सूफी शब्द की उत्पत्ति और सूफी मत का इतिहास

सूफी शब्द की उत्पत्ति सूफी शब्द कैसे चल पड़ा? कुछ लोगों की धारणा है कि सऊदी अरब के एक पवित्र नगर मदीना में मस्जिद के सामने एक सुफ्फा (चबूतरा) था, उस पर जो फकीर बैठते थे, वे सूफी कहलाये। प्रसिद्ध इतिहासकार अलबरूनी (जन्म काल 1971 ई.) ने ‘साफी’ (पवित्र) शब्द से ‘सूफ’ शब्द की उत्पत्ति बताई है। परन्तु आधुनिक काल के विद्वानों ने, जिनमें ब्राउन आरबेरी तथा मीर वलीउद्दीन प्रमुख है, सूफी की उत्पत्ति सफू से मानी है। फारसी में सफू का अर्थ ऊन है। प्रारम्भिक काल के सूफी साधक ऊनी कपड़े पहनते थे, इसीलिए उनको सूफी कहा जाने लगा।

सूफी मत का इतिहास

‘सूफी’ मत का इतिहास तब से आरम्भ होता है जब मुहम्मद साहब मक्का से मदीना गये थे। यह घटना 633 ई. की है। इस्लाम में भक्ति का समावेश सूफियों ने ही किया। प्रारम्भिक सूफी साधकों में अल हसन, इब्राहिम बिन अदम, अयाज, राबिया और मंसूर आदि का नाम उल्लेखनीय है। वे साधक 643 से 922 ई. के बीच हुए।

सूफी मत पर ईसाइयत, नव-प्लेटोवाद, भारतीय वेदान्त और बौद्ध दर्शन का भी प्रभाव पड़ा। मनसूर के विषय में ता े यह प्रसिद्ध है कि उन्होंने भारत में आकर वेदान्त का अध्ययन किया था। उनका ‘अनल्हक’ (मै ही सत्य हूँ) का संदेश वेदांत का ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ) ही है। यह विचार स्पष्टत: इस्लाम के एकेश्वरवाद से भिन्न था। मुस्लिमों में कट्टरपंथियों को यह सहन न हुआ और मंसूर को प्राणदण्ड दे दिया गया। बाद में इस्लाम और सूफी मत में समन्वय हो गया और सूफी मत को इस्लाम में मान्यता मिल गयी।

सूफी मत की सम्पूर्ण साधना प्रेम पर आधारित है। सूफी वह है जो अपने प्रिय के प्रेम में सदैव मस्त रहता है। प्रेम ज्ञान की भाँति ईश्वरीय देन है। ईश्वर का प्रेमी वही हो सकता है, जिसे खुद ईश्वर प्रेम करता है। ईश्वर ने प्रेम के कारण ही सृष्टि की। ईश्वर स्वयं प्रेमस्वरूप है। प्रेम के सहारे हर चीज अपनी पूर्णता पर पहुँच जाती है। सूफी मत में प्रेम के साथ.साथ सौन्दर्य को भी महत्ता प्रदान की गयी है। ईश्वर को ही प्रेम और सौन्दर्य का स्रोत माना गया है- उससे बढ़कर सुन्दर और कोई नहीं। संसार के समस्त सौन्दर्य उसी की प्रतिरूप प्रतिच्छवि हैं। लौकि सौन्दर्य आकर्षक है अवश्य, पर साधक की दृष्टि केवल उसी पर टिकी नहीं रहती। बल्कि इस सौन्दर्य से गुजरते हुए अलौकिक सौन्दर्य अर्थात् ईश्वरी सौन्दर्य तक पहुँचती है। यही बात प्रेम के लिए भी है। सांसारिक प्रेम (इश्क मजाजी) ईश्वरीय प्रेम (इश्क हकीकी) तक पहुँचने का साधन है। सांसारिक प्रेम ही ईश्वरीय प्रेम में बदल जाता है। इसलिए सम्पूर्ण सूफी साहित्य में सांसारिक प्रेम के आलम्बन, अनुभव, विभाग तथा संचारियों का चित्रण किया गया है। 

