राष्ट्र महासभा के कार्य एवं शक्तियां, चार्टर के अनुसार महासभा की निम्नलिखित कार्य एवं शक्तियाँ हैं : 
  1. अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने के लिए सहयोग के सिद्धान्तों के साथ-साथ निशस्त्रीकरण और शस्त्राीकरण के नियमन के सिद्धांतों के लिए सुझाव प्रस्तावित करना।
  2. सुरक्षा परिषद् के अधीन किसी विवाद या मामले को छोड़कर शेष रूप से अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा से जुड़े किसी प्रश्न पर चर्चा करना और उस संबंध में सुझाव देना।
  3. संयुक्त राष्ट्र के किसी अंग की कार्य एवं शक्तियों को प्रभावित करने वाले या चार्टर के अंतर्गत आने वाले किसी प्रश्न पर चर्चा एवं परामर्श देना।
  4. अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक सहयोग, अंतर्राष्ट्रीय कानून के विकास और संहिताकरण सभी के लिए मानव अधिकारों एवं मौलिक स्वतंत्राताओं की सुनिश्चितता तथा आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक एवं स्वास्थ्य क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए अध्ययन एवं परामर्श देना। अ राष्ट्रों के मध्य मैत्राीपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देने के लिए उनके मूल स्थान पर विचार किए बिना किसी भी स्थिति के शांतिपूर्ण निपटारे के लिए परामर्श देना।
  5. सुरक्षा परिषद् व अन्य संयुक्त राष्ट्र अंगों द्वारा प्राप्त रिर्पोटों का विवेचन करना।
  6. संयुक्त राष्ट्र बजट पर विचार एवं अनुमोदन करना तथा सदस्यों के बीच योगदान का संविभाजन करना।
  7. सुरक्षा परिषद् के अस्थाई सदस्यों का चुनाव, आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् एवं न्यास परिषद के अस्थाई सदस्यों का निर्वाचन, सुरक्षा परिषद् के साथ संयुक्त रूप से अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायधीशों का निर्वाचन और सुरक्षा परिषद् के परामर्श पर महासचिव को नियुक्त करना। 

अधिवेशन

महासभा के नियमित अधिवेश प्रति वर्ष सितंबर माह के तीसरे मंगलवार से आरंभ होकर दिसंबर के मध्य तक चलते हैं। प्रत्येक सत्रा की शुरूआत पर महासभा एक नए अध्यक्ष, 21 उपाध्यक्षों तथा सभा की सात प्रमुख समितियों के अध्यक्षों का चुनाव करती है। समान भौगोलिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए प्रति वर्ष देशों के पाँच समूह के बीच अध्यक्षता का चक्रण होता है। ये देश हैं- अफीका, एशिया, पूर्वी यूरोप, दक्षिणी अमेरीका तथा पश्चिमी यूरोप एवं अन्य राज्य।

इसके नियमित अधिवेशनों के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों के बहुमत द्वारा सुरक्षा परिषद् के अनुमोदन पर महासभा विशेष अधिवेशनों का भी आयोजन करती है। परिषद् के किन्हीं भी नौ सदस्यों या संयुक्त राष्ट्र सदस्यों के बहुमत अथवा बहुसंख्यक सदस्यों द्वारा समर्थन मिलने पर किसी एक सदस्य के वोट द्वारा सुरक्षा परिषद् की प्रार्थना पर 24 घण्टों के भीतर आपातकालीन अधिवेशन भी बुलाया जा सकता है।

प्रत्येक नियमित अधिवेशन की शुरूआत के समय महासभा में एक सामान्य वाद-विवाद होता है जिसमें सदस्य राज्य अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर अपने विचार अभिव्यक्त करते हैं। चूँकि बड़ी संख्या में प्रश्नों पर विवेचन के कारण महासभा का दायित्त्व बढ़ जाता है इसलिए यह अधिकांश प्रश्नों का बँटवारा निम्नलिखित सात प्रमुख समितियों को सौंपता है : 
  1. पहली समिति (निशस्त्राीकरण और संबंधित अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले) 107 अ विशेष राजनीतिक समिति अ दूसरी समिति (आर्थिक एवं वित्तीय मामले) अ तीसरी समिति (सामाजिक, मानवतावादी और सांस्कृतिक मामले) 
  2. चौथी समिति (वि-उपनिवेशीकरण के मामले) अ पाँचवी समिति (प्रशासनिक और बजट संबंधी मामले) 
  3. छठी समिति (कानूनी मामले) हालांकि महासभा के निर्णय सरकारों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं पर वे बड़े अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर विश्व जनमत के साथ-साथ विश्व समुदाय के नैतिक प्राधिकरण का प्रतिनिधित्व करते हैं।

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