आरक्षण क्या है?

आरक्षण एक उपाय है जिसके माध्यम से कुछ पदों को रोजगार में सुरक्षित किया जाता है तथा संसद, राज्य विधान मंडल एवं स्थानीय निकायों में कमजोर वर्गों  अनुसूचित, अनुसूचित जन जातियों, महिलाओं, अन्य पिछडे़ वर्गों अथवा ई.वी.एस., के लिए सीटें आरक्षित की जाती है। आरक्षण का लाभ किसी भी ऐसे समूह द्वारा नहीं किया जा सकता जो कानून द्वारा उनके लिए हकदार नहीं है। आरक्षण की आवश्यकता क्यों है? समाज के उन वर्गों की सहायता की आवश्यकता हे जो राज्य या किसी अन्य अभिकरण की सहायता से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकते। क्या आरक्षण अनारक्षित वर्गों के खिलाफ या भेदभावपूर्ण है? यह सकारात्मक अर्थ में भेदभाव पूर्ण है न कि नकारात्मक अर्थ में। इस तरह के भेदभाव के लिए उन्हें राज्य की सहायता की आवश्यकता होती है, ताकि अनारक्षित वर्ग को बराबर लाया जा सके। इस अर्थ में आरक्षण को सकारात्मक भेदभाव भी कहा जाता है। क्योंकि आरक्षण की पहल राज्य द्वारा की जाती है इसलिए इसे सकारात्मक कार्यवाही भी कहा जाता है। 

भारतीय राज्य विभिन्न समुदायों को भिन्न आधार पर आरक्षण प्रदान करता है। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण का प्रमुख आधार सामाजिक भेदभाव एवं छुआछूत जैसी समस्या रही है जिन्हें उन्होंने बहुत समय से अनुभव किया है। जबकि अनुसूचित जनजातियों को उनके भौगोलिक तथा अन्य कारणों से उत्पन्न अभावों के आधार पर आरक्षण दिया गया है। जबकि अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण उनके सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के कारण दिया है। महिलाओं को आरक्षण समाज में उनके खिलाफ हो रहे भेदभाव एवं पितृसत्ता जैसे मूल्यों के आधार पर दिया गया है। जबकि गरीब वर्गों को उनके आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया गया है।  आर्थिक आधार पर आरक्षण उन समुदायों को दिया गया है जिन्हें किसी भी वर्ग में आरक्षण नहीं मिल रहा है। ये मूल रूप से उच्च जातियों से संबंध रखते हैं।

संवैधानिक प्रावधान

एक समतावादी और धर्मनिरपेक्ष समाज की स्थापना के उद्देश्य से अनु. 15 (4) और 16 (4) के अनुसार पिछड़े वर्गों को आरक्षण प्रदान किया गया है। भारत के संविधान में आरक्षण का आश्वासन देने वाले अनुच्छेदों का समावेश संि वधान सभा में वाद विवाद का परिणाम था। संविधान सभा में आरक्षण के विषय पर तीन तर्क थे। दो तर्कों ने आरक्षण का विरोध किया। तीसरे ने उसका समर्थन किया। आरक्षण का विरोध करने वाले एक तर्क ने रेखांकित किया कि इससे योग्यता और क्षमता में कमी आयेगी। इससे समाज के अंदर बंटवारा पैदा होगा। जबकि दूसरे तर्क ने आरक्षण का विरोध नहीं किया। सैद्धांतिक तौर पर तो विरोध नहीं किया लेकिन यह माना कि इससे समाज में असमानताओं को दूर नहीं किया जा सकता। तीसरा तर्क जिसने आरक्षण को पूरी तरह से समर्थन किया था, उनका मानना था कि पिछड़ी जातियों ने कई सदियों तक भेदभाव का सामना किया है तथा वे आग भी इसका सामना कर रही है स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी। इन पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने से समाज में व्याप्त असमानताओं की व्यवस्था का हल किया जा सकता है। 

संविधान सभा के कई सदस्यों जिन्होंने आरक्षण का समर्थन किया था, निम्न तर्क दिये थे: कमजोर तबको को विशेष लाभ देने चाहिए जैसे कि आरक्षण तथा इससे अन्य पिछडे़ वर्गों की आशाएं भी पूरी हो जायेगी। आरक्षण को लागू करने के लिए केन्द्र सरकार ने 1950 में एक अध्यादेश पारित किया। इस अध्यादेश ने एस.सी. और एस.टी. वर्गों की पहचान की जिन्हें आरक्षण दिया जा सके। लेकिन इसने अन्य पिछडे़ वर्गों को आरक्षण प्रदान नहीं किया। हालांकि इसने ‘‘पिछडे़ वर्ग’’ या ‘‘कमजोर वर्ग’’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। इसका नतीजा यह हुआ कि इसने, दक्षिण भारत में पिछडे़ वर्गों का आंदोलन द्रविड  कड़गम (डी.के.) के नेतृत्व में शुरू हुआ।

