ब्रह्म समाज के उद्देश्य और सिद्धांत

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राजा राममोहन राय 22 मई 1774 कां बगांल के एक ब्राम्हण परिवार में इन्होंने जन्म लिया । पिता रमाकान्त तथा माता नारिणी देवी थीं । वे अंग्रेजी भाषा के साथ फ्रेंच, ग्रीक, लेटिन, जर्मन एवं हिन्दू भाषा भी जानते थे । वे मूर्ति पूजा के विरोधी और एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे । वे ईसा के नैतिक सन्देशों के प्रशंसक थे उनकी मान्यता थी कि विश्व के सभी धर्मो का उपदेश समान है । 

सन् 1828 ई. में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की । यही ब्रह्म समाज कहलाई ।

ब्रह्म समाज के उद्देश्य

ब्रह्म समाज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य हिन्दू धर्म में सुधार एवं एकेश्वरवाद का प्रचार करना था ।

ब्रह्म समाज के सिद्धांत

  1. जाति, धर्म, वर्ण, प्रजाति आदि के भेद के बिना सभी को ईश्वर की आराधना करनी चाहिए । 
  2. शुद्ध मन से ईश्वर की उपासना करने से मनुष्य अच्छे कार्यो की ओर प्रवृत्त होता है तथा तृष्णा त्याग से मोक्ष प्राप्त होता । 
  3. ईश्वर के संबंध में मान्यता है कि ईश्वर निर्गुण निराकार व निर्विकारी है । वह देह धारण नहीं करता ।
  4. मानव अपने अच्छे व बुरे कर्मो के अनुसार अच्छे या बुरे फल प्राप्त करता है । 
  5. ब्रह्म समाज सभी धर्मो पर आस्था रखता है तथा उसकी मान्यता है कि सभी धर्म सन्मार्ग में चलने की प्रेरणा देते है ।

ब्रह्म समाज का मूल्यांकन

राजा राममोहन राय ने सर्वप्रथम भारत में धर्म सुधार एवं समाज सुधार आन्दोलन प्रारंभ किया । वे एक दूरदर्शी एवं महान चिन्तक भी थे । उन्होंने आधुनिक शिक्षा का प्रबल समर्थन किया । पाश्चात्य शिक्षा से प्रगतिशील विचारों की जानकारी हो सके इसी लिये उसका समर्थन किया । वे पत्रकारिता के अग्रदूत, विश्वराजनीति के ज्ञाता तथा राष्ट्रवाद के जनक थे । उन्होंने सती प्रथा जैसी कुरीतियों का विरोध कर नारी की स्वतंत्र व उसके अधिकारों की वकालत की ।

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