आर्य समाज के सिद्धांत और कार्य

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आर्य समाज

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द जी सरस्वती हैं । सन् 1824 ई. में गुजरात के वंकरा परगने के जिवपुर ग्राम में इनका जन्म हुआ था । बचपन का नाम मूलशंकर था । जब वे 21 वर्ष के हुये तो गृह त्याग कर दिया 15 वर्षो तक यहां वहां भ्रमण करते रहे । सन् 1860 ई. में उन्होंने मथुरा पहुंचकर स्वामी वृजानन्द से दीक्षा ली । वहीं संस्कृत का अध्ययन किया तथा वेदों का भी गहन अध्ययन किया । उन्होंने ‘वेदो की ओर लौटों’ का नारा बुलन्द किया । कहा जाता है कि बचपन में एक बार शिवरात्रि के पर्व पर एक मन्दिर में शिवलिंग पर एक चुहे को प्रसाद खाते हये देखकर उनका विश्वास मूर्तिपूजा से हट गया ।

आर्य समाज की स्थापना

हिन्दू धर्म की वास्तविकता को सामने लाने के लिये स्वामी दयानन्द जी ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ग्रन्थ की रचना की । सन 1857 ई. में उन्होंने मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की । आगे चलकर 1877 ई. में लाहौर तथा 1878 ई. में दिल्ली में आर्य समाज की स्थापना उनके द्वारा की गई । 30 अक्टूबर 1883 ई. को स्वामी जी का देहावसान हो गया ।

आर्य समाज के सिद्धांत

आर्य समाज के सिद्धांत arya samaj ke siddhant स्वामीजी ने सत्यार्थ प्रकाश के आधार पर आर्य समाज के निम्न सिद्धांत बनाये-
  1. वेद सच्चे ज्ञान के स्त्रोत हैं इसलिये इनका अध्ययन सभी को करना चहिये । 
  2. ईश्वर निर्विकार, दयालु, अजर, अमर, सृष्टिकर्ता, न्यायकारी एवं सर्वशक्ति मान है । 
  3. किसी भी कार्य को सत्य एवं असत्य का विचार करके ही करना चाहिये । 
  4. सभी को असत्य का त्याग एवं सत्य को ग्रहण करना चाहिये ।
  5. मानव को केवल अपनी उन्नति से ही सन्तुष्ट नहीं होना चाहिये बल्कि सभी की उन्नति से ही संतुष्ट नहीं होना चाहिये बल्कि सभी की उन्नति में अपनी उन्नति समझना चाहिये ।
  6. समस्त मानव समुदाय को शारीरिक, आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति के लिये प्रयासरत रहना चाहिये ।
  7. धर्मानुकूल आचरण करना मानव का प्रमुख कर्तव्य है । इसे भूलना नहीं चाहिये । 
  8. अविद्या को समाप्त कर विद्या का प्रचार प्रसार करना चाहिये ।
  9. स्वयं के हित से संबंधित कार्य में आचरण की स्वतंत्रा रखनी चाहिये परन्तु सामाजिक कार्यो में आपसी मतभेदों को भुला देना चाहिये । 
  10.  ज्ञान की प्राप्ति से ईश्वर का बोध होता है ।

आर्य समाज के कार्य

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से समाज को पुनर्जागृत किया । तत्कालीन भारत में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में सुधार आदि के कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया । जैसे-
  1. सतीप्रथा को समाप्त करने पर जोर दिया । बाल विवाह को सामाजिक बुराई माना। विधवा विवाह का समर्थन किया । जाति-पांति एवं छुआ-छूत का अत्यधिक विरोध किया । 
  2. स्त्रियों को समाज में आदर मिले इसके लिए स्त्री शिक्षा पर जोर दिया । वैदिक शिक्षा के प्रसार प्रचार के लिये गुरूकुल स्थापित करवाये । इसमें हरिद्वार का गुरूकुल कांगड़ी अत्यधीक प्रसिद्ध शिक्षा का केन्द्र है । 
  3. आर्य समाज ने वेदों की ओर लौटों का नारा दिया तथा बुद्धदेववाद व अवतारवाद का खण्डन किया । अन्धविश्वास तथा मूर्ति पूजा का विरोध कर एक ईश्वर की आराधना करने का सन्देश दिया । प्राचीन आर्य संस्कृति और सभ्यता को सामने रखकर भारतीयों में आत्मसम्मान व गौरव पैदा करने का काम किया ।
  4. स्वामीजी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वेदीश वस्तुओं के प्रचार प्रसार जोर दिया। उन्होंने भारतीयों को पुनर्जाग्रत करने का काम किया । सत्यार्थ प्रकाश में लिखा कि अच्छे से अच्छा विदेशी शासन स्वदेशी शासन की तुलना नहीं कर सकता । वे प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने कहा कि भारत भारतवासियों के लिये है ।

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