आस्ट्रिक भाषा परिवार क्या है ?

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आस्ट्रिक भाषा परिवार आस्ट्रो- एशियाअिक और मलय-पालिनेशियन दोनों को मिलाकर आस्ट्रिक नाम दिया गया है। इस परिवार की दो शाखाएँ हैं। मान-ख्मेर शाखा की भाषाएँ बर्मा तथा हिंदी-चीन के कुछ देशों में बोली जाती हैं। भारत में इस शाखा की भाषाएँ खासी और निकोबारी हैं। खासी मेघालय की भाषा है। यह पहले विकसित भाषा नहीं थी, लेकिन अब इसमें साहित्य रचना होने लगी है। खासी रोमन में लिखी जाती है और स्कूलों में मातृभाषा के रूप में पढ़ाई जाती है। 

दूसरी भाषा निकोबारी निकोबार द्वीप समूह में व्यवहृत है। निकोबार के निवासी जनजातीय हैं। यह भाषा अधिक विकसित नहीं हैं। दूसरी उपशाखा को मुंडा भाषाएँ कहा जाता है। मुंडा भाषाएँ बोलने वाले सिफऱ् भारत में हैं। संस्कृत में इन भाषाओं में बोलने वालों को ‘निषाद’ की संज्ञा दी गयी थी और इनकी भाषा को ‘कोल’ कहा जाता था। मुंडा भाषाओं का क्षेत्र प्रमुखत: बिहार का छोटा नागपुर क्षेत्र है। 

मुंडा भाषाएँ बोलने वाले बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश आदि प्रदेशों में फैले हुए हैं।

भारत की प्रमुख मुंडा भाषाओं में बिहार की संथाली भाषा है। संथाली देवनागरी में लिखी जाती है। आधुनिक युग में इनमें साहित्यिक रचना भी होने लगी है। अन्य मुंडा भाषाएँ हैं- मुंडारी, कुर्कू, सवर (शबर), हो आदि। कुल मिलाकर मुंडा भाषाएँ अधिक विकसित नहीं हैं। हमने पिछली इकाई में ज़िक्र किया था कि भिन्न भाषा परिवारों में रचना की भिन्नता मिलती है। मुंडा भाषाओं में मध्यवर्ग या मध्य प्रत्यय से शब्द रचना होती है। यह विशेषता आर्य भाषाओं में नहीं होती। जैसे ‘दल’ (मारना) से ‘दपल’ (आपस में मारना) ‘ददल’ (खूब मारना), ‘आल’ (लिखना) से ‘अकाल’ (खूब लिखना) की रचना इस परिवार की विशेषता है। 

इस तरह धातु शब्द दो वर्ण वाले होते हैं और बहुधा मध्यसर्ग से शब्द रचना होती है। चूँकि मुंडा भाषाएँ चारों तरफ़ आर्य भाषाओं से घिरी है, इनमें आर्य भाषाओं की कई विशेषताएँ भी आ गई हैं और इस कारण समानताएँ विकसित हो गयी हैं।

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