सूफी साहित्य में नारी-प्रेम और नारी-सौन्दर्य ईश्वरीय प्रेम और सौन्दर्य का पर्याय बन गये। ईश्वर से वियुक्त होकर आत्मा विकल है, वह उसे पुन: प्राप्त करना चाहती है, पर ईश्वर मिलन के मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ है, जिन्हें साधक को पार करना पड़ता है। सांसारिक प्रपंच एवं अहंकार ही बाधक तत्त्व है यही शैतान है। आध्यात्मिक गुरु शिष्य का े सहायता देकर इन कठिनाइयों से उबारता है। अत: सन्त कवियों की तरह सूफी साधना में भी गुरु का महत्त्व है।

सूफी मत का भारत में प्रवेश

सूफी मत का भारत में कब और कैसे प्रवेश हुआ, इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। 711 ई. में मुहम्मद बिन कासिम ने सिन्ध पर आक्रमण किया था। उसके साथ ही इस्लाम धर्म का भारत में आगमन हुआ। परन्तु सूफी मत का यहाँ पहुँचना 1000 ई. के बाद ही हुआ। सूफी मत.प्रचारकों में पहला नाम शेख इस्लाम का लिया जाता है, जो 1005 ई. में लाहौर में आये थे। लेकिन सूफी मत का प्रचार 1036 ई. के बाद ही जोर पकड़ सका, गजनी निवासी अल् हुज्विरी नामक एक विद्वान तथा धर्माचार्य भारत पहुँचे। इन्होंने 1050 ई. में फारसी भाषा में ‘कश्फुल महबूब’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखा, जिनमें सूफी मत की रूपरेखा स्पष्ट की गई है। अल् हुज्विरी के बाद भारत में सूफी मत की लोकप्रियता बढ़ी और उसके कई सम्प्रदाय-चिश्तिया, सुहरवर्दिया, कादरिया तथा नक्शबन्दिया यहाँ बन गये। उनके द्वारा सूफी मत के प्रचार को विशेष बल मिला। इस्लामी शासकों का समर्थन भी सूफियों को प्राप्त हुआ, क्योंकि इनका मत उनको इस्लाम के प्रचार-प्रसार में सहायता प्रतीत हुआ और इनके माध्यम से भारतीय जनता के साथ उनका सम्पर्क बढ़ा।

सूफी प्रेमाख्यानक काव्यों की रचना : फारस और भारत में हिन्दी के सूफी प्रेमाख्यानों पर एक ओर जहाँ फारसी के सूफी प्रेमाख्यानों का प्रभाव है, वहाँ दूसरी ओर उनमें भारतीय प्रेमाख्यानों की प्रवृत्तियों का भी समावेश है। अत: हिन्दी पे्रमाख्यानों का अध्ययन फारसी के सूफी प्रेमाख्यानों के अध्ययन के बिना अपूर्ण ही माना जायेगा।

फारसी में ‘लैला-मजन’ू , ‘शीरी-खुसरो’, ‘यूसुफ-जुलेखा’ तथा ‘वामिक-आजरा’ की प्रेम कथाओं को लेकर अनेक मसनवियाँ लिखी गयी हैं। अल् हुज्विरी ने जब सूफी मत का शास्त्र ‘कश्फुल महबूब’ लिखा, उसके सौ से भी अधिक वर्षों बाद फारस के निजामी ने खुसरो.शीरीं और लैला-मजनं ू की प्रेम कथाओं पर आधारित, इन्हीं शीर्षकों से मसनवियाँ (प्रेमाख्यान) लिखीं। फारसी के दूसरे कवि जामी ने भी पाँच मसनवियां लिखीं जिसमें ‘यसू ुफ जुलेखा’ मसनवी प्रसिद्ध है। निजामी से प्रभावित होकर भारतीय कवि अमीर खुसरो ने फारसी में ‘शीरी.खुसरो’ मसनवी लिखी, जो भारतीय वातावरण एवं काव्य रूढ़ियों से प्रभावित है। बाद में बादशाह अकबर के दरबारी कवि फजै ी ने फारसी में ही महाभारत की नल.दयमन्ती कथा पर आधारित अपना ‘नल.दमन’ काव्य लिखा। ईरान तथा भारत में लिखित फारसी मसनवियों में कई प्रकार की असमानताएँ थी। अमीर खुसरों की मृत्यु के लगभग 50 वर्ष बाद हिन्दी में सूफी प्रेमाख्यान लिखे जाने लगे।

