भारतीय शास्त्रीय नृत्य के प्रकार

भारतीय नृत्य-कला की उत्पत्ति एवं विकास की अपनी एक स्वतन्त्र परम्परा रही है। इसकी उत्पत्ति वैदिक काल से ही हो चुकी थी। जिसका प्रमाण वेदों में पर्याप्त रूप में प्राप्त होता है। वेदों को मानव जीवन के धर्म, संस्कृति, विज्ञान, साहित्य, सभ्यता एवं कला कौशल का विशाल स्रोत माना गया है। इसलिए इसे विश्वकोश कहा गया है। भारतीय नृत्य कला का प्रेरणा स्रोत वेद को ही बताया गया है। आचार्य भरत मुनि द्वारा रचित ग्रन्थ ‘‘नाट्यशास्त्र‘‘ जो भारतीय नाट्य-नृत्य विषयक मुख्य ग्रन्थ माना गया है। इस ग्रन्थ के रचना विधान में भी चारों वेदों से सार ग्रहण करके पंचम वेद के रूप में इसे बनाया गया है। 

वैदिक युग की यह कला किस रूप में आगे आयी इसका कोई क्रमबद्ध इतिहास प्राप्त नहीं होता है। परन्तु समय-समय पर रचित ग्रन्थों एवं कृतियों से हम यह अनुमान लगा सकते हैं, कि लोक-जीवन में इस कला को बहुत ही उत्सुकता के साथ अपनाया गया है। प्राचीन काल की यह कला परम्परा को आज भी लोक-जीवन में पूर्ण उत्साह एवं रूचिपूर्वक अपनाया जाता है।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य

भारतीय शास्त्रीय नृत्य का प्रेरणास्रोत भरतमुनि का नाट्यशास्त्र एक प्रमुख एवं विशाल ग्रन्थ है। जिसने भारतीय नृत्यों को विभिन्न रूप से प्रभावित किया। प्रत्येक नृत्य शैली के अपने-अपने सिद्धान्त हैं। जो नाट्य शास्त्र के सिद्धान्त को आधार बनाकर विकसित हुए हैं। भरतनाट्यम्, कथकली, ओडिशी, मोहिनीअट्टम, कुचिपुडी, मणीपुरी, कथक, सत्रिया एवं छाउ आदि नृत्यों में आचार्य भरत के नाट्यशास्त्र के सूत्रों को देख सकते हैं।

शास्त्रीय नृत्यों का मुख्य स्रोत नाट्य-वेद (नाट्यशास्त्र) है। हमारे भारत के विभिन्न प्रान्तों में बहुत से नृत्य विकसित हुए जो, प्रारंभ में लोक नृत्य के रूप में ही रहे परन्तु जब उनका अवलोकन किया गया तो उनमें पूर्ण रूप से शास्त्र के नियम विद्यमान रहे। इस आधार पर उनको शास्त्रीय नृत्य श्रेणी में रखा गया। 

भारतीय शास्त्रीय नृत्य के प्रकार

आज हमारे यहाँ (भारत) प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों की श्रेणी में-भरतनाट्यम, ओडीशी, मोहिनीअट्टम, कथकलि, मणिपुरी, कथक, कुचिपुड़ी, सत्रिया नृत्य है। इनके अलावा छउ नृत्य जो कि शास्त्रीय नृत्य में मान्यता (भारत सरकार द्वारा) नहीं प्राप्त है, किन्तु पारम्परिक तरीके से होने के कारण व प्राचीन होने के कारण इनमें शास्त्रों के कई पक्षों का पालन होते हुए मिलता है। इसलिए इसे एक पारम्परिक नृत्य माना गया है।
  1. भरतनाट्यम :- दक्षिण भारत के तमिलनाडु प्रदेश का अत्यन्त ही प्राचीन नृत्य शैली है। इसकी परम्परा लगभग 2500 वर्षों से भी अधिक है।
  2. कथकलि :- केरल प्रान्त का मुख्य नृत्य है, जिनका उद्भव प्राचीन लोकाधर्मी नाट्य-नृत्य की परम्परा कृष्णादृम आदि से हुआ।
  3. मोहिनीअट्टम :- केरल के नागियार एवं तमिलनाडु की देवदासियों के सम्मिलित रूप से एक अन्य नृत्य पद्धति का विकास हुआ जिसे मोहिनीअट्टम नाम दिया गया।
  4. कुचिपुडी़ :- कुचिपुड़ी नृत्य का विकास आन्ध्र प्रदेश के कुचिपुड़ि नामक गाँव में भागवतर ब्राह्मणों द्वारा लगभग 1510-1530 ई0 में माना गया।
  5. ओडिशी :- भरतनाट्यम की तरह ही उडिशा का प्राचीन नृत्य, जिसका जन्म बुद्धकाल के सहजयान एवं वज्रयान के सौन्दर्य प्रधान साधना से माना जाता है।
  6. कथक :- उत्तर भारत का सुप्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य विधा ‘कथक’ अपनी एक अलग विशेषता के साथ उपस्थिति दर्ज कराता है।
  7. मणिपुरी :- भारत के उत्तर-पूर्व में बसा एक प्रदेश मणिपुर अपने धार्मिक और पौराणिक गाथाओं से युक्त मणिपुरी नृत्य के लिए भी लोकप्रिय रहा है।
  8. सत्रिया :- आसाम का लालित्यमय नृत्य शैली सत्रिया नृत्य जिसे 2000 में शास्त्रीय नृत्य में सम्मिलित किया गया।

Bandey

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