सूफी शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई ? सूफी मत का भारत में प्रवेश कब और कैसे हुआ

सूफी मत इस्लाम धर्म का ही एक अंग है। सूफी शब्द की उत्पत्ति सूफी शब्द कैसे चल पड़ा? कुछ लोगों की धारणा है कि सऊदी अरब के एक पवित्र नगर मदीना में मस्जिद के सामने एक सुफ्फा (चबूतरा) था, उस पर जो फकीर बैठते थे, वे सूफी कहलाये। प्रसिद्ध इतिहासकार अलबरूनी (जन्म काल 1971 ई.) ने ‘साफी’ (पवित्र) शब्द से ‘सूफ’ शब्द की उत्पत्ति बताई है। परन्तु आधुनिक काल के विद्वानों ने, जिनमें ब्राउन आरबेरी तथा मीर वलीउद्दीन प्रमुख है, सूफी की उत्पत्ति सफू से मानी है। फारसी में सफू का अर्थ ऊन है। प्रारम्भिक काल के सूफी साधक ऊनी कपड़े पहनते थे, इसीलिए उनको सूफी कहा जाने लगा।

सूफी शब्द की उत्पत्ति

सूफी शब्द की उत्पत्ति के संबंध में विद्वानों के कई मत है। सूफी शब्द का अर्थ समझना सरल नहीं है। इसके दो कारण है- प्रथमत: इसकी अलग-अलग परिभाषाएँ और व्याख्याएँ की जाती रही हैं। सूफी तथा तसव्वुफ (सूफी विचारधारा) की कितनी परिभाषाएँ की गयी है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि शेख फरीदुद्दीन अत्तार (1230 ई0) में सूफी संत से सम्बन्धित अपनी पुस्तक ‘‘तज़किरातुल-औलिया’’ में इस प्रकार की सत्तर परिभाषाओं का वर्णन किया है।

सूफी शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विचारकों व विद्वानों ने निम्नलिखित शब्दों पर विभिन्न सूफी मत सम्बन्धी पुस्तकों में तर्क-विर्तक तथा धारणाऐं प्रस्तुत की है- 
  1. सफा, 
  2. अहअल-सुफ्फाह, 
  3. सफ, 
  4. सूफाह, 
  5. बनूसूूफा, 
  6. सफवतुकलज़ा, 
  7. सेफिया, 
  8. सफाना एवं सूफ। 
1. सफा - कतिपय विद्वान सूफी शब्द की व्युत्पत्ति सफा शब्द से मानते है। सफा (पवित्रता) शब्द के सम्बनध में शेख अल्हुज्विरी का मानना है कि सफा में ही सूफी शब्द बना है। पवित्र सदाचारी लोग सूफी कहलाए। पवित्र एवं सदाचारी लोग सूफी कहलाए। प्राय: सूफी साधकों ने सफा से ही सूफी शब्द की व्युत्पत्ति को उचित माना है।

अल्हुज्विरी जी ने सफा शब्द से ही सूफी से माना तो है, परन्तु उनका कहना है कि अगर सफा शब्द को स्वीकार लिया जाए तो उससे सूफी शब्द नहीं बनेगा, बल्कि उसका रूप सफवीं होगा।

2. अहल-अल-सूफ्फा:- कुछ विद्वानों के विचारनुसार पैगम्बर मोहम्मद साहब के समय मदीने की मस्जिद नबवी के सामने सूफ्फा (चबूतरा) पर आसन लगाने वाले भक्त (भक्त) अहल-अल्-सूफ्फा शब्द से सूफी शब्द बना है। कालान्तर में ऐहले सुफ्फाह ही सूफी कहलाए। इस व्युत्पत्ति में यह दोश है कि सुफ्फाह से सुफ्फी शब्द बनेगा न कि सूफी नहीं। यही कथन डॉ0 राजबाला की पुस्तक में भी अंकित है-मदीने की मस्जिद के सामने बेंच पर बैठने वाले भक्तों अहल-अल-सुफ्फा के सुफ्फाह शब्द से सूफी शब्द बना है।

3. सफ्फ-ए-अव्वल:- कुछ विद्वानों ने सफ्फ-ए-अव्वल के सफ्फ शब्द से सूफी शब्द की संगति लगायी है। इसका अर्थ प्रर्थाना में ईमान लाने वालों की प्रथम पंक्ति से है। इसके सम्बन्ध में कहा जाता है कि सफ्फ शब्द से सफ्फी शब्द बनेगा सूफी नहीं।

4. सूफाह:- गियामुल लुगात में सूफाह से सूफी शब्द की उत्पत्ति मानी गयी है। 

5. बनूसूफा:-  कुछ लोग बनूसूफा नामक एक यायावर (घुमक्कड़) जाति सूफा शब्द से सूफी शब्द की व्युत्पत्ति बताते है। 

6. सोफिस्ता:- कतिपय विद्वानों ने ग्रीक शब्द ‘‘सोफिस्ता’’ में ‘‘सूफी’’ और थियोसोफिया शब्द से तसव्वुफ की व्युत्पत्ति करने की चेष्टा की है।

7. शोफिया:- कुछ विद्वान ग्रीक भाषा के शब्द सोफिया (ज्ञान) से सूफी शब्द की व्युत्पत्ति मानते हैं। सूफी शब्द का सोफिया से उत्पन्न है, ऐसे भी कुछ विद्वानों ने कहा है, जिसका अर्थ ‘ज्ञान’ होता है और यदि इसके आधार पर विचार किया जाय, तो सूफ़ियों को हम ‘ज्ञानी’ या ‘परमज्ञानी’ तक समझ सकते है। कुछ लोग सूफी शब्द की व्युत्पत्ति भावनात्मक संज्ञाओं से जोड़ते है, जिनका तात्पर्य पवित्रता, निश्छलता और ज्ञान से है।

