चुनाव आयोग के कार्य और शक्तियां

on
चुनाव आयोग के कार्य

एक लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए स्वतंत्र, और निष्पक्ष चुनाव अनिवार्य हैं और यह संविधान का मूलभूत पहलू भी हैं। चुनाव आयोग को भारत के चुनावों का संरक्षक माना जाता है। भारत के संविधान के अनुसार देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए एक स्वतंत्र चुनाव आयोग (EC) के गठन के लिए अनुच्छेद 324 के तहत प्रावधान है।

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के (सेवा की शर्तें) नियम, 1992 के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त (जो आमतौर पर सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी होते हैं) वेतन और भत्ता भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समान प्राप्त करते है। 

आयोग का सचिवालय नई दिल्ली में स्थित है और इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त, चुनाव आयुक्त, उप चुनाव आयुक्त (आमतौर पर आई.ए.एस. अधिकारी), महानिदेशक, प्रमुख सचिव, सचिव और अवर सचिव के कार्यालय हैं।

राज्य स्तर पर, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, जो प्रमुख सचिव पद का एक आई.ए.एस अधिकारी होता है, संबंधित राज्य में चुनाव के प्रबंधन के लिए उत्तरदायी होता है। जिला और निर्वाचन क्षेत्रों में जिला न्यायाधीश (जिला निर्वाचन अधिकारी के रूप में) निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी, और निर्वाचन अधिकारी चुनाव सम्बन्धित कार्य करते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रकार पद से हटाया जा सकता है जैसाकि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को। अन्य चुनाव आयुक्तों को भारत के राष्ट्रपति द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त की सलाह पर हटाया जा सकता है।

चुनाव आयोग के कार्य और शक्तियां

चुनाव आयोग के कार्य और शक्तियां, chunav aayog ke karya ko likhiye चुनाव आयोग की शक्ति और कार्यों पर चर्चा संविधान के अनुच्छेद 324-329 में उल्लिखित है:

1. चुनाव आयोग देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का पर्यवेक्षण, निर्देशन, नियंत्रण और संचालन करता है।

2. यह लोकसभा और राज्य विधानसभा (विधान सभा का निचला दल) के प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची तैयार करता है। यह मतदाता सूची को प्रत्येक जनगणना के पश्चात संशोधित करता है और हर चुनाव से पहले इसका नवीनीकरण करता है।

3. निष्पक्ष तरीके से चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग चुनावों की आचार संहिता का निर्धारण और घोषणा करता है। 1971 में 5वीं लोकसभा चुनावों से सभी राजनीतिक दलों व उम्मीदवारों को एक मॉडल आचार संहिता का पालन करना पड़ता है, जो चुनाव आयोग प्रत्येक चुनाव के लिए जारी करता हैं। ये दिशानिर्देश विभिन्न राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा अधिकारिक तंत्र के दुरुपयोग से नियमों और विनियमों के दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार को रेखांकित करते हुए भारत की संसद (लोकसभा और राज्यसभा) द्वारा पारित दो-तिहाई बहुमत का प्रस्ताव उल्लंघन के कारण प्राप्त की जा रही शिकायतों पर आधारित थे। आचार संहिता का कोई विशिष्ट वैधानिक आधार नहीं है, परन्तु यह केवल एक प्रेरक प्रभाव डालता है। इसमें चुनावी नैतिकता के नियम सम्मिलित होते है।

4. यह लोकसभा और विधानसभा के चुनाव करवाता है, जब भी ये चुनाव होने होते हैं। यह हर दो साल में राज्यसभा के चुनाव भी आयोजित करता हे क्योंकि राज्य सभा के सदस्य हर 2 साल के बाद सेवामुक्त हो जाते हैं। यह विधान परिषदों (राज्य विधानमंडल के ऊपरी सदन, जहाँ भी ये अस्तिव में हैं) के लिए चुनाव कराने के लिए उत्तरदायी है। यह उपचुनाव भी करवाता है।

5. यह भारत के राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के कार्यालयों के लिए चुनावों का संचालन करता है, जब भी उचित होता है। यह मतदाताओं की सूची तैयार करता है और चुनाव जीतने के लिए आवश्यक निर्वाचक मंडल के प्रत्येक वोट के वेटेज और महत्व को ध्यान में रखते हुए वोटों का कोटा तैयार करता है।

6. चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग माँग कर सकता है कि उसे कुछ कर्मियों की सेवायें उपलब्ध कराई जाए, जो केन्द्र आरै राज्य सरकारों में काम कर रहे हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों को कर्मियों को चुनाव कर्तव्यों को निभाने के लिए भेजना आवश्यक हाते ा हैं। इन कर्मियों की नियुक्ति चुनाव अधिकारी/प्रधान अधिकारी/अन्य मतदान अधिकारी के रूप में होती है। ऐसे प्रतिनियुक्त कर्मचारी चुनाव आयोग द्वारा निर्देशित और नियंत्रित होते हैं।

7. हर आम चुनाव के बाद, चुनाव आयोग राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय या राज्य स्तर की मान्यता देता है। किसी भी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता तब प्राप्त हाते ी है जब वह न्यूनतम चार राज्यों में मतदान के दौरान प्राप्त कुल वैध मतों का न्यूनतम चार प्रतिशत प्राप्त कर लेता है। इसी तरह राज्यों में भी, एक राजनीतिक दल को संबंधित राज्य में कुल वैध मतों का न्यूनतम चार प्रतिशत प्राप्त हाने ा चाहिए, जिससे वह राज्य पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकती है।