इस माँग के प्रत्युत्तर में केन्द्र सरकार ने नेहरू के नेतृत्व में प्रथम संविधान संशोधन पारित किया और संविधान में अनु. 15 में एक उपवंध (4) जोड़ा गया जिसने अनु. 15 (4) को रूप ले लिया था। इस अनु. में सामाजिक आरै शैक्षिक तौर पर पिछडे़ वर्गों की पहचान की गयी थी। 1951 में मद्रास सरकार ने एक अध्यादेश पारित किया जिसमें पिछडे़ वगोर्ं एवं एस.सीके लिए आरक्षण देने की बात थी। ओ.बी.सी. वर्गों के लिये आरक्षण केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने आयोग की सिफारिशों के बाद अपने.2 क्षेत्र में लागू किया था। जैसा कि आप इस इकाई में पढ़ेगें दो आयोगों . 1953 में कालेलकर आयोग एवं 1979 में मंडल आयोग का गठन किया था जिसने पिछडे़ वर्गों की पहचान की थी ओर उन्हें केंद्रिय सरकारी संस्थाओं आरक्षण देने की सिफारिश की थी। विभिन्न राज्य सरकारों ने भिन्न-भिन्न समय में आयोग गठित किये थे ताकि पिछडे़ वर्गों की पहचान की जा सके एवं उन्हें आरक्षण का लाभ मिल सकें।

अनु. जातियों के लिये आरक्षण

अनु. जातियों के लिये आरक्षण की उत्पत्ति पूना समझौते से से जुड़ी हुई है। जिस पर गाँधी और अंबेडकर ने हस्ताक्षर किये थे। पूना समझौते के अनुसार, अनुसूचित जातियों को विधानसभा और संसद में आरक्षण दिया गया था। 1935 के भारत सरकार अधिनियम, तहत आरक्षण को कानूनी मंजूरी दी गई थी। संविधान सभा में अनुसूचित जाति सदस्यों का प्रतिनिधित्व था जिनका ब्रिटिश भारत में विधायी स्वीकृति थी। संविधान सभा में आरक्षण की चर्चा की गयी। संविधान सभा ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें सार्वजनिक संस्थानों में अनु. जाति तथा अनु. जन.जातियों के लिये आरक्षण का सुझाव दिया गया। तदनुसार, आरक्षण के बारे में उपबंध संविधान के अनु. 15 और 16 में शामिल किये गये। 

1950 में संविधान में लाग ू हाने के साथ-साथ ये प्रावधान भी प्रभावशील हुए। 1947 में अनु. जाति तथा जन जातियों के आरक्षण को रोजगार और विधानमंडल में लागू करने का निर्णय लिया गया। 1954 में शिक्षा संस्थानों में इसका विस्तार हुआ। केन्द्र सरकार द्वारा निधिकृत उच्च शिक्षा संस्थाओं में 22.5 प्रतिशत उपलब्ध सीटें अनु. जाति और 7.5 प्रतिशत अनु. जन.जाति के छात्रों के लिए आरक्षित है।

पिछड़े वर्गों का आरक्षण का इतिहास

यद्यपि सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछडे़ वर्गों जैसे अनु. जाति, अनुसूचित जन.जाति, महिला वर्ग, और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोगों के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही आरक्षण लागू किया गया था, लेकिन इसका इतिहास औपनिवेशिक काल से ही रहा है। सन 1880 में औपनिवेशिक सरकार के सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने के लिए हंटर आयोग की स्थापना की। ज्योतिराव फूले ने हंटर आयोग के समक्ष अपील की थी। 1902 में कोल्हापुर के महाराजा साहू जी इन वर्गों को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही। आधुनिक भारत के इतिहास में यह पहला उदाहरण है आरक्षण देने का। 1921 में मद्रास सरकार ने समुदाय मुताबिक आरक्षण देने का प्रावधान किया वो इस प्रकार है : 44 प्रतिशत गैर.ब्राह्मणों को, 16 प्रतिशत ब्राह्मणों एवं मुस्लिम, ईसाई और आंग्ल. भारतीय लोगो प्रत्येक के लिए।

Comments