ख्याल गायन का अर्थ, ख्याल गायन शैली क्या है?

ख्याल का अर्थ है कल्पना इसमें राग के नियमों में कई स्वर समूहों की लय व ताल के साथ कल्पना कर, राग का स्वरूप स्थापित किया जाता है। ख्याल गायन में विलम्बित, मध्य एवं द्रुत लय की रचनाएं गाई जाती हैं। इसमें आलाप - ‘अकार’  ‘अ’, ‘आकार’ अर्थात ‘आ’, ‘उकार’ अर्थात ‘उ’ एवं ‘इकार’ अर्थात ‘इ’ वर्णों के माध्यम से किया जाता है। राग के भाव व रस के आधार पर पद्य का चयन कर रचनाएं गाई जाती हैं जिसका अलंकरण आलाप, बोल आलाप, बोल तान, सरगम एवं तानों के प्रयोग से किया जाता है। विलम्बित लय की रचना अथवा बन्दिश को बड़ा ख्याल कहा जाता है। बड़े ख्याल हेतु एकताल, तिलवाडा़ , झूमरा आदि तालों का प्रयोग किया जाता है। मध्य व द्रुत लय की रचना अथवा बन्दिश को छोटा ख्याल कहा जाता है। मध्य लय एवं द्रुत लय की रचना - तीनताल, एकताल, आड़ाचारताल तालों में की जाती है। अति द्रुत लय में ‘तराना’ गाया जाता है। अति द्रत लय में चूंकि शब्दों का उच्चारण शुद्ध नहीं रखा जा सकता है इसमें निरर्थक शब्द जैसे दानी-तानी, दीम, तन, तनन, देरे, ना द्रीतोम आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। बड़े एवं छोटे ख्याल के बाद ही तराना गाने की परम्परा है क्योंकि लय शास्त्र के नियमानुसार क्रमशः विलम्बित, मध्य एवं द्रुत लय का प्रयोग किया जाता है। यह कोमल एवं मधुर गायन शैली है। इसमें लय-ताल हेतु अवनद्ध वाद्य तबले का प्रयोग किया जाता है।

ख्याल गायन शैली क्या है?

ख्याल गायन शैली आधुनिक समय की एक लोकप्रिय गायन शैली है। ख्याल शब्द फारसी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है विचार या ‘कल्पना’। कुछ विद्वान ख्याल का अर्थ स्वेच्छाचार भी मानते हैं अत: हम कह सकते हैं कि राग के नियमों का पालन करते हुए अपनी कल्पना या इच्छा के अनुसार, कई प्रकार से राग के स्वरूप का वर्णन तथा विस्तार करना ही ख्याल है।

यह गीत शैली कब आरम्भ हुई इसके विषय में कई मत प्राप्त होते हैं- एक मत के अनुसार ख्याल का आविष्कार अमीर खुसरो ने किया था, परन्तु उस समय के ग्रंथों को देखने से ज्ञात होता है कि उस समय कव्वाली आदि तो प्रचार में थे परन्तु ख्याल का तो कही नाम भी नहीं मिलता है। कुछ इसे प्राचीन काल से ही मानते हैं। उनके अनुसार पहले रस गायन शैली का नाम कुछ और था। विद्वानों के अनुसार मध्यकाल में प्रचलित रूपक नामक प्रबंध से ही ख्याल का विकास हुआ।

कुछ विद्वान साधारणी ‘गीति’ से ही ख्याल का जन्म मानते हैं। इस साधारणी गीति में अन्य चार गीतियों (गौड़ी, बेसरा, भिन्न, शुद्ध) का मिश्रण था। विद्वानों का तो एक समूह नियामत खाँ को ख्याल का आविष्कारक मानता है। मतभेद चाहे जितने भी हो पर आधुनिक काल में यह शैली सबसे प्रमुख गायन शैली बन चुकी है।

मध्ययुग में ध्रुपद गायन शैली के साथ-साथ ख्याल गायकी का प्रचार भी होने लगा था। नियामत खाँ ने इस गायन शैली को आगे बढ़ाया। धीरे-धीरे ध्रुपद का प्रचार-प्रसार कम होने लगा तथा ख्याल गायन शैली की लोकप्रियता बढ़ने लगी।

ख्याल गायकी में पहले थोड़ा सा राग वायक आलाप किया जाता है। आलाप के बाद बड़ा ख्याल गाया जाता है। यह विलम्बित लय में होता है तथा इसे अधिकता तीन ताल, एक ताल, आदि में गाया जाता है। इसके बाद छोटा ख्याल गाया जाता है। इसकी लय द्रुत होती है। ख्याल गायकी में राग के लक्षणों के अतिरिक्त, कण, मीड, गमक आदि का प्रयोग गायक अपनी इच्छा के अनुसार करता है, काव्य लय, स्वर आदि के संयोग से ख्याल गायकी प्रसिद्ध शैली है। ख्याल गायन की संगत तबले पर की जाती है।

Bandey

मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता (MSW Passout 2014 MGCGVV University) चित्रकूट, भारत से ब्लॉगर हूं।

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