8. आयोग के पास राजनीतिक दल के प्रतीक चिन्ह को नामित करने का अधिकार है और किन्हीं भी दो अलग-अलग राजनीतिक दलों को एक ही प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने की अनुमति नहीं है।

9. यह चुनाव व्यय की सीमा भी तय करता है।

10. आयोग को मतदान के रुझानों के प्रसार या प्रकाशन को प्रतिबंधित करने का अधिकार है। ये रुझान जनमत सर्वेक्षण या एक्जिट पोल से मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।

11. चुनाव आयोग ने दण्डित राजनेताओं पर आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया है, जिससे राजनीति को अपराधिकता से बचाया जा सके।

आधुनिकीकरण की दिशा में पहल

1. चुनावों में धन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने आयकर विभाग के भारतीय राजस्व सेवा अधिकारियों को सभी चुनावों के लिए चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त किया है। एक निश्चित धनराशि तय की गई है, जिसे एक उम्मीदवार चुनाव अभियानों के दौरान खर्च कर सकते हैं। इन सीमाओं को समय के साथ-साथ संशोधित किया जाता है। चुनाव आयोग, भारतीय राजस्व सेवा से व्यय पर्यवेक्षकों को नियुक्त करके व्यक्तिगत चुनाव व्यय के लेखा-जोखा पर दृष्टि रखता है। 

आयोग नामांकन पत्र जमा करते समय शपथ पत्र पर उम्मीदवार की संपत्ति का विवरण लेता है और उसे परिणामों की घोषणा होने पर 30 दिनों के भीतर अपने व्यय का विवरण देना होता है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए आयोग द्वारा अभियान की अवधि को भी 21 से घटाकर 14 दिन का कर दिया गया है। यह चुनाव व्यय में कटौती करने के लिए किया गया है।

2. चुनाव आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन अर्थात् ई.वी.एम.3 के द्वारा चुनाव प्रक्रियाओं में सुधार किया है। ई.वी.एम. पहली बार 1982 के विधानसभा चुनावों के लिए केरल राज्य में एक प्रयोगात्मक आधार पर अपनाया गया था। सफल परीक्षण और कानूनी जाँचो के बाद, आयोग ने इन वोटिंग मशीनों के उपयोग के साथ चुनाव कराने का निर्णय लिया। ईवीएम पर उम्मीदवारों की फोटो के साथ फोटो मतदाता सूची बनाने की पहल बिहार विधान सभा चुनाव 2015 में की गई थी।

3. चुनावी धोखाधड़ी को रोकने के प्रयासों में, 1993 में मतदाता फोटो पहचान पत्र चालू किए गए, जो 2004 के चुनावों में अनिवार्य हो गए। हालाँकि, कुछ स्थितियों में, चुनाव के प्रयोजनों के लिए राशनकार्ड की अनुमति दी गई है।

8. चुनाव आयोग के पास एक ओर इ.वी.एम. के साथ वी.वी.पी.ए.टी. तथा दूसरी ओर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि व चुनाव अधिकारियों के मध्य का एक सुदश्ढ,़ व्यवस्थित, और संस्थागत ढाँचा है। इस प्रकार सभी हितधारकों के इवी.ए म. व वी.वी.पी.ए.टी. में अनिवार्य भागीदारी से सम्पूर्ण चुनाव प्रणाली पूर्ण रूप से पारदर्शी हो जाती है, और मशीनों के साथ किसी भी प्रकार से छेड़खानी समाप्त हो जाती है।

9. 2014 में NOTA को भी जोड़ा गया था जो वोटिंग मशीनों पर एक विकल्प की तरह था, और अब किसी भी चुनाव में इस विकल्प को प्रदान किया जाना अनिवार्य है। परन्तु, चुनाव आयोग के कामकाज में स्वतंत्रता और निष्पक्षता एक संशय का विषय रहा है। पहली बात तो यह है कि भारत का संविधान सीईसी की योग्यता और कार्यकाल के बारे में कुछ नहीं कहता है। इस संबंध में प्रत्येक मामले को राष्ट्रपति के पास छोड दिया गया है, जिन्हें संसद द्वारा अधिनियमित कानून के प्रावधानों द्वारा निर्देशित किया गया है। 

इससे राजनीतिक आधार पर किसी व्यक्ति की नियुक्ति हो सकती है। इनकी नियुक्ति के लिए गोस्वामी रिपोर्ट के अनुसार, एक पैनल होना चाहिए, जिसमें सदस्यों के रूप में प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता, लोकसभा अध्यक्ष, और भारत के मुख्य न्यायाधीश होने चाहिए।

दूसरा, सीईसी, हालांकि निष्पक्ष रूप से चुनाव कराने का बाखूबी निभाता है लेकिन फिर भी उसे अपने कर्मचारियों की सेवा से संबंधित शर्तों को नियुक्त और विनियमित करने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार सर्वोच्च न्यायालय और संघ लोक सेवा आयोग जैसे समान निकायों के लिए उपलब्ध है।

Comments