8. सफ:- कुछ विद्वानों का यह कहना है कि सूफी शब्द सफ से उत्पन्न है, जिसका अर्थ ‘सबसे आगे की पंक्ति’ अथवा प्रथम श्रेणी किया जाता है और इसके अनुसार सूफी केवल उन्ही व्यक्तियों को कहा जा सकता है, जो कयामत के दिन ईश्वर के प्रियपात्र होने के कारण सबसे आगे खड़े किये जायेंगे और जिनमें इस बात की ओर संकेत करने के लिए कुछ विशेषता भी होनी चाहिए।अन्तिम निर्णय के दिन आचरण व कर्म के कारण अन्य लोगो के अलग एक पंक्ति में खड़े किए जाएंगे, उन्हें सूफी कहते हैं। यह भी त्रुटिपूर्ण है क्योंकि सफ से सफी बनेगा न कि सूफी। प्रसिद्ध विद्वान एवं सूफी सन्त गजाली का विचार है कि व्याकरण के नियमों के अनुसार सफ से सूफी शब्द की रचना हो ही नहीं सकती।

9. सूफ:- सूफी शब्द को सूफ शब्द का रूपान्तर मानने वाले विद्वान अधिक हैं। अरबी शब्द सूफ का अर्थ परम अथवा ऊन अबू नस्र अल सर्राज (988 ई0) एवं इब्न खल्दून सूफ (उन) से सूफी शब्द की व्युत्पत्ति मानते हैं। यह समूह सामान्यजन के विपरीत अच्छे वस्त्र के स्थान पर मोटे ऊनी वस्त्र पहनते थे। अल-सर्राज ने अपनी पुस्तक ‘‘किताब अल-लुमा’’ में सूफी शब्द पर विचार करते हुये कहा है कि सूफी शब्द अरबी के सूफ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ ऊन है। अल सर्राज़ ने कहा है कि ऊन का व्यहार अथवा उपयोग पैगम्बर सन्त एवं साधक करते आये हैं। इस बात की पुश्टि हदीसों से भी होती हैं। बोएल्द ने भी इस व्युत्पत्ति को ठीक माना है। अनेक सूफ़ियों, भाषा वैज्ञानिकों और विद्वानों ने इसी मत को समर्थन दिया है।

सूफी मत का भारत में प्रवेश कब और कैसे हुआ

सूफी मत का भारत में कब और कैसे प्रवेश हुआ, इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। 711 ई. में मुहम्मद बिन कासिम ने सिन्ध पर आक्रमण किया था। उसके साथ ही इस्लाम धर्म का भारत में आगमन हुआ। परन्तु सूफी मत का यहाँ पहुँचना 1000 ई. के बाद ही हुआ। सूफी मत -प्रचारकों में पहला नाम शेख इस्लाम का लिया जाता है, जो 1005 ई. में लाहौर में आये थे। लेकिन सूफी मत का प्रचार 1036 ई. के बाद ही जोर पकड़ सका, गजनी निवासी अल् हुज्विरी नामक एक विद्वान तथा धर्माचार्य भारत पहुँचे। इन्होंने 1050 ई. में फारसी भाषा में ‘कश्फुल महबूब’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखा, जिनमें सूफी मत की रूपरेखा स्पष्ट की गई है। 

अल् हुज्विरी के बाद भारत में सूफी मत की लोकप्रियता बढ़ी और उसके कई सम्प्रदाय-चिश्तिया, सुहरवर्दिया, कादरिया तथा नक्शबन्दिया यहाँ बन गये। उनके द्वारा सूफी मत के प्रचार को विशेष बल मिला। इस्लामी शासकों का समर्थन भी सूफियों को प्राप्त हुआ, क्योंकि इनका मत उनको इस्लाम के प्रचार-प्रसार में सहायता प्रतीत हुआ और इनके माध्यम से भारतीय जनता के साथ उनका सम्पर्क बढ़ा।

फारसी में ‘लैला-मजन’ू , ‘शीरी-खुसरो’, ‘यूसुफ-जुलेखा’ तथा ‘वामिक-आजरा’ की प्रेम कथाओं को लेकर अनेक मसनवियाँ लिखी गयी हैं। अल् हुज्विरी ने जब सूफी मत का शास्त्र ‘कश्फुल महबूब’ लिखा, उसके सौ से भी अधिक वर्षों बाद फारस के निजामी ने खुसरो-शीरीं और लैला-मजनं ू की प्रेम कथाओं पर आधारित, इन्हीं शीर्षकों से मसनवियाँ (प्रेमाख्यान) लिखीं। 

फारसी के दूसरे कवि जामी ने भी पाँच मसनवियां लिखीं जिसमें ‘यसूफ जुलेखा’ मसनवी प्रसिद्ध है। निजामी से प्रभावित होकर भारतीय कवि अमीर खुसरो ने फारसी में ‘शीरी.खुसरो’ मसनवी लिखी, जो भारतीय वातावरण एवं काव्य रूढ़ियों से प्रभावित है। बाद में बादशाह अकबर के दरबारी कवि फजै ी ने फारसी में ही महाभारत की नल-दयमन्ती कथा पर आधारित अपना ‘नल-दमन’ काव्य लिखा। ईरान तथा भारत में लिखित फारसी मसनवियों में कई प्रकार की असमानताएँ थी। 

अमीर खुसरों की मृत्यु के लगभग 50 वर्ष बाद हिन्दी में सूफी प्रेमाख्यान लिखे जाने लगे।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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