ब्रह्म समाज के उद्देश्य और सिद्धांत

ब्रह्म समाज एक सामाजिक-धार्मिक आंदोलन था जिसने बंगाल के पुनर्जागरण युग को प्रभावित किया। इसके प्रवर्तक, राजा राम मोहन राय, अपने समय के विशिष्ट समाज सुधारक थे। 1828 में ब्रह्य समाज के नाम से जाना गया। देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने उसे आगे बढ़ाया। बाद में केशवचंद्र सेन जुडे़। उन दोनों के बीच मतभेद के कारण केशवचंद्र सेन ने सन् 1866 ”भारत वर्षीय ब्रह्य समाज“ नाम की संस्था की स्थापना की।

ब्रह्म समाज के उद्देश्य

  1. हिंदू धर्म की कुरीतियों को दूर करते हुए, बौद्धिक एवं तार्किक जीवन पर बल देना।
  2. एकेश्वरवाद पर बल।
  3. सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करना।

ब्रह्म समाज के सिद्धांत

  1. ईश्वर एक है और वह संसार का निर्माणकर्ता है।
  2. आत्मा अमर है।
  3. मनुष्य को अहिंसा अपनाना चाहिए।
  4. सभी मानव समान है।

ब्रह्म समाज के कार्य

  1. उपनिषद एवं वेदों की महत्ता को सबके सामने लाया।
  2. समाज में व्याप्त सती प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह के विरोध में जोरदार संघर्ष।
  3. किसानों, मजदूरों, श्रमिकों के हित में बोलना।
  4. पाश्चात्य दर्शन के बेहतरीन तत्वों को अपनाने की कोशिश करना।

ब्रह्म समाज का मूल्यांकन

राजा राममोहन राय ने सर्वप्रथम भारत में धर्म सुधार एवं समाज सुधार आन्दोलन प्रारंभ किया । वे एक दूरदर्शी एवं महान चिन्तक भी थे । उन्होंने आधुनिक शिक्षा का प्रबल समर्थन किया । पाश्चात्य शिक्षा से प्रगतिशील विचारों की जानकारी हो सके इसी लिये उसका समर्थन किया । वे पत्रकारिता के अग्रदूत, विश्वराजनीति के ज्ञाता तथा राष्ट्रवाद के जनक थे । उन्होंने सती प्रथा जैसी कुरीतियों का विरोध कर नारी की स्वतंत्र व उसके अधिकारों की वकालत की ।

उपलब्धि

  1. 1829 में विलियम बेंटिक ने कानून बनाकर सती प्रथा को अवैध घोषित किया।
  2. समाज में काफी हद तक सुधार आया।
  3. समाज में जाति, धर्म इत्यादि पर आधारित भेदभाव पर काफी हद तक कमी आई।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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