मताधिकार किसे कहते हैं, मताधिकार की आयु

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संविधान के अनु0 326 के अनुसार संसद और राज्य विधान मण्डलों के लिए निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा। प्रत्येक वह व्यक्ति जो भारत का नागरिक है तथा 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है तथा अनिवास, चित्त, विकृति, अपराध या भ्रष्ट आचरण के कारण विधि द्वारा अयोग्य घोषित न किया गया, मत देने का अधिकार रखता है।

मताधिकार की आयु

पहले मत देने का अधिकार 21 वर्ष की आयु के व्यक्तियों को था परन्तु संविधान के 61वें संशोधन अधिनियम 1988 द्वारा यह आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गयी। धारा 62 मत देने के अधिकार से सम्बन्धित प्रावधान करती है धारा 62 की उपधारा (1) के अनुसार निर्वाचन में मत देने का अधिकार उसी व्यक्ति को प्राप्त होगा जिसका नाम उस क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में उपस्थित है जिसका नाम निर्वाचक नामावली में उपस्थित नहीं है वह मत देने का अधिकारी नहीं है।

लक्ष्मी चरन सेन बनाम ए0 के0 एम0 हुसैन (1999) के वाद में निण्र्ाीत हुआ कि मत देने के अधिकार को भी एक अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में माना जाना चाहिए। संग्राम सिंह बनाम भारत संघ के वाद में न्यायालय ने स्पष्ट रूप में कहा कि मत देने का अधिकार मूल अधिकार न होकर एक संविधिक अधिकार है।

धारा 62 की उपधारा (2) के अनुसार ऐसा कोई भी व्यक्ति मत देने का अधिकार नहीं रखता है जिसे अधिनियम 1950 की धारा 16 के अधीन अयोग्य घोषित कर दिया गया।

धारा 62 की उपधारा (3) के अनुसार कोई भी व्यक्ति साधारण निर्वाचन में एक से अधिक बार मत नहीं देगा भले ही उसका नाम एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में उपस्थित हो। और यदि वो ऐसा करता है तो उसके मत शून्य होंगें। धारा 62 की उपधारा (4) के अनुसार कोई भी व्यक्ति एक ही निर्वाचन क्षेत्र में एक से अधिक बार मत नहीं देगा भले ही उसका नाम एक ही निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में एक से अधिक बार उपस्थित हो। यदि वो ऐसा करता है तो उसके सभी मत शून्य होंगें।

धारा 62 की उपधारा (5) के अनुसार निम्नलिखित व्यक्ति किसी निर्वाचन में मतदान नहीं करेगा।
  1. वह व्यक्ति जो कारावास में परिरूद्ध है। या 
  2. अन्यथा कारावास में परिरूद्ध है। या 
  3. पुलिस की विधिपूर्ण अभिरक्षा में है।
परन्तु यदि कोई व्यक्ति निवारक निरूद्धि के अन्र्तगत है तो वह मतदान कर सकेगा।

अकुल चन्द्र प्रधान बनाम भारत संघ (2001) इस वाद में कहा गया कि कोई व्यक्ति जिसे जेल में या पुलिस की विधिपूर्ण अभिरक्षा में होने के कारण मत देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है वह यह नहीं कह सकता कि अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन हुआ है। धारा 62(5) का उद्देश्य स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनाव को बढ़ावा देना है जो कि संविधान का आधारभूत ढांचा है। मत देने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है जो कानून की सीमाओं के अन्तर्गत है। कोई भी कैदी सामान्य व्यक्ति की तरह इन अधिकार का दावा नहीं कर सकता है।

धारा 62 की उपधारा (6) के अनुसार- एक व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन रहते हुए प्रतिनिधि के तौर पर दो मत डाल सकता है और यह उपधारा (3) तथा उपधारा (4) का उल्लंघन नहीं होगा।

उदाहरणार्थ एक व्यक्ति जिसकी निर्वाचन में ड्यूटी लगती है तो वह एक प्रपत्र भरकर (जो कि निर्वाचन आयोग द्वारा विहित हो) अपना मत डालने का अधिकार किसी अन्य व्यक्ति को दे सकता है, परन्तु यहाँ पर यह आवश्यक है कि दोनों व्यक्ति एक ही निर्वाचन क्षेत्र के होने चाहिए।

इसी अधिनियम की धारा 11(क) के अनुसार किसी व्यक्ति को मत देने के अधिकार से वंचित किया जा सकता है यदि उसने निम्न में से कोई अपराध किया है।
  1. भा0द0सं0 1860 की धारा 171(ड़) के अधीन रिश्वत लेने के लिए दण्डित किया गया हो। 
  2. भा0द0सं0 1860 की धारा 171(च) के अधीन निर्वाचन मं असम्यक असर डालने या प्रतिरूपण के लिए दण्डित किया गया हो। 
  3. लो0प्र0 अधिनियम 1951 की धारा 125 के अधीन निर्वाचन के सम्बन्ध में विभिन्न वर्गों के बीच में या भारत के नागरिकों के बीच में घृणा की भावनाएं या शत्रुता की भावनाएं फैलायी हों। 
  4. लोक प्रति0 अधिनियम 1951 की धारा 135 के अधीन मतदान केन्द्रों से मत पत्र हटाने का अपराध किया हो। 
  5. लो0प्र0 अधिनियम 1951 की धारा 136(2)(क) अधीन निर्वाचन अपराध के लिए दण्डित किया गया हो।
इस धारा के अन्तर्गत किसी व्यक्ति को 6 वर्ष के लिए मतदान देने से वंचित किया जा सकता है।
इस प्रकार मत देने का अधिकार एक विधिक अधिकार है। जिसकी मांग मूल अधिकार के रूप में नहीं की जा सकती है, परन्तु साधारण परिस्थितियों में इसे किसी व्यक्ति से नहीं छीना जा सकता है।

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