भारत के सूफी प्रेमाख्यानों में एक नवीन परम्परा तब पड़ी, जब सूफी मत निरूपण के लिए सूफी कवियों ने भारत में लाके .प्रचलित प्रेमकथाओं को ग्रहण किया और सूफी सिद्धान्त को अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए लोकभाषाओं अर्थात् अवधी, ब्रज, पंजाबी, बंगला आदि को अपनी काव्य भाषा बनाया। उत्तरी भारत के साथ-साथ दक्षिणी भारत में भी सूफी प्रेमाख्यान लिखे गए। दक्खिनी हिन्दी (हिन्दवी) में, जिसका केन्द्र हैदराबाद के आस.पास था, ‘कुतुबमुश्तरी’, ‘चन्दर बदन व महियार’ आदि अनेक प्रेमाख्यान लिखे गये।

इस सम्बन्ध में यह बात स्मरण रखने योग्य है कि उत्तर भारत की भाषाओं में लिखित सूफी प्रेमाख्यानों में भारतीय परमपरा को अधिक प्रश्रय मिला है और दक्खिनी हिन्दी (हिन्दवी) में लिखित सूफी प्रेमाख्यानों में फारसी परम्परा को।

परन्तु जहाँ तक काव्य.रूप का सम्बन्ध है, उत्तरी और दक्खिनी भारत के सभी सूफी प्रेमाख्यान काव्य मसनवी पद्धति के अनुकरण पर लिखे गए हैं।

मसनवी पद्धति- आपके मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि मसनवी पद्धति क्या है, जिसका सूफी काव्यों के प्रसंग में बार.बार उल्लेख मिलता है।

असल में ‘मसनवी’ फारसी का एक छन्द है, जिसमें फारस के कवियों ने प्रेमाख्यान लिखे। यों उस छन्द में अन्य प्रकार के काव्य भी लिखे गये। मसनवी की दो अर्द्धलयाँ परस्पर तुकान्त होती हैं, लम्बाई की कोई सीमा निर्धारित नहीं होती। बाद में यह छन्द प्रेमाख्यानों के लिए रूढ़ हो गया और प्रेमाख्यानक काव्य को मसनवी कहा जाने लगा। अमीर खुसरो तथा फैजी ने भी इस छन्द को अपनाया, लेकिन अवधी में लिखित सूफी प्रेमाख्यानों में दोहा.चौपाई छन्दों को अपनाया गया। फारसी मसनवियों में कुछ अन्य बातें भी रूढ़ हो गयीं। जैसे कि मसनवी (प्रेमाख्यानक काव्य) के आरम्भ में क्रमश: ईश्वर. वन्दना, पैगम्बर मुहम्मद साहब की स्तुति, मुहम्मद साहब के चार मित्रों या प्रारम्भिक खलीफाओं (अबूबकर, आदिल उमर, उसमान और अली) की प्रशंसा, तत्कालीन शासक (शाहेवक्त) की तारीफ, कवि द्वारा अपने गुरु या पीर का और स्वयं अपना परिचय देना। हिन्दी सूफी कवियों ने भी इस क्रम को अंगीकार कर लिया। मसनवी काव्यों में अलग.अलग सर्ग या अध्याय नहीं होते, बल्कि घटनाएँ ही कथा-साहित्य का काम देती हैं और उन्हीं को उपशीर्षक के रूप में दे दिया जाता है।

हिन्दी सूफी कवियों ने अपने काव्य में बारहमासा, षड़ऋतु का वर्णन भी किया है और उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि सादृश्यमूलक अलंकारों का प्रयोग अधिक किया है। अधिकतर कथानक और सौन्दर्य के उपमान भारतीय परम्परा से ग्रहण किये हैं।

सूफी काव्यों का कथा-रूप - हिन्दी के सूफी प्रेमाख्यानों का कथा.रूप भी प्राय: रूढ़ हो गया है। अधिकांश प्रेमाख्यानों में कथा का ढाँचा मिलता है : नायक अपने माता.पिता की इकलौती सन्तान. माता.पिता के दानपुण्य, तपस्या या सिद्ध पीर के आशीर्वाद के फलस्वरूप उसका जन्म नायक प्राय: विवाहित.नायिका के सौन्दर्य की चर्चा सुनकर (चित्र, स्वप्न, प्रत्यक्ष दर्शन से भी) उसका विरहाकुल हो जाना- माता.पिता और पत्नी को त्यागकर, कुछ साथियों को लेकर, योगी के वेश में, नायिका की खोज में निकल जाना- मार्ग में अनेक विघ्न-बाधाएँ आना- गुरु के द्वारा मार्ग दर्शन.नायिका की प्राप्ति-कुछ काल नायिका के देश में रहने के बाद अपने देश को वापसी। अधिकांश प्रेमाख्यान सुखान्त हैं पर कुछ दुखान्त भी हैं।

सूफी प्रेमाख्यानों में प्रतीकात्मकता होती है। उनमें लौकिक कथानक के माध्यम से अलौकिक बात कही जाती है। उनमें वर्णित नायक आत्मा का आरै नायिका ईश्वर का तथा मार्ग की रुकावटें साधना मार्ग की बाधाओं (शैतान) का प्रतीक होती हैं। नायिका के अंग-प्रत्यंग, काम-क्रीड़ा तथा सप्तखंडी धौराहर भी सूफी-साधना के प्रतीक माने जाते हैं।


हिन्दी के सूफी प्रेमाख्यान - सूफी मत के इतिहास, सिद्धान्त तथा काव्य एवं कथा-रूपों की इस सामान्य चर्चा के बाद आइए, अब हम हिन्दी के सूफी प्रेमाख्यानों से परिचय प्राप्त करे। हिन्दी में सूफी काव्य.रचना का इतिहास चौदहवीं से उन्नीसवीं सदी ईसवी तक- लगभग छ: सौ वर्षों में फैला। मुल्ला दाउद के ‘चंदायन’ काव्य से इस काव्य परम्परा का प्रारम्भ होता है। और शेख नसीर के ‘प्रेम.दर्पण’ पर इसकी समाप्ति होती है। इनमें से अधिकांश प्रेमाख्यान मध्य आरै पूर्वी उत्तर पद्र ेश के कवियों द्वारा लिखित हैं। 

अत: उस क्षेत्र के लोक-जीवन का चित्र इन काव्यों में उभरा है। यद्यपि इन काव्यों का उद्देश्य सूफी मत का प्रचार करना था और इसके अधिकांश कवि मुसलमान थे, तो भी इनमें हिन्दू. संस्कारो, रीति.रिवाजों तथा भावनाओं के प्रति समादर मिलता है। यही कारण है कि सूफी कवियों के काव्य हिन्दुओं के बीच भी लोक प्रिय बन पाये और जो काम कबीर की झाड़-फटकार ने नहीं किया था, वह काम सूफियों की प्रेमगाथाओं ने कर दिया। 

हिन्दुओं और मुसलमानों के हृदयों पर इन काव्यों ने प्रेम का मरहम लगाया तथा दोनों धर्मावलम्बियों को निकट लाने में काफी हद तक सफलता पायी। सूफी कवि और काव्य-परम्परा में मलिक मुहम्मद जायसी तथा उनका महाकाव्य ‘पद्मावत’ सिरमौर है।

Bandey

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